हिंदुत्व और हिंदू शब्द की राजनीति

Share:
  • मोहिंदर सिंह

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक  मोहन भागवत ने 27 दिसंबर, 2019 के अपने एक भाषण में कहा कि संघ भारत की 130 करोड़ की आबादी को हिंदू समाज मानता है: ‘भारत माता का सपूत चाहे वह कोई भी भाषा बोले, चाहे वह किसी भी क्षेत्र का को, किसी स्वरूप में पूजा करता हो या किसी भी तरह की पूजा में विश्वास नहीं करता हो, एक हिंदू है… ‘इस संबंध में, संघ के लिए भारत के सभी 130 करोड़ लोग हिंदू समाज है। उन्होंने आगे कहा: ‘एक प्रसिद्ध कहावत है विविधता में एकता। लेकिन हमारा देश उससे एक कदम आगे है। सिर्फ विविधता में एकता नहीं बल्कि एकता की विविधता। हम विविधता में एकता नहीं तलाश कर रहे हैं। हम ऐसी एकता तलाश कर रहे हैं जिसमें से विविधता आए और एकता हासिल करने के विविध रास्ते हैं। इस वक्तव्य में भागवत ने रवींद्रनाथ टैगोर के 1904 के प्रसिद्ध ‘स्वदेशी समाज नाम के निबंध को भी अपने कथन के समर्थन में उद्धृत करते हुए कहा, ‘हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच अंतर्निहित अंतर्विरोधों के बाद भी हिंदू समाज देश को एकजुट करने का रास्ता तलाशने में सक्षम है। यह भी कहा कि ‘भारत देश परंपरा से हिंदुत्ववादी है। हालांकि यह टैगोर के निबंध से उद्धरण पूरी तरह सच नहीं है क्योंकि टैगोर इस निबंध में जब हिंदू समाज की बात करते हैं तो वह सिर्फ हिंदू समाज की बात करते हैं न कि पूरे भारतीय समाज की।

इस बयान से कुछ महीने पहले सितंबर, 2019 को भागवत ने ही कहा था कि ‘किसी भी हिंदू को देश छोड़कर नहीं जाना पड़ेगा। यह बयान उन्होंने असम की एनआरसी की रिपोर्ट के प्रकाशित होने के संदर्भ में कही थी। सरसंघचालक के सितंबर वाले बयान से यह जाहिर है कि उनका यह आश्वासन सिर्फ हिंदुओं के लिए है और इसमें वे मुसलमान शामिल नहीं हैं जिनका एनआरसी में नाम नहीं है। हाल ही में भारतीय संसद के द्वारा पारित किए गए नागरिकता संशोधन अधिनियम में भी अप्रवासी मुस्लिमों को भारत की नागरिकता की संभावना से बाहर रखा गया है, जबकि पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगनिस्तान के छह अन्य धार्मिक समुदायों को यह अधिकार दिया गया है।

भागवत के इन दो बयानों से यह स्पष्ट हो जाता है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ‘हिंदू’ शब्द का प्रयोग दो अलग-अलग अर्थों में कर रहा है। इसमें कुछ नया नहीं है, बल्कि इस प्रकार के शब्दजाल और भ्रांतियां संघ-और आम तौर पर संघ परिवार के सभी घटक, जिसमें भाजपा भी शामिल है—दशकों से फैला रहा है। लूइस कैरोल के मशहूर चरित्र हम्प्टी-डम्पटी की तरह संघ भी शब्दों के अर्थों को अपने नियंत्रण में रखकर उनको अलग संदर्भों में अपनी जरूरत के हिसाब से अर्थ देना चाहता है, और वैसे भी उसका दो-मुंहे सांप वाला चरित्र जग जाहिर है। इसी प्रकार का शब्दार्थ का खेल संघ परिवार सेक्युलरिजम के अनुवाद के साथ भी कई दशकों से इस आग्रह के साथ खेलता आ रहा है कि सेक्युलरिजम का सही अनुवाद पंथ-निरपेक्ष होना चाहिए न कि धर्म-निरपेक्ष। इस आग्रह के पीछे तर्क यह दिया जाता है कि हिंदूइज्म एक पंथ नहीं बल्कि धर्म है। लेकिन इसके साथ ही वैधानिक तौर पर जिस धर्म या पंथ को हिंदू जाना जाता है उसका कुछ और नाम भी देने को तैयार नहीं हैं जैसे की वैदिक पंथ या ब्राह्मण पंथ।

