कविता की नई राजनीति

Share:

 

  • शीतांशु

पिछले कुछ महीनों में देश के हालात में गंभीर बदलाव आए हैं और इन बदलावों ने समकालीन कविता के सुर को भी परिवर्तित किया है। स्पष्टत: पिछले तीन महीनों में कविता की परिभूमि का विस्तार हुआ है और कविता की सामाजिकता की महत्ता प्रतिपादित करना भी अपेक्षाकृत सहज हो गया है। कोरोना दौर में लिखी गई कविताओं में घनीभूत पीड़ा, वेदना, अपराध बोध, कुछ न कर पाने से उपजी हताशा और पीडि़त समुदायों का जीवन बहुत ही मार्मिक रूप से प्रत्यक्ष हुआ है। साथ ही संघर्ष की चेतना भी पहले की तुलना में तीव्र हुई है। इसके साथ ही एक अच्छी बात यह हुई है कि प्रगति विरोधी स्वर कमजोर हुआ है। जैसे ही देश में कुछ समय की शांति आती है, कई ऐसे लोग हैं जो कविता की दुनिया को इतना स्वायत्त बनाने में लग जाते हैं कि सामान्य लोगों से उसका संबंध प्रभावित होता है। ये लोग समाज की प्रतिक्रियावादी या रूढि़वादी बातों से अधिक प्रगतिशील शक्तियों और मूल्यों पर हमले करने में जुट जाते हैं। उन्हें धरती की बाकी समस्याएं दिखाई नहीं देतीं, सिर्फ एक ही चीज समस्या लगती है-प्रगतिशील और प्रगतिशीलता। ऐसा माहौल बनाया जाता है कि हिंदी की प्रगतिशील आलोचना ने जिन कवियों को स्थापित किया है वे किसी काम के न हों। ऐसे लोगों की जबान भी इस घोर पीड़ा के दौर में या तो चुप हो गई है या बदल गई है। समकालीन कविता को यह जो सुखद परिस्थिति मिली है उसे अवसर में बदलने की जरूरत है ताकि कविता की सामाजिकता का और विस्तार हो सके।

लॉकडाउन ने जिन आम भारतीयों के जीवन को तहस-नहस किया है उनके प्रति इन कविताओं ने गहरी सहानुभूति दिखाई है। कविताएं उनके जीवन का हिस्सा बनने का प्रयास करते दिखाई दे रही हैं। इस बार की जो ‘घर वापसीÓ हुई है उसने कवियों को अंदर तक उद्वेलित कर दिया है और कविताएं ऐसे दृश्यों से ओत-प्रोत हैं जो घर के लिए यात्रा पर निकले लोगों के जीवन में घट रही हैं। शासन की नीतियों के कारण इन आम लोगों जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा है वह विचलित कर देने वाला है। बोधिसत्व त्रस्त भाव से लिखते हैं कि तुम नए विधाता हो/ नए यंत्र हैं तुम्हारे पास यंत्रणा के/ हमारे खून की जांच कर लो/ हमारे मन में खिले मुरझाए/ सावन भादो मई जून की जांच कर लो/ हमारी हड्डियों में छिपे ज्वर देख लो/ हमारा विस्फोट होता मौन स्वर देख लो/ और हमें हमारे खेत तक जाने दो/… हम रास्ते में रुकना नहीं जानते/ हम लौट नहीं सकते अब/ हमें सहारा नहीं चाहिए तुमसे/ हम चले जाएंगे अपने आप।‘ (हमारे कागज देख लो)

