कोरोना वायरसः बीमारी का सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

रंजोत

 

दुनिया के सामने स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना वायरस से पहले की दुनिया, कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में , बहुत फर्क चुका है। कोरोना का डर दिखा कर जिस तरह से पूरी दुनिया में तानाशाही की रिहर्सल हो रही है यह लंबे समय तक इस तरह नहीं टिक पाएगी। कोरोना के नाम पर साम्राज्यवाद अपना आर्थिक संकट टाल नहीं पाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार चीन में पहला नोवेल कोरोना (कोविड-19) केस आठ दिसंबर, 2019 को हुबेई प्रांत के वुहान शहर में दर्ज किया गया। लेकिन चीन के एक जानेमाने दैनिक के अनुसार देश में पहला मामला (पेशेंट जीरो) 17 नवंबर को सामने आया था। दिसंबर से पहले वुहान के जीनयीनतान अस्पताल में कुछ रोगियों के इलाज के दौरान इस संक्रमण का पता लगा था। इस बात की पुष्टि चिकित्सा विज्ञान की पत्रिका लासेंट 1 ने भी की है। लेकिन चीन और अमेरिका दोनों ही एक दूसरे पर कोरोना वायरस (विषाणु) को इजाद करने का आरोप लगाते रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे ‘वुहान वायरस’ या ‘चीनी वायरस’ कह रहे हैं, वहीं चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने बयान जारी किया था कि अमेरिकी सेना द्वारा वुहान में वायरस लाया गया है।

अब कोरोना किसने फैलाया और किसने इजाद किया और क्यों किया या यह प्राकृतिक रूप से मौजूद था या कृत्रिम रूप से तैयार किया गया, और क्या यह जैविक हथियार के रूप में पैदा किया गया, इस पर इतना जल्दी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। इसके बारे में दुनिया के सामने सच्चाई आने में बहुत लंबा समय लगेगा और बहुत बार ऐसी सच्चाई कभी सामने आती ही नहीं है। इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि साम्राज्यवाद अपने मुनाफे के लिए ऐसा कर सकता है। इसके साक्ष्य इतिहास में दर्ज हैं और अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए, राजनीतिक रूप से अपनी सत्ता को स्थिर बनाए रखने के लिए मरणासन्न पूंजीवाद किसी भी हद तक जा सकता है।

दुनिया के सामने यह स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना वायरस से पहले की दुनिया और कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में बहुत फर्क आ चुका है। कोरोना का डर दिखा कर जिस तरह से पूरी दुनिया में तानाशाही की रिहर्सल हो रही है यह लंबे समय तक इस तरह नहीं टिक पाएगी। कोरोना के नाम पर साम्राज्यवाद अपना आर्थिक संकट नहीं टाल पाएगा। अवश्य ही कोरोना के बाद दुनिया अभूतपूर्व महामंदी का सामना करेगी और महामंदी या तो फासीवाद पैदा करेगी या फिर क्रांतियां।

इस लेख में कोरोना के कालक्रम को समझने की कोशिश करेंगे और मजदूर वर्ग या उसकी मुक्ति के लिए कार्यरत संगठनों, पार्टियों, कार्यकर्ताओं की क्या जिम्मेदारियां बनती हैं, इस पर चर्चा करेंगे। क्योंकि विडंबना यह है कि क्रांतिकारी होने का दंभ भरने वाले लोग भी ‘स्टे होम’ (घर में रहें) का नारा लगा रहे हैं और यह भूल रहे हैं कि जनता की सेवा करते हुए जो मौत आती है वह हिमालय से भी भारी और कायरों की तरह दुबक कर जो मौत आती है वह पंख से भी हल्की होती है।

 

कोरोना वायरस क्या है?

विज्ञान की भाषा में नोवेल कोरोना विषाणुओं (वायरसों) का एक समूह है जो स्तनधारी (मैमल्स) प्राणियों और पक्षियों में पाया जाता है। इस विषाणु के कारण श्वास तंत्र (रेस्पेरेटरी सिस्टम) में संक्रमण (इंफेक्शन) पैदा हो सकता है जिसमें हल्की सर्दी-जुकाम से लेकर मौत तक हो जाती है। यह उन लोगों को अधिक निशाना बनाता है जिनमें पहले से ही फेफड़े संबंधी रोग होते हैं या किडनी या दिल की बिमारियां होती हैं। अभी तक के शोधों के मुताबिक मरने वालों में अधिक संख्या 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों की होती है।

