वोट की राजनीतिः आखिर जनता का पैमाना क्या होता है?

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  • सिद्धार्थ

गाय पट्टी में बिहार वामपंथी, सोशलिस्ट और सामाजिक न्याय के आंदोलन का गढ़ रहा है। यह ऐसा प्रदेश रहा है, जहां 1970 के दशक में ही सोशलिस्ट पार्टी की सरकारें बनीं। भले ही ये सरकारें ज्यादा दिन नहीं चल पाई हों। वामपंथी आंदोलन, सोशलिस्ट आंदोलन और सामाजिक न्याय आंदोलन, तीनों का आधार सामाजिक तौर पर पिछड़े एवं दलित और आर्थिक तौर पर भूमिहीन एवं गरीब-सीमांत किसान रहे हैं, भले ही नेतृत्व में ऊंची जातियां भी रही हों। जहां सोशलिस्ट आंदोलन का मुख्य आधार पिछड़ा वर्ग था, वहीं वामपंथी आंदोलन का व्यापक आधार दलितों में भी था।

बिहार गाय पट्टी में एकमात्र ऐसा प्रदेश  बचा हुआ है, जहां भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपनी खुद के बहुमत वाली सरकार और अपना मुख्यमंत्री बनाने में आजादी के बाद से लेकर अब तक असफल रही है। इसका दूसरा निहितार्थ यह है कि कमंडल-मंडल के बीच राजनीतिक संघर्ष का जो युग 1989 में गाय पट्टी में शुरू हुआ था, जिसमें भले कमंडल की राजनीति करीब-करीब पूर्ण विजय की ओर बढ़ती दिख रही हो, लेकिन उसे वह अंतिम अंजाम तक पहुंचाने में बिहार में अब तक पूरी तरह सफल नहीं हुई है। गाय पट्टी में बिहार वामपंथी, सोशलिस्ट और सामाजिक न्याय के आंदोलन का गढ़ रहा है। गाय पट्टी में यह ऐसा प्रदेश रहा है, जहां 1970 के दशक में ही सोशलिस्ट पार्टी की सरकारें बनीं और कर्पूरी ठाकुर एवं वीपी मंडल जैसे सामाजिक न्याय के पुरोधा मुख्यमंत्री बने और शहीद जगदेव प्रसाद जैसे लोग ताकतवर नेता के रूप में उभरकर मंत्री भी बने। भले ये सरकारें ज्यादा दिन नहीं चल पाई हों। वामपंथी आंदोलन, सोशलिस्ट आंदोलन और सामाजिक न्याय आंदोलन, तीनों का आधार सामाजिक तौर पिछड़े एवं दलित और आर्थिक तौर पर भूमिहीन एवं गरीब-सीमांत किसान रहे हैं, भले ही नेतृत्व में ऊंची जातियां भी रही हों। जहां सोशलिस्ट आंदोलन का मुख्य आधार पिछड़ा वर्ग था, वहीं वामपंथी आंदोलन का व्यापक आधार दलितों में भी था।

ऊंची जातियां भाजपा के अभ्युदय से पहले कांग्रेस का मुख्य आधार थीं, जिनके साथ वह मुसलमानों एवं दलितों के एक हिस्से को जोड़ हुए थीं। यही तीनों बिहार में लंबे समय तक कांग्रेसी सरकारों के आधार थे। बिहार में पिछड़ा वर्ग कभी भी कांग्रेस का आधार नहीं रहा। अब कांग्रेस को कमोबेश पदस्थ करके भाजपा ने उसके कोर वोट बैंक ऊंची जातियों को अपने साथ कर लिया है और अति पिछड़े वर्गों के बीच भी अपनी पैठ बनाई है। वैसे आज भी बिहार में ऊंची जातियां ही भाजपा का मुख्य आधार हैं, जिसकी पुष्टि उसके द्वारा इस बार के विधानसभा चुनावों में टिकट वितरण से भी होती है। भाजपा ने अपने खाते की कुल 110 सीटों में करीब 60 प्रतिशत ऊंची जातियों को दी है। 50 सीटें पर सिर्फ चार जातियों राजपूत (21), भूमिहार (14), ब्राह्मण (12) और कायस्थों (3) को प्रत्याशी बनाया है, जबकि इनकी आबादी 15 प्रतिशत से भी कम है। भाजपा ने इन 50 सीटों के अलावा 14 सीटों पर वैश्य समुदाय को टिकट दिया है, जो भाजपा का परंपरागत वोट बैंक है, भले ही इसमें से एक बड़ा हिस्सा ओबीसी (अन्य पिछड़ी जातियां) एवं ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियां) की सूची में शामिल हो। इस तरह भाजपा ने 110 सीटों में 64 सीटें अपने परंपरागत वोट बैंक वालों को दी हैं। कांग्रेस इस बार ऊंची जातियों के वोटों को फिर अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रही है और उसने भी 48.57 प्रतिशत टिकट ऊंची जातियों को दिया है।