आजकल कविता और राजनीति के संबंधों पर सोशल मीडिया पर लगातार बातचीत हो रही है जिसमें कई महत्त्वपूर्ण रचनाकारों और बुद्धिजीवियों ने शिरकत की है। यहां राजनीति अधिकांशत: नकारात्मक अर्थों के साथ है। समकालीन कविता के दौर में कविता की दुनिया उसकी मूल चेतना से इतर विषयों से काफी ग्रस्त रही है। हालांकि जो उदात्त विद्वान हैं वे इन बहसों को हमेशा उदात्त प्रश्नों की ओर खींच कर ले जाते हैं। असल में किसी भी काल का श्रेष्ठ साहित्यकार, वह राजनीति में सक्रिय हो या न हो, उसने एक भी राजनीतिक पैम्फलेट न लिखा हो, उसकी संवेदना अनिवार्यत: राजनीतिक चेतना संपन्न होगी। भले ही उसके साहित्य को सामान्य नजर से देखते हुए पाठक को कभी भी इसका पता न चले। साथ ही वह एक उदात्तता लिए होगी। इसे समझने के लिए रवींद्रनाथ टैगोर और गांधी के संबंध को देखना चाहिए। श्रेष्ठ साहित्यकार का ध्यान क्षुद्र राजनीति और जोड़-तोड़ की ओर नहीं जाता। तत्काल में इसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ सकता है लेकिन कवि की यही वृत्ति उसे कालजयी और दीर्घजीवी बनाती है। प्रेमचंद ने बहुत पहले ही कह दिया था कि साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल की तरह है। जो साहित्यकार है, बुद्धिजीवी है उसका संबंध सिर्फ सत्य और तर्क से होता है। साठोत्तरी कविता में कई कवि ऐसी राजनीतिक चेतना से संपन्न हैं लेकिन पिछले तीन महीनों में लिखी गई कविताओं की राजनीतिक चेतना काबिल-ए-गौर है। कवि देख रहा है कि कविता को इन स्थितियों से संवाद करना ही होगा।

यही कारण है कि सत्ता से सीधे टकराने और सवाल करने का साहस कुछ कवियों ने दिखाया है। युवा कवियों का साहस विशेषकर तारीफ के काबिल है। बोधिसत्व की ‘कलजुग का एक राजा था’, ‘राष्ट्रीय हंसी’, ‘अभी इसी समय’, मंजुल भारद्वाज की ‘अच्छे दिनों की सरकार’, ‘लॉकडाउन किसने मांगा था’, ओम निश्चल की ‘न बिजली, न पानी, न नहरें, न नदिया’, वंदना केंगरानी की ‘कुछ मुझ पर भी रहम दिखाओ मेरे आका’, कैलाश मनहर की ‘शूल राहों के बहुत तेज-ओ-नुकीले दिक्खे’, अमित एस.परिहार की ‘महाराज, अब आप कुछ भी न कहें’, नित्यानंद गायेन की ‘महान कवि ने कहा’, जसिंता केरकेट्टा की ‘मैं देशहित में क्या सोचता हूं’, संदीप प्रसाद की ‘गिद्धत्व’, रवि प्रकाश की ‘हत्यारे अनुपस्थित हैं’ जैसी कविताएं इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं। यह समय की मांग है कि कवि साहस दिखाए। मंजुल भारद्वाज सीधे-सीधे पूछते हैं कि धर्म और संस्कृति के ठेकेदार/ संस्कार के जागीरदार/ देश को सुरक्षित आथों में सौंपने वाले/ क्या आज देश की बर्बादी पर/ मरी हुई इंसानियत पर/ मरे हुए तंत्र पर/ मरे हुए लोक पर/ मरी हुई सरकार को/ अपने कंधे पर ढोते हुए/ शर्मिंदा हैं?’ कुछ कुतर्क देकर इस साहस से दरकिनार करने वाले लोगों की कविता दीर्घजीवी नहीं हो पाएगी। कबीर आज पांच सौ वर्ष बाद याद किए जाते हैं तो अपने साहस के कारण, अपने समय की परिस्थितियों से मुखामुखम के कारण। आजादी मिले अभी साल भर नहीं हुआ था कि तेलंगाना के किसानों के समर्थन में लाल भवानी कविता लिख दी थी नागार्जुन ने। आलोक धन्वा या फैज ने भी अपने समय की परिस्थितियों में यह साहस दिखाया। साठोत्तरी कविता के दौर में राजेश जोशी इस दृष्टि से अप्रतिम हैं। इसी तरह आज से कुछ समय बाद का पाठक जब इस दौर को देखेगा तो कवियों में सिर्फ दुख और पीड़ा को नहीं ढूंढेगा, उनके सत्ता से टकराने और सच कहने के साहस को भी ढूंढेगा। समकालीन कवियों में कुछ ने यह साहस दिखाया है जो सुखद है।

