आखिर हिंदी की उपयोगिता क्या है?

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  • पंकज बिष्ट

 

भाषा अपने बोलने वालों की बौद्धिक सक्रियता और गतिविधि का तो प्रमाण होती ही है, सत्ता से अपने जीवंत संवाद के सामथ्र्य की, और ज्ञान के संचयन की क्षमता के, अनुपातिक संबंध का भी मानदंड होती है। इसलिए उसके स्तर में समानता नहीं होती। दूसरे शब्दों में भाषा की शक्ति काफी हद तक उसके बोलने वालों की क्षमता पर निर्भर करती है। और यह क्षमता भाषा के स्वाभाविक गुणों से इतर कारणों से भी अर्जित की जाती है।

इसे भारतीय संदर्भ से बेहतर समझा जा सकता है। पहली महत्वपूर्ण बात यह है कि इस देश में शासक और शासितों की, बौद्ध काल के अपवाद के, कभी भी एक भाषा नहीं रही है। दूसरा, संस्कृत ऐसी भाषा है जो, कम से कम लिखित इतिहास में, शायद ही कभी किसी प्रदेश या क्षेत्र की जनभाषा रही हो। पर यह सत्ता और ज्ञान की भाषा अवश्य थी। दूसरे शब्दों में वह शासक वर्ग की भाषा थी, जिसके पास ज्ञान की भी सत्ता थी।

इसलिए इस बात को रेखांकित करना जरूरी है कि भाषा पर बात करना अंतत: राजनीति पर बात करना है, विशेषकर भारतीय संदर्भ में। इसका कारण यह है कि भाषा ऐसा अवयव है जो किसी भी समाज को समझने और उसे नियंत्रित करने का महत्त्वपूर्ण उपकरण बनता रहा है, और है। हमारे इतिहास में उसकी यह भूमिका असामान्य रूप से व्यापक और प्रभावकारी रही है। संस्कृत इसका चरम उदाहरण है।

संस्कृत स्वयं ऐसा शब्द है जो एक विशिष्ट सामाजिक स्थिति की ओर इशारा करता है। यानी ‘संस्कार’ किया हुआ या परिमार्जित। यहां संस्कार से मतलब द्विजजातियों के लिए की जानेवाली ‘धार्मिक क्रियाओं’ से है।

इसलिए सवाल है कि भारतीय संदर्भ में इस ‘परिष्कृत’ माध्यम तक पहुंच कितने लोगों की थी? सच यह है कि जिस तरह से भाषा का एक दमनकारी और विभाजक घटक के रूप में इस्तेमाल प्राचीन भारत में हुआ, वैसा अन्यत्र देखने को नहीं मिलता है।

संस्कृत शासक वर्ग की भाषा थी, जिसके पास ज्ञान की भी सत्ता थी। यह कहना जरूरी नहीं है कि भारत के इतिहास में उच्च जातियों के प्रभुत्व को कम से कम तीन हजार साल तक अक्षुण रखने में इस भाषा ने महत्वपूर्ण भूमिका तो निभाई ही पर बाद के विदेशी शासकों ने भी इसके इस्तेमाल से कम सबक नहीं सीखे।

 

आमजन की भाषा की ओर

यह बात रेखांकन योग्य है कि 12वीं सदी में आए तुर्क शासकों ने भी शासन-प्रशासन के लिए स्थानीय भाषा को नहीं अपनाया। इस तरह भारत में शासन की पहली विदेशी भाषा फारसी हो गई जिसका उस दौरान मुस्लिम संसार में व्यापक इस्तेमाल हो रहा था। महत्वपूर्ण यह है कि तुर्क इस्लाम के मानने वाले थे। सामाजिक समानता इस धर्म का आधार है। पर इन लोगों ने भी कभी यह कोशिश नहीं की कि प्रशासन के लिए किसी जन भाषा को अपनाया जाए। प्रश्न यह है कि एक विदेशी भूमि पर, और वह भी उत्तर भारत जैसे व्यापक क्षेत्र में, आप सेना के बल पर कब्जा तो कर सकते हैं पर क्या शासन भी विदेशी भाषा में कर सकते हैं? चकित करने वाली बात यह है कि वह भी अगले सात सौ साल तक? सत्य यह है कि 19वीं सदी के मध्य तक भारतवर्ष की राजभाषा फारसी बनी रही।

सवाल यह है यह कैसे संभव हुआ? इसकी बड़ी संभावना तभी है जब उस समाज या देश का शासक वर्ग या उसका बड़ा हिस्सा विदेशी आक्रांताओं का सहभागी न बन जाए। यह इस बात का भी प्रमाण है कि वह समाज अपने आप में विभाजित समाज रहा होगा और शायद ही कभी एकजुट होकर किसी सामाजिक-राजनीतिक मुद्दे पर सहमत हो पाया होगा। या फिर यह भी संभव है कि उस समाज के बड़े हिस्से की सामाजिक-राजनीतिक नीति निर्धारण में भागीदारी नहीं के बराबर रही होगी। उसकी आवाज ही नहीं होगी। दूसरे अर्थों में, जो महत्वपूर्ण है, वह यह कि समाज के बड़े हिस्से का सत्ता की भाषा से कोई सरोकार ही नहीं होगा।

