कुतर्क का कारोबार

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  • पार्थिव कुमार

भारत का धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी लोकतंत्र अपने अस्तित्व पर गंभीर चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। उसे केंद्र में सत्तारूढ़ सांप्रदायिक और फासीवादी राजनीतिक दल तथा अपने फायदे के लिए सरकारों को बनाने और गिराने में माहिर स्वदेशी और बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट के गठजोड़ के कारण लगातार हमलों का सामना करना पड़ रहा है। यह नापाक गठजोड़ पूंजीवादी मीडिया की मदद से बहस के मुद्दों को तय करने के साथ ही उसके दायरे का भी निर्धारण किस तरह करता है, इसे आज स्पष्ट देखा जा सकता है। इस मुहिम के पीछे उसका मकसद जनमत को यथार्थ से दूर रखने के अलावा उसकी समझ को भी कुंद करना है जिससे वह कभी भी सत्य को समझ ही न पाए।

राजस्थान में जारी राजनीतिक उठापटक इसका जीता जागता प्रमाण है। टेलीविजन और प्रिंट, दोनों तरह के मीडिया में इस मसले पर चर्चाओं को इस तरह से मोड़ा जा रहा कि कांग्रेस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व नाकारा और दृष्टिहीन सिद्ध किया जा सके। इन पर यकीन करें तो लगेगा कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार पर संकट के लिए इस पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व ही पूरी तरह जिम्मेदार है। पार्टी अपने नेताओं को संतुष्ट नहीं रख पा रही है और आंतरिक लोकतंत्र के अभाव की वजह से नौजवान पीढ़ी के नेता उसमें घुटन महसूस कर रहे हैं। स्पष्ट तौर पर इस चर्चा से आधारभूत तथ्यों जैसे के किसी भी राजनीतिक पार्टी का आंतरिक अनुशासन, नेतृत्व के लिए अनुभव तथा सत्ताधारी केंद्रीय पार्टी की सामाजिक और संसदीय मूल्यों के प्रति निष्ठा तथा उसका इन सब बातों को ताक में रख नैतिक-अनैतिक तरीकों का इस्तेमाल किए जाने जैसे मुद्दों को पूरी तरह नजरंदाज किया जा रहा है। इस बात पर भी बात नहीं हो रही है कि केंद्र किस तरह से इनकमटैक्स विभाग, ईडी, सीबीआई आदि का इस्तेमाल कर दलदबलुओं की मदद कर रही है। इधर, अंग्रेजी की एक बड़ी व्यावसायिक साप्ताहिक पत्रिका ने लगभग एक पूरा अंक (कुल 27 पृष्ठ) कांग्रेस को समर्पित कर दिया है। आवरण पर गांधी परिवार का एक कोलाज है जिस पर छपा है ‘व्हाट्स रॉंग विद द कांग्रेस (कांग्रेस के साथ क्या गड़बड़ है)। न तो इसमें कहीं सचिन पायलट हैं और न ही किसी तरह के दल-बदल का इशारा। प्रसंगश क्या यह सवाल आज ज्यादा जरूरी नहीं है कि जब देश महामारी, बेरोजगारी, महंगाई, चरम आर्थिक संकट और सीमाओं पर बढ़ते खतरे से जूझ रहा है, क्या देश के सामने सबसे बड़ा मसला राम मंदिर बनाने का है?

लोकतांत्रिक नैतिकता और मर्यादाओं का सवाल इन चर्चाओं से पूरी तरह नदारद है। एक व्यक्ति 200 सदस्यीय विधानसभा में महज 18 सदस्यों का समर्थन होने के बावजूद मुख्यमंत्री बनने का सपना देखता है। वह उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद इस निजी महत्त्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अपनी ही सरकार को गिराने की कोशिश कर रहा है। कोविड-19 की वैश्विक आपदा से समूचे देश और राजस्थान में पैदा नाजुक हालात के बीच उसे अपनी चाल चलने का बेहतरीन मौका नजर आता है। जनादेश के निरादर और अवसरवाद की यह जीती जागती मिसाल है लेकिन इस पर कहीं कोई चिंता दिखाई नहीं देती।

सचिन पायलट यह तो कहते हैं कि वह भारतीय जनता पार्टी में शामिल नहीं होंगे। लेकिन इस सवाल पर पायलट खामोश हैं कि क्या वह भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की मदद से सरकार बनाने का इरादा रखते हैं। उन्होंने यह भी साफ नहीं किया है कि क्या वह भाजपा को राजस्थान में सत्ता में वापसी के लिए समर्थन देंगे। इस बीच इतना तो सर्वविदित है कि पायलट ने अपने समर्थक विधायकों को भाजपा शासित हरियाणा के मानेसर में एक होटल में उस राज्य की पुलिस के पहरे में टिका रखा है। कांग्रेस ने कुछ ऑडियो टेप जारी कर आरोप लगाया है कि केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत राजस्थान में उसके विधायकों की खरीद-फरोख्त की कोशिश में लगे हैं।