बिहार एक ऐसा प्रदेश रहा है, जिसने कमंडल की राजनीति को सबसे निर्णायक चुनौती दी। गाय पट्टी में बिहार में ही वामपंथी राजनीति भी जमीनी स्तर पर शुरू से सबसे अधिक  ताकतवर रही है और एक हद तक आज भी बनी हुई है। नक्सलवाड़ी के बाद भी बिहार वामपंथी माले धड़ों (एमएल ग्रुपों) की राजनीति का एक महत्त्वपूर्ण कार्य एवं प्रयोग स्थल रहा है, जिससें दलित-बहुजनों का ऊंची जातियों के साथ सशस्त्र संघर्ष भी हुआ है और दोनों के बीच अभी भी तीखी जातीय-वर्गीय घृणा बनी हुई। भूमि सुधार न हो पाने के चलते जहां ऊंची जातियों का जमीनों पर मालिकाना बना रहा, वहीं अधिकांश दलित-बहुजन भूमिहीन ही रहे, जिसने वर्गीय-जातीय अंतर्विरोध को तीखा बनाए रखा है। हां, यह सच है कि पिछड़े वर्गों की कुछ जातियां भी भूमि की मालिक बनीं, लेकिन दलित और अति पिछड़े कमोबेश पूरी तरह भूमिहीन मजदूर ही रहे।

 

वाम और सामाजिक न्याय की राजनीति

इस अंतर्विरोध को वामपंथी वर्गीय राजनीति और पिछड़ों की सामाजिक न्याय की राजनीति ने वैचारिक स्वर दिया। जिसने गाय पट्टी के अन्य प्रदेशों की तुलना में बिहार की प्रगतिशील वैचारिकी को ज्यादा सशक्त बनाया। इन सब कारणों ने मिलकर बिहार की सामाजिक न्याय की राजनीति को बगल के प्रदेश उत्तर प्रदेश से भिन्न स्वर दिया। जहां उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में मंडल की राजनीति, एक समय तक निर्णायक तौर पर मुसलमानों के साथ खड़ी होकर अपनी धर्मनिरपेक्ष छवि तो बनाए रख सकी, लेकिन मुलायम सिंह के सामाजिक न्याय की राजनीति में ऊंची जातियों को कोई वैचारिक चुनौती देने का स्वर नहीं था, न ही उसमें ब्राह्मणवाद विरोधी तेवर था। जबकि बिहार में लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व में सामाजिक न्याय की राजनीति निर्णायक तौर पर मुसलमानों के साथ खड़े होने के साथ अपने भीतर ऊंची जातियों का विरोधी राजनीतिक तेवर एवं स्वर लिए हुए थी, जिसमें ब्राह्मणवाद विरोधी एक पुट भी था।  लालू प्रसाद यादव के साथ लंबे समय तक नीतीश कुमार, शरद यादव और रामविलास पासवान भी थे। भले ही लालू के नेतृत्व वाली राजनीति ने संसाधनों के मालिकाने के संदर्भ में ऊंची जातियों के वर्चस्व को तोडऩे में कोई कोशिश न की हो यानी बिहार में लंबे समय से लंबित पड़े भूमि सुधार (भूमि संबंध) को अपना एजेंडा न बनाया हो।

