‘हेट स्पीच’ का दुःस्वप्न

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  • शिवप्रसाद जोशी

 

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जो समाज से जुड़ा है और जो अपने लिखे हुए, प्रकाशन और प्रसारण के लिए समाज के प्रति जवाबदेह है। अगर एक भी शब्द या दृश्य गलत या झूठा है या सनसनी फैलाने और किसी को चोर रास्ते से बढ़ावा देने या बचाने के लिए लिखा गया है तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसीलिए मीडिया के नियमन की आवश्यकता पड़ती है। भारत में मीडिया के नियमन की कोई एकीकृत प्रणाली और कानून व्यवस्था नहीं है।

 

मुख्यधारा के हिंदी सिनेमा और उसके आसपास जब एक प्रतिभाशाली युवा अभिनेता की मौत पर हो रहे विवाद के मामले पर तलवारें खिंची थीं और कानाफूसियों, सोशल मीडिया के वार्तालापों और सनसनियों तथा कच्ची-पक्की सूचनाओं को धज्जियों की तरह उड़ाया जा रहा था, संसद में धुआंधार बिल पेशियां थीं और एक बार फिर किसान सड़कों पर उतरने लगे थे, ठीक उन्हीं दिनों ‘सुदर्शन न्यूजÓ नामक एक निजी टीवी समाचार चैनल ने एक नए ‘जिहादÓ की खोज कर उसकी प्रस्तुति का टीजर (प्रोमो) चला दिया था।

सूचना और प्रसारण मंत्रालय की प्रोग्राम कोड को लेकर चेतावनी और सशर्त मंजूरी के बाद चार एपिसोड ऑन एयर कर दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस चंद्रचूड़ की जिस बेंच के पास यह मामला सुनवाई के लिए आया उसने चैनल को कड़ी फटकार लगाते हुए कार्यक्रम रद्द करने का आदेश दिया। इस चैनल की पेशकश थी यूपीएससी जेहाद। हैरानी है कि इस मामले में चैनल के एंकर और स्वामी ने एक लिहाज से ‘जी न्यूज’ को भी पीछे छोड़ दिया। लेख के प्रेस में जाने तक चैनल के विवादास्पद कार्यक्रम से जुड़े पूरे मामले को सिलसिलेवार देखते हैं और समझने की कोशिश करते हैं –

दिल्ली हाईकोर्ट ने तो कार्यक्रम पर स्टे दे दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने प्रसारण पूर्व समय में हस्तक्षेप करने से मना कर दिया। लेकिन मामला खारिज नहीं किया। 11 सितंबर से चार एपिसोड सूचना और प्रसारण मंत्रालय की अनुमति के साथ प्रसारित कर दिए गए। शर्त यह थी कि टीवी प्रोग्राम पर लागू होने वाली किसी आचार संहिता का उल्लंघन न हो और अगर ऐसा हुआ तो कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाएगी। 15 सितंबर को जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की बेंच ने पाया कि जो एपिसोड प्रसारित हुए हैं, प्रसारित धारावाहिकों की मंशा और उद्देश्य मुस्लिम समुदाय को कलंकित करने का है, इसलिए व केबल टीवी नेटवर्क (रेगुलेशन) एक्ट 1995 के तहत बनाए गए प्रोग्राम कोड के कई नियमों का उल्लंघन करते हैं और सबसे ताजा संशोधन इस बिल में इसी साल जनवरी में किया गया था। 18, 21 और 23 भी सुनवाई जारी रही। जब कोर्ट ने एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया तो केंद्र ने आनन-फानन में कह दिया कि डिजिटल मीडिया रेगुलेशन पहले देखना चाहिए। हाहाकार टीवी में मचा है और सरकार डिजिटल की ओर कोर्ट का ध्यान बंटा रही थी। और इसी दौरान सरकार ने कोर्ट को सूचित भी कर दिया कि चार पेज का नोटिस ‘सुदर्शन न्यूजÓ को जारी किया गया है जिसका संबंध प्रोग्राम कोड के उल्लंघन से है। केंद्र ने 28 सितंबर तक लिखित में जवाब मांगा था, और कोर्ट में सॉलिसिटर जनरल ने केंद्र की ओर से पेश होते हुए कहा कि निर्धारित डेडलाइन तक जवाब नहीं मिला तो चैनल के बारे में कार्रवाई का निर्णय लिया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई को पांच अक्टूबर तक के लिए स्थगित कर दिया था।

 

मीडिया नियमन का विवाद

मीडिया रेगुलेशन भी इस बहस का हिस्सा है। फ्री स्पीच बनाम हेट स्पीच की जटिलताओं के बीच मीडिया रेगुलेशन को लेकर जारी भ्रम की स्थिति जस की तस है। सुशांत और रिया मामले में अभूतपूर्व और विचलित कर देने वाले मीडिया ट्रायल से एक बार फिर उठी यह बहस चैनल के विवादास्पद कार्यक्रम तक खिंची हुई है। महात्मा गांधी ने कहा था कि, ”प्रेस की अपनी ताकत है लेकिन एक बेलगाम प्रेस सेवा नहीं करता बल्कि विनाश का कारण बनता है जैसे कि अनियंत्रित पानी का बहाव खेतों और गांवों को तबाह कर देता है। अगर प्रेस पर बाहर से अंकुश लगाने की कोशिश की जाती है तो वो और भी ज्यादा ख़तरनाक स्थिति हो जाती है इसलिए बेहतर है कि प्रेस स्वयं ही अपने आप पर संयम रखे।‘’

लेकिन उपरोक्त बात कहते हुए महात्मा गांधी के मन में भी शायद दुविधा रही होगी इसीलिए उन्होंने आगे कहा कि, ”अगर आत्मनियमन की यह कसौटी रखी जाए तो कितने समाचारपत्र इस परीक्षा में पास हो पाएंगे। और उनका क्या जो रद्दी हैं। लेकिन सवाल यह है कि इस बात का निर्णय कौन करेगा कि क्या सही है और क्या गलत। उपयोगी और रद्दी दोनों साथ-साथ चलते हैं और इसका फैसला पाठक को करना है कि वह किसका चुनाव करे।‘’ आज अगर गांधी जीवित होते तो देख पाते कि अब रद्दी ही उपयोग में लायी जा रही है। और पाठक का भी कायांतरण हो चुका है। वो पाठक, श्रोता, दर्शक से होता हुआ ऑडियन्स, उपभोक्ता, यूजर तक पहुंचा था और आज खुद एक उत्पाद बनकर पड़ा हुआ है। वो चुनाव क्या करे!