लेकिन अगर यह सिर्फ किसी शब्दजाल या शब्दार्थ संबंधी कोई भ्रांति होती तो शायद मामला उतना गंभीर नहीं होता। ‘हिंदू’ शब्द के इस बहुआयामी प्रयोग की एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी है, जिसका संबंध सिर्फ आधुनिक भारतीय राष्ट्रवाद, हिंदू राष्ट्रवाद और हिंदुत्व से गहरा संबंध है बल्कि जो हिंदुत्व की ‘हिंदू’ शब्द की राजनीति के केंद्र में है। धर्म अध्ययन के प्रसिद्ध विद्वान अरविंद शर्मा ने अपने लेख ‘ऑन हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदूइज्म, एंड हिंदुत्व में ‘हिंदू’, ‘सिंधु’ और ‘इंडस’ शब्दों के इतिहास का विश्लेषण करते हुए दिखाया है कि इन शब्दों के सबसे प्राचीन उपयोग — जैसे की पारसी, यूनानी, और चीनी स्रोतों में —भौगोलिक या क्षेत्रीय अर्थ में हुए। इस प्रयोग में इन शब्दों का अर्थ सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्रों के निवासियों के लिए होता था। लेकिन चीनी स्रोतों के साथ ही इनका अर्थ इस क्षेत्र के निवासियों के धार्मिक विश्वासों के वर्णन के रूप में भी होना शुरू हो जाता है। यह एक नकारात्मक उपयोग था जिसके अंतर्गत ‘हिंदू’ सिंधु नदी के पूर्व के निवासियों के विभिन्न धार्मिक विश्वासों को दिया गया सामूहिक नाम था। इन्हीं दो अर्थों में हिंदू शब्द का प्रयोग 11वीं शताब्दी और उसके बाद के मुस्लिम, फारसी और अरबी स्रोतों में मिलता है। अल-बरूनी — जो महमूद गजनी के साथ भारत आया था —की किताब अल-हिंद में भी इस शब्द का प्रयोग इन्हीं दो अर्थों में होता है। अल-बरूनी इस विमर्श में एक और पहलू जोड़ता है जो बीसवीं शताब्दी तक प्रचलित है। एक तरफ तो वह बौद्धों और वैदिक ब्राह्मण धर्म के मानने वालों के बीच भेदों को स्वीकार करते हैं, दूसरी तरफ वह न सिर्फ इन दोनों समुदायों को, बल्कि हिंदुस्तान के उन तमाम समुदायों को जो मुस्लिम नहीं हैं, हिंदू नाम देते हैं। तत्कालीन हिंदुस्तान में विद्यमान तमाम धार्मिक मतों, संप्रदायों और विश्वासों और पूजा पद्धतियों के आंतरिक भेदों को स्वीकार करते हुए अल-बरूनी उनको एकता के सूत्र में इस आधार पर भी पिरोने की कोशिश करते हैं कि वे सब हिंदू हैं जो पुनर्जन्म में विश्वास रखते हैं।

दिल्ली सल्तनत और मुगल काल में भी धर्मों, मतों, विश्वासों और पूजा पद्धतियों की यह विविधता प्रचलित रहती है लेकिन इसके साथ ही इस काल में दो अन्य महत्त्वपूर्ण पहलू इसमें जुड़ते हैं। एक तो यह कि हिंदू शब्द का इस्तेमाल— जो पहले सिर्फ गैर-हिंदू करते थे — हिंदुओं के द्वारा, अपने आप को चिह्नित करने के लिए होने लगा; यानी उनकी अपनी पहचान की चेतना को इंगित करने लगा। हिंदू शब्द और अवधारणा के इतिहास के लिहाज से यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। दूसरी तरफ इस्लाम धर्म और मुसलमानों के संपर्क में आने से कुछ नई पूजा पद्धतियां, विश्वास और संप्रदाय – जो इस संपर्क और मिश्रण से पैदा हुए – इस विविधता में जुड़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर गैर-मुसलमानों द्वारा सूफी पीरों में विश्वास और मुसलमानों में जातियों का विकास। इसके साथ ही कुछ ऐसे समुदाय भी उभरे जिनको सीधे-सीधे हिंदू या मुसलमान के खाकों में बांटना आसान नहीं था और ऐसी तमाम मुश्किलें तब सामने आईं जब ब्रिटिश राज ने अपनी जनगणना में समुदायों को धार्मिक आधार पर स्पष्ट खानों में गिनना और वर्गीकृत करना शुरू किया। औपनिवेशिक काल से पहले हिंदू शब्द का इस्तेमाल ब्राह्मण या वैदिक धर्म के मानने वाले समुदाय अपने लिए करना शुरू करते हैं और कुछ हद तक हिंदू सांस्कृतिक आत्म-चेतना का विकास भी होता है, लेकिन वृहत्तर समाज को धार्मिक मतों, संप्रदायों, और पूजा पद्धतियों की विविधता और मिश्रण ही चरितार्थ करते रहे।

