कोरोना वायरसः बीमारी का सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ

रंजोत

 

दुनिया के सामने स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना वायरस से पहले की दुनिया, कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में , बहुत फर्क चुका है। कोरोना का डर दिखा कर जिस तरह से पूरी दुनिया में तानाशाही की रिहर्सल हो रही है यह लंबे समय तक इस तरह नहीं टिक पाएगी। कोरोना के नाम पर साम्राज्यवाद अपना आर्थिक संकट टाल नहीं पाएगा।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार चीन में पहला नोवेल कोरोना (कोविड-19) केस आठ दिसंबर, 2019 को हुबेई प्रांत के वुहान शहर में दर्ज किया गया। लेकिन चीन के एक जानेमाने दैनिक के अनुसार देश में पहला मामला (पेशेंट जीरो) 17 नवंबर को सामने आया था। दिसंबर से पहले वुहान के जीनयीनतान अस्पताल में कुछ रोगियों के इलाज के दौरान इस संक्रमण का पता लगा था। इस बात की पुष्टि चिकित्सा विज्ञान की पत्रिका लासेंट 1 ने भी की है। लेकिन चीन और अमेरिका दोनों ही एक दूसरे पर कोरोना वायरस (विषाणु) को इजाद करने का आरोप लगाते रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसे ‘वुहान वायरस’ या ‘चीनी वायरस’ कह रहे हैं, वहीं चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता झाओ लिजियन ने बयान जारी किया था कि अमेरिकी सेना द्वारा वुहान में वायरस लाया गया है।

अब कोरोना किसने फैलाया और किसने इजाद किया और क्यों किया या यह प्राकृतिक रूप से मौजूद था या कृत्रिम रूप से तैयार किया गया, और क्या यह जैविक हथियार के रूप में पैदा किया गया, इस पर इतना जल्दी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। इसके बारे में दुनिया के सामने सच्चाई आने में बहुत लंबा समय लगेगा और बहुत बार ऐसी सच्चाई कभी सामने आती ही नहीं है। इस बात को खारिज नहीं किया जा सकता कि साम्राज्यवाद अपने मुनाफे के लिए ऐसा कर सकता है। इसके साक्ष्य इतिहास में दर्ज हैं और अपने आर्थिक संकट से उबरने के लिए, राजनीतिक रूप से अपनी सत्ता को स्थिर बनाए रखने के लिए मरणासन्न पूंजीवाद किसी भी हद तक जा सकता है।

दुनिया के सामने यह स्पष्ट हो चुका है कि कोरोना वायरस से पहले की दुनिया और कोरोना वायरस के बाद की दुनिया में बहुत फर्क आ चुका है। कोरोना का डर दिखा कर जिस तरह से पूरी दुनिया में तानाशाही की रिहर्सल हो रही है यह लंबे समय तक इस तरह नहीं टिक पाएगी। कोरोना के नाम पर साम्राज्यवाद अपना आर्थिक संकट नहीं टाल पाएगा। अवश्य ही कोरोना के बाद दुनिया अभूतपूर्व महामंदी का सामना करेगी और महामंदी या तो फासीवाद पैदा करेगी या फिर क्रांतियां।

इस लेख में कोरोना के कालक्रम को समझने की कोशिश करेंगे और मजदूर वर्ग या उसकी मुक्ति के लिए कार्यरत संगठनों, पार्टियों, कार्यकर्ताओं की क्या जिम्मेदारियां बनती हैं, इस पर चर्चा करेंगे। क्योंकि विडंबना यह है कि क्रांतिकारी होने का दंभ भरने वाले लोग भी ‘स्टे होम’ (घर में रहें) का नारा लगा रहे हैं और यह भूल रहे हैं कि जनता की सेवा करते हुए जो मौत आती है वह हिमालय से भी भारी और कायरों की तरह दुबक कर जो मौत आती है वह पंख से भी हल्की होती है।

 

कोरोना वायरस क्या है?