पत्रकारिता एक ऐसा पेशा है जो समाज से जुड़ा है और जो अपने लिखे हुए, प्रकाशन और प्रसारण के लिए समाज के प्रति जवाबदेह है। अगर एक भी शब्द या दृश्य गलत या झूठा है या सनसनी फैलाने और किसी को चोर रास्ते से बढ़ावा देने या बचाने के लिए लिखा गया है तो उसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। इसीलिए मीडिया के नियमन की आवश्यकता पड़ती है। भारत में मीडिया के नियमन की कोई एकीकृत प्रणाली और कानून व्यवस्था नहीं है।

चैनल के ताजा विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के मापदंड बनाने के लिए पांच विशेषज्ञों की एक कमेटी बनाने का सुझाव दिया है। लेकिन कोर्ट शायद एक बात भूल गया। कोर्ट का ही 1995 का ऐतिहासिक जजमेंट कहता है कि वायुतरंगें या फ्रीक्वेंसी सार्वजनिक संपत्ति और जनता के हित में और उसके अधिकारों पर अतिक्रमण रोकने के उद्देश्य से उनका इस्तेमाल सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा नियंत्रित और विनियमित किया जाना चाहिए। 25 साल बीत चुके हैं, लेकिन ऐसी किसी स्वतंत्र और स्वायत्त पब्लिक अथॉरिटी का गठन नहीं हुआ है जो समाज के सभी वर्गों और अभिरुचियों का प्रतिनिधित्व करती हो और वायुतरंगों को नियंत्रित और विनियमित कर पाए।

मीडिया स्वामित्व और कंटेंट कोड या सेल्फ रेगुलेशन गाइडलाइन के बारे में 2007 में प्रसारण सेवा रेगुलेशन बिल का ड्राफ्ट तैयार कर लिया गया था। लेकिन वह कोशिश बेकार चली गई। इससे पहले प्रसारण सेवा रेगुलेशन बिल 2006 का ड्राफ्ट भी धरा का धरा रह गया। प्रसारण मीडिया को रेगुलेट करने के लिए 2006 से पहले दो कोशिशें भी नाकाम रह चुकी थीं। 2000 का कम्युनिकेशन कन्वर्जन्स बिल और 1997 का प्रसारण बिल। इन बिलों के साथ समस्या यह थी कि सरकार के प्रभावी नियंत्रण कायम करने के लिए लाए जा रहे थे। यानी एक तरह से सरकार का मीडिया पर नियंत्रण संस्थाबद्ध करने के लिए। जाहिर है यह स्वीकार्य तो नहीं है लेकिन इन सब बिलों की नाकाम कोशिशों के बीच आज जो राजनीतिक सामाजिक हालात हैं और मीडिया पर्यावरण जिस तरह से बड़बोलेपन और बदहवासी का शिकार नजर आता है- उसमें ये बिल होने या न होने का कोई अर्थ वैसे भी नहीं रहता। सरकार और कॉरपोरेट चालित मीडिया इस समय फेंस के इधर या उधर नहीं खड़े हैं। वे एक ही ओर खड़े हैं, फेंस के उधर इस मीडिया के अनभिज्ञ और मोहित उपभोक्ता हैं जो उसके उत्पाद भी हैं और वे पीडि़त कमजोर और संसाधनविहीन लोग भी हैं जिन पर मीडिया खासकर टीवी मीडिया इन दिनों हाहाकारी हो रखा है।

2007 के बिल के साथ जो विवाद हुए उसके बाद तत्कालीन टीवी चैनलों का प्रतिनिधित्व करने वाले दो संगठन अस्तित्व में आ गए। इंडियन ब्रॉडकास्टिंग फाउंडेशन (आईबीएफ) और न्यूज ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए)। इनका काम था अपने सेल्फ रेगुलेशन के लिए गाइडलाइन तैयार करना। 2009 में एक और संगठन आया ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन (बीईए)। लेकिन इन संस्थाओं की कार्यक्षमता या प्रभाव की क्या स्थिति है, ‘सुदर्शन न्यूज’ मामले में जाहिर हो जाता है। कार्यक्रम के बारे में शिकायत पर एनबीए कुछ नहीं कर पाया क्योंकि उसके मुताबिक उक्त चैनल एनबीए का सदस्य ही नहीं है। एनबीए ने कोर्ट में कहा कि उसका लंबे समय से प्रस्ताव है कि उसकी आचार संहिता को विधिक पहचान दी जाए जिससे कि वह सभी समाचार चैनलों के लिए जरूरी हो जाए। 2008 में गठित एनबीएसए को स्वंतत्र आत्मनियमन वाली इकाई के रूप में मान्यता दी जाए और सभी समाचार चैनल जो संगठन में हैं या नहीं, उन सभी पर उस प्राधिकरण के नियम लागू हों।

एनबीए की एनबीएसए को कुछ नखदंत मुहैया कराने की मांग अभी लंबित ही है कि 2019 में एक ओर संगठन आ खड़ा हुआ न्यूज ब्रॉडकास्टर्स फेडरेशन (एनबीएफ) और इसने अपना सेल्फ रेगुलेटरी इंतजाम खड़ा किया एनबीएफए के रूप में। एनबीएफ के गर्वनिंग बोर्ड के चेयरमैन का नाम भला आज की तारीख में किसने न सुना होगा। नन अदर दैन अर्नब गोस्वामी! एक मामले में एनबीए की ओर से चि_ी जाने के बाद वह नाराज हो उठे और उस संगठन से खुद को अलग कर लिया और एक नया संगठन ही बना डाला। इस नाम से ही संगठनों की आपसी खींचतान और तू बड़ा कि मैं बड़ा वाली टकराहट को भी समझा जा सकता है। या कंटेंट और प्रस्तुति के स्तर में निरंतर आ रही गिरावट पर अपने अफसोस को आप दर्शक या ऑब्जर्वर के रूप में और डूबता हुआ महसूस कर सकते हैं।