हिंदू शब्द के इतिहास में और हिंदू सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के इतिहास में औपनिवेशिक शासन ने निर्णायक भूमिका निभाई जिसके दूरगामी परिणाम निकले। इस दृष्टि से औपनिवेशिक काल में हुए कुछ परिवर्तन निर्णायक सिद्ध हुए। 19वीं शताब्दी में औपनिवेशिक शासन ने सभी धर्मों के कानूनों में संशोधन कर सभी धार्मिक समुदायों को अखिल भारतीय स्तर पर वर्गीकृत किया और उनको एक स्पष्ट कानूनी पहचान देने का काम किया। वहीं दूसरी तरफ औपनिवेशिक जनगणना ने धर्म और जाति के आधार पर गणना कर धार्मिक और जाति समुदायों को स्पष्ट प्रशासनिक पहचान दी जिसके भारतीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़े। जनगणना की इन विधियों में उन मिश्रित पहचानों के लिए कोई जगह नहीं थी जैसे की गुजरात का एक समुदाय जो ‘हिंदू-मोहम्मडन’ के नाम से जाना जाता था।7 विभिन्न जनगणनाओं के दौरान इस तरह के बहुत सारे उदाहरण औपनिवेशिक प्रशासकों के सामने आए। राजनीतिक विमर्श की दृष्टि से औपनिवेशिक जनगणनाओं का सबसे महत्त्वपूर्ण प्रभाव ‘बहुसंख्यक’ और ‘अल्पसंख्यक’ श्रेणियों का आविर्भाव था। 20वीं सदी के पहले दशक में मुस्लिम लीग के बनने के बाद इन श्रेणियों का सीधा संबंध राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जुड़ गया जिस पर मोरले-मिंटो संवैधानिक सुधारों ने अपनी मोहर लगाकर भारतीय राजनीति में हिंदू और मुस्लिम सांप्रदायिकता के आधुनिक राजनीतिक रूप को जन्म दिया।

प्रशासनिक और वैधानिक परिवर्तनों के साथ ही 19वीं सदी के शुरुआती दशकों से ही एक समानांतर विमर्श सभ्यता, संस्कृति और धर्म के सवालों पर केंद्रित था। इस विमर्श की पृष्ठभूमि में औपनिवेशिक शासन का वह आख्यान था जिसे ‘सिविलाइजिंग मिशन’ के नाम से जाना जाता है। इस आख्यान में भारत के सभी धर्मों —विशेष तौर पर हिंदू धर्म—को असभ्य बताया गया और हिंदू समाज के पिछड़ेपन के लिए धर्म को जिम्मेदार ठहराया। इसी काल में ईसाई मिशनरी इस आख्यान का इस्तेमाल ईसाई धर्म प्रचार के लिए और धर्म परिवर्तन के लिए भी कर रहे थे। प्रतिक्रिया स्वरूप 19वीं सदी के शुरुआती दशकों से ही मध्यवर्गीय और शिक्षित हिंदुओं में — विशेष तौर पर सवर्ण हिंदुओं में — दो धाराएं धर्म के सवाल पर उभरती हैं: एक सुधारवादी आंदोलन की धारा और दूसरी धर्म-सभाओं के रूप में जिसका जोर धर्म सुधार की बजाय धर्म बचाव पर रहा; हालांकि धर्म सभाएं भी पूरी तरह से समाज-सुधार की विरोधी नहीं थीं। इन धाराओं के आपसी विरोध के बावजूद दोनों धाराएं आधुनिक हिंदू धर्म का नेतृत्व करती हैं और विभिन्न रूपों में हिंदू आधुनिकता के जन्म और विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 19वीं सदी में इन धाराओं के नेतृत्व जहां एक तरफ राममोहन रॉय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, महादेव गोविंद रानाडे, स्वामी दयानंद सरस्वती जैसे दिग्गज समाज सुधारक थे, वहीं दूसरी तरफ बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय, भारतेंदु हरिश्चंद्र, बालगंगाधर तिलक सरीखे लेखक और राजनेता थे।