ऊपर यह बात परिकल्पनात्मक स्तर पर रखी गई थी, पर यह भारतीय संदर्भ में यथार्थ है। यही वह मोड़ है जो हमें सोचने को मजबूर करता है कि आखिर ऐसा क्यों और कैसे हुआ कि एक के बाद एक भारत में आए विदेशी शासकों को सात सौ साल तक किसी स्थानीय भाषा की कोई जरूरत ही नहीं महसूस हुई?

लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत जितना बड़ा कोई भी समाज बिना संवाद के चल नहीं सकता। इसलिए इस बीच एक नई भाषा का जन्म हो रहा था जो मुस्लिम शासन के पांच सौ साल बाद कहीं जाकर आकार ले पाई। इसका नाम हिंदवी, लश्करी या उर्दू था और जैसा कि स्पष्ट है इसका जन्म  सत्ता और समाज के बीच की भाषायी खाई से हुआ था। यह विदेशी अरबी-फारसी और स्थानीय भाषाओं और बोलियों के मिश्रण से बढ़ रही थी। इस तरह की मिश्रित भाषा का जन्म अफ्रीका और अमेरिकी उपहाद्वीपों में जगह-जगह देखा जा सकता है, जहां लंबे समय तक योरोपीय शासन रहा है। इस तरह की भाषाएं ‘पीजिन’ या ‘क्रिओल’ कहलाती हैं जो पूर्वी एशिया से लेकर अफ्रीका तथा लातिन अमेरिका तक फैली हैं।

इधर इतिहास नया मोड़ ले रहा था और 19वीं सदी के प्रारंभ में एक पश्चिमी ताकत भारत के राजनीतिक फलक पर उभर रही थी। महत्वपूर्ण यह है कि तब तक फारसी ही प्रशासन और न्यायपालिका की भाषा थी, जिसका किसी भी रूप में आम लोगों से संबंध नहीं था। तथ्य यह है कि अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर के समय  (ई.1857) तक फारसी ही राजकाज की भाषा बनी रही। यह स्थिति मुस्लिम शासन की शुरूआत यानी 13वीं सदी से चली आ रही थी। ऐसा कोई जरऱ्ा भर का प्रमाण नहीं है कि विदेशी भाषाओं के प्रयोग पर आम जनता तो छोड़ बुद्धिजीवियों यानी पंडितों तक ने कभी किसी तरह का कोई सक्रिय विरोध करना तो रहा दूर, सामान्य आपत्ति तक की हो। उल्टा उन्होंने बड़े पैमाने पर वह ‘मलेच्छ’ भाषा सीखी और सत्ता में भागीदारी की।

प्रसंगवश भारत में उर्दू भाषा का विकास जिस तरह से हो रहा था वह कम महत्वपूर्ण नहीं है। चमत्कार यह है कि मात्र सौ-डेढ़ सौ वर्ष पुरानी उर्दू ने भारतीय वांग्मय को मीर और गालिब जैसे कवि दिए। मजे की बात यह है कि आज गालिब की फारसी रचनाओं को कोई याद नहीं करता। यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत के अंतिम मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर ने, शासन चाहे फारसी में किया हो पर कविता उर्दू में ही लिखी। यह इस बात को भी दर्शाती है कि जन भाषा की स्फूर्तता क्या होती है। हिंदी का जन्म इसके सौ साल बाद हुआ और उसे तेज करने में अंग्रेजों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

पर इससे भी बड़ी बात यह है कि यह प्रक्रिया इस बात की पुष्टि ही करती है कि भारत में जनता और शासकों की भाषा सदा से अलग-अलग रही है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, सवाल सिर्फ यह है कि आखिर यह परंपरा इतने समय तक जारी कैसे रही?

विडंबना इस संदर्भ में यह है कि सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी के अंग्रेज प्रशासकों ने मांग की कि प्रशासन, विशेषकर अदालतों में, स्थानीय भाषाओं का प्रयोग हो। जैसे कि 1830 में भारत की यात्रा करने वाले मेजर एडवर्ड कालफील्ड आर्चर ने अपने यात्रा वृत्तांत टूर्स इन अपर इंडिया एंड इन पार्टस ऑफ हिमालय माउंटेंस में लिखा है: ”इस भाषा (फारसी) का सतत इस्तेमाल असीम बेहूदगी है और यह असंख्य जनता के साथ अंतहीन अन्याय का स्रोत है।‘’

