उपन्यासों के बहाने कानून और न्याय व्यवस्था
July 7th, 2010रामशरण जोशी
राम राज्यः मित्रसेन मीत; अनु: अर्जुन शर्मा; हरियाणा पुलिस अकादमी; मूल्य: रु. 195 (पेपर बैक) , पृष्ठ: 934
ISBN : 81.8235.081.6
‘‘पुलिस न केवल जुर्मों को बंद करने, अपराधियों को गिरफ्तार करने और जान-माल की रक्षा करने में ही असफल रही है, बल्कि हमारी पुलिस स्वयं अत्याचार का एक साधन है और लोगों के नैतिक पतन का एक प्रबल कारण बन गई है।’’ (1853 में अंगे्रजों की इंडिया रिफाॅर्म सोसायटी पत्रिका का सर्वे।)
एक जेनुइन कृति अपने समय का प्रतिनिधित्व करती है। यदि कृति में समकालीनता नहीं है; समय के विमर्श और चुनौतियां उसमें से गायब हैं; समय की सीमाओं और नए विकल्प गढ़ने के लिए उसमें पे्ररित करने की क्षमता नहीं है; वह अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की संस्कृति जनने से संकोच करती है या भयभीत है; वह निर्बल व उत्पीड़ित के साथ न होकर सामथ्र्यवानों की पक्षधर दिखाई देती है, तब निःसंदेह वह ‘जेनुइन कृति’ न होकर कुछ और ही होगी। वैसे समय सापेक्षता से रहित कोई भी कृति जीवित भी नहीं रह सकती। यह ऐतिहासिक सत्य है। पंजाबी के विख्यात कथाकार मित्रसेन मीत की चर्चित कृति राम राज्य को इस परिप्रेक्ष्य में देखने की जरूरत मुझे महसूस होती है।
मूलतः पंजाबी में प्रकाशित और हिंदी में रूपांतरित राम राज्य मीत के तीन उपन्यासोंµ1. तफ्तीश; 2. कटैहरा; और 3. सुधारघर का संगम है। यह कृति एक प्रकार से उपन्यास त्रयी है; 934 सफों में फैले ये तीनों उपन्यास अलग-अलग समय पर लिखे गए थे। पहले उपन्यास ‘तफ्तीश’ की कथावस्तु पुलिस तंत्र है। पुलिस के कामकाज के तरीकों; उसके हथकंडों; सामान्य विशिष्ट जनों के प्रति उसका रवैया और नेताओं व नौकरशाहों के लिए ‘दुम नचाऊ प्रवृत्ति’ जैसी घटनाओं की पड़ताल के माध्यम से पुलिस संसार को उजागर किया गया है। कई दशक पहले शायर व न्यायधीश ए.एन. मुल्ना ने पुलिस को ‘संगठित डाकुओं का गिरोह’ कहा था। मीत का यह उपन्यास जहां इस कथन की तसदीक़ करता है, वहीं इसके पात्र इसकी भी गवाही देते हैं कि स्थिति ‘बद से बदतर’ बन चुकी है। करीब 315 सफों का यह उपन्यास पाठक को एक झटके में औपनिवेशिक काल में धकेल देता है। यह वह काल था जब पुलिस की भूमिका विदेशी सत्ता की संरक्षक और राज करने की हुआ करती थी। मामूली नागरिक के लिए इस स्थिति में कोई गुणात्मक फरक आया है, इसका अहसास उपन्यास के पात्रों और पाठकों को नहीं होता है!
करीब तीन सौ पृष्ठों में सिमटा उपन्यास ‘कटैहरा’ कोर्ट-कचहरी के इर्द-गिर्द घूमता है। आजकल देश में न्यायपालिका की कछुआछाप कार्यशैली विवाद का मुद्दा बनी हुई है। देश की विभिन्न अदालतों में लाखों मुकदमें (संभवतः दो करोड़ से अधिक) फैसले के लिए दशकों से फाइलों में सड़ रहे हैं। कहा भी जाता है, ‘विलंबित न्याय अर्थात न्याय से वंचित’ करना है। कटैहरा उपन्यास में न्यायिक प्रक्रिया की जटिलताओं व भेदभावपूर्ण रवैया; अदालत में दौलत की सत्ता; न्यायधीशों का वर्ग चरित्र; आरोपियों के प्रति धनवादी व वर्गवादी रवैया; जजों की स्वेच्छाचारिता; धन-अर्जन पे्ररित वकीलों का चरित्र; कछुआछाप फैसला शैली आदि को बेलौस उजागर किया जाता है। यह एक्सपोजर भी संवेदनशील व विवेकशील पाठक को सोचने के लिए विवश कर देता है कि आखिर में इस लोकतांत्रिक भारत की न्यायपालिका किसके लिए है? यह किससे नियंत्रित व संचालित होती है? ये किसके वर्ग हितों का प्रतिनिधित्व करती है? इस प्रकार के सवाल उपन्यास के पात्रों की जिंदगियों में रह-रहकर उठते हैं। इन पात्रों को भी इसका अहसास नहीं हो पाता कि वे उस देश के अभागे नागरिक हैं जिसका राष्ट्रपिता बैरिस्टर मोहनदास करमचंद है!