19वीं सदी के उत्तराद्र्ध में ये दोनों धाराएं सार्वजनिक विमर्श के केंद्र में थीं। यह कहना भी पूरी तरह से सही नहीं है की इन दोनों धाराओं में सिर्फ विरोध है क्योंकि एक ऐसा दायरा भी है जिसमें ये दोनों धाराएं काफी कुछ साझा करती हैं। जैसे कि दोनों धाराओं में एक तरफ ईसाई मिशिनरियों का विरोध साझा जमीन है, वहीं दूसरी तरफ हिंदू पुनरुत्थानवादी पुट दोनों में विद्यमान है। जिस विमर्श को हम हिंदू राष्ट्रवाद के नाम से जानते हैं उसमें इन दोनों धाराओं का योगदान है। बाद में हिंदू राष्ट्रवाद के विमर्श में स्वामी विवेकानंद और श्री अरबिंदो ने भी महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 19वीं सदी के इन्हीं विमर्शों ने ही पहली बार ‘हिंदुइज्म’ शब्द को भी अंग्रेजी में लोकप्रिय बनाया। कुछ इतिहासकार यह भी मानते हैं कि ‘हिंदुइज्म’ शब्द का पहला इस्तेमाल राजा राममोहन रॉय ने 1816 में किया था जिसके बाद मैक्सम्यूलर आदि संस्कृत के प्राच्यवादी विद्वानों ने इसका प्रयोग किया। 19वीं सदी में ‘हिंदुइज्म’— जिसका हिंदी अनुवाद हिंदू-धर्म ही होना चाहिए न कि हिंदुत्व, हालांकि हिंदुत्ववादी इस फर्क को मिटाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं – की अवधारणा का उदय और उसका इस्तेमाल ‘हिंदू’ और संबंधित शब्दों के इतिहास में और हिंदू सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के विकास में एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव है।

इस लेख की विषयवस्तु की दृष्टि से 19वीं सदी के विमर्शों का सबसे महत्त्वपूर्ण योगदान यह है कि इनमें हिंदू और ‘हिंदुइज्म’ का इस्तेमाल धर्म और क्षेत्रीय अर्थों के अलावा हिंदू सभ्यता और संस्कृति के तौर पर भी होने लगा। जैसा कि बंकिम और टैगोर दोनों ने लिखा है कि सभ्यता (सिविलाइजेशन) और संस्कृति (कल्चर) दोनों अवधारणाएं पश्चिम की देन हैं और दोनों का आधुनिक काल से पहले भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल नहीं होता और न ही उनके लिए शब्द थे। लेकिन इन दोनों अवधारणाओं का सफल अनुवाद हुआ और दोनों का हिंदू राष्ट्रवाद और भारतीय राष्ट्रवाद में महत्त्वपूर्ण योगदान है। बंकिम ने अपनी पुस्तक धर्मतत्व में हिंदू धर्म को अनुशीलन (कल्चर का संस्कृति से पहले का बांग्ला अनुवाद) का पर्याय बताया है। सब्यसाची भट्टाचार्य ने अपनी किताब टॉकिंग-बैक : द आइडिया ऑफ सिविलाइजेशन इन इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कॉर्स में इस अवधारणा का विस्तार से विवेचन कर दिखाया है कि सभ्यता की अवधारणा का इस्तेमाल सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रवादी चिंतकों ने भारतीय राष्ट्र के एकता का आधार के रूप में किया।