चीन के वुहान शहर के डॉक्टर जब दिसंबर 2019 में कुछ मरीजों का इलाज कर रहे थे तब उनको यह नया वायरस समझ में आया। कोरोना वायरस पहले भी होता था लेकिन यह उससे भिन्न था, इसलिए इसका नाम नोवेल  (नया) कोरोना वायरस या कोविड-एन19 पड़ा। लैटिन भाषा में ‘कोरोना’ का मतलब ‘क्राउन’ यानी ताज होता है और इस वायरस की आकृति ताज पर उगे कांटों जैसी थी इसलिए इसको कोरोना कहा गया। किसी भी तरह के विषाणुओं से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) ही काम आती है। इसलिए इस वायरस का इलाज रोग के लक्षणों के आधार पर किया जाता है, ताकि रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत रहे। इसके अलावा विषाणुजनित रोग जैसे स्वाइन फ्लू, सार्स-दो, इंफ्लुएंजा, एचआईवी और मलेरिया रोग में दी जाने वाली दवाएं भी इस विषाणु के मरीजों पर असरकारी

रही हैं। सबसे बड़ा खौफ इस बात का फैलाया जा रहा है कि इसकी कोई दवाई नहीं है। यह बात आधी सच है। क्योंकि दुनिया में अब तक (इस लेख के प्रकाशित होने तक) इस विषाणु से 185 देशों में 18 लाख 28 हजार से ज्यादा लोग ग्रसित हुए हैं जिसमें से चार लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं और एक लाख 13 हजार से ज्यादा की मौत हुई है। भारत में 9191 लोग इसके शिकार हैं, वहीं 600 से ज्यादा लोग ठीक हुए हैं और 326  की मृत्यु हुई है। अगर दवा नहीं होती तो इतने लोग ठीक नहीं होते। इस बीमारी में कई दवाएं काम कर रही हैं। पर यह बात भी ठीक है कि इसका वैक्सिन (टीका) नहीं है। लेकिन प्रचार इस तरह से किया जा रहा है कि इसकी दवा नहीं है।

 

दवा और टीके (वैक्सिन) का अंतर ?

बड़े पैमाने पर वैक्सिन का इस्तेमाल 16वीं सदी के दौरान चीन में दिखाई देता है। इसके बाद 1796 में ब्रिटिश डॉक्टर एडवर्ड जेनेर ने छोटी माता का टीका तैयार किया था जो सर्वाधिक प्रचलित हुआ। शरीर के अंदर रोग प्रतिरक्षा प्रणाली होती है। अगर हमारे शरीर में कोई हानिकारिक विषाणु या किटाणु (बेक्टरिया) प्रवेश कर जाता है तो शरीर अपने आप उसके विरुद्ध रोग प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न कर लेता है और हानिकारक विषाणु या किटाणु को नष्ट कर देता है। लेकिन शरीर को नए विषाणु या जीवाणु के विरोध में अपने अंदर प्रतिरोध क्षमता विकसित करने में कई दिन लग जाते हैं, अगर रोगी की उस दौरान मृत्यु न हो तो प्रतिरक्षा प्रणाली और विकसित हो जाती है। यह निर्भर करता है रोगी की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली यानी उसके ‘इम्यून सिस्टम’ पर। इसलिए कोई भी दवाई किसी बीमारी का इलाज नहीं करती बल्कि वह शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने, बनाए रखने में शरीर की मदद करती है। रोग को शरीर अपने आप नष्ट करता है। इसके विपरित टीके का मुख्य कार्य रोग पैदा होने से पहले ही वैक्सिन देकर उसको खत्म कर देना होता है। टीके का निर्माण इस आधार पर किया गया था कि बहुत सारे रोग ऐसे होते हैं जो एक बार होकर फिर बहुत समय बाद होते हैं, जैसे कुछ रोग बचपन में हो जाएं तो वे आगे चल कर जवानी में नहीं होते हैं। वैज्ञानिकों ने खोज लिया कि यह शरीर के अंदर विषाणु या किटाणुओं के खिलाफ पैदा हुई रोग प्रतिरोध क्षमता का नतीजा है और इस आधार पर पहले ही शरीर के अंदर वे मृत विषाणु, कीटाणु प्रवेश करवा दिए जाते हैं जिससे वह रोग पैदा ही न हो।

दवाई का कार्य तात्कालिक होता है, मुख्य रूप से शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती देने के लिए बाहर से दिए जाने वाले सहारा के रूप में है। इसके विपरीत वैक्सिन लंबी अवधि तक कार्य करती है, बीमारी होने ही नहीं देती। इसलिए हमें दवा और वैक्सिन का अर्थ पता होना चाहिए। दवा लक्षणों के आधार पर मरीज का इलाज करती है और दवा से भी कोरोना का मरीज बच सकता है। यह जरूरी नहीं है कि जब वैक्सिन आएगी तभी रोगी का इलाज होगा। बिना वैक्सिन के भी कोरोना के मरीज ठीक हो रहे हैं। कोरोना के मरीज दवा या उनकी खुद की रोग प्रतिरोध क्षमता, पौष्टिक आहार, अंडा, दूध, पनीर आदि के बल पर ठीक हो रहे हैं। साठ के पार जिन रोगियों की रोग प्रतिरोध क्षमता कमजोर होती है, जिनमें पहले से कोई लंबी बीमारी होती है वे इसका शिकार आसानी से हो रहे हैं।