फ्रेड्रिक जॉन शोर, जो स्वयं फर्रुखाबाद में न्यायाधीश थे, के लेख में जनता पर फारसी लादे जाने की आलोचना है। शोर के लेख का शीर्षक था ‘ऑन द यूज ऑफ द हिंदुस्तानी लेंगुएज’ (‘हिंदुस्तानी भाषा के इस्तेमाल की जरूरत’, नोट्स ऑन इंडियन एफेयर्स, खंड 1, 1832)। फारसी को लेकर इस तरह की आपत्तियां अंग्रेजों द्वारा प्रकाशित की जाने वाली तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं (जैसे कि 1821 में फ्रेंड्स ऑफ इंडिया में लेख तथा कैलकेटा गजट का संपादकीय) और उस दौरान लिखी गई किताबों में देखने को मिलती हैं। ईस्ट इंडिया कंपनी के भारत पर बढ़ते नियंत्रण के साथ उसके कर्ताधर्ताओं की समझ में यह बात आते देर नहीं लगी कि फारसी का सत्ता के कामकाज में इस्तेमाल निहायत अव्यवहारिक है। क्योंकि वह न तो न्यायाधीशों की समझ में आती थी और न ही मुवक्किलों की। यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि कंपनी सरकार ने 1803 में ही फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना कर दी थी और टकसाली हिंदी की नींव पड़ गई थी। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ।

पहला इसलिए कि अंग्रेजों को स्थानीय स्तर की भारतीय भाषाओं के साथ ही फारसी भी सीखनी पड़ रही थी। दूसरा, देशी शासक वर्ग (यानी ऊंची जातियां) हजारों वर्ष पहले ही जान गया था कि भाषा ऐसा हथियार है जिससे लोगों को ज्ञान और यथार्थ से दूर रखने और अपना वर्चस्व बनाए रखने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सच यह है कि यह समझ भारतीय समाज तक ही सीमित नहीं थी। ऐसा ही इस्तेमाल योरोप में लेटिन का भी किया गया था, पर उतनी दक्षता से नहीं जितना कि भारतीय संदर्भ में जाति व्यवस्था के तहत देखने को मिलता है। यहां लोगों को जबरन उस भाषा यानी संस्कृत को सीखने और इसमें संग्रहित ज्ञान से परिचित नहीं होने दिया गया। याद कीजिए मनुस्मृति के निर्देशों को और इस तरह समाज के बड़े हिस्से को ज्ञान के साथ ही साथ सत्ता और प्रशासन से वंचित रखा गया, गुलामों से भी बदत्तर हालत में।  यह कम महत्वपूर्ण नहीं है कि संस्कृत के सीमित इस्तेमाल से मात्र ज्ञान ही पर नियंत्रण नहीं बना रहा बल्कि सामान्य आदमी के पैदा होने से मरने तक की क्रियाओं को नियंत्रित किया गया।

 

शासक वर्ग के निहितार्थ

भारत ने इतने बड़े पैमाने पर और इतने लंबे समय तक फारसी को क्यों लादे रखा इसे समझना जरूरी है।

सच यह है कि भारतीय शासक वर्ग कभी भी सारे समाज के लिए एक भाषा का हिमायती नहीं रहा। संस्कृत में जो मृच्छकटिकम जैसा अपवाद नजर आता है वह वास्तव में नियम की विकटता का ही उदाहरण है। इसलिए इन अपवादों का कोई अर्थ नहीं है। संस्कृत के लेखन और संवाद में भाषायी शुद्धता की अनिवार्यता लगातार बनी रही। दूसरे शब्दों में संस्कृत सीखने का कोई स्वतंत्र रास्ता नहीं रखा गया था। इस तरह शासक वर्ग और आम जनता की भाषा, सदा अलग-अलग रही।

संस्कृत के बाद फारसी इसकी वाहक बनी। आखिर यह क्यों हुआ? इसलिए कि भारतीय शासक वर्ग को शासन की भाषा (विदेशी) की गूढ़ता में छिपी संभावना नजर आई। वैसे भी अधिसंख्य जनता जो निरक्षर थी, उसके लिए जब अपनी ही भाषाएं अजनबी हों, एक विदेशी भाषा में महारथ हासिल करने की बात कैसे सोची जा सकती थी। हिंदू उच्च व मध्य वर्ग ने किसी जनभाषा के अपनाए जाने के लिए आम जनता के साथ मिलकर संघर्ष करने से बेहतर यही समझा की फारसी अपनाई जाए। उन्होंने बड़े पैमाने पर फारसी सीखनी शुरू कर दी और विदेशी शासकों के विश्वस्त कर्मचारी बनने में उन्हें समय नहीं लगा।

