लोकतांत्रिक नेहरू – जवाहरलाल नेहरू (14 नवंबर 1889-27 मई 1964) की प्रासंगिकता पर

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  • शशि शेखर प्रसाद सिंह

प्रधानमंत्री  के रूप में नेहरू  (1947 से 1964) के सामने जब आधुनिक लोकतांत्रिक भारतीय राष्ट्र की नींव डालने और उसे पल्लवित-पुष्पित करने का कार्यभार उपस्थित हुआ, तो उनके सामने चुनौतियों के कई पहाड़ थे। इनमें सबसे बड़ी चुनौती जाति विभाजित भारत को एक धर्मनिरपेक्ष आधुनिक लोकतंत्र के रूप में स्थापित करना था। 131वें जन्मदिन पर उनके योगदान का पुनर्संस्मरण।

यदि 15 अगस्त,1947 के बाद भारत की अब तक की सबसे बड़ी कोई उपलब्धि रही है, तो वह है एक आधुनिक लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत का उभरना और तमाम उतार-चढ़ावों एवं हिचकोलों के बाद भी देश का एक राजनीतिक लोकतंत्र के रूप में कायम रहना। भले आज उस पर काले बादल मंडरा रहे हों और 70 वर्षों की यह उपलब्धि खतरे में हो। लेकिन भारत में आधुनिक लोकतंत्र के पौधे को रोपने, उसे खाद-पानी देने और उसे पल्लवित-पुष्पित करने का यदि किसी एक व्यक्ति को  सर्वाधिक श्रेय जाता है, तो व्यक्ति का नाम है-जवाहर लाल नेहरू।

प्रधानमंत्री रूप में नेहरू (1947 से 1964) के सामने जब आधुनिक लोकतांत्रिक भारतीय राष्ट्र की नींव डालने और उसे पल्लवित-पुष्पित करने का कार्यभार उपस्थित हुआ, तो उनके सामने चुनौतियों के कई पहाड़ थे। इनमें सबसे बड़ी चुनौती जाति विभाजित भारत को एक धर्मनिरपेक्ष आधुनिक लोकतंत्र के रूप में स्थापित करना था। भारतीय उपमहाद्वीप के धर्म के आधार पर भारत-पाकिस्तान के रूप में बंटवारे और इस दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों के चलते पैदा हुई धार्मिक नफरत ने इस कार्य को बहुत ही मुश्किल बना दिया था।