चेचक की रोकथाम के लिए बचपन में ही चेचक की वैक्सिन लगा दी जाती है। इस वैक्सिन के अंदर चेचक के मरे हुए विषाणु होते हैं। उसे बच्चे के शरीर में टीके के तौर पर प्रवेश करवा दिया जाता है। शरीर में जब चेचक के मरे हुए कीटाणु पहुंचते हैं तो शरीर कुछ दिनों में उनके खिलाफ रोग प्रतिरोध क्षमता विकसित कर लेता है। वह उन कीटाणुओं के असर को समाप्त कर देता है। अगर जिंदा कीटाणु प्रवेश करवाए जाएं तो व्यक्ति रोगी हो जाता है फिर रोगी के शरीर को उनके खिलाफ लड़ने के लिए रोग प्रतिरोध क्षमता विकसित करने में अधिक समय लग जाता है। अगर वैक्सिन के रूप में दे दी जाए तो शरीर यह क्षमता पहले ही विकसित कर लेता है। वैक्सिन नाक के जरिए बूंद के रूप में या टीके के रूप में शरीर में प्रवेश करवाई जाती है।

 

कोरोना साम्राज्यवाद को उसकी महामंदी से नहीं निकाल पाएगा

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (डीइएसए)2 द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोविड-19 के विस्तार ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नुकसान पहुंचाया है। सौ देश अपनी सीमाएं बंद कर चुके हैं। लोगों की आवाजाही और पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था 2020 में 0.9 प्रतिशत पर सिमट सकती है। फिलहाल दुनिया की विकास दर 2.5 प्रतिशत है। यह 2009 की वैश्विक मंदी से भी खतरनाक स्थिती होगी जब दुनिया की विकास दर 1.7 प्रतिशत पर सिमट गई थी। रिपोर्ट का कहना है कि – इन देशों के लाखों मजदूरों के अंदर अपनी नौकरी खोने का डर देखा जा रहा है। सरकारें अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए बड़े प्रोत्साहन तरीकों पर विचार कर रही हैं और सहायता के ये कार्यक्रम (रोलआउट पैकेज) वैश्विक अर्थव्यस्था को संभावित गहरी मंदी में डूबो सकते हैं।

दुनियाभर के साम्राज्यवादी देश, खासकर अमेरिका 2008 के बाद से ही लगातार आर्थिक मंदी से घिरा हुआ है। चीनी सामाजिक साम्राज्यवाद अफ्रीका, एशिया के छोटे-छोटे देशों की अथाह प्राकृतिक संपदा का दोहन कर और अपने देश की सस्ती श्रम शक्ति को निचोड़ कर उभर कर सामने आ रहा है। योरोपीय संघ टूट रहा है और उनके अंतरविरोध भी तेज हो रहे हैं। खास बात यह देखने को मिल रही है कि दुनिया के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए आपा-धापी मची हुई है। अमेरिका ने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लैटिन अमेरिका आदि देशों को नर्क बना दिया है। चीन अफ्रीकी देशों को अपने कर्ज और सहायता के जाल में फंसा रहा है। अमेरिका और चीन के बीच लगातार स्थिति व्यापार युद्ध जारी है। इसका मुख्य मकसद दुनिया के बाजारों पर अपनी-अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है।

दुनिया की आर्थिक मंदी के चलते लगातार नौकरियों में कटौती होती जा रही है। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल रही है। सरकारें नए-नए टैक्स लगा रही हैं और नागरिक सुविधाओं में कटौती कर रही हैं। अमेरिका, चीन जैसे देश अपनी मंदी से उबरने के लिए नए-नए बाजार तलाश रहे हैं जिसके चलते विकासशील देशों में तीव्र आर्थिक संकट पैदा हो रहा है। भारत के सार्वजनिक उद्योग धंधे बुरी तरह से तबाह हुए हैं। बैंकिंग सेक्टर जिस तरह से डूब रहा है इसका असर अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ने वाला है। पिछले साल बैंकों का बट्टाखाता यानी

डूबा हुआ पैसा (एनपीए या नान परफार्मिंग एसेट्टस) रु 8,06,412 करोड़ था जिसमें लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इतना ही नहीं, बैंकों की संख्या विलय के बाद चार रह गई है। इसका मतलब है कि ये सभी मिलाए गए  बैंक डूब चुके थे। सरकार लीपापोती कर उनको बनाए रखे हुए है।