विज्ञान की भाषा में नोवेल कोरोना विषाणुओं (वायरसों) का एक समूह है जो स्तनधारी (मैमल्स) प्राणियों और पक्षियों में पाया जाता है। इस विषाणु के कारण श्वास तंत्र (रेस्पेरेटरी सिस्टम) में संक्रमण (इंफेक्शन) पैदा हो सकता है जिसमें हल्की सर्दी-जुकाम से लेकर मौत तक हो जाती है। यह उन लोगों को अधिक निशाना बनाता है जिनमें पहले से ही फेफड़े संबंधी रोग होते हैं या किडनी या दिल की बिमारियां होती हैं। अभी तक के शोधों के मुताबिक मरने वालों में अधिक संख्या 60 साल से ऊपर के बुजुर्गों की होती है।

चीन के वुहान शहर के डॉक्टर जब दिसंबर 2019 में कुछ मरीजों का इलाज कर रहे थे तब उनको यह नया वायरस समझ में आया। कोरोना वायरस पहले भी होता था लेकिन यह उससे भिन्न था, इसलिए इसका नाम नोवेल  (नया) कोरोना वायरस या कोविड-एन19 पड़ा। लैटिन भाषा में ‘कोरोना’ का मतलब ‘क्राउन’ यानी ताज होता है और इस वायरस की आकृति ताज पर उगे कांटों जैसी थी इसलिए इसको कोरोना कहा गया। किसी भी तरह के विषाणुओं से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली (इम्यून सिस्टम) ही काम आती है। इसलिए इस वायरस का इलाज रोग के लक्षणों के आधार पर किया जाता है, ताकि रोगी की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत रहे। इसके अलावा विषाणुजनित रोग जैसे स्वाइन फ्लू, सार्स-दो, इंफ्लुएंजा, एचआईवी और मलेरिया रोग में दी जाने वाली दवाएं भी इस विषाणु के मरीजों पर असरकारी

रही हैं। सबसे बड़ा खौफ इस बात का फैलाया जा रहा है कि इसकी कोई दवाई नहीं है। यह बात आधी सच है। क्योंकि दुनिया में अब तक (इस लेख के प्रकाशित होने तक) इस विषाणु से 185 देशों में 18 लाख 28 हजार से ज्यादा लोग ग्रसित हुए हैं जिसमें से चार लाख से ज्यादा लोग ठीक हो चुके हैं और एक लाख 13 हजार से ज्यादा की मौत हुई है। भारत में 9191 लोग इसके शिकार हैं, वहीं 600 से ज्यादा लोग ठीक हुए हैं और 326  की मृत्यु हुई है। अगर दवा नहीं होती तो इतने लोग ठीक नहीं होते। इस बीमारी में कई दवाएं काम कर रही हैं। पर यह बात भी ठीक है कि इसका वैक्सिन (टीका) नहीं है। लेकिन प्रचार इस तरह से किया जा रहा है कि इसकी दवा नहीं है।

 

दवा और टीके (वैक्सिन) का अंतर ?