कांग्रेस के भीतर और कांग्रेस के बाहर ऐसे ताकतवर व्यक्ति एवं संगठन मौजूद थे, जो भारत को पाकिस्तान के बरक्स हिंदू राष्ट्र के रूप में देखना चाहते थे। भारत के पहले राष्ट्रपति और संविधान सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद का हिंदुत्व प्रेम और हिंदू धर्म के प्रति खुला सार्वजनिक झुकाव जगजाहिर तथ्य रहा है। उनकी विचारधारा दक्षिणपंथी हिंदू विचारधारा थी। नेहरू राजेंद्र प्रसाद को राष्ट्रपति बनाने के पक्ष में नहीं थे। दूसरी बार जब वह राष्ट्रपति बने तो नेहरू ने उसका विरोध किया था। राष्ट्रपति के रूप में काशी में ब्राह्मणों के पांव धोने पर नेहरू ने कड़ी आपत्ति जताई थी। राजेंद्र प्रसाद हिंदू महिलाओं को समता का अधिकार दिलाने वाले हिंदू कोड बिल के विरोध में खड़े थे, जबकि नेहरू एवं आंबेडकर इस बिल को पास कराने के मामले में एक साथ थे। ये सारे तथ्य अब जग-जाहिर हो चुके हैं। सरदार बल्लभ भाई पटेल का हिंदूवादी दक्षिणपंथी झुकाव भी बार-बार सामने आता रहता था, जिसकी खुली अभिव्यक्ति सोमनाथ मंदिर के पुनर्निमाण में उनकी भूमिका के रूप में सामने आई और जिसका 1951 में राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने उद्घाटन किया। नेहरू इसे धर्मनिरपेक्ष भारत की अवधारणा के खिलाफ मानते थे, उन्होंने इस पर आपत्ति जताई थी। उत्तर प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और बाद में भारत गृहमंत्री बने गोविंद वल्लभ पंत अपने हिंदूवादी दक्षिणपंथी विचारधारा और पक्षधरता को खुलेआम प्रकट करते थे। अब यह सार्वजनिक तथ्य है कि मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सहमति एवं अनौपचारिक अनुमति के बाद ही बाबरी मस्जिद में 23 दिसंबर, 1949 को राम की मूर्ति रातों-रात रखी गई, जो, जैसा कि आज सब के सामने है, संघ-भाजपा के लिए भारत की सत्ता पर कब्जा करने आधार बनी। संविधान सभा के सदस्य और कांग्रेस पार्टी के एक ताकवर नेता कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी (के. एम. मुंशी) खुले तौर पर दक्षिणपंथी हिंदुत्वादी विचारधारा के पोषक एवं प्रवर्तक थे। वह भी एक ताकवर नेता थे। आधुनिक भारत में हिंदुत्व के पुनरूत्थान के पहले प्रतीक सोमनाथ मंदिर के तथाकथित जीर्णद्धार कार्यक्रम के सबसे बड़े कर्ताधर्ता भी वही थे, जिसे सरदार बल्लभ भाई पटेल और राजेंद्र प्रसाद का खुला समर्थन प्राप्त था।

इन तीनों ने मिलकर सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार नेहरू के धर्मनिरपेक्ष आधुनिक भारत की अवधारणा को चुनौती देते हुए किया था। इन तीनों की तिकड़ी कांग्रेस पर मजबूत पकड़ रखती थी और कांग्रेस में इनके बहुत सारे समर्थक थे। कांग्रेस के संगठन पर तो करीब-करीब पटेल का पूर्ण नियंत्रण था, भले नेहरू भारतीय जनता के बीच लोकप्रिय रहे हों। इस सब के साथ ही सबसे बड़ी बात थी, गांधी की विचारधारा एवं विरासत भी कांग्रेस के दक्षिणपंथी धड़े को मदद पहुंचाती थी, भले गांधी ने नेहरू के व्यक्तित्व एवं देश-विदेश में उनकी कांग्रेस के अन्य नेताओं की तुलना में लोकप्रियता को ध्यान में रखते हुए उनके प्रधानमंत्री बनने का समर्थन किया हो। गांधी अपनी वैचारिकी में हिंदूवादी थे, भले वह एक भारतीय राज्य द्वारा हिंदू-मुस्लिम के बीच भेदभाव करने के खिलाफ थे और सांप्रदायिक सौहार्द के पक्ष में थे। लेकिन उनकी हिंदूवादी विचारधारा और आदर्श राज्य के रूप में रामराज्य की अवधारणा कांग्रेस के हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथी धड़े के लिए मजबूत वैचारिक समर्थन मुहैया कराती थी।

कांग्रेस के बाहर हिंदू महासभा, आरएसएस और जनसंघ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने के लिए पूरा जोर लगाए हुए थे। पाकिस्तान के बंटबारे, सांप्रदायिक दंगे और बड़े पैमाने पर शरर्णार्थियों के आगमन से धार्मिक घृणा एवं वैमनस्व को और बढ़ा दिया था। जिसे कांग्रेस के अंदर एवं बाहर से हवा भी दी जा रही थी। यानी कांग्रेस के भीतर एवं बाहर शीर्ष स्तर पर जो दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी ताकतवर रुझान दिख रहा था, उसे एक हद तक जनसमर्थन भी प्राप्त था। स्थिति यह थी कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के सबसे ताकतवर लोगों में एकमात्र नेहरू थे, जो आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में पूर्ण विश्वास करते थे, भले ही उनके मंत्रिमंडल एवं संविधान सभा में आंबेडकर और उनके जैसे कुछ अन्य लोग भी थे, जिनका उन्हें समर्थन प्राप्त था। लेकिन अधिकांश निर्णय पहले कांग्रेस के शीर्ष केंद्रीय निकायों में होते थे, जहां अक्सर नेहरू अकेल पड़ जाते थे या अल्पमत में होते थे। कांग्रेस के शीर्ष केंद्रीय निकायों में निर्णय हो जाने के बाद उसे कैबिनेट एवं संविधान सभा में रखा जाता था।