लेकिन वामपंथ की जमीनी उपस्थिति एवं ऊंची जातियों के विरोधी तेवर वाली सामाजिक न्याय की राजनीति ने (लालू यादव से पहले और लालू यादव के नेतृत्व में भी) भाजपा को काफी हद तक बिहार में ऊंची जातियों तक सीमित रखा। इन जातियों में व्यापक और गहरी पैठ भाजपा ने अपने ऊंची जातियों के समर्थक वैचारिक-सांस्कृतिक एवं आर्थिक एजेंडों के साथ बनाया। जो ऊंची जातियां कांग्रेस का कोर वोट बैंक थीं, उसे तो भाजपा ने काफी हद तक कांग्रेस से छीन लिया, लेकिन सामाजिक न्याय की राजनीति करने वाले लालू यादव, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान से भाजपा उनका सामाजिक आधार पूरी तरह से छीन नहीं पाई। जिसके परिणाम स्वरूप उसे बिहार में कनिष्ठ सहयोगी के रूप में प्रदेश की सत्ता में जगह मिली और एक हद तक लोकसभा चुनावों में सफलता हासिल करने के लिए भी सामाजिक न्याय की राजनीति की एक धुरी, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान, पर निर्भर रहना पड़ा। बिहार में रामविलास पासवान आंबेडकरवादी राजनीति की पैदाइश नहीं थे, वह काफी हद तक सामाजिक न्याय की राजनीति की ही पैदाइश थे, भले ही उनका सामाजिक आधार दलितों-विशेषकर पासवानों में रहा हो। उनकी भी पृष्ठभूमि समाजवादी रही है। शायद बहुजन एवं वामपंथी राजनीति के ऊंची जाति विरोधी मुखर स्वर के चलते ही कांशीराम की राजनीति बिहार में पांव नहीं पसार पाई, क्योंकि दलितों एवं अति पिछड़ों का बड़ा हिस्सा इनमें से किसी न किसी समूह के साथ सक्रिय तौर पर खड़ा था और अपनी आशाओं-आकांक्षाओं की एक हद तक अभिव्यक्ति पा रहा था, जिसमें सामाजिक समता की आकांक्षा भी शामिल थी।

 

मोदी बनाम सामाजिक न्याय 

बिहार में यह स्थिति नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में 2014 में विशाल बहुमत से केंद्र में भाजपा की सरकार बनने और मोदी की लोकप्रियता के शिखर पर होने के बावजूद भी एक हद तक बनी रही। सन 2015 के बिहार विधानसभा के चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा बड़े जोशो-खरोश के साथ चुनावी मैदान में उतरी, लेकिन उसे लालू-नीतीश की जोड़ी के सामने बुरी तरह हार का मुंह देखना पड़ा और विधानसभा की 243 सीटों में उसे सिर्फ 53 सीटें ही मिलीं। एनडीए गठबंधन के अन्य सहयोगी दलों को पांच सीटें मिली थीं। इस तरह भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को कुल 58 सीटें मिल पाई थीं। दूसरी तरफ महागठबंधन (राजद, जेडीयू और कांग्रेस) को 178 सीटें मिली थीं और नीतीश कुमार के नेतृत्व में महागठबंधन की सरकार बनी। यह दीगर बात है कि 26 जुलाई 2017 को नीतीश कुमार ने पाला बदल लिया और भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली। इस तरह फिर से भाजपा की बिहार की सत्ता में वापसी तो हुई, लेकिन कनिष्ठ सहयोगी के रूप में ही।

 