मीडिया नियमन अगर सरकार करती है जो कि वह करने के लिए लंबे समय से लालायित है तो वह भारत में अभिव्यक्ति की आजादी के लिए एक काला दिन होगा। लेकिन इसी बात पर हम फिर से गौर करें तो मीडिया नियमन तो परोक्ष रूप से है ही, खबर का मुंह विज्ञापन से तो ढका ही रहा है, अब धमकियों और कार्रवाइयों का आवरण भी उस पर आ गिरा है। 1975 की इमरजेंसी का हवाला देकर बार-बार बाइनरी बनाने या व्हॉटअबाउटरी करने की राजनीति भी फाश हो चुकी है। मीडिया नियमन और सेल्फ नियमन की बहसें एक अंधी गली में दाखिल हो चुकी हैं। वैसे ‘यूपीएससी जेहादÓ वाले मामले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने विजुअल मीडिया के मालिकाना हक को भी खंगालने की जरूरत बताई। बेंच के जज केएम जोसेफ ने कहा कि, ”विजुअल मीडिया के स्वामित्व को भी देखने की जरूरत है। कंपनी का समूचा शेयर होल्डिंग पैटर्न सार्वजनिक किया जाना चाहिए। अगर सरकार किसी एक कंपनी में अधिक और किसी में कम विज्ञापन दे रही है तो उक्त कंपनी के रेवेन्यु मॉडल की भी जांच की जानी चाहिए।‘’

 

हेट स्पीच बनाम फ्री स्पीच और अभिव्यक्ति की आजादी

वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में भी चैनल के इस कार्यक्रम विवाद को लाने की कोशिश की गई। कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट का कदम इस आजादी पर आघात है। लेकिन हेट स्पीच यानी नफरती भाषण को लेकर भी स्पष्टता की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समांतर विचार और अभिव्यक्ति की आजादी के हवाले से चैनल कुछ भी कहे लेकिन कोर्ट ने कहा कि उसकी प्रस्तुति से ही दिख जाता है कि फ्री स्पीच कैसे हेट स्पीच में बदल जाती है।

कोर्ट ने कहा है कि धार्मिक आधार पर भेदभाव करना, गलत और भ्रामक तथ्य दिखाना, किसी व्यक्ति या समुदाय की सफलता पर उन्हें नीचा दिखाना, उनकी मानहानि करना-स्वीकार्य नहीं हो सकता। मामले की सुनवाई कर रही बेंच के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर सुप्रीम कोर्ट ने मामला की सुनवाई न की होती तो यह शो पूरी तरह प्रसारित हो चुका होता। उन्होंने कहा, ”संवैधानिक अदालत का न्यायाधीश होने के नाते यह मेरा संवैधानिक दायित्व है कि मैं मनुष्य गरिमा की हिफाजत करूं, जो कि उतना ही महत्त्वपूर्ण है जितना कि वाक् स्वातंत्रय की हिफाजत करने की हमारी ड्यूटी है। हम वाक् और अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का सम्मान करते हैं लेकिन हम एक समुदाय के विरुद्ध इस तरह के हमलों के बारे में भी निश्चित रूप से चिंतित हैं।‘’

18 सितंबर की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि अगर मुस्लिम समुदाय के लोग सिविल सेवा में आगे आ रहे हैं तो यह खुशी की बात है, लेकिन शो के माध्यम से उन्हें नीचा दिखाया गया है। कोर्ट ने पूछा कि चार एपिसोड की कटुता को और क्यों दिखाना चाहते हैं। एक समुदाय की छवि खराब करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं। आईएसआई का नाम उछालने पर भी कोर्ट ने दुख जताया। कोर्ट ने कहा कि खोजी पत्रकारिता अपनी जगह ठीक है लेकिन ऐसी धारणाओं को पनपने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। एक समुदाय विशेष के व्यक्ति को आतंकी बता देने पर भी कोर्ट ने एतराज जताया। और कहा कि इसी बिंदु पर आकर वाक् स्वातंत्रय (फ्री स्पीच) नफरत की छूट यानी हेट स्पीच में बदल जाती है। तस्वीरें और तथ्य आपत्तिजनक ही नहीं भ्रामक और त्रुटिपूर्ण भी हैं। कोर्ट ने कहा कि सामाजिक सह-अस्तित्व लोकतंत्र का मूल है। ऐसे में किसी धर्म को विलेन की तरह प्रस्तुत करने का समर्थन नहीं किया जा सकता।

मद्रास हाईकोर्ट में अधिवक्ता सुहरिथ पार्थसारथि ने ‘ दि हिंदू’ में प्रकाशित अपने एक लेख में बताया है कि ‘सुदर्शन चैनल’ की बहस में यह कानूनी तौर पर सही मौका है कि किसी उद्बोधन या वक्तव्य या विचार या टिप्पणी में नफरत के भाव को परिभाषित या चिन्हित किया जाए। कौन सी टिप्पणी या कौन सी स्पीच अपमानजनक है, कौन सी घृणास्पद और कौन से इन दोनों के अपवाद हैं इस बारे में स्पष्टता रखने पर जोर देते हुए लेख में अमेरिकी विद्वान जेरेमी वॉल्ड्रोन का हवाला दिया गया है जिनके मुताबिक, हेट स्पीच वह है जिससे लोगों की जाति, धर्म, नस्ल, जेंडर जैसी सामूहिक पहचान के आधार पर उनके खिलाफ हिंसा, नफरत या भेदभाव उभारने की कोशिश की जाती है। अपमानजनक टिप्पणी हेट स्पीच के दायरे से बाहर मानी गई है। इस लिहाज से किसी एक समूची कौम को गद्दार या देशद्रोही कहकर कलंकित करना हेट स्पीच के दायरे में आएगा। क्योंकि वॉल्ड्रोन के मुताबिक, हेट स्पीच एक लोकतांत्रिक गणतंत्र के दो बुनियादी सिद्धांतों पर हमला करती है – सभी के लिए एक समान गरिमा की गारंटी और समावेशिता की सार्वजनिक हित।