नेहरू की धर्मनिरपेक्ष आधुनिक लोकतांत्रिक भारतीय राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता का एक बड़ा कारण, उनकी वैज्ञानिक सोच में निहित था, जिसमें धर्म एवं ईश्वर के लिए कोई स्थान नहीं था। नास्तिक नेहरू आधुनिक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक जीवन के संचालन में धर्म एवं ईश्वर को कोई स्थान देने के पक्ष में नहीं थे। वह आधुनिक योरोपीय लोकतांत्रिक देशों की तरह धर्म को व्यक्तिगत आस्था तक सीमित करने के ही पक्ष में थे।

कांग्रेस के भीतर एवं कांग्रेस बाहर नेहरू को दक्षिणपंथी रुझान से सिर्फ हिंदू-मुसलमान एवं धार्मिक अल्पसंख्यकों के मामले में ही नहीं जूझना था। कांग्रेस के भीतर दक्षिणपंथी धड़ा वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृसत्ता में भी विश्वास रखता था, जिसकी भारतीय समाज में गहरी जड़े थीं। नेहरू जाति एवं पितृसत्ता से घृणा की हद तक नफरत करते थे, भले ही उन्हें इसका गहरा अहसास न रहा हो कि वर्ण-जाति व्यवस्था भारतीय समाज की नाभि है और उसकी भीतरी तहों तक तक धंसी हुई है। इस तथ्य को उन्होंने अपने एक अंतिम साक्षात्कार में स्वीकार भी किया है कि वह भारतीय समाज में जाति के कारक का ठीक से अहसास नहीं कर पाए। लेकिन इसके बावजूद भी आधुनिक और वैज्ञानिक सोच का व्यक्ति होने के चलते वह वर्ण-जाति व्यवस्था एवं पितृसत्ता में बिलकुल विश्वास नहीं करते थे और आधुनिक लोकतांत्रिक भारत में उसे किसी रूप में स्वीकृति देने को तैयार नहीं थे, जबकि कांग्रेस के भीतर ही मजबूत दक्षिणपंथी धड़ा वर्ण-जाति व्यवस्था को एवं पितृसत्ता  और उसे स्वीकृति देने वाले हिंदू धर्म एवं धर्मग्रंथों को समिर्पित था।

देश के दूसरे राष्ट्रपति राधाकृष्णन भी उसमें शामिल थे। इस मामले में नेहरू आंबेडकर के साथ खड़े थे। भले ही उन्हें कांग्रेस के दक्षिणपंथी धड़ों के दबाव में कई बार पीछे हटना पड़ा। हिंदू कोड बिल भी इसका एक उदाहरण है। भारत के राष्ट्रपिता भी वर्ण व्यवस्था को अंतिम क्षण तक आदर्श व्यवस्था कहते रहे और रामराज्य के पैरोकार बने रहे।