अंग्रेजी की कहानी इसी का अगला अध्याय है। सच यह है कि आज अगर मातृभाषा या जनभाषा, दूसरे शब्दों में हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं की बात होती है तो उसके लिए लोकतांत्रिक विश्वासों, अवधारणाओं और सिद्धांतों को श्रेय जाता है जो हमने पश्चिम से लिए या औपनिवेशिक आकाओं से सीखे। महत्वपूर्ण यह है कि उनके संपर्क में हमारा उच्च व मध्य वर्ग ही सबसे ज्यादा रहा है। तब सवाल है कि इसके बावजूद उनकी समझ में यह क्यों नहीं आया कि ज्ञान की भाषा और आम जनता की भाषा अलग-अलग नहीं होनी चाहिए? कांग्रेस की बात छोडि़ए उसकी तो स्थापना ही एक अंग्रेज ने की थी हमारे कम्युनिस्ट आंदोलन की भाषा भी अंग्रेजी ही रही। उन्होंने तो कभी भी भाषा के मसले पर बात करना उचित नहीं समझा।

यहां भी भारतीय बुर्जुआजी के चातुर्य का चमत्कार देखा जा सकता है। उसने पश्चिमी विकास और ज्ञान को इस तरह आत्मसात किया कि उसके पश्चिमी ज्ञान और जातीय अधिकारों के बीच कोई टकराव ही नहीं पैदा हुआ। वह जनेऊ लेकर प्रयोगशाला में घुसा और जनेऊ सहित ही फिर से बाहर खड़ा नजर आया। पश्चिमी ज्ञान की तार्किकता, रेडिकल सामाजिक मूल्यों का प्रभाव और समानता के मूल्य उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाए। कुल मिलाकर इससे ब्राह्मणवादी मूल्य व्यवस्था मजबूत ही हुई। धोती, जनेऊ और त्रिपुंड में अंग्रेजी बोलते स्वामी, संन्यासी और महर्षियों ने भारतीय संस्कृति की महानता को स्वयं सिद्ध कर दिया। इस वर्ग को ज्ञान से लाभान्वित होने की वह जन्मजात सुविधा थी जिसने कि उसे नई शासन व्यवस्था में भी उसी तरह शीर्ष पर विराजमान रखा, जिस तरह से मुस्लिम शासकों के दौर से चला आ रहा था।

यह किस तरह संभव हुआ इसका उदाहरण भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था है। संसदीय प्रणाली और मतदान की व्यवस्था को अपनाने की मजबूरी में भारतीय शासकों को भारतीय भाषाओं और हिंदी को, जो अब तक उर्दू के समानांतर और उससे आगे बढ़कर एक बड़े हिस्से की, काफी हद तक सांप्रदायिक कारणों से, भाषा बन चुकी थी, अपनाना पड़ा और इस तरह वोट की राजनीति के चलते भाषायी पहचान का मार्ग खुला।

विडंबना यह है कि भारतीय भाषाएं वोट की राजनीति का हथियार तो बनीं पर वे प्रशासन और ज्ञान की भाषा नहीं बन पाईं। क्षेत्रीय भाषाओं की बात तो छोडि़ए, हिंदी, जो सबसे बड़ी भाषा थी, सत्ता और ज्ञान से दूर ही रही। बल्कि हुआ यह कि अंग्रेजों के जाने के बाद धीरे-धीरे हिंदी अन्य प्रादेशिक भाषाओं के साथ किनारे लग गई। नतीजा सामने है, ज्ञान और सत्ता के सभी क्षेत्रों में एक वर्ग यानी उच्च जातियों का वर्चस्व बना रहा बल्कि कहना चाहिए बना हुआ है। इसलिए यह कोई अजूबा नहीं है कि इस वर्ग ने सबसे पहले अंग्रेजी में महारथ हसिल कर ली थी।

लगभग डेढ़ दशक पहले पढ़ा एक लेख मुझे याद आ रहा है जिसका शीर्षक था: ‘द इंग्लिश ऑफ इंडिया : क्लॉस फॉर्मेशन एंड सोशल प्रिविलेज’ (‘भारत की अंग्रेजी : वर्ग का निर्माण और सामाजिक विशेषाधिकार’)। इसके अनुसार 19वीं सदी के शुरू में ही अंग्रेजी की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई थी कि उसके पढऩे के लिए मारामार होने लगी। सन 1800 के आसपास कोलकाता में कम से कम 20 ऐसे प्राइवेट स्कूल खुल चुके थे जिन्हें अंग्रेज चलाते थे। ये सब बहुत मंहगे थे। इसके अलावा गिनती के कुछ ऐसे स्कूल मिशनरी भी चलाते थे जो नि:शुल्क थे। इसी तरह के एक स्कूल के संचालक परोपकारी व्यापारी डेविड हारे नाम के सज्जन थे। उनकी पालकी के साथ-साथ तख्ती लेकर रोते-गिड़गिड़ाते हुए दौड़ते लड़कों को देखा जा सकता था। इन तख्तियों पर लिखा होता था- ”मैं गरीब बच्चा हूं, मुझ पर दया करें, मुझे अपने स्कूल में दाखिला दें।‘’ लेख के अुनसार जब ईश्वर चंद्र गांव से पढऩे की चाह में कोलकाता पहुंचे, उन्हें भी यही करने की सलाह दी गई। स्पष्ट है कि वह अंग्रेजी सीखने ही कोलकाता आए थे। यह माना जाता है कि विद्यासागर के समकालीन सुधारक रामतनु लाहिड़ी ने, जो उस समय 13 वर्ष के थे, दो महीने तक हारे साहब की पालकी के पीछे दाखिले की भीख मांगते हुए दौड़ लगाई थी और अंतत: सफल हुए थे। मधुमिता राय का यह लेख सोशल सांइंटिस्ट में छपा था जिसके उन दिनों संपादक प्रभात पटनायक थे।