इस सबका बड़ा कारण यह है कि देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों और पूंजीपतियों ने बैंकों से जो उधार लिया है उसको चुकता नहीं कर रहे हैं। देश में बढ़ी बेरोजगारी और कृषि में जारी संकट के चलते मांग नहीं बढ़ रही है और कंपनियां लगातार अपना उत्पादन घटा रही हैं। उत्पादन घटने से मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। बेरोजगार मजदूर, किसान, नौजवान क्या करेंगे। यह सरकार को भी पता है और उनके आकाओं को भी है। देश के कृषि, विनिर्माण क्षेत्र, यातायात, रियल इस्टेट, मोटर-गाड़ी उद्योग, बैंकिंग क्षेत्र आदि लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।

 

बढ़ता असंतोष

पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के चलते लगातार मजदूर, किसान, नौजवान और छात्र अपने-अपने देशों की सरकारों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। पिछले साल से यह सिलसिला लगातार जारी रहा। सबसे ज्यादा खतरे की घंटी चीन के लिए तब बजी जब हांगकांग में लोग अपनी स्वायत्तता को लेकर प्रदर्शन पर प्रदर्शन कर रहे थे। उनको रोकने में चीन की साम्राज्यवादी सरकार नाकाम हो रही थी। इसी तरफ फ्रांस, अल्जीरिया, लैटिन अमेरिका, सीरिया, ईरान, इराक, तुर्की हर जगह लोग अपने देशों की सरकारों के खिलाफ लड़े। भारत में दशकों बाद राष्ट्रव्यापी आंदोलन देखा गया। एनपीआर, एनआरसी और सीएए जैसे कानूनों के खिलाफ पूरा देश एकजुट होकर सरकार के खिलाफ विद्रोह कर उठा था। इस विद्रोह को कुचलने के लिए दक्षिणपंथी सरकार द्वारा किया गया दमन, छात्रों पर किए गए हमले और मुस्लिम बस्तियों पर किए गए हमले भी काम नहीं आए। लोग रुक नहीं रहे थे। अमेरिका में भी लगातार ट्रंप की लोकप्रियता घट रही थी। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ समझौता नहीं हो पा रहा था, नतीजतन वह अपने सैनिकों को नहीं निकाल पा रहा था। वहीं चीन के साथ ट्रंप द्वारा छेड़ा गया व्यापार युद्ध अमेरिका के लिए घाटे का सौदा साबित होता जा रहा था। व्यापार युद्ध के चलते चीन की अर्थव्यवस्था पिछले तीस सालों में सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। वहां की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर महज 6.1 प्रतिशत रह गई है। ऑक्सफोर्ड इकनॉमिक्स  के मुख्य अर्थशास्त्री लाउस कूजिस कहते हैं कि 2019 में अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के चलते चीन की विकास दर उल्लेखनीय रूप से प्रभावित हुई है, उसका निर्यात घट गया है और  कमजोर भी हो रहा है। साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में निवेश घटा है।3

 

कोरोना के बाद की दुनिया

यह कोरोना से पहले का घटनाक्रम है। दुनिया भर में की सरकारें अपनी जनता से डरी हुई थीं। उन की लोकप्रियता गिरती जा रही थी। खासकर चीन, भारत, अमेरिका आदि देश लोगों की आकाक्षाओं को दबाने के लिए फासीवादी हथकंडे अपना रहे थे। कोरोना ने काले कानूनों को लागू और लोकतांत्रिक मूल्यों को समाप्त करके  सरकार के विरोध में कुछ भी बोलनेवालों को कुचलने के रास्ते खुल गए हैं। एक तरह से देखा जाए तो कोरोना फासीवाद को मजबूत करने के लिए साम्राज्यवादियों और देश के शासक वर्गों के हाथ में एक मजबूत हथियार बनकर सामने आ रहा है।

बीबीसी संवादाता रेहान फजल ने अपनी रिपोर्ट4 में जिक्र किया है कि इसके बाद शायद कुछ देश उतने लोकतांत्रिक नहीं रहेंगे जितने वे मार्च 2020 से पहले हुआ करते थे।  उनका इशारा इस बात की तरफ है कि दुनिया भर की सरकारें जिस तरह से अंधाधुंध घोषणाएं कर रही हैं, प्रतिबंध लगा रही हैं, पुलिस और फौज को खुली छूट दे रही हैं, पुलिस-फौज बेकसूर लोगों को मार-पीट रही है, एक तरह से नागरिक प्रशासन की जगह पुलिस और फौज ने ले ली है। शायद यह आने वाले समय में स्थाई हो जाए। लोगों को इस बात का एहसास करवाया जा रहा है कि यह सब आपकी सुरक्षा के लिए जरूरी है।

 