कई बार सत्ता की निरंकुशता इतनी बढ़ जाती है कि कवियों को अपनी बात संकेतों में करनी पड़ती है। लेकिन संकेतों में कहने की मजबूरी कविताओं को कमजोर नहीं बनातीं। कई बार तो सीधे-सीधे रख दिए गए वाक्यों से ये संकेतात्मक अभिव्यक्तियां ज्यादा मारक होती हैं। उदाहरण के लिए, मूल नाम लिए बगैर अगर कवि ‘गिद्ध’, ‘साहब’, ‘आका’, ‘कलजुग का राजा’, ‘महाराज’, ‘राष्ट्रीय विदूषकÓ, ‘तानाशाहÓ, ‘रक्त पिपासुÓ ‘जुमलाखोरÓ, ‘झूठ शिरोमणि’, ‘नुमाइशी परिधान के इश्तहार’ जैसे विशेषणों का प्रयोग कर रहा है तो कविता उससे और अधिक प्रभावशाली ही हुई है। ये सारे विशेषण पिछले तीन महीनों में लिखी गई विभिन्न कविताओं से उद्धृत हैं। यहां भारतेंदु की अंधेर नगरी को याद करने की जरूरत है जिसमें अंग्रेजों का जिक्र कहीं नहीं था, लेकिन सबको यह पता है कि अंधेर नगरी का राजा कौन है और उस राज्य में निर्णय कैसे होते हैं? सबको पता चल चुका था कि फांसी किसी को भी हो सकती, बकरी चाहे किसी की दबी हो। कोरोना दौर की कविताओं ने सीधे-सीधे भी और संकेतों में भी अपनी बातें, अपनी चिंताएं सार्थक ढंग से प्रकट की हैं। कैलाश मनहर की गजल से यह पंक्तियां देखिए- शूल राहों के बहुत तेज-ओ-नुकीले दिक्खे/ आजकल साहब के तेवर जरा ढीले दिक्खे/ चाल षडयंत्र की फिर सोच रहे हैं शायद/ इन दिनों उनके बयानात लचीले दिक्खे।‘ इसी तरह संदीप प्रसाद की ये पंक्तियां भी द्रष्टव्य हैं- लाचारी, जरूरत, अधिकार/ जैसे शब्द उल्का/ उसके आभामंडल से घिसकर हो जाते हैं राख/ जिस पर वह खड़ा करता है/ अवसर का आत्मनिर्भर मीनार/ जहां जरा-सा सुस्ता कर/ गिद्ध उड़ जाता है/ हमारी पहुंच से दूर।‘

इसके साथ ही राज्य की भूमिका, संविधान के महत्त्व, राष्ट्रवाद, अंधराष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के फर्क और वास्तविक नायकों की पहचान को लेकर भी यह कविता सतर्क है। गांधी, आंबेडकर, पटेल और नेहरू जैसे नेताओं की जैसी छवियां पिछले कुछ वर्षों में गढऩे की कोशिश की गई है, यह कविता उसके प्रति तीखा तेवर अपनाती है। जब मीडिया के विभिन्न माध्यमों का इस्तेमाल कर प्रोपगेंडा मशीनरी के माध्यम से तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर आम जनता के समक्ष परोसा जा रहा है, तब कविता अपनी सीमित दुनिया और संसाधनों में सत्य और तर्क के साथ खड़े रहने की कोशिश कर रही है। वास्तविक नायकत्व के स्वरूप और उसके पीछे की सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों, भौतिक परिस्थितियों को उद्घाटित कर सत्य को संप्रेषित करने की कोशिश कर रही हैं कविताएं। आज उत्तर-सत्य के युग में क्या हो रहा है उसे बोधिसत्व की कविता ‘अभी इसी समय’ की इन पंक्तियों से समझा जा सकता है- ‘अरे अरे यह तो गांधी ही हैं/ अपने फेफड़े में धंसी पिस्टल की गोलियां/ अपने हाथों से निकाल कर गांधी भागते जा रहे हैं/रोते हुए फरियाद करते हुए/ बचाव के लिए राम को पुकारते/ अपना दुख किसी को दिखाते/ गोलियों के घाव से बहता रक्त रोकते।/ लेकिन पैदल पैदल कहां तक भाग पाएंगे गांधी/ पांव कट गए हैं/ उनकी लाठी छीन ली है किसी ने/ उनका खून सोखने उनके घावों से चिपक गए हैं ये कौन लोग/ और उस पर भी जब नहीं मरते गांधी/ नहीं गिड़गिड़ाते गांधी/ फिर भी उनके पीछे रिवाल्वर लिए दौड़ रहे हैं कितने लोग/ निशाना साधे/ घेरते गांधी को/ विनोबा को/ यह गांधी ऐसे क्यों रो रहे/ क्यों गिड़गिड़ा नहीं रहे/ मांग क्यों नहीं रहे प्राण की भीख/ आखिर इतने बेगाने क्यों हैं पिता/ कौन लोग हैं जो गांधी की हत्या में सुख पाने का उपाय खोज रहे हैं/ कोई चेहरा छिपा नहीं है अब/ फिर भी पहचान करना कठिन कैसे हो रहा है।’ (अभी इसी समय)