ध्यान देने योग्य यह है कि ये दोनों ही – ईश्वर चंद्र और रामतनु लाहिड़ी – उच्चकुलीन ब्राह्मण थे। स्पष्ट है कि असफल (व्यापार में) अंग्रेजों के द्वारा चलाए जा रहे इन स्कूलों की फीस कोई सामान्य भारतीय यानी छोटा किसान, मजदूर या दलित नहीं दे सकता था।

क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि भारतीय, विशेषकर हिंदू एलीट और बौद्धिक वर्ग, ने इस बार भी एक और विदेशी भाषा यानी अंग्रेजी का विरोध नहीं किया, जो कायदे से उसे करना चाहिए था। सवाल है अंग्रेजी शिक्षा पाने की यह होड़ क्यों मची थी? क्योंकि वह हवा का रुख पहचान गया था। ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी पाना उस दौर में कितना आकर्षक रहा होगा इसका अनुमान किस्सा सूबेदार सीताराम पांडे शीर्षक आत्मकथा से लगाया जा सकता है। पांडे जिसने अपनी नौकरी बचाए रखने के लिए 1857 के गद्दर के दौरान अपने बेटे को गोली मारने के आदेश दिए थे। वह कंपनी की पल्टन में नॉन कमीशंड अधिकारी था और उसका जिम्मा था कि वह पकड़े गए विद्रोहियों को, जिनमें उसका बेटा भी शामिल था, गोली मारे। उसने पूरी स्वामिभक्ति से आदेश का पालान किया था। अंग्रेजी के साथ हिंदू एलीट का यह संबंध हर दिन प्रगाढ़ होता गया और जल्दी ही इसने वह रूप ले लिया जिसने 19वीं सदी के अंत तक पूरे भारत को अंग्रेजीमय बना दिया। इस प्रवृत्ति को फारसी को, बिना किसी विरोध के, स्वीकार किए जाने से भी जोड़ कर देखा जा सकता है।

 

नई शिक्षा नीति में भाषा

अगस्त माह घोषित नई शिक्षा नीति, जिसे भारतीय संस्कृति की अब तक की सबसे बड़ी ठेकेदार भाजपा सरकार ने बनाया है, किस तरह अंग्रेजी से जुड़ी है वह देखने लायक है। शिक्षाशास्त्री अनिल सदगोपाल का नई शिक्षा नीति (‘न्यू एज्यूकेशनल पालिसी’) के संदर्भ में यह कहना महत्वपूर्ण है कि : ”एनईपी जाति और पितृसत्ता शिक्षा, उसकी प्राप्ति, ज्ञान की रचना और उच्च शिक्षा के रास्ते से आर्थिक-सामाजिक गत्यात्मकता हासिल करने के रास्ते में रोड़ा अटकाने में आधिपत्यवादी भूमिका निभाती है।‘’ (‘डिकोडिंग द एजेंडा’, फ्रंटलाइन, 28 अगस्त, 2020)

इससे क्या यह नतीजा नहीं निकलता कि अंग्रेजी के प्रति जो प्रबल लगाव हमारे देश में पिछली दो शताब्दियों से बना हुआ है उसके पीछे सबसे बड़े कारण के तौर पर यही वर्ग है? स्पष्ट है कि तात्कालिक मजबूरियां चाहे जो रही हों, उसे यह कभी भी मंजूर नहीं हुआ कि उसके हाथ से ज्ञान और सत्ता की डोर खिसक जाए। यही कारण है कि भारत के आज तक के इतिहास में ज्ञान और सत्ता की भाषा किसी भी तरह आमजन की भाषा नहीं बन पाई है। वह लोकतांत्रिक प्रणाली, जिसके कारण सत्ता व ज्ञान पर उसके एकछत्र नियंत्रण को ,जो चुनौती मिलने लगी थी उससे बेचैन होकर भारतीय उच्च व मध्य वर्ग ने संविधान के धर्मनिरपेक्षता, जातिवाद विरोध और समाजवाद के घोषित उद्देश्यों के मुखौटों को नोंच कर फेंक दिया है। पिछले दो दशकों से तेजी से बढ़ते प्रतिगामी सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों का इनसे कितना और किस तरह का रिश्ता है या हो सकता है, इसके लिए किसी शोध की जरूरत नहीं है। आरक्षण के हथियार को जिस तरह से कुंद किया जा रहा है, विशेषकर वर्तमान सरकार द्वारा, वह कुल मिलाकर ऊंची जातियों के इस मिथक को ही मजबूत करता है कि प्रतिभा के असली दावेदार वही हैं और आरक्षण कुल मिला कर प्रतिभाहीनता को बढ़ावा देना है।

