सामाजिक दूरी और तालाबंदी में फंसा कामगार

  • चंद्रकला

पड़ोसी की छत पर खड़ी बच्ची छतों पर जलते दियों और आसमान में पटाखों की रंगीनियां देख रही थी। उसने आवाज लगाकर पूछा कि बुआ आपने अपने घर के सारे बल्ब क्यों जलाये हैं, आप दीये क्यों नहीं जला रही हैं और पटाखें क्यों नहीं छोड़ रही हैं? सब तो बहुत खुश हैं, आप क्यों दुखी लग रही हैं? मेरे पास उस बच्ची के एक साथ पूछे गए इतने प्रश्नों का उत्तर देने जैसा कुछ भी नहीं था।

लेकिन मैं उससे बोलना चाहती थी कि ‘नन्हीं बच्ची मैं तुम्हें कैसे समझाऊं कि पूरी दुनिया में हजारों लोग मर रहे हैं, लाखों मरने के कगार पर हैं, करोड़ों बेघर हो रहे हैं इसलिए मन खुश नहीं हो सकता। टोटकों और अंधविश्वास पर टिके हमारे समाज के डर को कम करने के लिए राजाज्ञा जारी हुई है इसलिए प्रजा राजज्ञा का पालन भक्तिभाव से कर रही है। जैसे कि वह मेरे मन की बात को समझ गई हो। बोली ‘बहुत सारे लोग मर रहे हैं ना…सब डर को भगाने के लिए यह सब कर रहे हैं ना… लेकिन यह तो दु:ख की घड़ी हुई ना, फिर हम खुशियां क्यों मना रहे हैं? मैं उसकी उत्सुक्तता को शांत करना चाहती थी तभी उसकी मां ने ‘सोशल डिस्टेन्सिंग का हवाला देकर बच्ची को अपने पास बुला लिया। लेकिन छत से नीचे उतरते हुए मेरा दिमाग ढेरों सवालों में उलझ गया।

मानसिक गुलामी और भक्त

मानसिक गुलामी की जद में आते देशभक्तों ने पांच अप्रैल की रात नौ बजे घरों की रोशनी बंद करके छतों और बालकनियों में दीयों, मोमबत्ती, टॉर्चलाइटें, मोबाइल की रोशनी जलाकर इस उत्सव को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। कुछ लोगों ने तो इस जश्न में पटाखे छोडऩा और हर्ष में फायरिंग करना भी अपना पुनीत कर्तव्य समझा, जिसने जैसे चाहा इस विशेष इवेंट को सैलिबरेट किया। क्योंकि इस देश के ‘ऐतिहासिक इवेंट मैनेजर जी ने इस आयोजन का आह्वान किया था। इससे पहले 22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बाद थाली ओर घंटी-शंख बजवा कर वह स्वयं को विश्व के समक्ष ‘ऐतिहासिक हीरो प्रस्तुत करने का बेहतरीन प्रयास कर चुके थे। देश का सम्पन्न मध्य वर्ग और धर्मभीरु प्रजा ‘ऐतिहासिक प्रयोगों का पालन करना अपना कर्तव्य समझती है। क्योंकि अधिकांश का मानना है कि जैसे परिवार के मुखिया के निर्णय का पालन करना परिवार का कर्तव्य है वैसे ही प्रजा का कर्तव्य है कि वह राजाज्ञा का पालन करे, क्योंकि इनके लिए गए निर्णय गलत नहीं हो सकते। दुनिया में हजारों मरें या लाखों गरीब और भूखे लोग सड़कों पर हों या शैल्टर होम में, इससे क्या फर्क पड़ता है बस हम अपनी चारदीवारी में महफूज रहें। अगले दिन सुबह, छह अप्रैल तक दुनियाभर में 69,527 लोगों की मौतें हो चुकी थीं और 1 लाख 277 हजार 962 लोग संक्रमित हो चुके थे। तेजी से फैलता यह संक्रमण प्रवासी भारतीयों के माध्यम से देश में प्रवेश कर चुका था और इसकी कीमत अंतत: हर तरह से गरीब और मेहनतकश को ही चुकानी होगी, यह भी तय था।

