सुबह की सैर

  • राजेश कुमार

‘‘खुलेगा क्या कुछ? मल्लब कोई ढील इस बंदी में, कोई स्ट्रेटेजिक रिलेक्सेशन…?’’ बंदी से किरोड़ी लाल का आशय शायद लॉकडाउन से था। लॉकडाउन खत्म होने की उम्मीद किसी को थी भी नहीं। कयास तो केवल इस पर था कि कितने दिन और! वह पास आते-आते रुक गए थे। बदस्तूर काले रंग के लोअर और चेक शर्ट में। पूरा ट्रैक शूट वह कभी नहीं पहनते। इजाफा यह कि कानों पर एक सर्जिकल मास्क फंसा था। कभी हल्के नीले रंग का रहा होगा। दोनों ओर लगे एलास्टिक ने कानों को ऊपर से टेढ़ा जरूर कर दिया था, पर मास्क नाक-मुंह पर नहीं, ठोढ़ी पर झूल रहा था। बोलने के लिए उन्होंने नीचे खींच लिया होगा। मैंने इधर-उधर देखा। पेच यही था कि वह मुझसे मुखातिब थे।

आते-जाते उनका दिखना आम है, इनसे, उनसे ढेर सारी बातें करना भी, पर सीधे मुझसे कभी बात हुई हो, याद नहीं। बोलते बहुत द्रुत हैं, चलने की ही तरह। छोटे-छोटे कदम लेते हैं। आप किन्हीं लोगों के साथ खड़े हों, डॉक्टर-प्रोफेसर-वकील साहब की जमात में, शर्माजी-मुकेश त्यागी-अग्रवाल साहब के साथ, या वेद जी-अग्ने-प्रवीण के पास, पता नहीं, किरोड़ी लाल जी कब अचानक नमूदार हो जाएं। आठेक महीने पहले, ऐसे ही कहीं पहुंच गए थे और अनुच्छेद 370 के खात्मे और देश में कश्मीर के टोटल इंटीग्रेशन से ज्यादा कश्मीर घाटी में जायदाद खरीद पाने के उत्साह में चहकने लगे थे। घाटी में जमीन-जायदाद बनाना तो रह ही गया, यह जरूर हुआ कि कभी-कभार सामने पड़ जाने पर जो दुआ सलाम हो जाया करती थी, वह औपचारिकता भी खत्म हो गई।

मैंने इधर-उधर देखा। कहीं कोई नहीं था।

किरोडी लाल बोले जा रहे थे, ‘‘धन्ना सेठों को क्या? और गरीब-गुरबा को भी? उसे तो राशन-अनाज सब मिल रहा है न! असल संकट तो हम व्यापारियों-कारोबारियों का है। भीख भी नहीं मांग सकते हम।’’

‘‘हां इतना सुकून में है बेचारा, कि चौदह-चौदह सौ किलोमीटर दूर अपने घर-दुआर के लिए निकल पड़ रहा है, भूखे, प्यासे, कई बार बीबी-बच्चों को कंधे पर उठाए। पुलिस की मार भी खा रहा है, चलते-चलते अधबीच कोई सगा या स्वयं, मर भी जा रहा है, पर जाना घर है। शौकिया नहीं हैं दसियो करोड़ लोग सड़क पर। मुंबई से, दिल्ली से, सूरत, कोलकाता, रायपुर, इंदौर से खब्त में नहीं निकल पडे हैं वे। किया क्या आपके चहेते पीएम ने लॉकडाउन की घोषणा से पहले उनके लिए कोई इंतजाम, उनकी कोई चिंता? उनकी छोड़िए, कोरोना से जूझ रहे डॉक्टरों के लिए ही कोई पीपीई, कोई मास्क, सेनेटाइजर की व्यवस्था? कुछ नहीं। कह दिया कि आप ताली बजाइए, थाली बजाइए और आप शुरू हो गए।’’ मेरा व्यंग्य जाया हुआ। शायद सुना ही नहीं उन्होंने। वह रौ में थे, ‘‘ढील नहीं देंगे तो कारोबार कैसे होगा। हम तो कमाएंगे, तभी खाएंगे न। ऊपर से यह जीएसटी की देनदारी। इतना थोड़े ही पड़ा है कि अंटी से निकालते जाएं, खरच करते जाएं।’’ -जवाब की उम्मीद में वह रुके।