भारत में मुंह मांगी मुराद

भारत में जब प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन और कर्फ्यू की घोषणा की गई तो ऐसा लग रहा था जैसे देश की सरकार की मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई हो। जिस राजनीतिक आक्रोश को, संघर्ष को वह कुचल नहीं पा रही थी, देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की नई रीत से जैसी वह डरी हुई थी, उसको कोरोना के संकट ने एक झटके में बदल दिया। पैदल घरों की तरफ लौट रहे मजदूरों को दवा, पानी, राशन देने की बजाए उन पर पुलिस को खुले सांडों की तरह छोड़ दिया गया जैसे कि मजदूर ही इस बीमारी का मुख्य कारण हों। इसके बाद तबलीगी जमात के तौर पर शासक वर्गीय सत्ताधारी पार्टी को अपना मनपसंद दुश्मन भी मिल ही गया।

ऐसा लगता है जैसे नाक के नीचे दिल्ली में जमावड़ा बनाए रखना और कर्फ्यू के चरम पर उनका दिल्ली से निकल कर पूरे देश में फैलाना, किसी साजिश का हिस्सा रहा हो। इसके बाद दक्षिणपंथी पार्टी द्वारा उनको मुख्य दुश्मन के तौर पर प्रचारित करना, पूरे सोशल मिडिया पर छाया रहा। बीबीसी अपनी रिपोर्ट में कहती है मानवाधिकारों पर पाबंदी से लोकतंत्र कमजोर हुए हैं।“कोरोना वायरस के आने से कहीं पहले दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र की जड़ें कम हो रही थीं। प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए काम करने वाली संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ की बात मानी जाए तो पिछले साल 64 देशों में लोकतांत्रिक मूल्य पहले की तुलना में कम हुए हैं। ‘‘ जब दुनिया के बहुत से देश इस महामारी से निपटने के लिए असाधारण कदम उठा रहे हैं, तानाशाह और प्रजातांत्रिक-दोनों तरह के देशों में मानवाधिकारों को बड़े स्तर पर संकुचित किया जा रहा है। व्यापार को बंद करना, सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग)को लागू करने पर जोर देना, लोगों को सड़क से दूर रखने और उनके जमा होने पर रोक और कर्फ्यू लगाने जैसे कदम इस बीमारी को रोकने के लिए बेशक जरूरी कदम हैं लेकिन इस बात के भी गंभीर खतरे हैं कि इससे तानाशाही की नई लहर को भी बढ़ावा मिल सकता है।”

ये आशंकाएं नजरंदाज नहीं की जा सकतीं। खासकर भारत में जहां सत्ताधारी पार्टी के सांसद खुल कर घोषणा करते हैं कि 2025 के बाद चुनावों की जरूरत नहीं होगी। सोशल मीडिया पर यह संदेश भी प्रचारित हो रहे हैं कि देश के प्रधानमंत्री का विरोध करना देश का विरोध करना है, या देशद्रोह है। एक संदेश फैल रहा है कि जिस प्रकार चीन और उत्तर कोरिया जैसे देशों में आजीवन प्रधानमंत्री होते हैं, भारत में भी ऐसा ही होना चाहिए। प्रधानमंत्री की गैर वैज्ञानिक नौटंकी को एक तबके का पूरा समर्थन मिल रहा है। यानी भारतीय फासीवाद अपने साथ एक तबके को लगाने में कामयाब होता जा रहा है। सोशल मीडिया और जमीनी स्तर पर ऐसी फौज तैयार हो रही है जो कि सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ कुछ नहीं सुनना चाहती। जिन राज्यों में सत्ताधारी पार्टी की सरकारें हैं वहां पर खासतौर से आपतकालीन कानूनों को अपनी पकड़ मजबूत करने, अपने मनपसंदीदा दुश्मन को निशाना बनाने, लोकतांत्रिक, क्रांतिकारी संघर्षों को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

 

गुनाह पासपोर्ट का था, दरबदर राशनकार्ड हो गए

कोरोना को देश में लाने के लिए मुख्य रूप से वह तबका जिम्मेदार है जो विदेशों में अपने ऐशो-आराम, कारोबार तथा काम-धंधों के लिए आना-जाना करता है। सबसे पहले देश में कोरोना का मरीज जो पाया गया वह केरल में था। वह विदेश से आई युवती थी। गायिका अभिनेत्री कनिका कपूर ने भी इस मामले में खूब वाही-वाही लूटी।