कोरोना के इस दौर में प्रत्यक्ष हुई अमानवीयता ने हमें यह समझने में मदद की है कि अब सत्ता और पूंजी के पास पहले की तुलना में ढेर सारे मुखौटे हैं। आपातकाल के दौर में कवियों के सामने मुखौटे कम थे और अंग्रेजी राज के समय उसकी तुलना में कम। विडंबना यह है कि जब तक समकालीन कविता एक मुखौटा उतारती है तब तक कई और मुखौटे तैयार हो जाते हैं। इसलिए ठहर कर सुस्ताने या संतुष्ट हो जाने की सहूलियत अब हाथ से जा चुकी है। देशभक्ति, सेना, राज्य, भारतीयता इसे इतने विकृत रूप में इतनी अश्लीलता के साथ परोसा जा रहा है कि सब कुछ भयावह लग रहा है। भारतीयता की पहचान करें तो कैसे। शशिभूषण लिखते हैं- ‘माना अंग्रेज था जनरल डायर/ उसने आदेश दे दिया/ मगर सब सिपाही तो अंग्रेज थे/ जिन्होंने लगातार बरसाईं गोलियां/ बंद जलियां वाला बाग में/ निहत्थे निबल मनुष्यों पर/ जिनमें औरते और बच्चे भी थे नन्हें/ विचार करना चाहिए/ कहां बसता है राज्य में देश/ किनसे बनता है देश/ क्या होती है देश भक्ति/ राजभक्ति क्या है/ सेना किसकी भक्त रहे। ’(देश)

इक्कीसवीं सदी के शुरुआत में ऐसी स्थिति हो गई थी कि ढेर सारे लेखकगण, कवि, आलोचक, सोशल मीडिया ने जो ‘लोकतंत्र’ उपलब्ध कराया है उसे लेकर बहुत ही उत्तेजित और प्रसन्न दिखाई दे रहे थे। यह उत्तेजना इतनी अधिक थी कि उन्हें पढऩे वाले लोगों को लगने लगता कि हां हमारी भी आवाज लोगों तक पहुंच रही है और वास्तविक लोकतंत्र यही है। धीरे-धीरे यह उद्घाटित होता रहा कि मास मीडिया तो अब मुखपत्र बन गया है और सोशल मीडिया एक छद्म सुख, क्योंकि वास्तविक दुनिया तो बद से बदतर स्थितियों में जा रही है। पूंजी का खेल नई ऊंचाइयां छू रहा है। यह मुखौटा उतर रहा था कि कोरोना दौर की परिस्थितियों ने कई कवियों में यह बोध पैदा किया है कि इस अमूर्त छद्म में फंस कर हम यहां कैद नहीं हो सकते। लोकतंत्र के कई स्वरूप हो सकते हैं। लोकतंत्र पूंजीपरस्त भी हो सकता है लोकतंत्र समाजवादी भी हो सकता है। और आज का लोकतंत्र किस तरह एक ही राष्ट्र में अपनी जनता के बीच किस तरह साफ-साफ फर्क कर रहा है, बताने की जरूरत नहीं। अमित एस.परिहार की कविता ‘एक राष्ट्र में दो यात्राओं के दृश्य’ कविता की यह पंक्तियां देखिए- विदेशों में फंसे यात्रियों का एक दस्ता चुका। यात्रियों के/ चेहरे का सुकून भला लगता है/ वंदे भारत अभियान सकुशल संपन्न होने की/ गहरी आश्वस्ति झलकती है/ वहीं दूसरी ओर राष्ट्र के भीतर ही भीतर चल रही/ दूसरी यात्रा पीपल के गिरते हुए सूखे पत्ते सी खरखराती हैं/ अनिश्चय के निश्चय में/ यात्र के भविष्य का कांपता है चेहरा (एक राष्ट्र में दो यात्राओं के दृश्य)