राजनीति में काले धन की भूमिका को लेकर सियासी पार्टियों, मीडिया, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका समेत हर कोई चिंतित दिखाई देता है। लेकिन किसी ने भी पायलट से यह पूछने की जहमत नहीं उठाई कि मानेसर के होटल में उनके समर्थक विधायकों के बिल का भुगतान कौन और क्यों कर रहा है। एक क्रेडिट घोटाले में भी आरोपित शेखावत ऑडियो टेप मामले की जांच के लिए तैयार होने की बात तो करते हैं मगर अपनी आवाज का नमूना देने को तैयार नहीं हैं।

भाजपा का विधायकों की खरीद-फरोख्त के जरिए विपक्षी दलों की राज्य सरकारों को गिराने का यह पहला प्रयास नहीं है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के ‘कुशलÓ नेतृत्व में यह पार्टी अरुणाचल प्रदेश, गोवा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में इस तरह की अपनी कोशिशों में पहले ही सफलता हासिल कर चुकी है। अवैध धन के सहारे लोकतंत्र के अपहरण के इन प्रयासों का देश में मुखर विरोध नहीं होने के कारण उसके हौसले बुलंद हैं। काइयां कॉरपोरेट जगत ने अपनी थैलियों के मुंह खोल कर इस अनैतिक काम में भाजपा का भरपूर साथ दिया है। इसकी शुरूआत राज्यसभा में बहुमत हासिल करने के लिए की गई थी, जो अब पूरे विपक्ष को ही समाप्त कर देने के निर्णय पर पहुंच गई लगती है।

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में राजनीतिक दलों को बड़ी रकम में जितना चंदा मिला उसमें अकेले भाजपा का हिस्सा 78 प्रतिशत था। बीस हजार रुपए से ज्यादा के कुल 951 करोड़ रुपए के चंदे में 742 करोड़ रुपए भाजपा की थैली में गए। एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म के अनुसार, 2019 के चुनावों से पहले चुनावी बॉन्ड की कुल रकम का 95 प्रतिशत हिस्सा भाजपा को मिला। सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019 के चुनावों में राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों ने लगभग 60,000 करोड़ रुपए व्यय किए जिसमें से लगभग आधी रकम अकेले भाजपा ने खर्च की।

मोदी के 2014 में सत्ता संभालने के बाद से राजनीति में धन का खेल लगातार बढ़ा है। इसलिए यह अचानक नहीं है कि नरेंद्र मोदी से यह नहीं पूछा जा रहा है कि ऐसे दौर में जब कि पूरी दुनिया कोरोन से पीडि़त है। अर्थव्यवस्था ठप है। मीडिया रिपोर्टों में ही यह बताया गया है कि 2016 में नोटबंदी की घोषणा से ऐन पहले भाजपा ने देशभर में बड़ी संख्या में जमीनें नकद भुगतान के जरिए खरीदीं। लेकिन मीडिया ने यह सवाल कभी नहीं उठाया कि आखिर भाजपा के पास अचानक इतनी नकदी कहां से आई। अनैतिक ढंग से हासिल इस विशाल संपत्ति का इस्तेमाल विपक्ष मुक्त भारत के निर्माण और भगवा राजनीति के विस्तार के लिए खुले तौर पर किया जा रहा है। राजनीतिक चंदा हासिल करने की चुनावी बॉन्ड की अपारदर्शी व्यवस्था ने कॉरपोरेट जगत और भाजपा के आपसी स्वार्थ पर आधारित रिश्ते को मजबूत किया है।

 

विदेश नीति बनाम देश

अक्सर कहा जाता है कि विदेश और रक्षा नीतियां चूंकि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हैं इसलिए इन्हें सार्वजनिक बहस का मुद्दा नहीं बनाया जाना चाहिए। वास्तव में गोपनीयता के इस आग्रह का असली मकसद यह सुनिश्चित करना है कि आम अवाम तक तथ्यों की जानकारी नहीं पहुंच सके। तमाम निरंकुश शासकों के इस पसंदीदा जुमले का इस्तेमाल हाल के अरसे में खासतौर से चीन की हमलावर गतिविधियों और उनसे पहले राफेल विमान सौदे पर चर्चाओं को रोकने के लिए किया गया है। यह बात और है कि इन चर्चाओं की शुरुआत खुद सरकार के रुख में अस्पष्टता की वजह से हुई।