हालांकि इस थ्योरी में कुछ कमजोरियां भी देखी जा सकती हैं। अपमानजनक टिप्पणियां करना भी उतना ही खतरनाक और गैरकानूनी क्यों नहीं हो सकता जितना कि हेट स्पीच को कहा जाता है। और इस लिहाज से अपमानजनक टिप्पणी को छूट देकर या वाक् या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आधार पर उसे आरोप से बरी कर देने की दलील समझ नहीं आती। कई संदर्भ ऐसे होते हैं जहां अपराधी यह कहकर साफ बचकर निकल सकता है कि उसका उद्देश्य पूरी जाति या कौम को अपमानित या लांछित करने का नहीं था बल्कि वह तो सिर्फ एक व्यक्ति के बारे में बोल रहा था। तो क्या हमें यह स्वीकार्य हो सकता है कि एक मनुष्य दूसरे मनुष्य पर अपमानजनक और उसकी गरिमा को चोट पहुंचाने वाली टिप्पणियां करने का अधिकारी हो जाए।

दूसरी बात यह भी है कि हेट स्पीच को लेकर भारतीय कानून भी बहुत स्पष्ट नहीं है। आईपीसी के सेक्शन 153ए और सेक्शन 295ए में बेशक दो समूहों के बीच वैमनस्य को बढ़ावा देने वाली स्पीच और गतिविधि और धार्मिक भावनाओं को भड़काने वाली टिप्पणी या गतिविधि को आपराधिक कृत्य माना गया है। लेकिन ये कानून अस्पष्ट हैं और पूरे मामले को खोलकर नहीं बताते बल्कि सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता बनाए रखने के लिए फ्री स्पीच को ही सीमित करने की दिशा में काम करते प्रतीत होते हैं। क्या यही अच्छा हो कि ‘सुदर्शन न्यूजÓ का मामला एक नजीर बने और कोर्ट ने जैसे कहा ही है कि यह मामला फ्री स्पीच नहीं हेट स्पीच की श्रेणी में आता है लिहाजा आने वाले समय के लिए भी ऐसे मामलों में इस फैसले को भी देखा जाए।

 

राजनीतिक मंशाएं भी देखिए

लेकिन कानून की पेचीदगियों और सीमाओं के समांतर इस मामले में हमें एक अलग पहलू से भी गौर करना चाहिए। वह है इसकी राजनीति। फिर इस कार्यक्रम की राजनीति को समझना चाहिए। यह बहुत सोची समझी तैयारी का हिस्सा है। कौन नहीं जानता और आंकड़ों की जरा भी समझ रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि देश में अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों की सरकारी नौकरियों में क्या स्थिति है। आईएएस ही क्यों, पुलिस, सेना के तीनों अंगों, अद्र्धसैनिक बलों, अन्य खुफिया एजेंसियों और उच्च सरकारी व्यवसायिक, वाणिज्यिक, अकादमिक, शिक्षण संस्थानों में उनकी संख्या कितनी है। आज नहीं बहुत पहले ही सच्चर आयोग इस बारे में विस्तृत रिपोर्ट दे चुका है। और ये सारे तथ्य पब्लिक डोमेन में हैं। तथ्य ही क्यों वस्तुस्थिति भी तो सबको दिखती रही है। वो वेदनाएं, दमन और भयानकताएं नकली नहीं हैं जिनसे साधारण भारतीय मनुष्य घिरे रहने को अभिशप्त बना दिया गया है।

उक्त विवाद के साए में कुछ तथ्यों पर गौर करें। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा 2019 के नतीजे इस वर्ष अगस्त के पहले सप्ताह में घोषित हुए थे। 829 आईएएस प्रशिक्षु चुने गए थे, प्राथमिक, मुख्य और व्यक्तित्व टेस्ट की तीन चरणों में अत्यंत कठिन प्रक्रिया के तहत होने वाली आईएएस परीक्षा में आखिरकार करीब 10 हजार अभ्यर्थी मुख्य परीक्षा के लिए बैठते हैं। 2009 में जब शाह फैसल सिविल सेवा में पहला स्थान पाने वाले पहले कश्मीरी व्यक्ति बने थे उसने भी मुस्लिम युवाओं में नया जोश भर दिया था और उन्हें आगे आने के लिए प्रेरित किया था। आईएएस परीक्षा की तैयारी कर मुंबईवासी रईस शेख ने ‘द वायर’ में प्रकाशित अपने एक लेख में कुछ आंकड़ों के जरिए अपनी बात रखी है। 2011 में 31, 2012 में 30, 2013 में 34, 2014 में 38 और 2015 में 36 मुस्लिम युवा आईएएस में चुने गए। 2016 से करीब 40-45 मुस्लिम युवक हर साल यूपीएससी परीक्षा क्लियर करते हैं। बेहतरी की प्रेरणा और जुनून में अगर वे अपना प्रदर्शन सुधार रहे हैं तो इसमें कौन सा जेहाद नजर आता है। और यह संख्या देश की आबादी में उनकी कुल संख्या के अनुपात में क्या है। कुछ भी नहीं। यह भी देखना चाहिए। उनके लिए तो बेहतरी की लड़ाई बहुत लंबी और कठिन है। और मीडिया हल्कों में कुत्सित प्रचार की कोशिशें तो इस लड़ाई में न सिर्फ बाधाएं खड़ी करती हैं बल्कि थकाती और उदास करती हैं। और किनारे धकेल देने की कोशिशें भी करती हैं।