बड़े पैमाने पर वैक्सिन का इस्तेमाल 16वीं सदी के दौरान चीन में दिखाई देता है। इसके बाद 1796 में ब्रिटिश डॉक्टर एडवर्ड जेनेर ने छोटी माता का टीका तैयार किया था जो सर्वाधिक प्रचलित हुआ। शरीर के अंदर रोग प्रतिरक्षा प्रणाली होती है। अगर हमारे शरीर में कोई हानिकारिक विषाणु या किटाणु (बेक्टरिया) प्रवेश कर जाता है तो शरीर अपने आप उसके विरुद्ध रोग प्रतिरोध क्षमता उत्पन्न कर लेता है और हानिकारक विषाणु या किटाणु को नष्ट कर देता है। लेकिन शरीर को नए विषाणु या जीवाणु के विरोध में अपने अंदर प्रतिरोध क्षमता विकसित करने में कई दिन लग जाते हैं, अगर रोगी की उस दौरान मृत्यु न हो तो प्रतिरक्षा प्रणाली और विकसित हो जाती है। यह निर्भर करता है रोगी की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली यानी उसके ‘इम्यून सिस्टम’ पर। इसलिए कोई भी दवाई किसी बीमारी का इलाज नहीं करती बल्कि वह शरीर की रोग प्रतिरोध क्षमता बढ़ाने, बनाए रखने में शरीर की मदद करती है। रोग को शरीर अपने आप नष्ट करता है। इसके विपरित टीके का मुख्य कार्य रोग पैदा होने से पहले ही वैक्सिन देकर उसको खत्म कर देना होता है। टीके का निर्माण इस आधार पर किया गया था कि बहुत सारे रोग ऐसे होते हैं जो एक बार होकर फिर बहुत समय बाद होते हैं, जैसे कुछ रोग बचपन में हो जाएं तो वे आगे चल कर जवानी में नहीं होते हैं। वैज्ञानिकों ने खोज लिया कि यह शरीर के अंदर विषाणु या किटाणुओं के खिलाफ पैदा हुई रोग प्रतिरोध क्षमता का नतीजा है और इस आधार पर पहले ही शरीर के अंदर वे मृत विषाणु, कीटाणु प्रवेश करवा दिए जाते हैं जिससे वह रोग पैदा ही न हो।

दवाई का कार्य तात्कालिक होता है, मुख्य रूप से शरीर की रोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूती देने के लिए बाहर से दिए जाने वाले सहारा के रूप में है। इसके विपरीत वैक्सिन लंबी अवधि तक कार्य करती है, बीमारी होने ही नहीं देती। इसलिए हमें दवा और वैक्सिन का अर्थ पता होना चाहिए। दवा लक्षणों के आधार पर मरीज का इलाज करती है और दवा से भी कोरोना का मरीज बच सकता है। यह जरूरी नहीं है कि जब वैक्सिन आएगी तभी रोगी का इलाज होगा। बिना वैक्सिन के भी कोरोना के मरीज ठीक हो रहे हैं। कोरोना के मरीज दवा या उनकी खुद की रोग प्रतिरोध क्षमता, पौष्टिक आहार, अंडा, दूध, पनीर आदि के बल पर ठीक हो रहे हैं। साठ के पार जिन रोगियों की रोग प्रतिरोध क्षमता कमजोर होती है, जिनमें पहले से कोई लंबी बीमारी होती है वे इसका शिकार आसानी से हो रहे हैं।

चेचक की रोकथाम के लिए बचपन में ही चेचक की वैक्सिन लगा दी जाती है। इस वैक्सिन के अंदर चेचक के मरे हुए विषाणु होते हैं। उसे बच्चे के शरीर में टीके के तौर पर प्रवेश करवा दिया जाता है। शरीर में जब चेचक के मरे हुए कीटाणु पहुंचते हैं तो शरीर कुछ दिनों में उनके खिलाफ रोग प्रतिरोध क्षमता विकसित कर लेता है। वह उन कीटाणुओं के असर को समाप्त कर देता है। अगर जिंदा कीटाणु प्रवेश करवाए जाएं तो व्यक्ति रोगी हो जाता है फिर रोगी के शरीर को उनके खिलाफ लड़ने के लिए रोग प्रतिरोध क्षमता विकसित करने में अधिक समय लग जाता है। अगर वैक्सिन के रूप में दे दी जाए तो शरीर यह क्षमता पहले ही विकसित कर लेता है। वैक्सिन नाक के जरिए बूंद के रूप में या टीके के रूप में शरीर में प्रवेश करवाई जाती है।

 