जहां तक चीन का सवाल है उसकी सेना ने लद्दाख के गलवान घाटी इलाके में 20 भारतीय सैनिकों की नृशंस हत्या कर दी। इसी से साबित है कि चीनी सैनिकों ने कम-से-कम इस इलाके में भारतीय क्षेत्र में जरूर प्रवेश किया था। लेकिन प्रधानमंत्री ने इस घटना के बाद आयोजित सर्वदलीय बैठक में कहा- ‘न वहां कोई हमारी सीमा में घुस आया है और न ही कोई घुसा हुआ है, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है।’ उनके इस स्पष्टीकरण के डेढ़ महीने बाद भी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति की बहाली के लिए चीन और भारत के अधिकारियों के बीच बातचीत जारी है।

भारतीय नागरिकों को पूरा अधिकार है कि वे भ्रम की इस तरह की स्थिति में अपनी सरकार से सच को सार्वजनिक करने की मांग करें। एक जीवंत लोकतंत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर इस तरह के सवालों को दरकिनार करना वाजिब नहीं है। लेकिन कुछेक पत्रकारों को छोड़कर मीडिया ने इस समूचे घटनाक्रम की तह तक पहुंचने की कोई कोशिश नहीं की। उसने तथाकथित राष्ट्रहित में उन सरकारी बयानों पर भरोसा करना उचित समझा जो नागरिकों की जिज्ञासाओं को शांत करने के बजाय भ्रम की स्थिति के विस्तार में योगदान कर रहे हैं।

राफेल सौदे के मामले में सामने आए सरकारी दस्तावेजों और अन्य तथ्यों से कम-से-कम दो बातें साफ थीं। एक तो यह कि इन युद्धक विमानों को 2001 में हुए और मोदी सरकार द्वारा रद्द किए गए पुराने सौदे की तुलना में अधिक कीमत पर खरीदा गया। दूसरी बात यह कि राफेल की निर्माता दासो कंपनी ने भारत सरकार के हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड की जगह रिलायंस को दबाव में आकर आखिरी वक्त में अपना ऑफसेट पार्टनर चुना। लेकिन इस सौदे की जांच की मांग को मीडिया के सक्रिय सहयोग से एक दूसरी पटरी पर डाल दिया गया। इन युद्धक विमानों की गुणवत्ता और उपयोगिता को लेकर किसी ने भी कोई सवाल नहीं उठाया था। मगर चर्चा का विषय अब यह हो गया कि इस बेहतरीन विमान की खरीद पर सवाल उठाने वाले चूंकि देश की रक्षा संबंधी तैयारियों में रुकावट डाल रहे हैं इसलिए उन्हें राष्ट्रद्रोही कहा जाना चाहिए या नहीं। यहां तक कि उच्चतम न्यायालय ने भी इस सौदे की जांच की अपील को खारिज करते हुए कहा कि राफेल की जरूरत और गुणवत्ता को लेकर कोई संदेह नहीं है। भारत वैसे हालात में कोताही नहीं बरत सकता जब हमारे प्रतिद्वंद्वियों के पास चौथी और पांचवीं पीढ़ी के विमान हैं। मतलब यह कि असली सवाल को दरकिनार करने के लिए एक ऐसा मुद्दा खड़ा कर दिया गया जिसका कभी वजूद ही नहीं था।

बेशक देश की रक्षा और विदेश नीतियों पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए। लेकिन ऐसा तभी मुमकिन है जब इन महत्त्वपूर्ण नीतियों को लेकर देश में आम सहमति हो। जाहिर तौर पर इस तरह की सहमति बनाने की जिम्मेदारी सरकार की है। लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए कोशिश करने के बजाय अपनी नीतियों पर सवाल उठाने वालों को खुलेआम देशद्रोही करार देने का टकराव का रास्ता अपनाया है। देश की सुरक्षा से संबंधित फैसलों में कोताही या भ्रष्टाचार का संदेह होने पर जांच की मांग करना देशद्रोह नहीं हो सकता। अगर बांग्लादेश और नेपाल समेत तमाम पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंधों में कड़वाहट आ रही है तो इस पर चिंता जाहिर की ही जानी चाहिए। मीडिया का भी यह दायित्व बनता है कि वह सरकार पर कामकाज में ज्यादा पारदर्शिता लाने के लिए दबाव बनाए।

 