 

दलित और अंग्रेजी

इधर अंग्रेजी को लेकर एक ऐसी प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है जिसका संबंध ‘सांस्कृतिकरण’ के सिद्धांत से है। वह है दलितों में अंग्रेजी को मुक्ति के मार्ग के तौर पर देखने की। कंचा इलइया शेपर्ड और चंद्रभान प्रसाद जैसे बुद्धिजीवियों का कहना है कि अंग्रेजी से हम वैश्विक स्तर पर जुड़ते हैं और जातीय दमन से मुक्ति पाते हैं। ऊपरी तौर पर यह बात गलत नहीं है। पर वे यह भूल जाते हैं कि जिस देश में अधिसंख्य लोगों के लिए आज भी अपनी भाषा में पढ़ाई की उचित व्यवस्था न हो वहां कितने लोगों को अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा पाने का सौभाग्य प्राप्त हो सकता है। अब तो यह और भी कठिन हो चुका है।  शिक्षा को, व्यापार बनाने का जो दौर पिछली कांग्रेस सरकारों ने शुरू किया था, भाजपा सरकार ने उसे कमोबेश पूरी तरह निजी क्षेत्र के हवाले कर देने का फैसला कर लिया है।

इसके साथ ही हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि आज देश में जो दलित चेतना का विकास दिखाई दे रहा है उसमें हिंदी सहित प्रादेशिक भाषाओं, जैसे कि मराठी, तेलुगू और तमिल आदि की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। स्पष्ट है कि यहां असली महत्व ज्ञान अर्जन का है और यह मातृभाषा या स्थानीय भाषाओं में ज्यादा आसानी और तेजी से संभव है। पर दलित बुद्धिजीवियों में बढ़ते इस विश्वास को आधारहीन भी नहीं माना जा सकता। वर्तमान सरकार जितना भारतीय भाषाओं के महत्व पर बात करती है, उतना ही संशय बढ़ता है कि वह गरीबों और दलितों को शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक प्रगति से बाहर कर देना चाहती है।

भारत सरकार हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं को लेकर कितनी प्रतिबद्ध या गंभीर है या हो सकती है, निश्चय ही यह आधारभूत सवाल है। तथ्य यह है कि स्वयं निम्नवर्ग, जो जातिगत तौर पर भी निर्धारित हो रहा है, आर्थिक और सामाजिक विकास के क्षेत्रों में लगातार पिछड़ता जा रहा है। उसे उन सरकारी स्कूलों में पढऩे को मजबूर किया जाता है जहां आज न तो अध्यापक हैं और न ही अन्य सुविधाएं, सिवाय मध्याह्न भोजन के। दूसरी ओर उच्च जातियां लगभग तीन दशक पहले ही पूरी तरह से सरकारी स्कूलों को छोड़कर निजी क्षेत्र के स्कूलों में जा चुकी हैं, जहां केजी आदि से ही अंग्रेजी सिखाई जाती है।

गत वर्ष जब नई शिक्षा नीति का मसौदा जारी हुआ था तो उसमें सीधे-सीधे हिंदी को गैरहिंदी भाषी प्रांतों पर थोपने का प्रयत्न इस कदर सीधा था कि हंगामा मचते देर नहीं लगी। इस बार सरकार ने वह गलती सुधार ली है। फिलहाल जुलाई में घोषित नई शिक्षा नीति (नशिनी) में भाषा को लेकर क्या है इसे देखा जा सकता है। नशिनी कक्षा पांच तक  मातृभाषा में शिक्षा देने पर जोर डालती है। यहां तक कि उसकी सिफारिश है अगर संभव हो तो मातृभाषा में शिक्षा आठवीं कक्षा तक दी जाए। मातृभाषा में शिक्षा देने का महत्त्व किसी से छिपा नहीं है। ज्योतिबा फुले, महात्मा गांधी और रवींद्र नाथ ठाकुर जैसे लोग इसके हिमायती रहे हैं। इसलिए इसका स्वागत न करने का सवाल ही नहीं उठता। पर सवाल यह है कि आखिर सात दशकों से यह हुआ क्यों नहीं? उल्टा निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के बहाने गांव- गांव में अंग्रेजी स्कूल फैल गए हैं। अब सरकारी स्कूलों में सिर्फ वे बच्चे पढ़ रहे हैं जिनके घरों में दो समय की रोटी ठीक से उपलब्ध नहीं है।