इसके बाद विदेश से लौटकर आने वालों की बाकी भीड़ ने इस भारी तबाही को जन्म दिया। लेकिन इसका सबसे अधिक खामियाजा मजदूर तबके को भुगतना पड़ रहा है। यह वही मजदूर तबका है जो कि केरल से लेकर कन्याकुमारी तक, रेगिस्तान से लेकर समुद्र तट तक, हड्डियां जमा देने वाली रोहतांग, लेह-लद्दाख की बर्फ तक की परवाह न करते हुए बड़ी ढांचा निर्माण परियोजनाओं से लेकर फैक्ट्रियों तक में कार्य कर रहा है। इसने आठ-आठ लेन की सड़कें बनाई हैं, पहाड़ों का सीना चीर रेल लाइने बिछाई हैं, सूरंगें खोदी हैं, गगनचूंबी इमारतें बनाई हैं। यह वही वर्ग है जो देश की अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करता है। लेकिन इस गरीब लाचार मजदूर तबके के खिलाफ शासक वर्ग के साथ मिलकर मध्य व उच्च मध्य वर्ग के बड़े हिस्से और गोदी मीडिया ने जो आरोप लगाया, उनको दोषी ठहराया, उनको गालियां दीं, वह देश के इतिहास में काले धब्बे के तौर पर अंकित रहेगा। सारा दोष उस गरीब तबके पर मढ़ा जा रहा है जो इस रोग से बहुत दूर था। जो दो वक्त की रोटी के लिए पूरे देश में दरबदर ठोकर खाने पर मजबूर है। हजारों-लाखों लोग देश में सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर, चोरों की तरह छिपकर अपने घरों को जाने के लिए मजबूर हुए।

बीमारी चाहे विदेशों से आई हो और देश के उच्च-मध्यवर्ग, शासक जमातों के जरिए आई हो, लेकिन भविष्य में भी इसका शिकार सबसे अधिक देश का गरीब मजदूर, किसान वर्ग ही होने जा रहा है। क्योंकि अमीरों के लिए एक से एक अस्पताल हैं, स्वास्थ्य सुविधाएं हैं, वह अपने बंगलों में क्वॉरेंटाइन नियमों का आनंद उठा सकते हैं। पर क्या मजदूर और निम्नवर्ग के लिए यह अय्याशी संभव है? एक सरकारी अधिकारी के अनुसार गांव में लोग अपने घरों में क्वॉरेंटाइन नहीं रह सकते, सभी घरों में एक ही स्नानघर और शौचालय होता है, यहां तक की कभी-कभी पूरा परिवार एक ही तौलिए और साबुन का इस्तेमाल करता है। सवाल है, ऐसे मरीजों को गांव में कैसे रखा जाए?

बात जायज है और पूरे देश की ग्रामीण आबादी के लिए सटीक है। कोरोना वायरस सर्वाधिक निशाना उन लोगों को बनाता है जिनका ‘इम्यून सिस्टम’ या फिर रोग प्रतिरोध प्रणाली कमजोर होती है। जाहिर सी बात है कि जिस देश की 37.2 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा से नीचे जीती हो उस देश के लोगों का इम्यून सिस्टम कैसे मजबूत हो सकता है। इसलिए कोरोना का सबसे बड़ा कहर इसी वर्ग होगा।

एक और मसला यह है कि लाकडाउन के बाद जिस तरह से भारी संख्या में असंगठित क्षेत्र के मजदूर अपने गांवों को वापस गए हैं उसके कारण वहां की अर्थव्यवस्था इनके बोझ को नहीं उठा पाएगी। अगर गांव में काम होता तो उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों के लाखों-करोड़ों लोग अपना घर-बार छोड़कर शहरों की ओर पलायन ही क्यों करते। यही लोग जब लौटकर गांव पहुंचेंगे तो वहां इनको किस तरह रोजगार मिल पाएगा? स्पष्ट है कि वहां इनको किसी तरह का रोजगार हासिल नहीं होगा। जो कुछ पैसा इन्होंने कमाया था वह एक-दो महीने से अधिक इनके परिवारों का पेट नहीं भर पाएगा। बहुत सारे लोग सरकार से मांग कर रहे हैं कि सरकार को इनके लिए सही पैकेज घोषित करना चाहिए। जो कंपनियां या फैक्ट्रियां बंद हो गई हैं, उत्पादन ठप पड़ गया है, ठेकेदार के पास मजदूर हैं उनके लिए सरकार प्रबंध करे। लेकिन किसी भी तरह का सरकारी पैकेज इनको स्थाई राहत नहीं दे सकता।

बीपीएल परिवारों को दो माह का राशन, कई राज्यों में दो या तीन महीने फ्री गैस सप्लाई या फिर पांच सौ या दो हजार रुपए की किस्तों से करोड़ों लोगों का पेट नहीं भर पाएगा।5 कोरोना से ज्यादा लोग भुखमरी के शिकार होकर मरेंगे। बिना पैसे स्वास्थ्य सुविधाएं खरीद पाना करोड़ों की इस आबादी के लिए दूर की कौड़ी है। इसलिए कोई भी राहत पैकेज केवल और केवल पूंजीपतियों, ठेकेदारों तक ही सीमित होगा। रिजर्व बैंक आफ इंडिया (आरबीआई) ने रिवर्स रेपो रेट या कहें बैंकों को दिए जाने वाले कर्ज पर ब्याज घटा कर जो पैंतरा चला है उससे केवल बड़ी कंपनियों तथा उद्योगों को कर्ज मिलेगा और आने वाले समय में उसका एनपीए में तब्दील होना तय है। इसका दूसरा अर्थ यह भी है कि बचे-खुचे चार बैंक भी दिवालिया होने की तरफ धकेल दिए गए हैं।