नेहरू की धर्मनिपेक्षता की अवधारणा में धर्म के साथ वर्ण-जाति एवं पितृसत्ता निरपेक्षता भी शामिल थी। इसका सबूत उनके नेतृत्व में बनी कमेटी द्वारा प्रस्तुत भारत के संविधान की प्रस्तावना है। जो इस प्रकार है-  ”हम, भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को : सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता, प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में, व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ईस्वी (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।ÓÓ यह प्रस्तावना 13 दिसंबर, 1946 को जवाहर लाल नेहरू द्वारा पेश किए गए उद्देश्य प्रस्ताव (ऑबजेक्टिव रिजोल्यूशन) पर आधारित है। भले  समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और अखंडता शब्द को 1976 में 42वें संविधान संसोधन द्वारा जोड़ा गया हो, लेकिन इसका अन्तर्य प्रस्तावना में पहले से मौजूद है।

जवाहर लाल नेहरू के सामने चुनौती कांग्रेस के भीतर एवं बाहर के विकट हालातों एवं विपरीत परिस्थियों में एक आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की नींव रखनी थी और वह इसमें काफी हद तक कामयाब भी हुए। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसा संविधान तैयार करवाने की थी, जो हर तरह उन आस्थाओं एवं विचारों से मुक्त हो, जो किसी भी व्यक्ति की मानवीय गरिमा को चोट पहुंचाता हो। वे विचार एवं आस्थाएं चाहे किसी धर्म, समुदाय एवं जाति विशेष को कितना ही प्रिय क्यों न हो। नेहरू द्वारा प्रस्तुत संविधान की प्रस्तावना को देखें, तो उसमें मानवीय गरिमा पर बहुत अधिक जोर है। नेहरू को यह अच्छी तरह अहसास था कि मानवीय गरिमा की स्थापना की अनिवार्य शर्त न्याय एवं समता आधारित समाज का निर्माण है, जिममें धर्म, जाति, लिंग, भाषा एवं क्षेत्र आदि के आधार पर कोई भेदभाव न हो। आंबेडकर की तरह नेहरू भी राजनीतिक और सामाजिक समता के साथ आर्थिक समता भी चाहते थे, विकास मिश्रित मॉडल अपनाने के पीछे यह एक बहुत बड़ा कारण था।

नेहरू आंबेडकर साथ निरंतर संवाद एवं तालमेल करते हुए भारत को एक ऐसा आधुनिक संविधान देने में सफल रहे, जिसमें मध्यकालीन आस्थाओं के लिए कोई जगह न हो। संविधान बन जाने के बाद उनके सामने सबसे बड़ा कार्यभार था, उसे जमीन पर उतारने के लिए प्रयास करना। नेहरू प्रधानमंत्री रहते हुए आजीवन एक आधुनिक भारत के निर्माण के लिए प्रतिबद्ध बने रहे। उन्होंने अनेक आधुनिक एवं वैज्ञानिक संस्थाओं की नींव डाली और भारत के आधुनिकीकरण के लिए आवश्यक औद्योगिकरण की शुरुआत की।

जिस कश्मीर के लिए संघ-भाजपा नेहरू को कोसते रहते हैं, भारत के साथ उस कश्मीर को बनाए रखने का सर्वाधिक श्रेय भी नेहरू को ही जाता है। नेहरू की धर्मनिरपेक्षता और उनके लोकतांत्रिक समाजवाद की ओर उन्मुख व्यक्तित्व ने ही शेख अब्दुला को नेहरू की ओर खींचा और उन्होंने उनके साथ रहने का निर्णय लिया। शेख अब्दुला ने धर्म आधारित पाकिस्तान की तुलना में नेहरू के धर्मनिरपेक्ष भारत में रहना पसंद किया। शेख अब्दुला सोशलिस्ट भी थे, जिसने उन्हें नेहरू के समाजवादी भारत के स्वप्न के करीब लाकर खड़ा किया।

देश की स्वतंत्रता एवं संप्रभुता के बनाए रखने की चुनौती को भी नेहरू ने स्वीकार किया। हम सभी जानते हैं कि ब्रिटिश सत्ता ने भारत को भले ही राजनीतिक सत्ता का हस्तांरण 1947 में कर दिया था, लेकिन नेहरू को यह यह अच्छी तरह अहसास था कि भारत को राजनीतिक-आर्थिक तौर पर उपनिवेशवाद की विरासत पूरी तरह से मुक्त करने का ठोस कार्यभार अभी बाकी है।