पर नशिनी आगे जो कहती है वह उसकी मंशाओं को स्पष्ट कर देती है: ”किसी भी छात्र पर कोई भाषा लादी नहीं जाएगी।ÓÓ इस वाक्य की मार देखिये। यानी आप अंग्रेजी समेत, जो चाहे भाषा चुन सकते हैं। तब मातृभाषा की अनिवार्यता कहां गई? यह किसके लिए किया गया है? स्पष्ट है कि विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग के लिए और हां, निजी क्षेत्र के स्कूलों के लिए, जहां तीसरे वर्ष से ही अंग्रेजी की शिक्षा शुरू हो जाती है। पर यह निश्चित है कि सरकारी स्कूलों में नशिनी को जरूर लागू किया जाएगा। यानी भाषा का यह बोझा ढोने का काम दलित और गरीब वर्ग करेगा।

यह सवाल, जो हो सकता है पर अर्थहीन है, कि अगर सरकार हिंदी या भारतीय भाषाओं की पक्षपाती है तो फिर उसने अंग्रेजी को वैकल्पिक भाषा क्यों नहीं बनाया? यह किसी से छिपा नहीं है कि अंग्रेजी, इस औपनिवेशिक इतिहास से लदे देश में, निर्णायक घटक है। इसके बाद आपको और किसी भाषा को जानने की जरूरत नहीं रह जाती। इसलिए कि ऐसा करने से जो तूफान बरपता उसे शायद सरकार एक घंटा नहीं झेल पाती। यह असंभव नहीं है कि तब उत्तर भारत का अभिजन वर्ग भी खुलकर हिंदी विरोधियों के साथ खड़ा नजर आता। जबकि सत्य यह है कि अगर अंग्रेजी को वैकल्पिक विषय बना भी दिया जाता है तो भी लोग शायद ही उसे छोड़ें।

पर मसला अंग्रेजी के पढ़ाए जाने के विरोध का नहीं है। आज अंग्रेजी से, कम से कम भारत में, बचा नहीं जा सकता। तथ्य यह है कि मातृभाषा का हर बच्चे के निर्माण में महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। अनिल सदगोपाल ने अपने लेख में(वही, फ्रंटलाइन, 28 अगस्त) ब्रिटिश काउंसिल द्वारा अंग्रेजी को लेकर किए गए एक अध्ययन का हवाला दिया है। काउंसिल विश्व में अंग्रेजी के प्रचार-प्रसार का काम करती है, 2017 में अंग्रेजी पढ़ाए जाने पर उसने यह अध्ययन करवाया था। जिसके अनुसार, ”व्यापक तौर पर मानी जाने वाली इस बात के पक्ष में लगभग कोई प्रमाण नहीं है कि शिक्षा का माध्यम बना देने से अंग्रेजी भाषा को बेहतर सीखा जा सकता है बनिस्पत कि अंग्रेजी का एक विषय के रूप में अध्ययन करने से।‘’

आज के संदर्भ में, यथार्थ को देखते हुए, हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मांग का कोई औचित्य वैसे भी नहीं नजर आता है। माना हिंदी राष्ट्रभाषा हो भी जाती है, तो भी अगर वह आज जैसी स्थिति में बनी रहती है तो किस काम की। वह कभी भी अंग्रेजी का स्थान नहीं ले पाएगी।  इसलिए जो मांग होनी चाहिए थी या होनी चाहिए वह है हिंदी को एक आधुनिक भाषा बनाने की। ऐसी भाषा जिसमें विश्व का अद्यतन ज्ञान हो। जिसकी रचनात्मक सक्रियता व्यापक हो। इस रचनात्मकता से तात्पर्य यह है कि समाज के रूप में उसकी भूमिका साहित्य ही नहीं कलाओं, समाज विज्ञान और शुद्ध विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी में भी उतनी ही हो। यानी जिसके पाठक अपनी सामाजिक समझ, वैज्ञानिक चेतना और तार्किकता के लिए जाने जाते हों।

हिंदी के आधुनिक होते ही भारत की सारी भाषाओं की स्थिति बदल जाएगी। इसका ‘काइनैटिक’ असर होगा। यह अचानक नहीं है कि आज भारत अंग्रेजी बोलने वालों का सबसे बड़ा देश बन चुका है। यहां से ऐसा अखबार निकलता है जो छाती ठोक कर कहता है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा अंग्रेजी अखबार है। भारत में अंग्रेजी प्रकाशन उद्योग का अपना ही जलवा है। दुनिया का अंग्रेजी का शायद ही ऐसा कोई प्रकाशक हो जो आज भारत से प्रकाशन न करता हो। इसलिए जो कोई भी गैर हिंदी भाषी अपनी भाषा बचाने की कोशिश कर रहे हैं उनका समर्थन किया जाना चाहिए क्योंकि ये ही लोग और इन्हीं की भाषा शायद भविष्य में कभी हिंदी को समर्थ बनाने और बचाने के लिए उदाहरण बने।

 