मोदी का जादू नहीं चला

वैसे तो नरेंद्र मोदी के अश्वमेध यज्ञ के विजयी घोड़े की लगाम पहली बार दिल्ली में 2014 में आम आदमी पार्टी ने ही पकड़ ली थी, जब उसने दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ तीन सीटों तक सिमटा दिया था और 70 में से 67 सीटें जीत ली थीं। यही कहानी कमोबेश  2019 में दुहराई गई, जब आम आदमी पार्टी ने 70 सीटों में 62 सीटें जीत लीं और भाजपा को आठ सीटों पर संतोष करने के लिए मजबूर कर दिया। यानी बिहार और दिल्ली गाय पट्टी के दो ऐसे प्रदेश रहे, जहां मोदी का जादू विधानसभा चुनावों में नहीं चल पाया और वहां उन्हें और उनकी पार्टी को बुरी तरह पराजय का स्वाद चखना पड़ा। इसके बावजूद लोकसभा चुनाव में इन दोनों प्रदेशों में भाजपा को बड़ी विजय मिल चुकी थी। इसका निहितार्थ यह है कि जहां भी प्रदेशों में थोड़ा भी कारगर एवं सशक्त विकल्प था, वहां जनता ने भाजपा को हरा दिया।

2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की निर्णायक जीत और मंडल एवं दलित राजनीति (सपा-बसपा) के गठजोड़ की पराजय ने भाजपा के हौसले को काफी बढ़ा दिया, क्योंकि उसने मंडल एवं दलित राजनीति के गठजोड़ को बुरी तरह शिकस्त देने में अंतत: कामयाब हासिल कर ली थी, जो इस बात का पुख्ता संकेत था कि उत्तर भारत से मंडल एवं दलित राजनीति के पराभव का युग शुरू हो गया है। मंडल एवं दलित राजनीति के गठजोड़ की उत्तर प्रदेश में पराजय ने ऊंची जातियों के वर्चस्व वाले नए राजनीतिक युग के आगाज की शुरुआत की और इसके प्रतीक पुरुष अजय सिंह बिष्ट बने, जो कहने को योगी के चोले में जाति से ऊपर हैं, लेकिन यह स्थापित तथ्य है कि वह न केवल ऊंची जातियों के हितों का खुलेआम प्रतिनिधित्व करते हैं, उसमें विशेष तौर पर ठाकुरों के नेता हैं और हिंदुत्व के नाम पर ब्राह्मणवाद के खुले संरक्षक हैं।

2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में बड़े बहुमत से नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को जिताने वाली जनता ने सिर्फ बिहार एवं दिल्ली में ही भाजपा को नहीं हराया, अन्य प्रदेशों में भी हराया। 2019 की भारी सफलता के पहले भाजपा को मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों (2018) में पराजय का सामना करना पड़ा था, भले ही मध्य प्रदेश एवं राजस्थान में जीत का अंतर कम था। छत्तीसगढ़ में भाजपा को बुरी तरह पराजय का मुंह देखना पड़ा था। यह दीगर बात है कि जोड़-तोड़ करके वह फिर मध्य प्रदेश में अपनी सरकार बनाने में सफल रही और राजस्थान में भी उसने यह कोशिश की, हालांकि वह सफल नहीं हुई। 2019 के लोकसभा चुनाव की भारी विजय के भाजपा के रथ को न केवल दिल्ली विधानसभा चुनाव में लगाम लगी, झारखंड विधानसभा के चुनाव में भी मोदी का जादू नहीं चला और झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने 81 सदस्यीय विधानसभा में 47 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल कर लिया। उसने सत्ताधारी भाजपा को पराजित किया। जिसे सिर्फ 25 सीटें मिलीं। हेमंत सोरेन के नेतृत्व में गैर-भाजपा सरकार झारखंड में बनी।

सार्थक विकल्प का महत्त्व

यहां यह रेखांकित कर लेना जरूरी है कि भले ही विपक्षी पार्टियां भाजपा के सामने काफी हद तक आत्मसमर्पण की मुद्रा में आ गई हों, लेकिन भारत के आम जन ने जहां और जब भी कोई सार्थक विकल्प मिला या मिलता दिखा, भाजपा को पराजय का स्वाद चखाया, उसकी अजेय-सी दिखती ताकत को धूल चटाई। उसको उसकी गलतियों के लिए सबक सिखाया और उसके अहंकार को भी तोड़ा। दिल्ली, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान सब इसके प्रमाण रहे हैं।