अगर विशिष्ट पाठक को छोड़ कर पूरे समाज को ध्यान में रखें, तो सवाल यह है कि सोशल मीडिया के माध्यमों या मास मीडिया के माध्यमों में समकालीन दौर में लिखी जा रही कैसी कविताओं को महत्त्व दिया जाता है। जो कवि मजदूरों की दुर्दशा से पीडि़त होकर कविता लिख रहा है उसे ज्यादा स्पेस मिल रहा है या उस ढंग की कविता को जो टेलीवीजनों पर अनाप-शनाप ढंग की तुकबंदी करने वाले कुछ ओछे किस्म के कविनुमा लोग हाथ हिला-हिला कर पढ़ते रहते हैं। या कुमार विश्वास की तरह मात्र उत्तेजना को कविता समझने वाले लोगों को। फेसबुक पर अस्मिता के गंभीर प्रश्नों को गहरी संवेदना के साथ पिरो कर रखने वाले लोगों को इस फेसबुकिया लोकतंत्र में कितनी जगह है और कुमार विश्वास के लिए कितनी? हजारों की संख्या में कुमार विश्वास सरीखे कवियों को शेयर या लाइक किया जाता है लेकिन अस्मिता के गंभीर प्रश्नों को कुछ सौ लोगों के बीच। यहां भी पूंजीपरस्ती है और आपने मजदूरों के जीवन, अस्मिता के प्रश्नों पर दी हुई लीक से हटकर ज्यादा कुछ लिख दिया तो उसके दुखद परिणाम भी हो सकते हैं। इस छद्म आवरण और पीछे सक्रिय विचारधारात्मक दबावों तक अपनी नजर ले जाने की जरूरत है। यह पूंजीपरस्ती मीडिया के रग-रग में इस तरह प्रवेश कर चुकी है कि समकालीन कविता के सार्थक स्वर जिन संवेदनाओं को केंद्र में लाना चाहते हैं उन्हें हाशिए पर ही बना कर रखा जाता है, इस मनोभाव के साथ कि लोकतंत्र तो आपके पास भी है। इन सबके साथ आधुनिकता के आवरण में हमने जो ढकोसला तैयार कर रखा है इन तीन महीनों की कविता उनसे मुक्त होना चाहती है। ये गगनचुम्बी इमारतें, ये ब्रिज, हवाई जहाज, टेलीविजन आदि जो सभ्यता की प्रतीक बनी हुई हैं वे किस काम की हैं अगर हमारे मजदूरों की यह दुर्दशा है। सब कुछ एक तमाशे की तरह हो गया है जैसे कोई शो चल रहा हो जिसे बस घर बैठे टीवी के बक्से में देखते जाना है। शंकरानंद लिखते हैं कि हद है कि वह पानी/ घर में मिला हजारों मील दूर किसी चमकदार शहर में/ जहां समुद्र का किनारा था/ जहां छल-छल नदी बहती थी/ जहां सबसे अमीर लोग रहते थे/ जहां इस देश की संसद थी…ये समय इतिहास का सबसे भयानक समय है/ जब एक मनुष्य/ दूसरे मनुष्य के बच जाने के लिए प्रार्थना नहीं करता/ उन्हें मौत के मुंह में जाते देखता है/ ठीक उसी तरह जैसे कोई फिल्म चल रही हो/ जैसे कोई तमाशा शुरू हुआ हो/ ये पृथ्वी अब सोच रही है / मैं आखिर घूम किसके लिए रही हूं।’ (पृथ्वी सोच रही है)