मन हुआ, कह दूं कि छह सालों में, बल्कि उससे पहले से ही कहा तो बहुत-बहुत है, कभी किया भी है कुछ। कह भी देता पर बीच में मिस्टर पवार आ गए, ‘‘और कैसे…?’’ पार्क में पहुंचा था, तब केवल वही थे, दूर, वाकिंग ट्रैक के दूसरी ओर। लॉकडाउन के कारण बाहर जाना रुक गया होगा, वरना वह तो अशोका पार्क जाने के ही अभ्यस्त रहे हैं। इतना बाहर भी नहीं है अशोका पार्क, एक एन्ट्रेंस गेट तो मेन रोड पर, यहीं लक्ष्मीबाई कॉलेज के लगभग सामने है, एसएफएस कॉलोनी से निकले, टंकी से मुड़े और पहुंच गए। विस्तार तो इतना है कि पार्क में कहीं से भी आप, सभी लोगों को एक साथ नहीं देख सकते। आम दिनों में वहां खूब सारे लोग होते हैं, कई-कई कॉलोनियों के, कई तो अपने पेट्स के साथ, आम तौर पर लेब्रा, गोल्डन रिट्रीवर, सेंट बर्नार्ड और बीगल, पग जैसे कुत्तों के साथ। कोई-कोई तो पार्क को पेट्स की गंदगी से मुक्त रखने के लिए स्कूपर तक लिए हुए। यह नया अभ्यास है, जो आरडब्ल्यूए की सरहदों को पार करने लगा है। इन दिनों खाली पड़ा होगा- सुबह-शाम जितना भरा होता था, उससे भी ज्यादा खाली। आवारा कुत्तों का वहां एकछत्र राज होगा इन दिनों। कॉलोनियों के अपने पार्क शायद ही कभी इतने निर्जन होते हों। लॉकडाउन के इन दिनों में भी अपनी बालकनी से मैं कई बार कैप्टन मेहता को पार्क में बेंच पर देख चुका हूं। अलबत्ता आते वह सुबह नाश्ते-वास्ते के बाद ही हैं। पार्क में बेंच ही हैं, जो निरापद बचे हैं। वरना इलाके के एमएलए के फंड, बल्कि वकील साहब से उनकी नजदीकी के जलाल से जो जिमिंग अपरेटस लगे हैं और बच्चों के लिए जो प्लास्टिक के राइडर-स्लाइडर, सब नारियल की रस्सी से बेतरतीब बांध दिए गए हैं। बांधना शायद गलत शब्द है, जिमिंग अपरेटस और राइडर-स्लाइडर पर रस्सियां ऐसे लपेट दी गई हैं कि इनका इस्तेमाल न किया जा सके।

कुशल-क्षेम का अपना सवाल मिस्टर पवार ने हाथ उठाकर पूरा किया था और मैंने भी केवल सिर हिला दिया था। भाषा का यह विलोपन और भंगिमाओं का ऐसा और इतना एप्लीकेशन इस कोरोना समय की ईजाद है। पता नहीं, आवाजों के साथ कितने-कितने ड्रॉपलेट्स हवा में तैर जाएं और किस-किस को इन्फेक्ट कर दें। वह रुक गये, ट्रैक पर 4-5 फीट दूर। किरोड़ी लाल कुछ और दूर खड़े रहे। वह मोबाइल पर थे या शायद प्रतीक्षा में।

‘‘फूलों की बहार हो गई है, ऐं जी!’’ – नाक-मुंह पर रुमाल बांधे, मिस्टर पवार का अगला सवाल, बल्कि टिप्पणी थी। सवाल होता तो वह रुकते, उत्तर के लिए। जैसे किरोड़ी लाल रुके थे, पार्क के गेट के पास कदमताल करते हुए। गलत भी नहीं थे मिस्टर पवार। लोग नहीं हैं, तो फूलों की उपस्थिति और एम्फैटिक हो गई है, हॉर्टीकल्चर से लेकर आरडब्ल्यूए और मालियों तक की दखलंदाजी कम हुई है, तो प्रकुति कुछ अधिक प्राकृतिक हुई है। ऐसे-ऐसे फूल जो पहले नहीं देखे। नाम तक नहीं पता, लंबी, हरी डंडीनुमा तने के सिर पर टिका, गेंद की तरह की संरचना बनाता छोटे फूलों का गुच्छा। पार्क में लंबी हो चली, घास की चादर के ठीक बीच, विस्तृत परिधि की क्यारियां तो हैं ही – कई रंगों की पारभासी बोगनविलिया, गेंदे, गुडहल, गुलाब, पीला डैफोडिल, चमकदार गुलाबी रंग की पेटुनिया, सफेद चमेली, पीला गुलबहार, नलिनी के पौधों से भरी। अधिकतर को खूब धूप चाहिए, खूब पानी भी, बस मालती और चमेली ही है, जिसे अधिक पानी रास नहीं आता।