उनके सामने विश्व समुदाय के ऐसे अनेक उदाहरण मौजदू थे, जिसमें सद्य: आजादी पाने वाले देशों ने आंतरिक एवं बाह्य कारणों से अपनी आजादी खोकर किसी न किसी साम्राज्यवादी देश के नवउपविवेश बनना स्वीकार कर लिया था।

नेहरू के सामने एक तात्कालिक कार्यभार था कि भारत को एक संप्रभु राष्ट्र के रूप में कायम रखना और उसे सशक्त बनाते जाना। इसके लिए उन्होंने न केवल गुटनिरपेक्षता का रास्ता चुना, बल्कि उसे वैश्विक स्तर पर गुटनिरेपेक्ष देशों का एक समूह बनाने के प्रयासों की अगुवाई भी की। जिसमें उनको पूरी तरह सफलता मिली और भारत इस या उस देश की कठपुतली बनने की जगह संप्रभु देश के रूप में अपने अस्तित्व को बनाए रख सका। आज भी भारत की संप्रभुता दुनिया में कायम है, तो सर्वाधिक श्रेय नेहरू को जाता है। आज भले ही यह संप्रभुता खतरे में दिखाई दे रही है और हमारी ‘राष्ट्रवादीÓ सरकार चीन को चुनौती देने की आड़ में देश को अमेरिका का  पिछलग्गू बनाने की ओर बढ़ रही है।

नेहरू ने विकट एवं विपरीत परिस्थियों में आधुनिक भारत की नींव डाली। उन्हें गैरों की तुलना में अपनों यानी कांग्रेस के भीतर की दक्षिणपंथी ताकतों से सबसे अधिक जूझना पड़ा। नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण के तीन तत्वों को अपनी पूरी ताकत के साथ स्थापित करने की कोशिश की। पहला आधुनिक भारत में धर्म के आधार पर किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा और न ही धर्म के आधार पर किसी को वरीयता यानी विशेषाधिकार दिया जाएगा। दूसरा, आधुनिक भारत में वर्ण-जाति एवं लिंग के आधार पर भेदभाव करने के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। तीसरा, भारत दुनिया के किसी देश की कठपुतली या पिछलग्गू नहीं बनेगा यानि अपनी स्वतंत्रता एवं संप्रभुता को गिरवी नहीं रखेगा। पहले दो तत्व संघ-भाजपा की विचारधारा के पूरी तरह खिलाफ जाते हैं और तीसरे तत्व पर भाजपा ने समझौता करना शुरू कर दिया है।

अकारण ही नेहरू संघ-भाजपा के निशाने पर सदा नहीं बने रहे हैं, नेहरू ने जिन विचारों एवं मूल्यों के आधार पर आधुनिक भारत की नींव रखी, संघ-भाजपा को उन विचारों एवं मूल्यों से बिल्कुल उलट भारत का निर्माण करना है, जिसमें नेहरू की विरासत उन्हें बाधा की तरह लगती है। नेहरू के आधुनिक मूल्यों पर आधारित भारत की जगह संघ-भाजपा मध्यकालीन मूल्यों पर आधारित भारत बनाना चाहते हैं, जिसमें नेहरू की विरासत सबसे बड़ी बाधा है। आधुनिक लोकतांत्रिक भारत की स्थापना में नेहरू की अहम भूमिका से कोई ईमानदार अध्येता इंकार नहीं कर सकता है और न ही इस बात से इंकार कर सकता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक विचारों-मूल्यों के बिना भारत तो क्या दुनिया का कोई देश स्वतंत्र और समृद्ध हो सकता है।  

-समयांतर, नवंबर 2020

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