समकालीन कविता को इस छद्म को और गहराई से समझना होगा और मध्यवर्गीय सीमाओं से बाहर आना होगा। यह उत्तर सत्य का युग है। सिर्फ तथ्य गलत तरीके से रखा जाना ही उत्तर सत्य नहीं है। उसके मुखौटे ढेर सारे हैं। कोरोना युग ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समकालीन कविताओं को ढेर सारे मुखौटों को उतार फेंकने का काम करना है। यह काम आसान नहीं है क्योंकि जिनके ऊपर रक्षा का दायित्व था वही अब इन मुखौटों के सबसे ताकतवर उत्पादक हैं। बोधिसत्व के शब्दों में यह एक ऐसा युग है जिसमें सूचित है कि पूरे राज्य में जो दुखी हैं/ वे राज्य द्रोही हैं/ वे सत्ता के शत्रु हैं/ वे विधर्मी हैं/ वे झूठे हैं।/ सूचित है कि राज्य में दुख का समूल नाश कर दिया गया है/ अब केवल जैजैकार बचा है/ सूचित है कि धिक्कार अब व्यभिचार बचा है/ एक दंडनीय अपराध है क्षोभ।…/ सरकार के सेवकों को दिया जाता यह अधिकार है/ कि राज्य में जो भी दिखाए दुख/ उसे सेवक समझाएं कि/ अलग-अलग नहीं होता सुख से दुख।/ सूचित है प्रजा के दुख से दुखी रहते हैं राजा/ तो राजा को सुख देने के लिए/ प्रजा भूल जाए सब दुख/ सूचित है कि दुख और दुखी प्रजा के लिए/ राज्य में कोई स्थान नहीं अब/ किसी दुखी की सहायता भी अब राजद्रोह है।’ (सुख सूचक शिलालेख)

सुखद यह है कि जब एक के बाद एक कर लोकतंत्र के खंभे धराशायी होते जा रहे हैं तो कोरोना दौर की कविताओं ने कुछ उम्मीद जगाई है। एक छोर को थामने का, सहारा देने का, देश रूपी इमारत को बचाने का दावा साहित्य ने भी पेश किया है। इस दौर की कविताएं स्वायत्तता के सुख की जगह सामाजिक विषमताओं, सत्ता की क्रूरताओं, माध्यमों की चाटुकारिता और आम जनों की असहायता और विवशता को मुखरता के साथ अभिव्यक्त कर एक नई राजनीति को चरितार्थ कर रही हैं। समकालीन कविता के परिदृश्य के संदर्भ में 2001 में उदय प्रकाश ने यह लिखा था कि ‘समकालीन कविता की केंद्रीय समस्या यह थी/ कि हर बार हड्डी एक हुआ करती थी/ और जबड़े कई एक/ हर बार एक यही दृश्य बनता था/ सबसे सुसंगठित फुर्तीला और जुगाड़ू/ सुनियोजित तरीके से हड्डी ले भागता था।‘’ इस कविता के लगभग बीस साल बाद इन मर्मांतक परिस्थितियों में अपने साथी भारतवासियों के साथ फंसा आज का कवि अपने दूसरे समकालीन कवियों से कह रहा है- ‘कविता लिख कर मुक्त नहीं हो सकता मैं/ कविता पढ़ कर तुम भी मुक्त नहीं हो सकते/ उत्तर दो उसका/ वह अकेले पैदल क्यों गया/ धनंजय कुमार बताओ/ मंजुल भारद्वाज तुम भी बोलो/ वागीश सारस्वत चुप क्यों हो/ आभा, भाविनी, शैलेश, रमन, सुरबाला, मयंक/ तुममें से कोई क्यों नहीं गया उनके साथ।’ (बताओ-बताओ- बोधिसत्व)

अगस्त, 2020

 

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*