उपरोक्त सारे तथ्य बताते हैं कि कॉरपोरेट जगत द्वारा भाजपा के लिए तिजोरी खोल देने, मीडिया के बड़े हिस्से द्वारा भाजपा की प्रचार मशीनरी की तरह कार्य करने, आर्थिक, सामाजिक एवं बौद्धिक तौर पर भारतीय समाज में सबसे ताकतवर ऊंची जातियों के बहुलांश हिस्से द्वारा भाजपा के पक्ष में पूरी तरह अपनी ताकत झोंक देने और आरएसएस की पूरी मशीनरी द्वारा भाजपा को जीताने के लिए जी-जान लगा देने के बाद भी भाजपा राजनीतिक तौर पर कोई अपराजेय राजनीतिक शक्ति नहीं है और उसे नरेंद्र मोदी के अभ्युदय के (2014 के) बाद भी निरंतर जनता पराजय का स्वाद चखाती रही और कई बार बुरी तरह बाहर का रास्ता भी दिखाया है,  अपने वोट के विकल्प का इस्तेमाल करके। बिहार चुनाव में भी अभी तक के रुझान एनडीए गठबंधन के लिए कोई विशेष उत्साहवर्धक नहीं हैं, और न ही मोदी का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता दिखाई दे रहा है। फिलहाल महागठबंधन बढ़त लेता दिख रहा है, एकदम युवा नेता तेजस्वी यादव बिहार चुनाव में आकर्षण का मुख्य केंद्र बने हुए हैं।

 

बिहार चुनाव का परिदृश्य

लेकिन बिहार के वर्तमान चुनावी परिदृश्य के कारणों का विवेचन करने से पहले आइए देखते हैं कि कौन सा वह परिदृश्य है और परिस्थिति है, जिसमें बिहार का चुनाव हो रहा है। कोविड-19 के बाद भारत का यह पहला चुनाव है। बिहार चुनाव ऐसे समय में हो रहा, जब नरेंद्र मोदी की केंद्र सरकार आर्थिक मोर्चे पूरी तरह असफल साबित हो चुकी है। पहली तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 23.9 प्रतिशत तक गिर चुका था। करीब सभी आर्थिक अनुमान बता रहे हैं कि 2020-21 के वित्तीय वर्ष में अर्थव्यवस्था कम से कम 10 प्रतिशत तक सिकुड़ जाएगी। सभी स्तरों पर बेरोजगारी सारे रिकॉर्ड तोड़ चुकी है, भविष्य में अर्थव्यवस्था पटरी पर आती दिखाई नहीं दे रही है। रूढि़वादी, उदारवादी और वामपंथी सभी तरह के अर्थशास्त्री करीब इस बात पर एकमत हैं कि भाजपा अपने धार्मिक-सांस्कृतिक एजेंडों को कार्यान्वित करने में चाहे जितनी सफल हो, लेकिन वह आर्थिक मोर्चे पूरी तरह असफल है। उसे अर्थव्यवस्था चलाना नहीं आता है। इसमें नरेंद्र मोदी की आत्ममुग्ध, अपने आसपास केंद्रीकरण की कार्यपद्धति की भी अहम भूमिका है। नरेंद्र मोदी की आर्थिक तौर अगर कोई सफलता है, तो वह यह है कि नरेंद्र मोदी के मित्र चंद कॉरपोरेट घरानों (अंबानी-अडानी) की संपत्ति में बेहतहाशा वृद्धि, जिसे क्रोनी कैपिटलिज्म (याराना पूंजीवाद) कहा जाता है। सभी जानते हैं कि अर्थव्यवस्था की यह तबाही कोविड-19 से काफी पहले शुरू हो चुकी थी। पिछली आठ तिमाही से जीडीपी निरंतर गिर रही थी। बेरोजगारी कोविड-19 से पहले ही 45 वर्षों के सारे रिकॉर्ड तोड़ चुकी थी। कोविड-19 और सनक भरे लॉकडाउन ने अर्थव्यवस्था को रसातल में पहुंचा दिया।

 