20वीं सदी के शुरू के दशकों से ही भारत की सभ्यता और संस्कृति को परिभाषित करना राष्ट्रवादी विमर्श में विवाद और संघर्ष का मुद्दा रहा है। इस विवाद में अनेक दृष्टिकोण और विचार-दृष्टियां समय-समय पर सामने आईं जिनको मुख्यत: दो भागों में बांटा जा सकता है: हिंदू राष्ट्रवादी और सेक्युलर राष्ट्रवादी दृष्टिकोण। हिंदू राष्ट्रवादी दृष्टिकोण हिंदू संस्कृति, हिंदू धर्म और हिंदू अस्मिता को केंद्र में रखकर भारतीय राष्ट्रवाद को परिभाषित करता है, जबकि सेक्युलर राष्ट्रवाद प्राचीन समय से विकसित भारत की साझी और मिश्रित संस्कृति को केंद्र में रखकर भारतीय अस्मिता और राष्ट्रवाद को परिभाषित करने की कोशिश करता है। यह वर्गीकरण विश्लेषण की दृष्टि से ही इतने स्पष्ट तौर पर भिन्न है और कुछ हद तक वास्तविक स्थिति का सरलीकरण भी है, क्योंकि पिछले सौ वर्षों की वास्तविक सांस्कृतिक राजनीति में ये दोनों विचारधाराएं मिश्रित तौर पर इस्तेमाल होती रही हैं। अगर सेक्युलर राष्ट्रवाद की इबारत के तौर पर जवाहरलाल नेहरू की भारत की खोज एक स्पष्ट और केंद्रीय इबारत रही है तो इतिहासकार यह भी दिखाते हैं कि 1930 से 1960 के दशकों में यूपी कांग्रेस के कई प्रतिष्ठित सेक्युलरवादी और समाजवादी नेताओं—जैसे कि डॉक्टर संपूर्णानंद, आचार्य नरेंद्र देव और पुरूषोत्तमदास टंडन – की राजनीति की भाषा में कई संदर्भों में हिंदू राष्ट्रवादी भाषा का मिश्रण दिखाई देता है।11 वैसे भी सेक्युलर राष्ट्रवाद की भाषा व्यापक जनता के मध्य न पहुंचकर इलीट वर्ग या सिविल सोसायटी की भाषा तक सिमट कर रह गई है। भारतीय सेक्युलरवाद और सेक्युलर राष्ट्रवाद के समकालीन संकट का एक बड़ा कारण यह भी है।

उधर दूसरी तरफ गत सौ वर्षों में हिंदू राष्ट्रवाद भी कोई एकांगी विचारधारा नहीं रही है। इसका सबसे उग्र रूप 1920 के दशक में ‘हिंदू-संगठन’ आंदोलन के रूप में सामने आता है। यह दशक असहयोग और खिलाफत आंदोलनों की असफलता, आर्य समाज के शुद्धि आंदोलन, और हिंदू-मुस्लिम दंगों के साथ शुरू होता है। इससे पहले के दशकों की तुलना में ‘हिंदू-संगठन’ आंदोलन की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसमें उपरोक्त हिंदू आधुनिकता की दोनों धाराएं, अपने आंतरिक विरोधों के बावजूद, एक राजनीतिक गठबंधन बनाने में सफल होती हैं। इसके साथ ही ईसाई मिशनरियों के साथ, बल्कि उनसे बड़े दुश्मन के रूप में, इस्लाम और मुस्लिम राजनीति बनाए जाते हैं। विमर्श के तौर पर इस उग्र हिंदू राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति इस दशक की दो महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में होती है: 1924 में प्रकाशित विनायक दामोदर सावरकर की हिंदुत्व : हू इज ए हिंदू? और दूसरी 1926 में प्रकाशित शुद्धि आंदोलन से जुड़े आर्य समाजी नेता स्वामी श्रद्धानंद की हिंदू संगठन।12 ये दोनों पुस्तकें भारतीय राष्ट्रवाद के केंद्र में हिंदू संस्कृति को तो केंद्र में रखती ही हैं इनमें जनसंख्या और भौगोलिकता पर नए सिरे से जोर दिया जाता है। इसके साथ ही इन दोनों पुस्तकों में हिंदू शब्द का प्रयोग एक नस्ल या जाति (रेस एंड नेशन) और संस्कृति के विशेषण के रूप में किया गया है जिसमें हिंदू जाति में उन सभी विश्वासों के लोग शामिल हैं जो मुस्लिम या ईसाई नहीं हैं। सावरकर इस दिशा में एक कदम आगे जाकर हिंदुत्व और हिंदुइज्म के बीच पारिभाषिक तौर पर फर्क करते हैं और जोर देकर हिंदुत्व के तीन आधारभूत तत्वों को रेखांकित करते हैं। ये तत्व हैं: एक राष्ट्र (नेशन), एक जाति (रेस), एक संस्कृति (सिविलाइजेशन)। सावरकर के अनुसार इनमें से पहले दो का संबंध पितृभूमि से है और तीसरे का संबंध पुण्यभूमि से है। गौर करें कि इनमें धर्म शामिल नहीं है। इसी प्रकार से हिंदू कौन है? प्रश्न का उत्तर देते हुए वह लिखते हैं: हिंदू वह है जो 1. भारतीय उपमहाद्वीप को अपनी पितृभूमि मानता है; 2. जिसके पूर्वज हिंदू हैं; 3.भारतवर्ष जिसकी पुण्यभूमि है।