शुरुआती लापरवाही

2020 की शुरूआत में खबर आई कि चीन के वुहान शहर में कोरोना वायरस से धीरे-धीरे मौतें होने लगी हैं और आकंड़ा तेजी से बढ़ता जा रहा है। और उतनी ही तेजी से रात-दिन मरीजों के साथ लगे डॉक्टर, नर्स और अन्य कर्मचारी अवसाद में जाने लगे हैं। बाद में यह भी कि अब इस वायरस का फैलाव दुनिया के अन्य देशों में भी दिखाने लगा है। हालांकि चीन इस पर काफी हद तक काबू पाता दिख रहा है लेकिन अन्य देशों में इसका कहर कितना व्यापक होगा इसके परिणाम योरोप और अमेरिका में दिखने शुरू हो गए। जब चीन से भारतीय छात्रों को वापस लाने की प्रक्रिया शुरू हुई उस वक्त इन प्रवासियों की नाचते-गाते पार्टी मनाते तस्वीरें चर्चा में भी आई थीं। चीन से लाई गई केरल की एक छात्रा में ही पहली बार 30 जनवरी को कोरोना वायरस की पुष्टि हो गई थी। हालांकि केरल सरकार की गंभीर तैयारी के परिणामस्वरूप ही राज्य में वायरस के फैलाव पर काफी हद तक नियंत्रण पाया गया। किंतु केंद्र सरकार इस महामारी के प्रति लापरवाह बनी रही। कारण, वैश्विक महामारी में तब्दील होते वायरस के प्रति सचेत होकर अपनी स्वास्थ्य सेवाओं को दुरस्त करने से अधिक महत्वपूर्ण उस वक्त भाजपानीत केंद्र सरकार के लिए किसी भी तरह दिल्ली के चुनाव में जीत हासिल करना था।

केंद्रीय गृहमंत्री स्वयं दिल्ली के गली-मोहल्लों में जाकर जनता से वोट मांग रहे थे। इतना ही कहां, विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्रियों, कैबिनेट मंत्रियों और सासंदों ने पूरी ताकत को दिल्ली चुनाव में झोंक दिया गया था। कट्टर हिंदूवादी एजेंडा से दिल्ली का चुनाव प्रचार चलाया गया, भाषणों की उग्रता और आह्वानों से सीधे तौर पर मुसलमानों को निशाना बनाया गया। गोली चलाने के आह्वान को लागू करने के प्रयास सीएए, एनपीआर और एनसीआर को विरोध कर रही शाहीन बाग की महिलाओं के प्रदर्शन स्थल पर हुए। क्योंकि दिल्ली की सत्ता पर काबिज होना भाजपा सरकार का ड्रीम प्रोजेक्ट बन चुका था। लेकिन 11 फरवरी को जो परिणाम घोषित हुआ उसमें दिल्ली की जनता ने केजरीवाल के नेतृत्व पर ही भरोसा जताया।

चूंकि इस चुनाव में भाजपा की साख दांव पर लगी थी और चुनाव प्रचार के दौरान मुसलमानों के खिलाफ जो जहर उगल दिया गया था वह जमीन तक पसर चुका था। भाजपा की हार होती या जीत, उसका बाहर निकलना तो तय ही था। अभी दिल्ली की सरकार बने दस दिन भी नहीं हुए थे कि 22 फरवरी को दिल्ली के उत्तर पूर्वी इलाकों में हिंसा शुरू हो गई। 25 फरवरी तक, तीन दिनों में ही चरम उन्माद ने अपना पूरा रंग दिखा दिया। हिंसा और आगजनी में कितने लोग मारे गए, कितने घर जले, कितने लापता हुए, कितने अभी भी घरों और अस्पताल में पड़े हैं, कितने ही लोग आज भी राहत शिविरों में रहने को मजबूर हैं अब उनकी खोज खबर लेने की सुध किसी को नहीं है। सत्ता के मद में चूर विचार अभी भी समाज में सांप्रदायिक विद्वेष फैलाने के लिए नए तरीके तलाश रहा है।

और नीरो बांसुरी बजा रहा था

‘रोम जल रहा था और नीरो बांसुरी बजा रहा था की पंक्ति यहां पर इसलिए प्रासंगिक लगती है कि जब एक ओर कोरोना वायरस धीरे-धीरे दुनिया को अपनी चपेट में लेने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा था तब दूसरी ओर भारत की राजधानी दिल्ली जल रही थी। लेकिन प्रधानमंत्री और गृहमंत्री सहित केंद्र सरकार की कैबिनेट गुजरात में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को खुश करने के लिए लाखों लोगों की भीड़ इक_ा करके ‘ऐतिहासिक रिकार्ड बनाने में जुटे हुई थी। और मीडिया पूरे देश की जनता को ट्रंप, उनकी पत्नी और बेटी की नजर से ताजमहल के दीदार करवाने के लिए टूट पड़ रहा था, ताकि दिल्ली के दंगों की तस्वीरों और आने वाले कोरोना वायरस के कहर की आहट से देश का ध्यान हटाया जा सके।

