‘उत्तर-हिंदू’ भारत: कितना सच, कितनी कल्पना
July 7th, 2010मीरा नंदा
पोस्ट हिंदू इंडियाः ए डिस्कोर्स इन दलित बहुजन, सोशियो-स्प्रिचुएल एंड साइंटिफिक रिवोल्यूशन: कांचा इलैया; सेज
भारत के बौद्धिक परिदृश्य पर कांचा इलैया का उभार 1996 में उनकी पुस्तक व्हाई आई एम नाॅट अ हिंदू से हुआ। इस पुस्तक में इलैया ने तकरीबन आत्मकथात्मक शैली में बताया था कि आखिर क्यों उनके और उनके साथी दलित-बहुजनों (शूद्र) के मन में हिंदूवाद के प्रति सिर्फ आक्रोश और संवेदनहीनता मौजूद है- एक ऐसा धर्म जिसने उनके जीवन, संस्कृति और भगवानों का अवमूल्यन किया और साथ ही द्विज जातियों की ‘उच्च संस्कृति’ से बाहर कर दिया है। करीब 15 साल बाद इलैया ने एक नई पुस्तक लिख कर इस पक्ष में दलील दी है कि आखिर हिंदूवाद क्यों खत्म हो जाने के काबिल है और जातियों का खात्मा हिंदू धर्म के खात्मे के लिए क्यों रास्ता बनाएगा। वह दावा करते हैं कि भारत अपने ‘उत्तर-हिंदू’ भविष्य की ओर अग्रसर है, एक ऐसा भविष्य जिसे लाने की कोशिश में वह खुद हैं और उसे काफी उम्मीद से देखते हैं।
जाहिर है कि वक्त के साथ इलैया की संवेदनाओं में बिल्कुल भी बदलाव नहीं आया है। दलित-बहुजन और आदिवासी समुदायों पर किए गए अन्यायों के खिलाफ वही ज्वलंत आक्रोश उनकी दोनों पुस्तकों में दिखता है। दुर्भाग्यवश, यह भी कहा जा सकता है कि दुनिया को अच्छे-बुरे के दो खांचों में देखने की उनकी सोच भी वक्त के साथ नहीं बदली है, जिसका तथ्यों से कोई खास सरोकार नहीं होता। वही रुग्ण सोच, कि ‘हम अच्छे हैं और ब्राह्मण बुरे’, जिसने व्हाई आई एम नाॅट अ हिंदू को एक आत्मतुष्ट चीख-पुकार में तब्दील कर दिया था, उसी ने पोस्ट-हिंदू इंडिया को एक ऐसे दिवास्वप्न में बदल डाला है जो इतिहास से और यहां तक कि समकालीन यथार्थ से भी मुक्त होकर विचरण करता है। भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जाने माने प्रतिष्ठिानों में एक, हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र पढ़ाने वाले एक प्रोफेसर से उम्मीद की जाती है कि वह सामाजिक विज्ञान से पुष्ट विश्लेषण प्रस्तुत करेगा, बजाय इसके इलैया ने मूलतः एक रूमानवादी रचना कर डाली है।
पोस्ट-हिंदू इंडिया में प्रतिपादित सिद्धांत बहुत सहज है। यह दावा करता है कि दुनिया के चार प्रमुख धर्मों में एक हिंदू धर्म ‘धीमी और तयशुदा मौत की राह पर है’ क्योंकि उसके द्वारा वैधता प्राप्त ‘जाति का कैंसर’ ही उसे भीतर से खाए जा रहा है, जिसके चलते इस्लाम और ईसाइयत जैसे समतावादी धर्मों के लिए उसने जमीन खाली छोड़ दी है। पूंजीवाद, वैश्वीकरण और अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार से समर्थ होकर अंततः दलित-बहुजनों को अब ‘आध्यात्मिक गुंडों’ (दूसरे शब्दों में ब्राह्मणों) के खिलाफ एक निर्णायक लड़ाई छेड़ने और जीतने तथा उन धर्मों को अपनाने का विकल्प मिल गया है जो कहीं ज्यादा ‘आध्यात्मिक रूप से जनतांत्रिक’ हैं। इलैया कहते हैं कि भले ही दलित-बहुजन हिंदू धर्म का त्याग आधिकारिक तौर पर न करें, लेकिन उसके प्रति उनके मन में कोई ‘सम्मान नहीं हैं।’ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और हिंदुत्ववादी ताकतों का उभार ‘हिंदूवाद को उसकी मौत की ओर धकेल रहा है’, क्योंकि यह उत्पीड़ित बहुसंख्यकों के लिए समानता सुनिश्चित किए बगैर हिंदू धर्म के लिए एक राश्ट्रष्य और वैश्विक स्थान हासिल करने के प्रयास में है।