यहां पर सावरकर एक पारिभाषिक रणनीति अपनाते हैं जिसके तहत धर्म और धार्मिक पहचान का रिश्ता कर दिया जाता है। यहां हिंदुइज्म हिंदू को परिभाषित नहीं करता है बल्कि पहले हिंदू कौन है यह परिभाषित किया जाता है उसके बाद सावरकर लिखते हैं कि हिंदुइज्म हिंदुओं के बीच पाए जाने वाले धार्मिक विश्वासों से अलग नहीं है। इस पारिभाषिक रणनीति के तहत वैदिक और अवैदिक तमाम धर्मों – जैसे वेद-पुराण सम्मत सनातन धर्म, बौद्ध धर्म, सिख धर्म, जैन धर्म, देवसमाजी, आर्यसमाजी इत्यादि — को तो हिंदुत्व में शामिल कर लेते हैं लेकिन इस्लाम और ईसाई धर्म को बाहर रखते हैं। यहां पर ऐसा प्रतीत होता है कि घूम-फिर कर सावरकर का विमर्श फिर से एक बार हिंदू शब्द की सदियों पुरानी परिभाषा पर लौट आता है, और सावरकर स्वयं इस शब्द का ऐतिहासिक अन्वेषण विस्तार से करते हैं। लेकिन यह सिर्फ आंशिक सच है। सावरकर के हिसाब से सिर्फ भौगोलिक कसौटी काफी नहीं है हिंदू की परिभाषा के लिए। इसमें वह एक ओर सांस्कृतिक मापदंड जोड़ते हैं और दूसरी तरफ पैतृक खून की कसौटी। गौरतलब है कि ये दोनों मापदंड आधुनिक राष्ट्रवाद की देन हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक एम. एस. गोलवलकर भी हिंदू और हिंदुत्व की परिभाषा में नस्ल (रेस), संस्कृति (जिसके अंतर्गत भारतीय मूल के धर्म आते हैं), और भौगोलिक अखंडता पर जोर देते हैं। गोलवलकर की अवधारणा में गैर-भारतीय मूल के सभी धार्मिक समुदायों को हिंदू समुदाय के अधीन और आश्रित का स्थान दिया गया है। स्वतंत्रता उपरांत जनसंघ और आरएसएस ने गैर-हिंदू धर्मों के राष्ट्रीयकरण और उनके हिंदू संस्कृति में स्वांगीकरण करने पर अधिक जोर दिया है।13 सावरकर और उसके बाद के हिंदुत्व के तमाम संस्करणों से एक बात स्पष्ट है कि हिंदुत्व की विचारधारा के ऐतिहासिक विकास के बावजूद इस विचारधारा का एक अपरिवर्तनीयतत्व है: बहुसंख्यक यानी हिंदू संस्कृति का अल्पसंख्यक समुदायों पर सांस्कृतिक प्रभुत्व स्थापित करना।

इस परिप्रेक्ष्य के साथ मोहन भागवत के भाषण पर एक बार फिर से गौर करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि भागवत संघ की मूल विचारधारा से हटकर कुछ नहीं कह रहे हैं और उनके भाषण का सार भी इसी प्रभुत्व के इरादे को अभिव्यक्त करता है। जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, इस तरह के शब्दों के खेल संघ और भाजपा के नेता और प्रवक्ता दशकों से खेल रहे हैं। सीधे-सीधे देखें तो उनकी यह बात अर्थहीन है कि भारत में सभी हिंदू हैं क्योंकि भारत का संविधान हिंदू शब्द को वैधानिक रूप में परिभाषित करता है जिसमें सभी भारतीय शामिल नहीं हैं। मजे की बात यह है संविधान में दी गई हिंदू की परिभाषा संघ की परिभाषा से बहुत अलग नहीं है, यानी कि नकारात्मक परिभाषा के आधार पर उन सभी धर्मों के मानने वालों को कानूनी तौर पर हिंदू परिभाषित किया गया है जो मुस्लिम, ईसाई, यहूदी या पारसी नहीं हैं।