आर्थिक तबाही और बिहार

आर्थिक तबाही की सबसे अधिक मार यदि किसी प्रदेश के लोगों पर पड़ी तो है, तो वे हैं पहले से ही बदहाल बिहार के लोग। चरम गरीबी, कंगाली, बेरोजगारी और विवश पलायन के शिकार बिहार के लोगों, उसमें सनक भरे लॉकडाउन ने विशेषकर नौजवानों की कमर ही तोड़ दी। केंद्र और बिहार सरकार के पलायन करके आ रहे, मजदूरों को प्रति निर्मम एवं क्रुर व्यवहार ने उनके भीतर एक गहरे आक्रोश को जन्म दिया। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाल हालात स्थिति इससे और भी बदत्तर हो गई। वाणिज्यिक दैनिक ‘इकनॉमिक्स टाइम्सÓ के आंकड़ों के अनुसार, कोविड-19 लॉकडाउन के बाद 32 लाख मजदूर देश के विभिन्न शहरों से पलायन करके बिहार वापस आए। एक मजदूर पर चार लोगों का परिवार भी निर्भर हो, तो यह संख्या करीब 1 करोड़ 25 लाख होती है। इंस्टीट्यूट ऑफ पापुलेशन साइंसेज (आईआईपीएस) के आंकड़े (फरवरी, 2020) बताते हैं कि बिहार के आधे से अधिक परिवारों का कोई न कोई सदस्य रोजी-रोटी की तलाश में प्रदेश छोड़कर देश के अन्य राज्यों या विदेशों-खाड़ी के देशों, में जाता है। बिहार के ये आधे से अधिक परिवार इन लोगों द्वारा घर भेजे गए पैसे से अपने जीवनयापन का एक बड़ा हिस्सा जुटाते हैं। काम कर भेजी जानी वाली राशि अत्यंत न्यूनतम है, लेकिन यह बिहार के आधे परिवारों के जीवनयापन का मुख्य साधन है।

जो लोग बिहार के मेहनतकश गरीब परिवारों की जमीनी हालात से परिचित नहीं होंगे, शायद उन्हें यह तथ्य जानकर आश्चर्य हो कि औसत तौर पर पलायन करने वाला एक बिहारी मजदूर अपने घर सालभर में 26,020 रुपया ही भेज पाता है यानी औसत तौर पर प्रति महीने करीब 2,100 रुपया। इसी कमाई से परिवार का पेट भरने के अलावा बहुत सारे जीवन-मरण के अन्य काम भी करने होते हैं। 85 प्रतिशत लोगों ने उन परिवारों से पलायन किया, जो या तो भूमिहीन थे या जिनके पास एक एकड़ से कम जमीन थी।

शैक्षिक तौर पर देखा गया कि 85 प्रतिशत ऐसे लोगों ने पलायन किया, जो दसवीं या दसवीं से कम तक शिक्षा प्राप्त किए हुए थे। बिहार आज भी आर्थिक तौर पर भारत का सबसे बदहाल प्रदेश बना हुआ है। 2019 में भारत की प्रति व्यक्ति वार्षिक औसत आय 1,34, 226 रुपया थी, जबकि बिहार में यह सिर्फ 46, 664 रुपया ही थी यानी राष्ट्रीय वार्षिक प्रति व्यक्ति औसत वार्षिक आय का सिर्फ एक तिहाई। देश के किसी भी प्रदेश की तुलना में सबसे कम। बिहार में प्रति व्यक्ति औसत मासिक आय 3,888 रुपया ही है, जबकि राष्ट्रीय स्तर प्रति व्यक्ति मासिक आय 11,186 रुपया है। इस आय में कोई गुणवत्ता युक्त जीवन नहीं जिया जा सकता है। यह औसत मासिक आय है, बिहार में जिस कदर असमानता है, बहुलांश लोगों की मासिक आय इस औसत से भी बहुत नीचे है। उनकी गरीबी और कंगाली भरे जीवन के बारे इन तथ्यों के बाद कोई भी अंदाज लगा सकता है, कि स्थिति कितनी विकट हो सकती है।