कोरोना साम्राज्यवाद को उसकी महामंदी से नहीं निकाल पाएगा

हाल ही में संयुक्त राष्ट्र संघ के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (डीइएसए)2 द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि कोविड-19 के विस्तार ने वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय व्यापार को नुकसान पहुंचाया है। सौ देश अपनी सीमाएं बंद कर चुके हैं। लोगों की आवाजाही और पर्यटन बुरी तरह से प्रभावित हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था 2020 में 0.9 प्रतिशत पर सिमट सकती है। फिलहाल दुनिया की विकास दर 2.5 प्रतिशत है। यह 2009 की वैश्विक मंदी से भी खतरनाक स्थिती होगी जब दुनिया की विकास दर 1.7 प्रतिशत पर सिमट गई थी। रिपोर्ट का कहना है कि – इन देशों के लाखों मजदूरों के अंदर अपनी नौकरी खोने का डर देखा जा रहा है। सरकारें अर्थव्यवस्था को ठीक करने के लिए बड़े प्रोत्साहन तरीकों पर विचार कर रही हैं और सहायता के ये कार्यक्रम (रोलआउट पैकेज) वैश्विक अर्थव्यस्था को संभावित गहरी मंदी में डूबो सकते हैं।

दुनियाभर के साम्राज्यवादी देश, खासकर अमेरिका 2008 के बाद से ही लगातार आर्थिक मंदी से घिरा हुआ है। चीनी सामाजिक साम्राज्यवाद अफ्रीका, एशिया के छोटे-छोटे देशों की अथाह प्राकृतिक संपदा का दोहन कर और अपने देश की सस्ती श्रम शक्ति को निचोड़ कर उभर कर सामने आ रहा है। योरोपीय संघ टूट रहा है और उनके अंतरविरोध भी तेज हो रहे हैं। खास बात यह देखने को मिल रही है कि दुनिया के बाजार पर कब्जा जमाने के लिए आपा-धापी मची हुई है। अमेरिका ने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, सीरिया, लैटिन अमेरिका आदि देशों को नर्क बना दिया है। चीन अफ्रीकी देशों को अपने कर्ज और सहायता के जाल में फंसा रहा है। अमेरिका और चीन के बीच लगातार स्थिति व्यापार युद्ध जारी है। इसका मुख्य मकसद दुनिया के बाजारों पर अपनी-अपनी हिस्सेदारी सुनिश्चित करना है।

दुनिया की आर्थिक मंदी के चलते लगातार नौकरियों में कटौती होती जा रही है। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी फैल रही है। सरकारें नए-नए टैक्स लगा रही हैं और नागरिक सुविधाओं में कटौती कर रही हैं। अमेरिका, चीन जैसे देश अपनी मंदी से उबरने के लिए नए-नए बाजार तलाश रहे हैं जिसके चलते विकासशील देशों में तीव्र आर्थिक संकट पैदा हो रहा है। भारत के सार्वजनिक उद्योग धंधे बुरी तरह से तबाह हुए हैं। बैंकिंग सेक्टर जिस तरह से डूब रहा है इसका असर अर्थव्यवस्था पर गहरा पड़ने वाला है। पिछले साल बैंकों का बट्टाखाता यानी

डूबा हुआ पैसा (एनपीए या नान परफार्मिंग एसेट्टस) रु 8,06,412 करोड़ था जिसमें लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इतना ही नहीं, बैंकों की संख्या विलय के बाद चार रह गई है। इसका मतलब है कि ये सभी मिलाए गए  बैंक डूब चुके थे। सरकार लीपापोती कर उनको बनाए रखे हुए है।

इस सबका बड़ा कारण यह है कि देश की बड़ी-बड़ी कंपनियों और पूंजीपतियों ने बैंकों से जो उधार लिया है उसको चुकता नहीं कर रहे हैं। देश में बढ़ी बेरोजगारी और कृषि में जारी संकट के चलते मांग नहीं बढ़ रही है और कंपनियां लगातार अपना उत्पादन घटा रही हैं। उत्पादन घटने से मजदूर बेरोजगार हो रहे हैं। बेरोजगार मजदूर, किसान, नौजवान क्या करेंगे। यह सरकार को भी पता है और उनके आकाओं को भी है। देश के कृषि, विनिर्माण क्षेत्र, यातायात, रियल इस्टेट, मोटर-गाड़ी उद्योग, बैंकिंग क्षेत्र आदि लगातार पिछड़ते जा रहे हैं।