सृजनात्मकता का सिमटता दायरा

हिंदी में आज से सौ वर्ष पूर्व जो रचनात्मक ऊर्जा थी क्या वह आज नजर आ रही है? क्या ऐसा है कि आज का हिंदी समाज प्रतिभा-विहीन हो गया है? इस ठहराव का बड़ा कारण कुल मिलाकर अंग्रेजी ही है। दक्षिण को छोडि़ए। बल्कि पूरे अहिंदी भाषी प्रांतों को ही छोड़ दीजिए। हिंदी के दस प्रांतों की बात कीजिए। जितने बड़े  पैमाने पर आज इस क्षेत्र में अंग्रेजी माध्यम के स्कूल खुल रहे हैं, उतने शायद ही किसी अन्य क्षेत्र में खुल रहे हों। इसलिए हिंदी में बढ़ता ठहराव मात्र संयोग नहीं है। दूसरी ओर आज जितने रचनात्मक अंग्रेजी लेखक हिंदी पट्टी से आ रहे हैं उतने पिछले सौ साल में नहीं आए होंगे। आजादी से पहले और उसके बाद के कई दशकों तक लोग अंग्रेजी पढ़ते-पढ़ाते थे, पर लिखते हिंदी में थे। उदाहरण के लिए याद कीजिए हरिवंश राय बच्चन को। इस सूची के प्रमुख कुछ और नाम हैं: नगेंद्र, रघुवीर सहाय, श्रीकांत वर्मा, भीष्म साहनी, कृष्ण बलदेव वैद्य और विष्णु खरे। इस परंपरा में अशोक वाजपेयी, रमेशचंद्र शाह, राजी सेठ और मृणाल पांडे आदि को भी जोड़ा जा सकता है। पर आज क्या हो रहा है? ओला के ड्राइवर तक अपने बच्चों को किसी तरह अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। वे कैसे हैं, उनका स्तर क्या है, यह दीगर बात है।

प्रश्न संभवत: हिंदी का ही नहीं है, बल्कि यह है कि तमिल, बांग्ला, मलयालम जैसी समृद्ध भारतीय भाषाओं को हमारे समाज और सत्तावर्ग ने क्यों प्रशासन और ज्ञान की भाषा नहीं होने दिया है? स्पष्टत: इसके कारण भारतीय समाज की संरचना में निहित हैं जिसमें ज्ञान, सामाजिक तंत्र तथा राजनीतिक व्यवस्था पर एकछत्र नियंत्रण उच्च जातियों का रहा है। आजादी के बाद अपनाई गई राजनीतिक व्यवस्था ने, कुछ हद तक ही सही, उस व्यवस्था को तोड़ा था। इस दौर में उठाए गए कई सुधारवादी कदमों ने भारतीय समाज में उच्च जातियों के नियंत्रण को कमजोर किया और राजनीति तथा राजतंत्र में भी पिछड़ी जातियों की उपस्थिति बढ़ी। यह निश्चय ही समानता की ओर एक बड़ा कदम था। पर इसने ऊंची जातियों में जो बेचैनी पैदा की वह आज अपने चरम पर पहुंचकर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन की नीतियों के तौर पर सामने है।

इस परिघटना में एक बात जो सामान्यत: समझ नहीं आती है वह यह कि आखिर हिंदू धर्म की रक्षा में वे जातियां भी, जो अनंतकाल से जाति भेद और दमन का शिकार रही हैं, क्यों शामिल हो गई हैं। इसका एक संभावित उत्तर यह है कि सामाजिक न्याय के जो कदम पिछले सात दशकों में उठाए गए उनको लोकतांत्रिक सरकारों ने समय-समय पर अद्यतन नहीं किया। इसका नतीजा यह हुआ कि ये सुधारवादी कदम, वंचित समाजों के सीमित वर्ग तक सिमट गए और इन जातियों के बीच पैदा हुए इस एलीट के हित अंतत: यथास्थिति को बनाए रखने के साथ जुड़ गए।

एक और बात यह हुई कि पिछड़ी जातियों का यह वर्ग अपने सांस्कृतिकरण के कारण उच्च जातियों में काफी हद तक स्वीकार्य भी होता गया और स्वयं इन्हें अपने को उच्च जातीय ढांचे में ढालने में समय नहीं लगा। इस तरह यह वर्ग अंतत: हिंदुत्ववादी बनकर सामने आ रहा है। वैसे जातीय संरचना में यह सिलसिला कोई नया नहीं है। आर्थिक और राजनीतिक ताकत हासिल करने के साथ कई मध्य बल्कि निम्नवर्गीय जातियों भी ऐसी रही हैं जो कालांतर में हिंदू उच्च जातियों में शामिल होती रहीं।

इसलिए जैसा कि शुरू में कहा गया था, उसे पुन: दोहराया जा सकता है कि भाषा पर बात करना अंतत: राजनीति पर बात करना है, विशेषकर भारतीय संदर्भ में।

वैसे अनुष्ठान के अपने लाभ हैं। वे हमारे कर्तव्य की याद दिलाएं या न दिलाएं, हमारे दायित्व की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति तो होते ही हैं और सबसे बड़ी बात यह है कि वे हमें किसी भी तरह की ग्लानि से मुक्त रखते हैं।

 

  • समयांतर, सितंबर 2020

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