बिहार के 42.5 प्रतिशत कृषक परिवार कर्ज में डूबे हुए हैं। सीमांत किसानों के संदर्भ में यह प्रतिशत 86.7 है। बिहार के नौजवानों के संदर्भ में बेरोजगारी 55 प्रतिशत है और जो बेरोजगार  हैं, उसमें 87 प्रतिशत अनियमित रोजगार में लगे हैं, जिसमें निश्चित मासिक आय (सेलरी) की गारंटी नहीं है। बिहार में गरीबी घटने की जगह बढ़ी है। नीति आयोग के अनुसार, 2018-19 में बिहार के 55 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा के नीचे थे। हर साल आने वाली बाढ़ और उससे होने वाली तबाही बिहार के लोगों के जीवन को बद से बदत्तर बना देती है। इस साल की बाढ़ में भी करीब 75 लाख लोग बुरी तरह प्रभावित हुए और इस दौरान नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली एनडीए की सरकार ने करीब-करीब हाथ खड़े कर दिए।

बिहार के सारे आंकड़े इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि नीतीश कुमार के करीब 15 वर्षों के शासन काल में बिहार की कंगाली, बेरोजगारी और आर्थिक बदहाली में कोई ऐसा परिवर्तन नहीं आया, जिसे रेखांकित किया जा सके। इन पद्रंह सालों में भाजपा सत्ता में नीतीश कुमार के साथ हिस्सेदार रही है और भाजपा प्रतिनिधि उप मुख्यमंत्री के रूप में विराजमान रहा है।

देश और बिहार की बदहाल होती अर्थव्यवस्था ने नौजवानों को विशेष तौर प्रभावित किया है। 2014 में नरेंद्र मोदी की पहली जीत में रोजगार और विकास एक महत्त्वपूर्ण कारण रहा, जिसने हर समुदाय के नौजवानों को उनकी ओर आकर्षित किया था। लेकिन नरेंद्र मोदी का छह वर्ष का कार्यकाल रोजगार की दृष्टि से पूरी तरह निराशाजनक रहा है। सीएमआईई के आकंड़ों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में रोजगार सृजन की दर में कोई वृद्धि नहीं हुई है। बेरोजगारी नौजवानों की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है, अकारण नहीं है कि तेजस्वी यादव द्वारा 10 लाख सरकारी नौकरियां देने के वादे ने बिहार के नौजवानों को अपनी ओर खींचा है और बिहार के चुनाव में रोजगार एवं विकास को प्रमुख मुद्दा बना दिया है। भाजपा के धार्मिक-सांस्कृतिक और अंधराष्ट्रवादी मुद्दे (रामजन्म भूमि का शिलन्यास, अनुच्छेद-370 की समाप्ति और सीएए) बिहार में कारगर होते नहीं दिख रहे हैं। 15 वर्षों के नीतीश कुमार और छह वर्षों में केंद्र की मोदी की रोजगार के मामले में असफलता के चलते एनडीए इस मुद्दे से आंख चुराता दिख रहा है और बार-बार 15 वर्ष पहले के लालू यादव राज की कमियों को मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहा है या रोजगार एवं विकास से इतर मुद्दों पर ध्रुवीकरण और गोलबंदी करना चाह रहा है।