 

बढ़ता असंतोष

पूरी दुनिया में आर्थिक संकट के चलते लगातार मजदूर, किसान, नौजवान और छात्र अपने-अपने देशों की सरकारों के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं। पिछले साल से यह सिलसिला लगातार जारी रहा। सबसे ज्यादा खतरे की घंटी चीन के लिए तब बजी जब हांगकांग में लोग अपनी स्वायत्तता को लेकर प्रदर्शन पर प्रदर्शन कर रहे थे। उनको रोकने में चीन की साम्राज्यवादी सरकार नाकाम हो रही थी। इसी तरफ फ्रांस, अल्जीरिया, लैटिन अमेरिका, सीरिया, ईरान, इराक, तुर्की हर जगह लोग अपने देशों की सरकारों के खिलाफ लड़े। भारत में दशकों बाद राष्ट्रव्यापी आंदोलन देखा गया। एनपीआर, एनआरसी और सीएए जैसे कानूनों के खिलाफ पूरा देश एकजुट होकर सरकार के खिलाफ विद्रोह कर उठा था। इस विद्रोह को कुचलने के लिए दक्षिणपंथी सरकार द्वारा किया गया दमन, छात्रों पर किए गए हमले और मुस्लिम बस्तियों पर किए गए हमले भी काम नहीं आए। लोग रुक नहीं रहे थे। अमेरिका में भी लगातार ट्रंप की लोकप्रियता घट रही थी। अफगानिस्तान में तालिबान के साथ समझौता नहीं हो पा रहा था, नतीजतन वह अपने सैनिकों को नहीं निकाल पा रहा था। वहीं चीन के साथ ट्रंप द्वारा छेड़ा गया व्यापार युद्ध अमेरिका के लिए घाटे का सौदा साबित होता जा रहा था। व्यापार युद्ध के चलते चीन की अर्थव्यवस्था पिछले तीस सालों में सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। वहां की सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की दर महज 6.1 प्रतिशत रह गई है। ऑक्सफोर्ड इकनॉमिक्स  के मुख्य अर्थशास्त्री लाउस कूजिस कहते हैं कि 2019 में अमेरिका के साथ व्यापार युद्ध के चलते चीन की विकास दर उल्लेखनीय रूप से प्रभावित हुई है, उसका निर्यात घट गया है और  कमजोर भी हो रहा है। साथ ही विनिर्माण क्षेत्र में निवेश घटा है।3

 

कोरोना के बाद की दुनिया

यह कोरोना से पहले का घटनाक्रम है। दुनिया भर में की सरकारें अपनी जनता से डरी हुई थीं। उन की लोकप्रियता गिरती जा रही थी। खासकर चीन, भारत, अमेरिका आदि देश लोगों की आकाक्षाओं को दबाने के लिए फासीवादी हथकंडे अपना रहे थे। कोरोना ने काले कानूनों को लागू और लोकतांत्रिक मूल्यों को समाप्त करके  सरकार के विरोध में कुछ भी बोलनेवालों को कुचलने के रास्ते खुल गए हैं। एक तरह से देखा जाए तो कोरोना फासीवाद को मजबूत करने के लिए साम्राज्यवादियों और देश के शासक वर्गों के हाथ में एक मजबूत हथियार बनकर सामने आ रहा है।