कार्यक्रम में सिविल सेवा में मुसलमानों के लिए आरक्षण या कोटा जैसी सूचना भी तथ्यहीन पाई गई, कोर्ट ने इसका संज्ञान लिया। बेंच की एक जज, जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने बताया कि उन्होंने एक एपिसोड देखा और उसे देखकर वह आहत हुईं। बेंच के दूसरे जज केएम जोसेफ ने कहा कि ”राष्ट्र के लिए तो यह खुशी की बात है कि मुस्लिम यूपीएससी परीक्षाओं में चयनित हो रहे हैं। लेकिन आप उन्हें नीचा दिखाने के लिए ऐसा शो चलाना चाहते हो।‘’

चैनल के विवादास्पद प्रोमो में दिखाया गया कि मुसलमान साजिश कर रहे हैं सिविल सेवाओं में घुसपैठ के जरिए। कहा गया कि यूपीएससी जेहाद के जरिए इस परीक्षा में मुस्लिम उम्मीदवारों की आवक अचानक बढ़ गई है। यूपीएससी की ओर से इस बारे में कोई खंडन या नाराजगी या चैनल को फटकार या उसकी शिकायत के रूप में एक भी टिप्पणी पब्लिक डोमेन में नजर नहीं आई है। जबकि उसकी साख पर सवाल उठाया गया था। इतना जरूर है कि आईएएस और आईपीएस अधिकारियों ने इस तरह की किसी प्रस्तुति की सख्त आलोचना की और इसे मूल्यों के खिलाफ बताया। केरल के पूर्व डीजीपी और सीआरपीएफ के पूर्व एडीजी रिटायर्ड पुलिस अधिकारी डॉ एनसी अस्थाना ने चैनल के प्रोमो की भत्र्सना करते हुए इसे प्रशासन में मुस्लिम भागीदारी और उनकी मेहनत की तौहीन करने वाला बताया। उनके मुताबिक, इस तरह से तो आगे ‘मेडिकल जेहाद’ और ‘इंजीनियरिंग जेहाद’ जैसी कहानियां गढ़ी जाएंगी। और मुस्लिमों के लिए सारे रास्ते बंद करने की कोशिश की जाएगी।

आंकड़े बताते हैं कि प्रशासनिक सेवाओं में मुसलमान सिर्फ तीन प्रतिशत हैं। विदेश सेवा में करीब दो प्रतिशत, पुलिस में चार प्रतिशत, रेलवे में साढ़े चार प्रतिशत, शिक्षा में साढ़े छह प्रतिशत, गृह विभाग में सात प्रतिशत, न्यायिक सेवाओं में करीब आठ प्रतिशत और स्वास्थ्य विभाग में साढ़े चार प्रतिशत। अब इन आंकड़ों के बाद भी कुछ कहना बाकी रह जाता है? और उनकी उम्मीदों के कुछ कोने बनने लगते हैं तो उन्हें मिटाने की कोशिशें ‘यूपीएससी जेहाद’ जैसे कार्यक्रमों से करने की कोशिशें की जाती हैं। समाज में उनकी स्थिति पर तो कुछ कहा ही नहीं जाता। इंटरनेशनल डेवलेपमेंट स्टडीज के प्रोफेसर निसीम मनत्तुक्कारेन का एक विस्तृत आकलन दो साल पहले ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित हुआ था, जिसमें मुसलमानों की बदहाली के बारे में एक तरह की याद दिलाती है कि किस तरह उनकी राजनीतिक भागीदारी में कटौती होती जा रही है। यह हमले का एक प्रछन्न पैटर्न है। विधानसभा और लोकसभा सीटों का परिसीमन, वोटों का गणित, जातीय आधार- बहुत से ऐसे औजार चुनावी रणनीति के अदृश्य बक्से में रखे हैं जो मुसलमानों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से वंचित रखने में काम आते हैं। 19वीं सदी के फ्रांसीसी विचारक और राजनीतिज्ञ अलेक्सी चाल्र्स टॉकविल ने इसे ही टाइरैनी ऑफ मेजोरिटी कहा था। यानी बहुमत की निरंकुशता।

एक मिसाल जेलों की लेते हैं। भारत की जेलों में बंद लोगों में मुसलमानों, आदिवासियों और दलितों की तादाद देश में उनकी आबादी के अनुपात में कहीं ज्यादा है। सरकार के ये नए आंकड़े न्याय प्रणाली की समस्याएं ही नहीं गहरी सामाजिक विसंगतियों को भी उजागर करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, विचाराधीन कैदियों में सबसे अधिक संख्या मुस्लिमों की है। देश भर की जेलों में दोषसिद्ध यानी कन्विक्टड कैदियों में सबसे ज्यादा संख्या दलितों की है, 21.7 प्रतिशत। अनुसूचित जाति के विचाराधीन कैदियों का प्रतिशत है 21। जबकि 2011 की जनगणना में उनका हिस्सा 16.6 प्रतिशत का है। जनजातियों (आदिवासियों) में भी यही स्थिति हैं। दोषी करार दिए गए कैदियों में वे 13.6 प्रतिशत हैं और विचाराधीन कैदियों में साढ़े दस प्रतिशत। जबकि देश की कुल आबादी में वे साढ़े आठ प्रतिशत से कुछ अधिक ही हैं। मुसलमानों की संख्या देश की आबादी में 14.2 प्रतिशत है, लेकिन जेल के भीतर दोषसिद्ध कैदियों में साढ़े 16 प्रतिशत से कुछ अधिक उनकी संख्या है और विचाराधीन कैदियों में 18.7 प्रतिशत। न्याय प्रणाली के विशेषज्ञों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इससे भारत की आपराधिक न्याय पद्धति की बहुत सी कमजोरियों का पता चलता है और यह भी कि गरीब व्यक्ति के लिए इंसाफ की लड़ाई कितनी कठिन है।

 