तीन दिन तक दिल्ली में जो हिंसा होती रही उसको रोकने के लिए कोई त्वरित कार्रवाई करने की केंद्र सरकार से तो उम्मीद क्या हो सकती थी, लेकिन दिल्ली सरकार ने भी निर्णायक हस्तक्षेप करने के बजाय अपने कदम पीछे ही खींचे। आम आदमी की बात करके भले ही केजरीवाल को पुन: सत्ता मिल गई लेकिन वह न तो कभी शाहीन बाग के प्रदर्शन पर एक शब्द बोले और न ही दिल्ली में हो रही हिंसा पर खुलकर ही अपना कोई विरोध दर्ज किया। सत्ता में आने के बाद केजरीवाल अब एक लंबी पारी खेलने की तैयारी में हैं, संभवत: अब यह ओझल प्रश्न नहीं है। आम आदमी की सीढ़ी से सत्ता हासिल कर लेने के बाद अपने वर्गीय हित ने आम से खास बनने की दिशा पकड़ ली है, यह आने वाले समय में अधिक खुलकर सामने आएगा। इसके साथ ही सैद्धांतिक रूप से यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि किसी भी व्यवस्था के बुनियादी तंत्र को बदले बिना आम आदमी को उसके बुनियादी अधिकार मिल ही नहीं सकते।

स्वास्थ्य व्यवस्था की बेहाली

अब आते हैं वर्तमान में, ऐसा तो नहीं कहा जा सकता कि भारत सरकार को यह मुगालता रहा कि भारत में कोरोना वायरस का खतरा नहीं बढ़ेगा। वास्तविकता तो यह है कि बेहतर और सस्ते स्वास्थ्य की दिशा में हमारे देश में गंभीरता से कभी प्रयास ही नहीं किये गए, तो कोई दूरदृष्टि हो भी कैसे। अमूमन दुनिया में स्वास्थ्य के मामले में भारत बहुत पीछे है। भले ही वह स्वयं को विश्वगुरु कहे लेकिन सबके लिए स्वास्थ्य उपलब्ध कराने में भारत थाईलैंड और श्रीलंका से भी पीछे है। भारत की सरकारों ने स्वास्थ्य को हमेशा गौण विषय ही माना है। नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन अपने एक निबंध में कहते हैं कि ‘सरकार स्वास्थ्य के विषय में विचार कर भी ले तो व्यवहार में लागू करने के लिए सरकार के पास पैसा कहां है।Ó यानी स्वास्थ्य पर सरकारें खर्च ही नहीं करना चाहती बल्कि धीरे-धीरे स्वास्थ्य सेवाएं निजी हाथों में देने की तैयारी चल रही है। भारत सरकार की लापरवाही का आलम तो यहां तक है कि मार्च के शुरूआती हफ्तों में, जबकि भारत में मरीजों की संख्या सामने आने लगी थी, तब भी पर्सनल प्रोटेक्टेट इक्यूपमेंट (पीपीई) का निर्यात किया जा रहा था।

 

महामारी का साया और राजनीति

मध्य प्रदेश के कई इलाकों में कोरोना वायरस ने तेजी से पैर पसारे क्योंकि समय रहते यहां पर इसको रोकने के ठोस उपाय नहीं किए गए। लेकिन यदि यह कह दिया जाए कि भाजपा ने इस राज्य की सत्ता पाने के लिए 23 मार्च तक यहां राजनीतिक उठापटक जारी रखी हुई थी तो राजाज्ञा की अवहेलना मान ली जाएगी। 10 मार्च को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से अपने इस्तीफे और भाजपा में शामिल होने की घोषणा से पहले कमलनाथ सरकार के छह मंत्रियों सहित 22 विधायकों को कर्नाटक पहुंचा दिया गया। स्वास्थ्य मंत्री तुलसी राम सिलावट भी इसमें शामिल थे, तब यहां पर छह कोरोना मरीजों के संक्रमण की पुष्टि हो चुकी थी और 50 से अधिक लोग अलग-थलग यानी क्वारंटीन किए जा चुके थे। 21 मार्च को कमलनाथ ने इस्तीफा दिया, 22 मार्च को मोदी जी जनता कर्फ्यू का ऐलान करते हैं, 23 मार्च को शिवराज सिंह को मध्य प्रदेश का मुख्यमंत्री घोषित किया जाता है। तब तक देश में लगभग 562 कोरोना से सक्रंमित मरीज पाए जा चुके थे और नौ लोगों की जान चुकी थी। इसके बाद 24 मार्च को बिना किसी पूर्व तैयारी के हमेशा की तरह रात आठ बजे प्रधानमंत्री घोषणा कर देते हैं कि रात 12 बजे से पूरे देश में लॉकडाउन शुरू हो जाएगा। अर्थात 130 करोड़ आबादी वाले देश की चलती हुई व्यवस्था को ठप्प होने के लिए महज चार घंटे का समय दिया गया। साधन सम्पन्न वर्ग साढ़े आठ बजे से ही अपने घरों में अतिरिक्त सामान भरने के लिए तेजी से दुकानों की भीड़ में शामिल हो गए, लेकिन एक बड़ी मेहनतकश आबादी के पास सिवाय अपनी बेबसी पर सोचने के अलावा कुछ भी नहीं था।