बीबीसी संवादाता रेहान फजल ने अपनी रिपोर्ट4 में जिक्र किया है कि इसके बाद शायद कुछ देश उतने लोकतांत्रिक नहीं रहेंगे जितने वे मार्च 2020 से पहले हुआ करते थे।  उनका इशारा इस बात की तरफ है कि दुनिया भर की सरकारें जिस तरह से अंधाधुंध घोषणाएं कर रही हैं, प्रतिबंध लगा रही हैं, पुलिस और फौज को खुली छूट दे रही हैं, पुलिस-फौज बेकसूर लोगों को मार-पीट रही है, एक तरह से नागरिक प्रशासन की जगह पुलिस और फौज ने ले ली है। शायद यह आने वाले समय में स्थाई हो जाए। लोगों को इस बात का एहसास करवाया जा रहा है कि यह सब आपकी सुरक्षा के लिए जरूरी है।

 

भारत में मुंह मांगी मुराद

भारत में जब प्रधानमंत्री द्वारा लॉकडाउन और कर्फ्यू की घोषणा की गई तो ऐसा लग रहा था जैसे देश की सरकार की मुंह मांगी मुराद पूरी हो गई हो। जिस राजनीतिक आक्रोश को, संघर्ष को वह कुचल नहीं पा रही थी, देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों की नई रीत से जैसी वह डरी हुई थी, उसको कोरोना के संकट ने एक झटके में बदल दिया। पैदल घरों की तरफ लौट रहे मजदूरों को दवा, पानी, राशन देने की बजाए उन पर पुलिस को खुले सांडों की तरह छोड़ दिया गया जैसे कि मजदूर ही इस बीमारी का मुख्य कारण हों। इसके बाद तबलीगी जमात के तौर पर शासक वर्गीय सत्ताधारी पार्टी को अपना मनपसंद दुश्मन भी मिल ही गया।

ऐसा लगता है जैसे नाक के नीचे दिल्ली में जमावड़ा बनाए रखना और कर्फ्यू के चरम पर उनका दिल्ली से निकल कर पूरे देश में फैलाना, किसी साजिश का हिस्सा रहा हो। इसके बाद दक्षिणपंथी पार्टी द्वारा उनको मुख्य दुश्मन के तौर पर प्रचारित करना, पूरे सोशल मिडिया पर छाया रहा। बीबीसी अपनी रिपोर्ट में कहती है मानवाधिकारों पर पाबंदी से लोकतंत्र कमजोर हुए हैं।“कोरोना वायरस के आने से कहीं पहले दुनिया के कई देशों में लोकतंत्र की जड़ें कम हो रही थीं। प्रजातांत्रिक मूल्यों के लिए काम करने वाली संस्था ‘फ्रीडम हाउस’ की बात मानी जाए तो पिछले साल 64 देशों में लोकतांत्रिक मूल्य पहले की तुलना में कम हुए हैं। ‘‘ जब दुनिया के बहुत से देश इस महामारी से निपटने के लिए असाधारण कदम उठा रहे हैं, तानाशाह और प्रजातांत्रिक-दोनों तरह के देशों में मानवाधिकारों को बड़े स्तर पर संकुचित किया जा रहा है। व्यापार को बंद करना, सामाजिक दूरी (सोशल डिस्टेंसिंग)को लागू करने पर जोर देना, लोगों को सड़क से दूर रखने और उनके जमा होने पर रोक और कर्फ्यू लगाने जैसे कदम इस बीमारी को रोकने के लिए बेशक जरूरी कदम हैं लेकिन इस बात के भी गंभीर खतरे हैं कि इससे तानाशाही की नई लहर को भी बढ़ावा मिल सकता है।”

ये आशंकाएं नजरंदाज नहीं की जा सकतीं। खासकर भारत में जहां सत्ताधारी पार्टी के सांसद खुल कर घोषणा करते हैं कि 2025 के बाद चुनावों की जरूरत नहीं होगी। सोशल मीडिया पर यह संदेश भी प्रचारित हो रहे हैं कि देश के प्रधानमंत्री का विरोध करना देश का विरोध करना है, या देशद्रोह है। एक स