बिहार में चुनाव शुरू होने से पहले अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक एनडीए (नीतीश-मोदी की जोड़ी) की जीत को पक्का मान रहे थे। इसका सबसे बड़ा कारण इस चुनाव में लालू यादव की अनुपस्थिति माना जा रहा था और कहा जा रहा था कि लालू की अनुपस्थिति में कोई ऐसा चेहरा बिहार में नहीं है, जो नीतीश-मोदी की जोड़ी को चुनौती दे सके। कहा जा रहा था कि तेजस्वी यादव में लालू जैसा न तो दम है, न ही उनके पास राजनीतिक संघर्ष एवं अनुभव की पूंजी है, जो एक हद तक सच भी है। कांग्रेस को वैसे भी बिहार में एक कमजोर राजनीतिक शक्ति के रूप में देखा जाता है। ऐसी स्थिति में यह बिहार विधानसभा चुनाव को एनडीए के पक्ष में एक तरफ माना जा रहा था। लेकिन यह खेल अब बिगड़ता दिख रहा है। जैसे-जैसे चुनाव प्रक्रिया आगे बढ़ी और एनडीए के खिलाफ महागठबंधन खड़ा हुआ, वैसे-वैसे लोगों, विशेषकर बेरोजगार युवाओं का आक्रोश एवं उनकी आकांक्षा मुखर हो रही है। इसे अपने पक्ष में लाने की  कोशिश में 10 लाख सरकारी नौकरियों का वादा करके तेजस्वी यादव एक हद तक अपनी खींचने में सफल होते दिख रहे हैं और एक हद तक कम से कम चुनावी प्रचार एवं जनसभाओं के संदर्भ में एनडीए पर बढ़त हासिल कर लिए हैं। इसके बावजूद की एनडीए के प्रचार के लिए कॉरपोरेट जगत द्वारा उपलब्ध कराया गया अपार धन, मीडिया की ताकत, आरएसएस की प्रचार एवं दुष्प्रचार मशीनरी उपलब्ध है और ताकतवर ऊंची जातियां मुस्तैदी से भाजपा के साथ खड़ी हैं। वैसे इस चुनाव में आरएसएस एवं भाजपा महागठबंधन से तो आमने-सामने का मुकाबला कर रहे हैं, लेकिन भीतर-भीतर चिराग पासवान के माध्यम से नीतीश के खात्मे की भी रणनीति पर काम कर रहे हैं, क्योंकि उनका दीर्घकालीन लक्ष्य नीतीश कुमार की राजनीति का खात्मा भी है।

निष्कर्ष रूप में कहना यह है कि भारतीय जन न्याय, स्वतंत्रता, समता, समृद्धि एवं गरिमामय जीवन की तलाश में आजादी के बाद से ही विभिन्न विकल्पों को आजमा रहा है, ज्यादातर विकल्पों से उसे समय-समय निराशा ही हाथ लगी। इसी निराश मानसिकता में उसने भाजपा एवं नरेंद्र मोदी को एक विकल्प के रूप में देखा और उन्हें चुना, लेकिन अपने अब तक के शासन से नरेंद्र मोदी ने भी लोगों को निराश ही किया है, भले ही यह निराशा अपनी पराकाष्ठा पर अभी न पहुंची हो और केंद्रीय स्तर पर विकल्पों के अभाव में खुद को मुखर तरीके से अभिव्यक्त न कर पा रही हो। लाख निराशा के बावजूद भी जनता की एक विवशता होती है, वह है विकल्पनहीनता। विकल्प न होने पर वह, जिससे भीतर-भीतर निराश होती है, उसके साथ भी बनी रहती है। जनता अपनी राजनीतिक निराशा सापेक्षिक तौर पर सकारात्मक विकल्प को चुनकर ही अपने को अभिव्यक्त करती है, कभी-कभी वह किसी भी उपलब्ध विकल्प को चुन लेती है। इसका परिचय भारतीय जन ने बार-बार 2014 के बाद भी विभिन्न विधानसभा चुनावों में दिया है और इसके कुछ लक्षण बिहार में भी दिख रहे हैं।

जनता को अपने सपने, आशाओं एवं आकांक्षाओं को पूरा करने वाला विकल्प चाहिए, जिसकी वह आजादी के बाद से ही विभिन्न रूपों में तलाश कर रही है। यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि आजादी के बाद उपलब्ध करीब सभी विकल्पों को आजमाने के बाद ही भारतीय जनता ने 2014 में संघ द्वारा पोषित भाजपा को पहली बार बहुमत से सरकार बनाने का मौका दिया था। उसके पहले वह कांग्रेस, कम्युनिस्ट, सोशलिस्ट, सामाजिक न्यायवादी, आंबेडकरवादी और अन्य दावेदारों को आजमा चुकी थी। 2014 से पहले कोई ऐसी राजनीतिक शक्ति नहीं बची थी, जिसे भारतीय जनता ने आजमाया न हो। सबसे थकहार कर ही उसने 2014 में भाजपा को मौका दिया था।

-समयांतर, नवंबर 2020

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