अदरिंग पर आमादा बेलगाम टीवी मीडिया

इसीलिए यह माना ही नहीं जा सकता कि उक्त चैनल को ऐसे कुछ तथ्यों या हालात की कोई खबर ही न होगी। यूपीएससी जेहाद के जरिए निशाना उन युवकों पर है जो पढ़ लिखकर आईएएस बनने या अच्छी नौकरियां अच्छे पदों पर जाने का सपना देखते हैं, बदहाली और अपमानों से पीछा छुड़ाना चाहते हैं और एक नागरिक के रूप में अपनी भूमिका को और बेहतर ढंग से निभाने की जिम्मेदारी को महसूस करते हैं। यह निशाना ऐसे युवकों को प्रेरित करने वाले, उन्हें हर मुमकिन मदद मुहैया कराने की कोशिशें करने वाले समूहों और व्यक्तियों और संगठनों पर भी है। क्या यह एक ताकीद और चेतावनी भी है कि खबरदार वे ऐसा सोचें भी ना, उन्हें बस दूसरे दर्जे का नागरिक बनकर सिर झुकाकर रहना होगा- क्या यही संदेश है? इस खतरनाक और लोकतंत्र विरोधी प्रवृत्ति को सुप्रीम कोर्ट के सम्मानित जजों ने अपने फैसले में रेखांकित किया है। और एक बहुत बड़ी राहत दबे कुचले सहमे लोगों को दी है। लेकिन कॉर्नर करते जाने की खुराफातों का कोई अंत नहीं।

‘सुदर्शन न्यूज’ चैनल पर जो दिखाया गया या दिखाया जाने वाला था, वे सारी चीजें किसी न किसी रूप में अन्य टीवी चैनलों पर आती रही हैं। मुसलमानों की अदरिंग का साजो-सामान बड़ा विविध और बहुआयामी है। आप किसी भी कोण से जब चाहें कोई मुद्दा उठाकर उनकी मजम्मत करते रह सकते थे। मुख्यधारा के सिनेमा और इधर ओटीटी प्लेटफॉर्मों के चित्रण में ही नहीं, याद कीजिए- तीन तलाक की बहस, पर्दे की बहस, लव जेहाद और आतंकी वाली बहस और नागरिकता कानून, एनआरसी, मंदिर का मुद्दा और तो और मथुरा में कृष्ण के मंदिर की दीवार से सटी हुई मस्जिद को हटाए जाने को लेकर एक याचिका अदालत में डाली जा चुकी है- हो सकता है आने वाले दिनों में कैमरे बंबई से निकलें और शायद मथुरा चले जाएं? सिलसिला थमना नहीं चाहिए?

लॉकडाउन के दौरान तबलीगी सदस्यों समेत कई विदेशी नागरिकों के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार पर अदालतों ने पूछा कि अतिथि देवो भव: की परंपरा कैसे भूल गए। बंबई हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने साफ-साफ कहा कि नागरिक संशोधन एक्ट (सीएए) 2019 और एनआरसी के खिलाफ आक्रोशित और आंदोलित मुसलमानों को अप्रत्यक्ष चेतावनी देने के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी नागरिकों को अपराधियों के रूप में फंसाया गया और एक लिहाज से उन्हें ‘बलि का बकरा’ बनाया गया। हालांकि ये टिप्पणियां दो जजों की खंडपीठ में से एक ही जज की ओर से आई थी। तबलीगी सदस्यों पर कार्रवाई और मुख्यधारा के मीडिया में उनके खिलाफ बनाए गए माहौल के बीच जमाती शब्द को किसी अशोभनीय या खराब चीज की तरह इस्तेमाल किया गया। सोशल मीडिया नेटवर्क पर अफवाहें, सनसनी और फेक न्यूज फैलाई गईं। जहरीले कारखाने ज्यादा खतरनाक संक्रमण वाले विषाणु फैलाने पर आमादा हैं।

आधार भले ही अलग थे लेकिन दो अन्य हाईकोर्टो ने हाल में कमोबेश ऐसे ही निर्णय सुनाए थे। कर्नाटक हाईकोर्ट में विदेशी तीर्थयात्रियों को इस आशय के शपथपत्रों पर हस्ताक्षर करने पड़े कि उन्होंने वीजा शर्तों का उल्लंघन किया है और दस साल तक वे भारत नहीं आएंगें और मुआवजा भी भरा। लेकिन अपने फैसले में कोर्ट ने विदेशी तीर्थयात्रियों के प्रति सहानुभूति बरतने की ओर ध्यान दिलाया। कोर्ट का कहना था कि कोविड महामारी हमें एक दूसरे का ख्याल रखने का सबक सिखाती है न कि कानून के जखीरे निकालने का। मद्रास हाईकोर्ट के जज जीआर स्वानीनाथन ने कहा कि विदेशी तीर्थयात्रियों की हिरासत और उन पर मुकदमे करना बेसबब, बेजा और न्यायविरुद्ध है। उनका कहना था कि ये हालात बेशक अनिश्चित हैं लेकिन अधिकार निश्चित हैं। तबलीगी सदस्यों ने जो यातना और अपमान बर्दाश्त किया उसे वे ही महसूस कर सकते हैं। क्या अदालती टिप्पणियां नाइंसाफी पर मरहम की तरह काम करेंगी?

हक की लड़ाइयों पर हमला सिर्फ पुलिस दमन के रूप में या कानूनी कार्रवाईयों से ही नहीं होता। इस हमले के स्वरूप भी विभिन्न हैं और पैटर्न भी। ‘यूपीएससी जेहादÓ मुसलमानों को टार्गेट करने वाला एक पैटर्न है और भी ऐसी शब्दावलियां मैनुफेक्चर की जाएंगी। मुगलकालीन समय और मुगल शासकों के प्रति नफरती धारणाएं एक अलग पैटर्न है, सड़कों और संग्रहालयों के नाम बदलना भी एक पैटर्न है। आखिरकार मॉब लिंचिंग के जरिए हत्या कर देना रास्ते से हटा देने का एक पैटर्न ही तो है। सोशल मीडिया पर साहित्य और विचार और खानपान की अठखेलियां भी एक पैटर्न ही है। बहुसंख्यकवादी और नवफासीवादी एजेंडे, करतूत और प्रविधि का विरोध करने वाले या उसके दायरे में न अंटने वाले हर व्यक्ति, संगठन या विचार का अदृश्यीकरण। फॉल इन लाइन- सूत्र वाक्य यह है।

 