यह तर्क हमें इलैया की पुस्तक के दूसरे अध्याय तक ले जाता है, जो ‘जाति के कैंसर’ की प्रकृति पर केंद्रित है। इलैया के अनुसार जाति, जो कि हिंदू धर्म में से उसके जीवन सत्व को खंीच रही है, उसकी जड़ें ‘धर्म की आंतरिक संरचना में समानता और परिवर्तन के आध्यात्मिक जनतांत्रिक आयाम’ को संस्थागत रूप देने में उसकी अक्षमता में निहित है। यहां सवाल खड़ा होता है कि आखिर हिंदू धर्म में यह आध्यात्मिक जनतंत्र क्यों गायब है, जो इलैया को दुनिया के अन्य धर्मों में पर्याप्त दिखाई देता है। लेखक के मुताबिक बुनियादी समस्या यह है कि ‘हिंदूवाद तर्क और आस्था के बीच संवाद कायम कर पाने में अक्षम है।’ एक ओर जहां मेहनतकश दलित-बहुजन जातियों ने दुनिया के प्रति तार्किक व उत्पादन केंद्रित दृष्टिकोण को अपनाया, वहीं हिंदू ब्राह्मणवाद ने ‘उत्पादन विरोधी और विज्ञान-विरोधी’ नैतिकता को अपनाया। इलैया के मुताबिक विडंबना यह रही कि ब्राह्मणवाद ने अपनी परजीवी जीवन शैली का प्रचार-प्रसार शुद्धता और ज्ञान की प्राप्ति के मार्ग के रूप में किया, तो दूसरी ओर उसने ‘वास्तविक’ वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और कामगारों – यानी दलित, शूद्र और आदिवासी की उपेक्षा की। इलैया तर्क देते हैं कि भारत को यदि आधुनिकता और वैश्वीकरण के इस युग में अपना अस्तित्व बनाए रखना है, तो उसे अपनी मेहनतकश उत्पीड़ित ‘निम्न जातियों’ की वैज्ञानिक नैतिकता को गले लगाना होगा, और इस तरह उसे ‘उत्तर-हिंदू’ होना होगा- एक ऐसा परिवर्तन जिसे लेखक अपरिहार्य मानता है।
इलैया द्वारा हिंदू धर्म के खात्मे का आह्वान कुछ साल पहले हिंदू विचारकों द्वारा मचाए गए हो-हल्ले की याद दिलाता है जिसमें उन्होंने कहा था कि भारत कथित तौर पर मुस्लिम-बहुल देश बन रहा है और हिंदू ‘अपने ही देश में’ अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। इलैया, जाहिर है कम हिंदुओं वाले भारत की किसी भी संभावना का स्वागत ही करेंगे, हालांकि हिंदू दक्षिणपंथ इसकी निंदा करते हुए मुस्लिमों में आबादी के काल्पनिक विस्फोट का भय फैलाता है। हालांकि तथ्यों के आधार पर देखें तो इलैया के सामने भी उतनी ही बड़ी चुनौती है जितनी हिंदू विचारकों के सामनेः कल्पना की कोई भी उड़ान हमें इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचाती कि भारत उत्तर-हिंदू होने के किसी चरण में है। इसके उलट, देश ने जिस किस्म के आत्मघाती पूंजीवाद और वैश्वीकरण को गले लगा लिया है, उसमें सभी धार्मिक आस्थाओं वाले भारतीय और ज्यादा धार्मिक होते जा रहे हैं तथा हिंदू धार्मिकता समाज के सभी तबकों में बढ़ रही है- जिनमें दलित, शूद्र और आदिवासी सभी शामिल हैं। हिंदू धर्म से मुंह मोड़ने के बजाय दलित-बहुजन ज्यादा से ज्यादा आकर्षक हिंदू कर्मकांडों, महंगी पूजा, जगराता, होम आदि में लिप्त होते जा रहे हैं ताकि वे विनम्र और ‘साफ-सुथरे’ मध्य-वर्ग का हिस्सा बन सकें। जैसा कि इलैया हमें भरोसा दिलाना चाहते हैं, उसके उलट हिंदू धर्म में सभी को शामिल कर लेने की सदियों पुरानी प्रक्रिया की ताकत अब भी चुकी नहीं है।