भाजपा सरकार और निजी क्षेत्र के हित

मोदी सरकार के हर अच्छे और बुरे काम में उसका साथ देना भारतीय मीडिया की जरूरत बन गई है। दरअसल इस मीडिया का स्वामित्व उन कॉरपोरेट घरानों के हाथों में है जिन्होंने अपने हितों को साधने के लिए भाजपा पर काफी धन लगा रखा है। सरकार ने भी देश की आर्थिक दशा बेहद खराब होने के बावजूद कर्ज माफी, टैक्स में रियायत तथा पर्यावरण संबंधी और अन्य मंजूरियों की शर्तों में ढील देकर उनकी हर संभव मदद की है। स्वार्थ पर आधारित परस्पर सहयोग का यह संबंध किसी भी कीमत पर बनाए रखना कॉरपोरेट घरानों और सरकार, दोनों के ही हित में है। लिहाजा मीडिया को इस संतुलन में खलल डालने की इजाजत हरगिज नहीं दी जा सकती।

एक समय पत्रकारिता के छात्रों को पढ़ाया जाता था कि अखबार के वास्तविक मालिक उसमें निवेश करने वाले नहीं, बल्कि उसके पाठक होते हैं। लिहाजा, अखबार के लिए पाठकों के हितों का ध्यान रखना सबसे ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। लेकिन यह धारणा अब पुरानी हो चुकी है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति थॉमस जेफरसन की अखबारों के बारे में राय मौजूदा समय में भारतीय मीडिया के संदर्भ में ज्यादा प्रासंगिक हो गई है। उन्होंने कहा था, ‘अखबार में प्रकाशित किसी भी चीज पर यकीन नहीं किया जा सकता। इस प्रदूषित माध्यम में जाकर सच भी संदिग्ध हो जाता है।Ó

भारतीय मीडिया ने उन मुद्दों को चुनने की एक पूरी प्रणाली विकसित कर ली है जिन पर चर्चा कॉरपोरेट घरानों और उनके सहयोग से चलने वाली सरकार के आर्थिक और राजनीतिक हित में हो। वह किसी भी मुद्दे पर बहस के दायरे को भी निर्धारित कर उसके अंदर ही पक्ष और विपक्ष, दोनों तैयार करती है। मसलन, इस बात पर बहस हो सकती है कि प्रधानमंत्री को अयोध्या में राम मंदिर का शिलान्यास पांच अगस्त को ही करना चाहिए या फिर किसी अधिक शुभ दिन का इंतजार उनके लिए बेहतर होगा। मगर यह सवाल नहीं उठाया जा सकता कि एक धर्मनिरपेक्ष देश के प्रधानमंत्री का किसी खास संप्रदाय के धर्मस्थल का शिलान्यास करना किस तरह वाजिब है।

सरकार और कॉरपोरेट के हाथों अगवा हो चुके इस लोकतंत्र में अवाम के लिए आचार संहिता मीडिया के जरिए घोषित कर दी गई है। देश में कोविड 19 से होने वाली मौतों का आंकड़ा 40 हजार के पार पहुंचने को है। लेकिन आप खुश हों कि सरकार के सराहनीय प्रबंधन की बदौलत आपकी जिंदगी बच गई। इस वैश्विक महामारी से निपटने के नाम पर किए गए लॉकडाउन का दुरुपयोग नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर के विरोधियों तथा मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को सबक सिखाने के लिए किया जा रहा है। मगर आपको संतोष होना चाहिए कि देशद्रोहियों की इस फेहरिस्त में आपका नाम नहीं है। करोड़ों कामगार भले ही बेरोजगार और बेघर हो गए हों, आपको खुशी होनी चाहिए कि मुकेश अंबानी विश्व के पांचवें सबसे अमीर व्यक्ति और रिलायंस पूरी तरह कर्ज मुक्त कंपनी बन गई है।

प्रधानमंत्री अमेरिकी कंपनियों से प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, बीमा, नागरिक उड्डयन, रक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर समेत अर्थव्यवस्था के तमाम अहम क्षेत्रों में निवेश की गुहार लगा रहे हैं। लेकिन मीडिया आपको आत्मनिर्भरता का जश्न मनाने के लिए प्रेरित कर रही है। आपसे न्यायेतर हत्याओं पर ताली बजाने की उम्मीद की जाती है क्योंकि समाज को अपने ही प्रश्रय में फलने-फूलने वाले अपराधियों से मुक्ति दिलाने का सरकार के पास सिर्फ यही एक तरीका बचा है। भाजपा और कॉरपोरेट के गठजोड़ ने साबित कर दिया है कि वोट से सत्ता परिवर्तन भले ही कठिन हो मगर धन से सोच और सरकार दोनों को आसानी से बदला जा सकता है।

अगस्त, 2020

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