जीवंत लोकतंत्र पर गहन है अंधेरा

पोलिश-ब्रिटिश दार्शनिक और सामाजिक विज्ञान के व्याख्याकार सिगमुंट बाउमान (नवंबर,1925-जनवरी, 2017) सबसे अधिक अपने लिक्विड मॉडर्निटी के सिद्धांत के लिए जाने जाते हैं। यहूदियों के नात्सी उत्पीडऩ, अत्याचार और जनसंहार, फासीवादी प्रवृत्तियों और हिटलर की कार्यशैली के बारे में भी उन्होंने बिल्कुल नए ढंग से प्रकाश डाला है और कुछ अलग और अनूठी प्रस्थापनाएं दी हैं। बाउमान होलोकॉस्ट के बारे में लिखते हुए चिंतित रहे हैं कि यह जो गुजरा था, वह आने वाली भयावहता के सामने कुछ भी नहीं। वह निकट भविष्य के अवश्यंभावी होलोकॉस्ट को लेकर व्यग्र थे, उसकी अवश्यंभाविता के कारणों की तलाश करते थे और इसी तलाश के दरम्यान उन्होंने एक द्रवीली आधुनिकता का सिद्धांत सामने रख दिया था। एक ऐसी आधुनिकता जहां अस्मिता निरंतर द्रव है, उसका ठोस आकार नहीं है और वह एक अप्रत्याशित व्यग्रता और असुरक्षा को पैदा करती है।

बाउमान के निराशावाद के आलोचक भी कम नहीं। उस पर संदेह करने वाले विद्वान भी हैं जिन्होंने कहा कि बाउमान की यह चिंता और निराशा और उदासी कुछ अतिरंजित है, और इसकी वजह दरअसल उनका अतीत है। वह पोलेंड के निवासी यहूदी थे, दूसरे विश्व युद्ध के सरवाइवर थे, सोवियत संघ में शरणार्थी थे, कम्युनिस्ट थे लेकिन पार्टी वैचारिकता से हटने के आरोप में पोलैंड से निर्वासित कर दिए गए थे, इजरायल जाकर रहे लेकिन वहां से भी मन उखड़ा तो वापस इंग्लैंड आकर बस गए। लीड्स यूनिवर्सिटी से रिटायर होकर वहीं उसी परिसर के पास ही ताउम्र रहे। उन्हें समझौतावादी कहा गया, एंटी कम्युनिस्ट कहा गया, यहूदी घृणा का प्रचारक भी कहा गया लेकिन बाउमान अपने जीवन, लेखन और विचारों से बताते हैं कि वह यह सब नहीं थे। उनकी इकलौती चिंता आधुनिक मनुष्यता के खतरे में पड़ जाने की थी। वह एक नैतिक मुद्दे की तरह उसकी शिनाख्त करते हैं। बाउमान का विख्यात कथन है कि क्या हम अपनी जिम्मेदारी की जिम्मेदारी ले पाते हैं। यह बात मानो आज मुख्यधारा के मास मीडिया के संचालकों से भी पूछी जा रही है।

ऑनलाइन मीडिया, सोशल मीडिया, समाचार चैनलों और अखबारों से अंदर की खबरें बताती हैं कि मीडिया नियंत्रण के लिए अब प्रत्यक्ष दमनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई से ज्यादा अपने पक्ष में झुका लेने की रणनीति ज्यादा अमल में लाई जा रही है। सरकार समर्थित खबरें हावी हैं, आलोचना दरकिनार है। सत्ता के प्रति मीडिया की डिस्टेंसिंग ही उसकी पहचान रही है लेकिन इधर भारत में मीडिया की यह प्रवृत्ति भी मानो बड़े उलटफेर का शिकार हो गई है और अवमूल्यन समाचार की एक नई कसौटी बन चुका है। एक बड़ा मीडिया हिस्सा सत्ता नजदीकी से ग्रस्त है। कायांतरित हो जाने की यह बेला सेल्फी मोड की पत्रकारिता से फूटी थी। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ अखबार के मुख्य संपादक और मशहूर अंग्रेजी उपन्यासकार राजकमल झा ने आज की पत्रकारिता को बड़े खतरे से आगाह कराते हुए, 2016 में रामनाथ गोयनका जर्नलिज्म अवार्ड के समारोह में कहा था, ”इस सेल्फी जर्नलिज्म में अगर आपके पास तथ्य नहीं है तो इससे फर्क नहीं पड़ता है। आप फ्रेम में बस एक झंडा रख दीजिए और उसके पीछे छिप जाइए।‘’

समुदायविरोधी कटुता का प्रदर्शन करने वाला प्रस्तावित टीवी कार्यक्रम हो या हेट स्पीच या मुख्यधारा के सिने जगत का सुनियोजित आखेट या जेनुइन मुद्दों की लगातार अनदेखी और घोर उपेक्षा- इन सबके बीच समूचा लोकतांत्रिक लैंडस्केप ही मानो बिखरा हुआ नजर आता है। फॉल इन लाइन का तार मानो चारों दिशाओं में और हर कोने में हर फील्ड में बज रहा है। लेकिन तमाम बदहवासियों के बीच भी न जाने कैसे साहस की कुछ लकीरें फूट ही जाती हैं।

‘टाइमÓ पत्रिका की 2020 के सौ विशिष्टों की सूची में लीडर वाली कैटगरी में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी नाम आया है। ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने अपनी वेबसाइट में उनका वर्णन करते हुए लिखा है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में बहुधार्मिकता दलाई लामा के शब्दों में पारस्परिक सौहार्द और स्थिरता का एक बेजोड़ उदाहरण है लेकिन ”नरेंद्र मोदी ने इन सब बातों को संदेह के घेरे में ला दिया है। उनकी पार्टी बीजेपी ने बहुलतावाद को खारिज करते हुए भारतीय मुसलमानों को खासतौर पर टार्गेट किया है। महामारी की आड़ में प्रतिरोध को दबाया गया। और दुनिया की सबसे जीवंत डेमोक्रैसी पर और घना अंधेरा घिर आया।‘’