इलैया का यह विचार कि हिंदूवाद अब अपनी संख्या और प्रभाव के मामले में ‘नीचे की ओर गतिमान है’ और ‘धीमी लेकिन तयशुदा मौत’ की ओर बढ़ रहा है, तथ्यों से पुष्ट नहीं होता। हालिया जनगणना के आंकड़े दिखाते हैं कि भारत की कुल आबादी में मुस्लिमों और ईसाइयों का हिस्सा 1991 में 15 फीसदी से कम था और 2001 में 16 फीसदी से कम था- यानी यह मामूली बढ़ोतरी मुस्लिमों की आपेक्षिक आर्थिक बदहाली का परिणाम है, हालांकि हिंदूवाद से कोई महत्वपूर्ण प्रस्थान की ओर इशारा नहीं करती। विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) द्वारा 2004 और 2009 के चुनावों के बाद कराए गए राष्ट्रीय चुनाव अध्ययन में यह बात सामने आई कि हिंदू देवी-देवताओं की पूजा करने वाले दलितों और आदिवासियों का अनुपात घट नहीं रहा, बल्कि बढ़ रहा है। ज्यादा सूक्ष्म जातीय अध्ययन दिखाते हैं कि दलितों और अन्य पिछड़ी जातियों में जिस तरह उच्च तबके में जाने की गति बढ़ती है, वे प्रतिष्ठा हासिल करने और मध्यवर्गीय जातियों का हिस्सा बनने के लिए हिंदू आचारों को अपना लेती हैं – जो निश्चित तौर पर समकालीन भारत में जातिवादी प्रवृत्तियों पर एक निराशाजनक टिप्पणी है।
ऐतिहासिक रूप से वंचित जातियों में द्विज जातियों की स्वीकृति प्राप्त करने की अब भी मजबूत इस प्रवृत्ति पर इलैया बड़ी आसानी से छूट ले लेते हैं, जो अक्सर इन जातियों को हिंदू दक्षिणपंथ की घोशित प्रतिगामी मुस्लिम-विरोधी और ईसाई-विरोधी राजनीति का समर्थक बना देती है। जैसा कि इलैया कहते हैं, यदि हिंदूवाद का प्रभाव वास्तव में दलित-बहुजन समुदायों में कम हो रहा है, तो इस तथ्य के पीछे क्या तर्क होगा कि वाल्मीकि जाति के दलितों ने अपने नायकों को हिंदूओं द्वारा क्यों अपना लेने दिया? इस प्रक्रिया को बद्री नारायण ने उत्तर प्रदेश और बिहार के दलितों के अपने बेहतरीन अध्ययन फैसिनेटिंग हिंदुत्व में विस्तार से समझाया है। पाठ में जहां-तहां आने वाले वाक्य हालांकि दिखाते हैं कि इलैया इस प्रक्रिया से वाकिफ हैं, लेकिन हिंदू धर्म को मृत्यु प्रमाण पत्र देने के अपने उत्साह पर इस समझदारी को वह हावी नहीं होने देते।
आनुभविक साक्ष्यों पर ध्यान नहीं देने की यह प्रवृत्ति इलैया के समूचे लेखन को प्रभावित करती है। पोस्ट-हिंदू इंडिया एक ‘अद्भुत प्रविधि’ का दावा करती है जहां किसी भी प्रकाशित ग्रंथ का कोई भी संदर्भ मौजूद नहीं हैः 295 पृष्ठों की समूची पुस्तक इलैया के मस्तिष्क की सीधी उपज लगती है। हालांकि आंबेडकर से लेकर हीगेल और माक्र्स तक नाम तो कई गिनाए गए हैं, लेकिन उनके वक्तव्यों की विश्वसनीयता या प्रासंगिकता को जांचने का कोई तरीका नहीं है। इन ‘महान’ विचारकों के बयानों के अलावा किसी भी समकालीन अध्ययन का कोई संदर्भ मौजूद नहीं है। यदि इलैया ने अपनी अपरिपक्व भावनाओं को उपलब्ध सामाजिक व नृशास्त्रीय आंकड़ों के बरक्स जांचा होता, तो इस पुस्तक और व्हाई आई एम नाॅट हिंदू में किए गए सरलीकरणों से बचा जा सकता था। दलित- बहुजनों और आदिवासियों के वैज्ञानिक प्रवृत्ति का होने के अपने तमाम दावों के बावजूद इलैया खुद अपने लेखन में सामाजिक वैज्ञानिक प्रविधि का प्रदर्शन नहीं कर पाते हैं।