गाडिय़ां, बसें, रेलगाड़ी सभी वाहनों की आवाजाही बंद की जा चुकी थी। सरकार आपदा अधिनियम 2005 के तहत राष्ट्रीय आपदा की स्थिति में तत्काल निर्णय लेने की आधिकारी है। किंतु इसकी जो पूर्व तैयारी की जानी होती है वह किए बिना लिए जाने वाले ऐसे निर्णयों से जब देश के लाखों लोगों का जीवन महामारी से मरने से पहले भूख से मरने की नौबत आ जाए और नागरिकों की शारीरिक, मानसिक और आर्थिक क्षति हो तब निर्णय लेने वालों के विरूद्ध कानून में क्या उपचार हैं। यह सवाल अब गौण हो चुका है और इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी यह तय करना तो यक्ष प्रश्न है।

जीवनयापन का भयावह संकट

सालों से अपने गांवों को छोड़कर शहरों में रोजगार की तलाश में पहुंचे हजारों मजदूरों, जिनकी मेहनत से ये चमचमाते शहर आबाद थे, के सामने तालाबंदी के कुछ ही घंटों में वायरस से भी कहीं अधिक भयावह संकट आ गया। ढाबे बंद हो गए तो खाने का संकट, कमाई नहीं थी तो घर का किराया देने का संकट, कोई बीमार है तो अस्पताल का संकट, घर वापस जाना है तो गाडिय़ों का संकट। इन सारे संकटों से उबरने का एकमात्र विकल्प था कि चाहे पैदल ही सही, किसी भी तरह वापस अपने गांव अपनों तक पहुंचा जाए, फिर वहां जो भी हो। लेकिन यहां फिर प्रश्न उठ गया कि क्या सरकारें जनता के हित में फैसले लेती हैं या फिर उनके अपने हित सर्वोपरि होते हैं।

हां, यही सच है कि भारत सरकार ने अपनी नाकामी और राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर पर्दा डालने के लिए लाखों लोगों के जीवन को दांव पर लगा दिया। पहले से सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था में अचानक हुए इस लॉकडाउन से रातों-रात बड़ी संख्या में कामगारों को अपने काम से हाथ धोना पड़ गया। गांवों की ओर वापस जाने के अलावा इनके पास कोई ओर रास्ता भी नहीं बचा। लेकिन सरकार ने न केवल उनके वापस अपने घरों में जाने का अधिकार छीन लिया बल्कि भूखे-प्यासे इन मजदूरों के साथ अमानवीय व्यवहार की भी कितनी ही घटनाएं सामने आई और जो अभी तक आ रही हैं, कई जगह पर जब उनका सब्र टूट रहा है तो वह उग्र होने से भी परहेज नहीं कर पा रहे हैं। पूरे देश में अलग-अलग फंसे इन मजदूरों की मात्र एक मांग है वापस अपने घरों पर जाने की, जो कि एक मूल अधिकार है।

वास्तव में हमें इस बात को समझना होगा कि पूंजीपतियों की चाटुकार सरकारें कभी भी आम आदमी के हितों पर ध्यान दे ही नहीं सकती। देखिए, यह जानते हुए भी कि देश के भीतर लाखों मजदूर इस आपदा में सबसे अधिक प्रभावित होने वाले हैं, किसी भी राज्य या केंद्र सरकार ने कामगारों के हितों को सुरक्षित करने के लिए कोई रणनीति नहीं बनाई। बजाय इस पर कोई रणनीति बनाने के सरकार की प्राथमिकता क्या रही, विदेशों से आने और जाने वाले धनाढ्य लोगों को सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचना। क्या इस सच्चाई पर किसी को बोलने की हिम्मत होगी कि देश में कोरोना संक्रमण के वाहक विदेश से आए अधिकांश हिंदू सम्पन्न और मध्य वर्ग के प्रवासी थे। लेकिन इसकी कीमत चुकानी पड़ी रही है गरीब और मेहनतकशों को, जो एक ही रात में सड़कों पर आ गए और जिनके लिए जाति और धर्म से ऊपर पेट की भूख है। और इसके बाद कितने और कितनी तरह के दृश्य आम होते चले गए जिनमें मजदूर भाग रहे हैं, न वे घरों में हैं,  न ही खेतों में, न कारखानों में न कहीं अन्य कार्यस्थलों में और न ही बस्तियों में। वे सिर्फ सड़कों पर हैं। किसी के कंधे में बच्चा है, पीठ पर झोला, ऊंगुली थामे दूसरा बच्चा, पीछे से एक बच्चे को गोद में लिए हुए सिर पर और हाथ पर सामान ढोती पत्नी है, तो कुछ झुंड में हैं, चप्पलों में पैर सूज गए हैं लेकिन चलना है। नहीं पता कितना, कितने दिन, कितनी रातें, बस चलना और किसी भी तरह अपने गांव पहुंच जाना है। बस चलना है, रुक गए तो मर जाएंगे। सड़कों पर भूखे-प्यासे, दौड़ते-भागते पुलिस के डंडों से पिटते जिंदा इंसान महान आजाद भारत में ब्रितानी हुकूमत के समय में फैल गए अकाल की तस्वीरों की याद दिला कर रही थी।