वरिष्ठ पत्रकार कार्ल विक के संक्षिप्त लेकिन तीक्ष्ण नोट की शुरुआत यह याद दिलाते हुए होती है कि ”लोकतंत्र की सबसे बड़ी खासियत यकीनन स्वतंत्र चुनाव नहीं हैं। चुनावों से तो सिर्फ यह पता चलता है कि किसे सबसे अधिक वोट मिले। विजेता को वोट न देने वालों के अधिकार ज्यादा महत्त्वपूर्ण हैं।‘’

आज से दो सदी पहले, 18वीं सदी के आखिरी दशकों में आयरलैंड के राजनीतिज्ञ और चिंतक एडमंड बर्क (जनवरी,1729-जुलाई,1797) भी कमोबेश यही बात एक अलग और ज्यादा प्रखर दार्शनिकता में रेखांकित कर चुके थे कि लोकतंत्र को नागरिक हिफाजत की गारंटी और सत्तासीन व्यक्ति की दल की सदाशयता या राजनीतिक भाईचारे या भलमनसाहत का प्रमाणपत्र मान लेना सही नहीं है। अपने चिंतन में कुछ कंजर्वेटिव, कुछ उदार, कुछ बरतानी मिजाज, कुछ विद्रोही एक मिलाजुला आवेगपूर्ण विरोधाभास लिए हुए था बर्क का व्यक्तित्व। फ्रांस की क्रांति बस भड़की ही थी। फ्रांस में उलट-पुलट का दौर था और योरोप में संशय और संदेह के बादल। नवंबर,1790 में उनका एक विख्यात निबंध प्रकाशित हुआ था, ‘रिफलेक्शन ऑन द रिवोल्यूशन इन फ्रांस’ (फ्रांस में क्रांति पर दृष्टिपात)। यह लेख बास्तीए (बास्तील जेल) के पतन से करीब एक साल पहले आ चुका था, जब लगता था कि लुई सोलहवें की जान बच जाएगी और संवैधानिक राजशाही कायम रहेगी और देश रक्तपात में नहीं डूब जाएगा। अपने दौर के अकेले चिंतक और राजनीति के मर्मज्ञ बर्क ही थे जिन्होंने फ्रांसीसी क्रांति की अंतर्निहित कमजोरियों, विफलताओं और विडंबनाओं की ओर इंगित करते हुए कहा था कि इससे न कोई लोकतंत्र आएगा न लोग सुखी होंगे, न वे अधिकारसंपन्न बन पाएंगें। एडमंड बर्क ने कहा था कि लोकतंत्र में नागरिकों की बहुसंख्या, अल्पसंख्यकों पर जघन्यतम अत्याचार ढाने में सक्षम होती है।

बर्क ने भांप लिया था कि क्रांतिकारी कहे जाने वाले नेता बेअसर हो जाएंगे और अधिक मारकाट होगी और उस क्रांति का सिला यह होगा कि एक तानाशाह का उदय होगा जो अपनी लपलपाती लालसाओं से दुनिया को फतह करने और लोगों को आजाद कराने की सनक से घिरा होगा और एक बार फिर धरती खून से नहा उठेगी। उस समय वह तानाशाह नेपोलियन था। आज अगर तसल्ली और सावधानी से बर्क के निबंधों को फिर से पढ़ा जाए तो लगने लगेगा कि ये तो आज के हालात के बारे में भी बता रहे हैं, वे आज की दुनिया की सामूहिकता के बिखराव और विश्व में राजनीतिक लोकतंत्र के छिन्न-भिन्न और एक हद तक तहसनहस होते जाने की प्रक्रिया का रिफ्लेक्शन सरीखे बन गए हैं। लोकतंत्र से भी बेहतर अगर कोई व्यवस्था होगी तो वह और अधिक पारदर्शी और टिकाऊ लोकतंत्र की ही हो सकती है। इसलिए लोकतंत्र की क्षति रोकने की भरसक कोशिश करनी चाहिए और उसे अधिक से अधिक जनोन्मुख बनाना चाहिए। मीडिया में आज जो दिखाया जा रहा है, उसका विरोध इसी ओर इंगित करता है, अदालत भी अपने तई यही करती हुई दिखती है।

सामाजिक प्रतिरोध आंदोलनों के साथ-साथ सूक्ष्म अध्ययन और मानवीय वैचारिक समझ के निर्माण की लड़ाई भी उतनी ही अपरिहार्य हो चुकी है। इंटरनेट और वेब और विशालकाय निगरानी तंत्र का साया इतना फैल चुका है कि दस-पंद्रह साल पहले जो कन्ज्यूमर या यूजर थे अब वे इस समूची सूचना प्रौद्योगिकी के प्रोडक्ट बन कर रह गए हैं। इस भयावह और त्रासद समय की एक झलक ‘मॉडर्न टाइम्स फिल्म के जरिये चार्ली चैप्लिन दिखा चुके थे : चलती हुई मशीन के पुर्जों के बीच फंसा हुआ आदमी!

इन पेचीदा और राजनीति और मीडिया जनित बदहवासियों के दौर में अपनी जमीन पर टिके रहें और अपने यकीन में डगमगाएं नहीं – यह भी आज की एक बड़ी लड़ाई है। सोचिए, आज से करीब 250 साल पहले एडमंड बर्क कह चुके थे कि जब बुरे आदमी इक_ा हो जाते हैं तो अच्छे लोगों को भी एक साथ आ जाना चाहिए वरना वे एक के बाद एक गिरते चले जाएंगे और एक तुच्छ लड़ाई में यह एक व्यर्थ की शहादत बनकर रह जाएगी। बर्क के निधन के कुछ वर्षों बाद 19वीं सदी में कमोबेश ऐसा ही आह्वान अधिक तीक्ष्णता और मॉमेंटम के साथ कार्ल माक्र्स ने किया था। 20वीं सदी कुछ उलझन, कुछ वेदना, कुछ संताप और कुछ संघर्ष में निकल गई, 21वीं सदी को अपनी प्रखरताओं का इंतजार है।

समयांतर,  अक्टूबर 2020

 

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