मोहन भागवत के इस तरह के वक्तव्य संघ के लिए दुधारी तलवार के जैसे हैं। एक तरफ तो यह पहले से ही हाशिये पर जा चुकी साझी राष्ट्रीय विरासत और संस्कृति की विचारधारा पर हमले का काम करता है और वहीं दूसरी तरफ ऐसे वक्तव्य संविधान में – विशेष तौर पर मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में — शामिल अल्पसंख्यक समुदायों के सांस्कृतिक अधिकारों पर भविष्य में होने वाले हमलों के लिए वैचारिक जमीन भी तैयार करते हैं, जिनमें सबसे प्रमुख ‘समान नागरिक संहिताÓ को लागू करने का भाजपा और संघ का पुराना एजेंडा है। सेक्युलर और सेक्युलरवाद के समकालीन चिंतक तलाल असद ने इस बात विशेष जोर दिया है कि सेक्युलरवाद या धर्म-निरपेक्षता को सिर्फ राज्य और धर्म के बीच संबंधों के माध्यम से पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता। तलाल असद का तर्क है कि राज्य की एकता का आधार राष्ट्र में होता है और कोई भी राष्ट्र अपने आप को एकता के सूत्र में बांधे रखने के लिए और अपनी पहचान के लिए मूल्यों का एक स्रोत किसी विशिष्ट संस्कृति में ढूंढता है, और आम तौर पर वह संस्कृति बहुसंख्यक या प्रभुत्व वाले धार्मिक या सांस्कृतिक समुदाय की संस्कृति होती है। इस प्रकार कई सेक्युलर राज्य अपने बहुसंख्यकवादी (मेजोरिटेरीयन) रूप को छिपा सकने में सफल होते हैं। वैसे भी बहुसंख्यकवादी और सेक्युलर के बीच हर परिस्थिति में अंतर्विरोध हो ऐसा आवश्यक नहीं है। बहुसंख्यकवादी सांस्कृतिक वर्चस्व के इस खतरे से निजात पाने के लिए है आधुनिक संविधानों में अल्पसंखयक समुदायों के—धार्मिक, भाषाई, नस्ली और अन्य अल्पसंख्यक समुदाय—सांस्कृतिक अधिकारों की रक्षा के प्रावधान दिए गए हैं।

इस दृष्टि से भारतीय संविधान की विशेषता यह रही है इसमें व्यक्ति-केंद्रित अधिकारों से आगे बढ़कर 1940 के दशक में ही सामुदायिक अधिकारों (या समूहों के अधिकारों) की अवधारणा को विकसित करने के क्षेत्र में एक बड़ी पहल की गई है। जबकि दुनिया के कई अन्य देशों में बहुसंस्कृतिवाद के नाम पर ऐसे अधिकार आधी शताब्दी के बाद अधिकारों के विमर्श का हिस्सा बने। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा (और उससे पहले जनसंघ) को इन अधिकारों से शुरू से ही समस्या रही है जिसे वे अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकारों के रूप में देखते हैं। दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दायरे में भी संघ चाहता है की भारत की सांस्कृतिक पहचान एक हिंदू देश के रूप में हो। इसलिए जब आडवाणी ने जिन्ना को सेक्युलर कहा तो उनकी समझ इसी प्रकार की व्यवस्था की रही होगी जो सांस्कृतिक तौर पर मेजोरिटेरीयन है लेकिन सभी व्यक्तियों के (समुदायों के नहीं) समान अधिकार—जिसमें धर्म के स्वतंत्र पालन का अधिकार भी शामिल है। ऐसी समझ की दृष्टि में अल्पसंख्यक समुदायों के सांस्कृतिक अधिकारों के प्रावधानों वाले संविंधान ‘स्यूडो सेक्युलर’ हैं!

संघ की बहुसंख्यकवादी सांस्कृतिक वर्चस्व की राजनीति का दूसरा बड़ा हथियार नागरिकता संबंधी संवैधानिक प्रावधानों में संशोधन है। इस दृष्टि से हाल ही में पारित हुआ 2019 का नागरिकता संशोधन अधिनियम सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। इस अधिनियम से पहले भी 1986 और 2003 में संशोधन अधिनियमों के द्वारा नागरिकता संबंधी संवैधानिक प्रावधानों में बड़े बदलाव किए जा चुके हैं। इन संशोधनों के परिणामस्वरूप 1955 के नागरिकता अधिनियम के सैद्धांतिक आधार में मूलभूत बदलाव हुआ है। भारत के मौलिक संविधान, और 1955 के नागरिकता अधिनियम में भारत की नागरिकता का आधार जन्म और रक्त-संबंध या वंशाधिकार दोनों ही थे। लेकिन 1986 और 2003 के संशोधनों के द्वारा इस संतुलन को बदला गया जिसके परिणामस्वरूप नागरिकता प्रावधानों का अधिक झुकाव रक्त-संबंध या वंशाधिकार की तरफ हुआ। अस्सी के दशक से ही—विशेषकर असम आंदोलन की पृष्ठभूमि में, जिसका प्रमुख मुद्दा 1971 के युद्ध के बाद बांग्लादेश से आए प्रवासी थे—भारत में नागरिकता संबंधी संवैधानिक प्रावधानों में नागरिकता के आवेदक के जन्म के साथ उसके माता या पिता में से किसी एक का भारतीय नागरिक होना एक अनिवार्य शर्त बना दिया गया है। नागरिकता के प्रावधान में पिछले कुछ दशकों से हो रहे इन बदलावों के पीछे गैर-कानूनी विदेशी प्रवासियों का डर है।