सड़कों पर चल पड़े इन हजारों कदमों में कामगारों की जीजीविषा ने बुरे दौर में ही सही कुछ भी कर गुजरने की वह ताकत सामने ला दी, जिसको कि 1848 में मार्क्स ने पहचाना था और कहा था-‘दुनिया के मजदूरो एक हो, तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ नहीं है लेकिन पाने के लिए सारी दुनिया है।Ó संभवत: यही वह विश्वास रहा होगा जिसने इन मेहनतकश मजदूरों को सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करने के लिए तैयार कर दिया था। ये मजदूर भारत के बड़े-बड़े शहरों के लिए अब उपयोगी नहीं रह गए मालूम पड़ते हैं। इस देश की पूरी व्यवस्था को अपने कंधों पर ढोए, खेतों, कारखानों और निर्माण इकाई में, लघु व बड़े उद्योगों में काम करने वाले कामगार, रिक्शा वाले, ठेलेवाले, गाड़ीवाले, माली, घरेलू और दुकान के नौकर, सफाईकर्मी तमाम वे लोग जो कि धनी व मध्य वर्ग के रोजमर्रा के जीवन का आसान बनाते रहे हैं। एक ही रात में अछूत बना दिए गए। इन जिंदा इंसानों की आखिरकार क्या गलती रही, सिर्फ यही न कि इनका श्रम बिकाऊ है और खरीदार ही नहीं होंगे तो अपने घरों की राह पकडऩे को मजबूर होना ही पड़ेगा। रोज कमाकर खाने वाले को अगर काम नहीं मिलेगा तो खाएगा क्या। घरों के भीतर सुरक्षित हो गए इस देश की भक्तिमय जनता ने इस अपार जन समूह की जिजीविषा की कल्पना भी नहीं की थी जो राजाज्ञा को धता बताकर चल रहे थे और चलते जा रहे थे।

सैकड़ों किलोमीटर चलने के बाद भी जब सारे कष्ट सहकर एक बड़ा हिस्सा अपने राज्यों की सीमाओं पर पहुंचा भी तो जो जहां पर थे उनको वहीं 14 दिन की क्वारंटीन की प्रक्रिया पूरी करने के नाम पर अधिकांश जगहों पर जानवरों की तरह ठूंस दिया गया, जहां पर रोते हुए बेबस स्त्री-पुरुषों के चेहरे किसी मासूम बच्चे से कम नहीं दिख रहे थे। पुलिस-प्रशासन को इन गरीबों के साथ जैसे चाहे वैसे बर्ताव करने की छूट है। कहीं पर ताले में बंद कर दिए गए, तो कहीं पर जमीन में बैठाकर पूरे समूह पर दवा छिड़काव किया गया, गोया कि इंसान न होकर कोई सामान हों। क्या जिस तरह का बर्ताव इन हजारों इंसानों के साथ किया जा रहा है, किसी एक भी धनाढ्य या सम्पन्न प्रवासी से करने का साहस कर सकते हैं पुलिस की वर्दी पहनने वाले? वास्तव में इस सामंती समाज में वर्ग और जाति ही तो वह दायरा है जो किसी भी व्यक्ति के साथ व्यवहार को तय करता है।