‘‘बाकी मोदी जी के बस में तो क्या है? यूएस, चीन, जापान, जर्मनी के सामने अपनी बिसात भी क्या!’’ – किरोड़ी लाल की ओर से यह संवाद की बहाली थी। मिस्टर पवार के जाते ही वह केवल मेरी ओर मुड़ भर गए, गेट पर खड़े-खड़े ही, जैसे बस जाने वाले ही हों। ‘‘हां, जो बस में था, वह तो किया ही। जनवरी के अंत में ही जब कोरोना के मामले आने लगे थे, तब अहमदाबाद में ‘नमस्ते ट्रंप’ के मेगा आयोजन और चीन और दूसरे देशों में विशेष विमान भेजकर इन्फेक्शन आयात करते रहे। फिर जब संक्रमण तेजी से फैलने लगा तो एक समुदाय पर इसकी जवाबदेही थोप दी गई, जबकि अब यह आम जानकारी है कि इसी समय में कैसे हरिद्वार से 1800 लोगों को वापस गुजरात भेजने के लिए अमित शाह के आदेश पर उत्तराखंड की बीसियों बसें रातो-रात सेवा में लगा दी गईं, कैसे 500 के करीब श्रद्धालु वैष्णो देवी में जा फंसे, अयोध्या में रामनवमी में हजारों लोगों ने और सीएम ने भी भाग लिया, पंजाब में छह दिन का विशाल होला मोहल्ला आयोजन हुआ, जिसमें शिरकत के लिए बड़ी संख्या में विदेश से भी श्रद्धालु आए। बाद में इन आयोजनों से जुड़े या उनके प्रत्यक्ष-परोक्ष संपर्क में आए कई लोगों की कोरोना से मौत की भी खबरें हैं। अहमदाबाद वैसे ही कोरोना-संक्रमितों की संख्या के लिहाज से देश के सभी शहरों का सिरमौर हो गया है।’’

किरोड़ी लाल जी गेट से निकल नहीं गए। उन्होंने हस्त्क्षेप किया, ‘‘हां, लेकिन इकनॉमी का क्या? बंदी में ढील के बिना कैसे शुरु होगी इकॉनॉमिक एक्टिविटीज?’’ वह अपने शुरुआती सवाल पर लौट गए थे। भोलापन यह कि वह अब भी उम्मीद में थे कि सरकार कुछ तो करेगी, कुछ तो सोचेगी रसातल में जाती अर्थव्यवस्था के बारे में, कोई तो फॉर्मूला सोचा होगा उसने भी। उन्होंने सुना ही नहीं होगा कि 14 के अपने संबोधन में पीएम आर्थिक संकट का ठीकरा कोरोना के सिर पर फोड़ कर अपना पल्ला झाड़ चुके हैं, उस संकट का ठीकरा, जो 2019 की तीसरी तिमाही में ही पूरी तरह स्पष्ट हो चुका था। ऑटोमोबाइल, टेक्सटाइल, मैन्युफैक्चरिंग-सारे सेक्टर मंदी की चपेट में थे, चार करोड़ रोजगार जा चुके थे और जिसके चलते विश्व की तमाम एजेंसियां 2020 के लिए जीडीपी विकास दर चार प्रतिशत से नीचे रहने की भविष्यवाणियां करने लगी थीं। मजा यह है कि भक्त-अंधभक्त उन्हें सुनें ही क्यों, उनके हिस्से तो अंततः ताली-थाली बजाने, दीप-धूप जलाने की ही जवाबदेही आनी है।

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