भारत सरकार ने कोरोना से लड़ने के लिए आंकड़ों का खेल खेलते हुए बजट के आंवटनों को फेरदबल कर 15 हजार करोड़ खर्च करने का ऐलान किया है, वहीं केरल इसके लिए 20 हजार करोड़ खर्च करेगा। इसमें अमेरिका ने भी अपने योगदान की घोषणा करते हुए 28 मार्च को 29 लाख डॉलर (21 करोड़ 71 लाख रुपए) देने का आश्वासन दिया है। यह वह राशि है जो अमेरिका ने अपने व्यापारिक हितों के मद्देनजर 64 देशों को जारी की है। अमेरिका 2,740 लाख अमेरिकी डॉलर की वित्तीय सहायता करेगा। हालांकि इसमें कहा गया है कि इमरजेंसी हेल्थ एंड ह्यूमेन फंडिंग (आपतकालीन स्वास्थ्य और मानवीय कोष) के तहत उन देशों को मदद दी जा रही है जो इस वैश्विक महामारी की सबसे ज्यादा चपेट में हैं। छह मार्च को अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोरोना वायरस प्रेपेयर्डनेस एंड रेस्पोन्स सप्लीमेंट एप्रोप्रिएशन एक्ट (कोरोना वायरस तैयारी तथा कार्रवाही पूरक विनियोग कानून) पर दस्तखत किए, जिसमें महामारी से लड़ रहे दुनियाभर के देशों को 130 करोड़ डॉलर देने का वादा किया गया है। वहीं चीन ने भी एलान कर दिया है कि विपत्ति के समय उसकी मदद करने वाले 19 देशों को कोरोना से लड़ने के लिए वह भरपूर मदद करेगा। भारत भी चीन की मदद की सूची में शामिल है।6 चीन ने सात अप्रैल को कोरोना वायरस के संक्रमण के इलाज में चिकित्साकर्मियों के इस्तेमाल में आने वाले निजी सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) की 1.7 लाख किट भारत को सहायता के तौर पर दी है। इसके अलावा चीन ने 18 अफ्रीकी देशों की भी कोरोना से लड़ने के लिए मेडिकल जरूरतों की आपूर्ति की है।7 चीन और अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों को दी जा रही यह राहत आने वाले समय में उन देशों के प्राकृतिक संसाधन हड़पने के ही काम आएगी।

जहां तक अपने-अपने गांव लौटी मेहनतकश जनता का सवाल है उसे केवल और केवल कृषि ही पर्याप्त रोजगार मुहैया करवा सकती है इसलिए उन तमाम भूमिहीन लोगों को जो कंगाली के चलते शहरों की तरफ पलायन कर मजदूर बने थे, उद्धार का एक मात्र रास्ता खेतिहर क्रांति ही बचती है। भूमिसुधार और उन लोगों को भूमि वितरण से ही रोजगार प्राप्त होगा बाकि सब पैकेज एक और धोखा साबित होंगे।

 

स्टे होमका रामबांण

जिस तरह से देश के शासक वर्ग ने लॉकडाउन और कर्फ्यू का हुक्म दिया, कोरोना से लड़ने के नाम पर ‘स्टे होम’ का नारा दिया, तो मेहनतकश की मुक्ति की बात करने वाले बहुत सारे संगठन, पार्टियां, एनजीओ तथा सामाजिक संगठन सरकार के सुर में सुर मिलाते नजर आए। यह पूंजीवाद के चंगुल में फंसने वाला नारा है। मेहनतकश की मुक्ति के लिए जी-जान लगाने, प्राणों तक को न्यौछावर करने की क्रांतिकारी भावना के खिलाफ नारा है। दुनियाभर में महामारियां पहले भी आई हैं, चाहे वह प्लेग के रूप में थीं या साम्राज्यवाद प्रायोजित अकाल के दौरान फैली महामारियां थीं। उस समय भी जान हथेली पर रखकर निकलने वाले क्रांतिकारियों के दुनिया में उदाहरण भरे पड़े हैं। आज कोरोना से सावधान रहने की जरूरत है, बचने की जरूरत है लेकिन घर पर बैठ कर तमाशा देखना बेहद शर्मनाक है। इस दौरान जब देश की जनता इस महामारी से जूझ रही है, देश की सर्वाधिक आबादी पर खतरा मंडरा रहा है, उस समय यह बेहद जरूरी हो जाता है कि हम उसके पास जाएं, उसकी सेवा करें, उसके लिए रोटी-कपड़ा-मकान-दवा का इंतजाम करें। क्योंकि सरकार के भरोसे बैठकर यह सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि वह इन सब पैकेजों से पूरा कर देगी।