अपने जीवन की पूंजी को महज कुछ थैलों में समेटे, चलती-फिरती हजारों की संख्या का साहस जब सरकार की परेशानी का सबब बनने लगा तो सरकार के लिए किसी भी तरह इन अमानवीय तस्वीरों से जनता का ध्यान भटकाना आवश्यक हो गया। अब तक जहां देश में सांप्रदायिक वैमनस्य पर कोरोना वायरस प्रभावी होने लगा था और घरों के भीतर बंद देश का ध्यान मजूदरों की समस्या पर अटकने लगने था। और सरकार की तालाबंदी से पूर्व नाकाफी तैयारियों पर चौतरफा हमले होने लगे थे और उनके ‘ऐतिहासिकÓ फैसलों पर भी प्रश्न उठने लगे थे। तभी दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में मिल गए तबलीगी जमात के सैकड़ों जमातियों ने सरकार के लिए संजीवनी का काम किया। और फिर आसानी से बेबस भूखे और अपने घरों को भेज देने की भीख मांगते मजदूरों की तस्वीरें नेपथ्य में जाने लगी और तबलीगी जमात यानी मुसलमान फिर निशाने पर आ गए। इस घटना पर जिस तरह से पुलिस-प्रशासन और दिल्ली सरकार ने अपना हाथ झाड़ लिया और सारा ठीकरा जमात वालों पर फोड़ दिया, उसका सच कभी देश के सामने नहीं आ पाएगा। क्योंकि देशभक्त मीडिया के कर्मठ संवादाताओं और सरकारी प्रयासों से आसानी से यह स्थापित हो चुका है कि भारत में कोरोना वायरस को फैलाने में तबलीगी जमात जिम्मेदार है। आज हिंदूवादी ताकतें सोशल मीडिया के माध्यम से आसानी से मुसलमानों को समाज से काट देने में सफल हो रही हैं। परिणामस्वरूप गरीब मेहनतकश मुसलमान दोहरी मार झेलने को मजबूर है। जबकि इस सच्चाई से लगातार ध्यान भटकाया जा रहा है कि वास्तव में मोदी-ट्रंप की जोड़ी इस महामारी को अपने देशों में फैलाने के लिए ज्यादा जिम्मेदार है। दुनिया में तेजी से फैलती इस महामारी के खतरे को समय रहते फैलने से रोकने के प्रयास करने के बजाय दोनों ही अपने राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति में लगे रहे और इन दोनों दंभी राजनेताओं ने अंतत: अपने-अपने देश के नागरिकों को कोरोना संक्रमण और तालाबंदी में झोंक दिया।

मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश में कोरोना के प्राथमिक केस हिंदू और सम्पन्न लोग थे। उत्तराखण्ड में जो पहले तीन कोरोना संक्रमित मरीज मिले वे हिंदू आईएफएस अधिकारी थे, जो फ्रांस और स्पेन की यात्रा करके आए थे। उनकी दिल्ली एयरपोर्ट पर लापरवाह स्क्रीनिंग भी हुई थी फिर भी वे पॉजिटिव पाए गए। लेकिन मीडिया और सांप्रदायिक ताकतों के लिए यह कोई मुद्दा नहीं था बल्कि ये सब तो सहानुभूति के पात्र थे। हमें इस बात को नहीं भूलना होगा कि जनता का ध्यान भटकाने का प्रशिक्षण आज भारत की सत्ताधारी पार्टी के प्रमुख शासक अपने प्रचारक रहने के दौरान ले चुके हैं। चूंकि अब पूरा देश ही उनकी प्रयोगस्थली है तो भक्तिमय प्रजा अपने हितों के अनुसार अपने तरीके से राजाज्ञा का पालन करती है तो क्या बड़ी बात है।

‘ऐतिहासिकÓ चक्रवर्ती सम्राट द्वारा जब अपने मुखारबिंदु से लॉकडाउन की घोषणा की गई तो उनकी धनी और मध्यवर्गीय भक्तिमय प्रजा अभिभूत थी। हो भी क्यों न, घर में परिवार के साथ समय बिताने का अवसर जो मिला है, इस अवसर को भरपूर इन्जॉय तो किया ही जाना चाहिए। खाना पचाना हो तो पोज देकर जो योग और आयुष एप में नुस्खे सिखाए और बताए जा रहे हैं, उनका प्रयोग तो किया ही जाना चाहिए। सोचिए पूरा देश क्या विदेश भी चलाने वाला महज एक व्यक्ति, अपनी व्यस्तताओं के बावूजद अपनी प्रजा के लिए वह स्वयं योगा करते हों, हाथ जोड़ते हों, सोशल डिस्टेंन्सिंग की बात करते हों, क्या सबके बस की बात है यह? हिंदू धर्म के विचारों को आज देश में दृढ़ किए जाने की जरूरत आ पड़ी है, इसीलिए परिवार सहित बैठकर रामायण और महाभारत देखने की सुविधा कर दी गई है। राजाज्ञा का किसी भी हालत में पालन होना जरूरी है। इससे क्या फर्क पड़ता है कि गरीब, मजलूम और उपेक्षित लोग रोजी-रोटी के लिए सड़क पर भटक रहे हैं। आखिर देश के लोगों को बचाने के लिए कुछ लोगों को अपना या अपने परिवार का बलिदान देना भी पड़े तो देना ही चाहिए न? वैसे भी गरीब मजदूरों के लिए कोई संबोधन होता है क्या? हमेशा उनसे हाथ जोड़ कर मांगा ही गया है, उनको देने की बात कभी किसी ने सुनी है क्या? कभी यह कहते सुना है कि एक गरीब परिवार अपने बच्चों का पेट कैसे भरेगा?