लेकिन 2019 के नागरिकता संशोधन अधिनियम से पहले नागरिकता संबंधी कानूनों में धार्मिक आधार पर भेद-भाव का कोई प्रावधान नहीं था। सर्वविदित है कि 2019 के संशोधन अधिनियम के तहत 31 दिसंबर, 2014 से पहले पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के लोगों को नागरिकता देने का प्रावधान है लेकिन मुसलमानों को इस अधिकार से वंचित किया गया है। यह कानून भेदभावपूर्ण तो है ही, संविधान की मूल संरचना का भी उल्लंघन करता है। लेकिन इसके साथ ही यह कानून भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की दिशा में संघ का एक सोचा-समझा कदम है। इस कानून को संघ और भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे का हिस्सा समझना चाहिए जिसके तहत वे भारत को हिंदुओं का ‘प्राकृतिक घर’ (‘नेचुलर होम) सिद्ध करना चाहते हैं। और यह मुद्दा पूरी तरह से सावरकर और गोलवलकर की हिंदुत्व की अवधारणा को ही आगे बढ़ाता है। इस कानून के पीछे संघ का वह मंसूबा साफ नजर आता है जिसमें भारत की नागरिकता और भारतीय राष्ट्रवाद को इजराइल के राष्ट्रवाद की तर्ज पर बदलना चाहते हैं।

 

मोहिंदर सिंह जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन संस्थान में पढ़ाते हैं.

 

संदर्भ:

 

  1. https://www.youtube.com/watch?v=d1I1wlXoI-w
  2. रवींद्रनाथ टैगोर ‘स्वदेशी समाजÓ, रवींद्रनाथ के निबंध (संकलन और अनुवाद विश्वनाथ नरवणे), साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली, 1964.
  3. https://khabar.ndtv.com/news/india/rss-chief-mohan-bhagwat-gave-a-big-statement-said-to-a-single-hindu-wv®zyy®
  4. अरविंद शर्मा, ऑन हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदूइज्म, एंड हिंदुत्व, Numen, Vol. y~, v (w®®w), pp. v-x{
  5. अरविंद शर्मा, ऑन हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदूइज़्म, एंड हिंदुत्व
  6. अरविंद शर्मा, ऑन हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदूइज़्म, एंड हिंदुत्व
  7. डरमट किलिंगले, माडर्नटी, रेफॉर्म, रिवाइवल, गैविन फ्लड (संकलित) ब्लैकवेल कम्पेनियन टू हिंदूइज्म, ब्लैकवेल, 2003.
  8. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, धर्मतत्त्व, (अंग्रेजी अनुवाद अप्रतिम रे), ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2003; रवींद्रनाथ टैगोर, सेलेक्टेड एसेज, रूपा एंड कंपनी, नई दिल्ली, 2008.
  9. सब्यसाची भट्टाचार्य, टॉकिंग बैक : द आइडिया ऑफ सिविलाइजेशन इन इंडियन नेशनलिस्ट डिस्कॉर्स, आक्स्फॉर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, नई दिल्ली, 2011.
  10. विलियम गूल्ड, हिंदू नेशनलिज्म एंड द लैंगवेज ऑफ पॉलिटिक्स इन लेट कोलोनीयल इंडिया, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस, कैंब्रिज, 2004.
  11. विनायक दामोदर सावरकर, हिंदुत्व : हू इज ए हिंदू? हिंदी साहित्य सदन, 2018; स्वामी श्रद्धानंद, हिंदू-संगठन : क्यों और कैसे, विजय पुस्तक भंडार, दिल्ली, 2000.
  12. अरविंद शर्मा, ऑन हिंदू, हिंदुस्तान, हिंदूइज्म, एंड हिंदुत्व
  13. तलाल असद, ट्राइंग टू अंडरस्टैंड फ्रैंच सेक्युलरिजम, हेंट डि वरीज और लारेंस सुल्लीवान, पॉलिटिकल थीओलोजीस : पब्लिक रिलिजंस इन पोस्ट-सेक्युलर वल्र्ड, फोर्डहम यूनिवर्सिटी प्रेस, न्यूयॉर्क, 2006.

Be the first to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published.


*