वैज्ञानिक मानस का मसला हमें इलैया के सिद्धांत के दूसरे हिस्से तक ले आता है जिसमें तर्क व आस्था के बीच संवाद कायम करने के हिंदू धर्म की ‘विफलता’ के बारे में बताया गया है। इसमें निश्चित तौर पर सच्चाई का एक अंश मौजूद है, क्योंकि ‘सनातन सत्य’ के बारे में शुद्धता और रहस्यवादी ज्ञान का ब्राह्मणवादी आग्रह, जो इंद्रियबोधी पर्यवेक्षण का अतिक्रमण करता है, भारत में प्राकृतिक विज्ञान को विकास को पीछे धकेलने के लिए मुख्य तौर पर जिम्मेदार था। इससे कोई इनकार नहीं है कि कामगार जातियों ने ही पारंपरिक ज्ञान का विकास करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभाई, चाहे वह आयुर्वेद हो या फिर कीमियागरी। ज्योतिषशास्त्र और यज्ञ का इकलौता ‘विज्ञान’ है जिसके योगदान का दावा द्विज जातियां कर सकती हैं। लेकिन यहां एक बार फिर से इलैया सच्चाई के अंश पर अपनी अपुष्ट अतिशयोक्तियों से बुनी कल्पनाओं की परत चढ़ा देते हैं। वह ‘विज्ञान’ का प्रयोग उतने ही लचर ढंग से करते हैं जैसे कि हिंदूवादी करते आए हैं; यदि सनातन धर्म के रक्षकों के लिए ज्योतिषशास्त्र से लेकर मिथकीय तथ्यों तक सब कुछ कथित आधुनिक शब्दावली में विज्ञान है, तो इलैया भी चमड़ा काटने से लेकर खाद बनाने और बाल काटने तक की सभी गतिविधियों को वैज्ञानिक करार देकर संतुष्ट नजर आते हैं।
विज्ञान के इस लचर प्रयोग के साथ दिक्कत यह है कि यह सैद्धांतिक विवरण की जमीन पर खड़े और परीक्षण पर खरे उतरे प्रयोगात्मक ज्ञान यानी जिसे हम आधुनिक विज्ञान समझते हैं, उसका स्थान उस चीज को दे देता है जिसे ज्यादा से ज्यादा हम अपने पूर्वजों का आनुभविक विज्ञान कह सकते हैं। यह सच है कि चमड़ा काटने, फसलें उगाने और बीमार व्यक्ति की तीमारदारी करने की गतिविधियां किसी व्यक्ति का ध्यान उक्त परिघटना के भौतिक पक्ष की ओर ज्यादा मोड़ती हैं। लेकिन भौतिकवाद और इंद्रियबोध अपने आप में किसी भी गतिविधि को वैज्ञानिक नहंी बना देते। आखिरकार, प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों के आनुभविक विज्ञान में भी ‘जादुई’ विचार का एक तत्व होता था, जो ‘आध्यात्मिक उपचार’ की ब्राह्मणवादी अवधारणा से जन्मा था जिसमें मंत्रेच्चार, तिलिस्म, उपवास, बलि आदि कर्मकांड शामिल होते थे।
इलैया जो कुछ सोचते हैं, उसके उलट कोई भी वैज्ञानिक- चाहे वह उनका ‘चर्म वैज्ञानिक’ माडिगा हो या ‘खाद वैज्ञानिक’ माला – किसी भी परिघटना को विशुद्ध अनुभवों के आधार पर नहीं देखता और व्यापक समाज में प्रचलित विश्वदृष्टिकोण व सांस्कृतिक प्रस्थापनाओं से उसकी दृष्टि अछूती नहीं रहती। कामगार जातियां किसी भी बिंदु पर ब्रह्मांड के दैवीय स्रोत के विषय में प्रच्छन्न प्रस्थापनाओं या फिर वैदिक हिंदुत्व की आत्मा संबंधी धारणाओं से मुक्त नहीं थीं। भले ही उन्हें संस्कृत में उपलब्ध अभिजात्य ज्ञान को प्राप्त करने की छूट नहीं थी, लेकिन यह ज्ञान निश्चित तौर पर जन भाषा में पढ़ाए जाने वाले पुराणों और तंत्र के माध्यम से निचली जातियों तक रिस कर चला आता था। इस संदर्भ में ‘उत्पादक’ दलित-बहुजनों के तथाकथित ‘वैज्ञानिक’ ज्ञान और ‘परजीवी’ ब्राह्मणों के ‘अंधविश्वासों’ के बीच एक कठोर विभाजक रेखा को खींचना सर्वथा सरलीकरण है।
हम भले ही हिंदू धर्म की पैदाइशों पर इलैया के आक्रोश से सहानुभूति रख सकते हैं, लेकिन हिंदू धर्म की दिशा के बारे में उनके विश्लेषण को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हिंदू धर्म इतना लचीला, सर्व-समावेशी और प्रतिरोधरहित धर्म है कि निकट भविष्य में भारतीय कल्पना जगत पर उसकी पकड़ कमजोर होती नहीं दिखती। इसलिए पोस्ट-हिंदू इंडिया सामाजिक विज्ञान का एक गंभीर पाठ होने के बजाय परीकथा ज्यादा है।
अनुः अ.श्री. साभारः हिमाल साउथ एशियन