रेडियो, टेलीविजन, सोशल मीडिया पर कितने ही सुझाव, बहस, उपदेश और भाषण, घर पर सुरक्षित समय बिताने के अनगिनत टिप्स, इंडिया के धनी और मध्य वर्ग के लिए हमेशा उपलब्ध हैं, किंतु इस देश को चलाने वाले निम्न और गरीब वर्ग, जिसके लिए बंदी के इस दौर में अपनी जिंदगी का एक दिन चलाना मुश्किल है, उनके लिए क्या किया जाना चाहिए, बोलने वाले, सोचने वाले कितने हैं? देश की पूरी व्यवस्था को चलाने वाले मजदूर, खेतिहर मजदूर, कूड़ा बीनने वाले जो कि एक ही मास्क और दस्तानों में न जाने कितने दिन, कितने घरों की गंदगी उठाने के लिए मजबूर हैं और दिहाड़ी मजदूर की सुरक्षा के लिए कोई टिप्स या सुझाव के बजाय उनको कोरोना फैलाने वाला मानकर दुत्कारा जा रहा है। एक प्रसिद्ध शोधार्थी के शोध पत्र में इसका सटीक चित्रण दिखता है कि गरीबी और बीमारी की तुलना एक ऐसे दुष्चक्र में फंस गई है जो एक-दूसरे को बढ़ावा देते हैं। सम्पन्न भारत को विपन्न भारत की जमात केवल नौकर के रूप में जान पड़ती है। सम्पन्न भारत विपन्न भारत को निर्णय सुना देता है। यदि कोई छूत की बीमारी लगी होती तो इस वर्ग के कान में जूं तक नहीं रेंगती क्योंकि गरीबों के मरने से किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।

गरीबों को राशन उपलब्धता की हकीकत

ऐसा नहीं है कि देश में अनाज की कमी है और सरकार भी इस बात की दुहाई दे रही है लेकिन इस व्यापक गरीब आबादी की भूख को कैसे शांत किया जाए और उनको किसी भी तरह दो वक्त की रोटी मिले इसकी रणनीति बनाने पर लंबे लॉकडाउन के दौरान भी नहीं सोचा गया है। सच कहें तो आज इस देश के करोड़ों लोगों के लिए कोरोना वायरस से अधिक खौफनाक पेट की भूख है। गरीबों को मुफ्त राशन देने की बातें हो रही हैं। गरीब महिलाओं के जन-धन खातों में आए महज 500 रुपए निकालने के लिए उन्हें कितनी ही मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। पति या बेटा परदेश में रो रहा है पत्नी, मां और परिवार गांव में रोने को छोड़ दिया गया हैं। सरकारी राशन देने के मापदंड भी गैरबराबरी पर आधारित हैं। कितनी ही जगहों पर राशन और खाने की कतारों में लगे गरीब लोगों को अमानवीय तरीके से दुत्कारते और लाठी भांजते पुलिस के सिपाही अपनी भड़ास निकालते दिख रहे हैं। सामाजिक और कई अन्य संस्थाएं, व्यक्तिगत तौर पर भी कईं लोग खाना आदि देने के लिए आगे आए हैं। इनमें से कुछ ईमानदार और मानवीय प्रयासों को छोड़ दिया जाए तो अधिकांश तो सोशल मीडिया पर वाह-वाही बटोरने के लिए भी यह कार्य कर रहे हैं या फिर राजनीतिक हितों के लिए कर रहे हैं। लेकिन हम सभी को यह भी याद रखना होगा कि वे कोई भी एहसान नहीं कर रहा है, बल्कि इन्हीं मेहनतकशों के श्रम पर यह व्यवस्था टिकी है जिसमें हम ऐश कर रहे हैं। और कितनों ने इनके पेटों पर लात मार कर अपनी सम्पन्नता की सीढिय़ा चढ़ी हैं। वास्तव में तो यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह देश के प्रत्येक नागरिक की जीवनापयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति करे।