आज फिर से जो भूमिहीन गांव में वापस जा रहे हैं उनके लिए भूमि की समस्या को उठाया जाए। सरकारी गोदामों में अनाज भरा पड़ा है, दवाएं भरी पड़ी हैं, बड़े-बड़े व्यापारी, जमींदार जमाखोरी कर मुनाफा कमाने के लिए तैयार बैठे हैं। सरकार साम्राज्यवादी आकाओं के आगे झुककर उनके लिए दवा, स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जरूरी उपकरणों के निर्यात पर से पाबंदी हटा रही है। साम्राज्यवादी देश फिर हमारे संसाधनों का दोहन कर रहे हैं। ट्रंप की एक धमकी के आगे जिस तरह से हमारे शासक वर्ग ने घुटने टेक वह स्तब्ध करनेवाला है। विदेश भेजे जानेवाले ये सब उपकरण तथा दवाएं हमारे देश के लोगों के लिए जरूरी हैं।

दुनिया के बड़े-बड़े देश, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, 44 से ज्यादा टीकों पर अरबों रुपए खर्च कर शोध कर रही हैं। आने वाले समय में साम्राज्यवाद इस तरह के टीकों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेगा। जो सबसे पहले कारोना का टीका बनाएगा वह अकूत मुनाफा कमाएगा, यह निश्चित है। जनता की जान से उसका कोई लेना-देना नहीं है। जब तक टीका नहीं आ जाता तब तक कई सारी दवाएं इसके इलाज के काम आ रही हैं। हमें लड़कर सुनिश्चित करवाना चाहिए कि वे दवाएं जनता को निःशुल्क मिलें।

निजी कंपनियों को कोरोना टेस्टिंग की अनुमति देना, बड़े-बड़े निजी कोरोना अस्पताल खोलने की अनुमति देना, यह सब सरकार अपने पूंजीपति दोस्तों का मुनाफा सुनिश्चित करने के लिए कर रही है। हमें इस बात के लिए लड़ना चाहिए कि स्वास्थ्य क्षेत्र पूरी तरह से सरकारी होना चाहिए। कोरोना के टेस्टों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए और पूरी तरफ मुफ्त होनी चाहिए। स्वास्थ्यकर्मियों के लिए जरूरी उपकरणों की सप्लाई की गारंटी होनी चाहिए। बड़े पैमाने पर निजी दवा कंपनियों को अपने हाथ में लेकर एंटी वायरल दवाओं का उत्पादन करना चाहिए खासतौर पर क्लोरोक्विन का, क्योंकि यह दवा बेहद सस्ती दवा है। भारी मात्रा में गैर जरूरी उत्पादन को रोक कर वेंटिलेटर और अन्य स्वास्थ्य मशीनों का उत्पादन होना चाहिए। तमाम निजी होटलों, रेस्तराओं, शापिंग मॉलों को, जो बंद पड़े हैं अस्पतालों में तब्दील किया जाना चाहिए। लोगों का इम्यून सिस्टम तभी मजबूत हो सकता है जब वह गरीबी रेखा से उपर उठेंगे, और इम्यून सिस्टम की कमजोरी तमाम बीमारियों की जड़ है। इसलिए यह लड़ाई आखिर में जाकर मजदूर-किसानों की जंग के रूप में तब्दील होती है। जब तक उसके पास अपनी जमीन और फैक्ट्रियों पर उसका अपना अधिकार नहीं होगा वह अपने लिए स्वास्थ्य, रोटी-कपड़ा-मकान हासिल नहीं कर सकता।

पूंजीवाद द्वारा स्थापित विकास का मॉडल ध्वस्त हो चुका है। यह जन विकास के वैकल्पिक माडल को पेश करने का समय है। इसलिए सरकार द्वारा की जा रही तानाशाही की रिहर्सल का मूल्यांकन बहुत सावधानी से करने की जरूरत है।

संदर्भ:

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  5. 2011 की जनगणना के अनुसार भारत मे बीपीएल जनसंख्या 21.9 प्रतिशत यानी 27 करोड़ थी जबकि 2004-05 में यह संख्या 37.2 प्रतिशत यानी 40 करोड़ 70 लाख थी। आंकड़ों के फेरबदल से 2011 में बीपीएल संख्या घटाई गई थी। https://www-google-com/url\sa¾t&rct¾j& q¾&esrc¾s&source¾web&cd ¾2& cad¾rja & ua ct¾8&ved¾2 ahUKEwjs qsf14tXo AhV1yjgGHUnBCVQQ FjABeg QIDBAE &url ¾ http %3A%2 F%2Fplanningcommission-nic-in%2Fnews %2Fpre_pov2307-pdf&usg ¾AOv Vaw2 dpPuK74j B6shw9 IL d9nRH
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लेखक एचपीयू, शिमला, के लॉ डिपार्टमेंट से संबद्ध हैं.

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