देश के विभिन्न शहरों में, कस्बों में, कैंपों में या खुले में, पुल के नीचे या सड़क के किनारे कहीं भी तालाबंदी खुलने का इंतजार कर रहे मजदूर, विशेषकर गुजरात, दिल्ली, मुंबई में फंस गये इन लोगों के हालात दिन-प्रतिदिन बदतर होते जा रहे हैं। भले ही कुछ समय के लिए कुछ लोगों को राशन और खाना आधा पेट ही सही मिल भी पा रहा है तो भी यह लंबे समय तक नहीं चल पाएगा। अभी ही कईं जगहों से खबरे आ रही हैं कि कितने ही लोग भूख के कारण परेशान हैं। अब सिर्फ एक वक्त का खाना पाने के लिए घंटों लाइन में लगे गरीब लोग कब तक अपने आक्रोश को दबाएंगे, वह निश्चित ही किसी न किसी रूप में फूटेगा यह तय है। गर्मी बढऩे के साथ ही कईं अन्य समस्याएं सामने आने लगेंगी। पानी और अन्य जरूरी दिनचर्या के अभाव में कोरोना वायरस के इतर बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। कोई भी महामारी जब लंबे समय तक और व्यापक पैमाने में फैलने लगती है तो इसका आसान निशाना अंतत: तो गरीब आदमी ही बनता है।

भारत जैसे वृहद गरीब आबादी वाले देश की सच्चाई यह है कि यहां पर कोरोना वायरस से बड़ा खतरा भूख और समय पर ईलाज न मिलने का है। इस तालाबंदी के दौरान समय से ईलाज न मिलने से कितनी मौतें होंगी, यह आंकड़े कहीं दर्ज नहीं किए जा सकेंगे। उसके साथ ही यह भी कि विभिन्न प्रकार के मानसिक दबाव से उत्पन्न अवसाद जो आत्महत्याएं होनी शुरू हो गई हैं उस समस्या पर गौर ही नहीं किया जा रहा है। रोजगारशुदा या बेरोजगार पुरुषों के घर बैठ जाने और विशेष कर आर्थिक अभाव झेलने वाले परिवारों की महिलाओं का जो शारीरिक और मानसिक बोझ तेजी से बढ़ है, उसको भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आकंड़े बता रहे हैं कि इधर के दिनों में महिलाओं के साथ होने वाली घरेलू हिंसा की घटनाएं अन्य प्रकार की महिला हिंसा के बरक्स तेजी से बढ़ रही हैं।

अंतिम बात, ‘सोशल डिस्टेन्सिंग की, कोरोना वायरस के फैल जाने से जैसे विशेषज्ञों की बाढ़ सी आ गई है। पहला दूसरे से बेहतर ‘सोशल डिस्टेन्सिंग को व्याख्यायित करता है, तो दूसरा तीसरे से स्वयं को ‘डिस्टेन्सिंग की बेहतर समझ रखने वाला विद्वान मानता है। जितनी तेजी से समाज में ‘सोशल डिस्टेन्सिंग की व्याख्या हो रही है, सामाजिक दूरी ‘रामबाढ़ है और ‘लक्ष्मण रेखा को न लांघना, कोरोना वायरस से बचने के औजार के रूप में जितनी सहजता से इस्तेमाल किए जाने लगे हैं यह भविष्य के भारत के लिए निश्चित ही चिंताजनक है। पहले से ही जाति, धर्म, भाषा, क्षेत्रीयता और राष्ट्रीयताओं तथा सांस्कृतिक एवं लैंगिक विभेद में बंटे भारतीय समाज में जहां पर कि मालिक और नौकर, सवर्ण और दलित, बहुसंख्यक व अल्पसंख्यक, देव और दासी के आधार पर सामाज का आचार-व्यवहार संचालित होता है, वहां आने वाले दिनों में आम जनमानस में कितनी संकीर्णता घर कर जाएगी इसका महज अंदाजा ही लगाया जा सकता है। एक तरह से देखें तो ‘शारीरिक दूरी यानी ‘फिजिकल डिस्टेन्सिंगÓ शब्द तो समझ भी आता है लेकिन यदि हम सामाजिक दूरी, जिसका शाब्दिक अर्थ हुआ ‘एक समाज की दूसरे समाज से दूरी को मान लिया जाय तो यह मानसिकता कोरोना वायरस के संक्रमण के खतरे के टल जाने के बाद, यदि यह मान भी लें कि यह 40 दिन से अधिक नहीं होगा, तो भी दिलों के बीच में बन आई दूरियों को करीब आने में जाने कितने वर्षो लगेंगे।

 

मई 2020

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