अंतिम उपन्यास ‘सुधार घर’ की कथावस्तु सुधारघर उर्फ जेल है। किशोरावस्था में एक फिल्म देखी थी ‘दो आंखें बारह हाथ’ जिसमें गांधीजी के ‘हृदय परिवर्तन’ के दर्शन से पे्ररित होकर छह कैदियों के सुधार की कोशिश की जाती है। ‘आक्रोश’, ‘अर्ध सत्य’, ‘वांटेड’ जैसी कई फिल्मों में ‘जेल जगत’ के विभिन्न पक्षों को उद्घाटित किया गया है। विभिन्न नेताओं की जेल डायरियों (नेहरू, मंडेला, चंद्रशेखर आदि) से भी जेल की झलकियां मिलती हैं। मैरी टैलर की ‘जेल डायरी’ कम दहला देने वाली नहीं है। कुछ वर्ष पहले अंगे्रजी का एक उपन्यास पढ़ा था ‘माई डेडी’ वह उपन्यास भी जेल के नारकीय चेहरे को उजागर करता है।
मीत का उपन्यास ‘सुधार घर’ एक व्यंग्यात्मक संज्ञा है। इसे सुधार घर न कहकर ‘अपराधी जनन व प्रशिक्षण गृह’ कहना अधिक उपयुक्त रहेगा। उपन्यासकार मीत ने उन तमाम परिस्थितियों का दस्तावेजीकरण किया है जोकि पहली बार के अपराधी को ‘उस्ताद अपराधी’ में तब्दील कर देती हैं। एक नया अपराधी जेल में सुधरने के स्थान पर किस प्रकार शिक्षित-प्रशिक्षित होकर वहां से बाहर निकलता है; उसे कितनी तरह की अपमानजनक परिस्थितियों से गुजरना पड़ता है; जेल में सत्ता के असली खिलाड़ी कौन होते हैं; संपन्न व विपन्न अपराधियों के साथ किस प्रकार का व्यवहार होता है; जातिवाद भी जेल-जगत का पीछा नहीं छोड़ता है; कैदी के क्या अधिकार होते हैं; इसे जानना विद्रोह में शुमार किया जाता है; जेल में ‘लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है?’ यही हैसियत रह गई है लोकतंत्र की। लेखक ने इतनी प्रामाणिक बारीकियां दी हैं कि जेल को ‘सुधार घर’ कहना ही उसके प्रति नाइंसाफी होगी। स्पष्ट शब्दों में, इसे ‘सुधार घर’ के अलावा अन्य कुछ भी कहा जा सकता है जो इसके उत्पीड़क चरित्र के अनुकूल हो।
पाठक लेखक के बारे में जान लें। 1952 में जन्में मित्रसेन मीत पेशे से वकील हैं और वर्तमान में लुधियाना में ‘डिस्ट्रिक्ट अटार्नी’ हैं। इसलिए पुलिस, अपराध, अदालत और तथाकथित सुधार घर उर्फ जेल की जितनी संभावित तहें-परतें हो सकती हैं, मीत जी उनसे गहराई तक परिचित हैं क्योंकि उनका पुलिसकर्मी, अपराधी, वकील, जज और जेलर से रोजाना साबका पड़ता रहता है। जनप्रतिनिधि भी इन क्षेत्रों में उनसे टकराते रहते हैं। एक प्रकार से लेखक को स्थानीय स्तर पर ही सही कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका की तालमेल-भूमिका को समीप से देखने का अवसर मिलता है। वास्तव में मीत ने अपने वर्षों के प्रामाणिक अनुभवों को इस उपन्यास त्रयी में उदारता व प्रचुरता के साथ उड़ेला है। यद्यपि इस रामराज्य की रंगमंच भूमि पंजाब है। इसके सभी पात्र शहरी व कस्बाई पंजाब के हैं। पंजाब और पंजाबियत की पृष्ठभूमि में रचे-बसे ये तीनों उपन्यास एक सूबे के होते हुए भी इन्हें सूबाई या आंचलिक नहीं कहा जा सकता। बल्कि इनमें उत्तर औपनिवेशिक भारत की व्यवस्था का ‘चाल-चरित्र-चेहरा’ समाया हुआ है। इस दृष्टि से रामराज्य पंजाब की सीमाओं को लांघता है और आधुनिक भारतीय राष्ट्र राज्य के तीन आधारभूत अंगों-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का प्रतिनिधित्व करता है।
मेरे मत में लेखक मीत ने रामराज्य को आधुनिक भारतीय व्यवस्था के ‘रूपक’ के रूप में प्रस्तुत किया है। राज्य के तीनों अंगों का यह एक ‘महाआख्यान’ है। इसकी कहानी मुख्तसर में यह है कि एक साधन संपन्न समाज सेवक परिवार का बच्चा ‘बंटी’ का अपहरण हो जाता है। पुलिस तंत्र हरकत में आ जाता है। इलाके की सियासत गरमा जाती है। मुख्यमंत्री पुलिस को ताकीद करता है कि अमुक तारीख तक अपहरणकर्ता पकड़े जाने चाहिए। बस! इसके बाद पुलिस कहर बरपाने लगती है। कफ्र्यू लग जाता है। अपराधियों को पकड़ने की रणनीतियां बनती हैं। प्रतिपक्ष के लोग भी सक्रिय हो जाते हैं। सिविल सोसाइटी के सदस्य भी इसमें कूद पड़ते हैं। स्थानीय और जिला पुलिस अधिकारी भी अपराधी को पकड़ने और सजा दिलवाने में अपनी तरक्कियों के सपने देखने लगते हैं। इस दौड़ में पुलिस महकमें के अंतर्विरोध खुलकर उजागर होते हैं। नेता, पुलिस और मीडिया के संबंध भी सामने आते हैं। पुलिस के चरित्र को उजागर करने के लिए निम्न टिप्पणियां काफी कुछ कह जाती हैं। एक, ‘‘थाना न हुआ, पोस्त-अफीम की दुकान हो गई।’’; दो, ‘‘पहले बच्चे पैदा करने में कोई शर्म नहीं करते… बच्चे सुअरों की तरह गलियों बाजारों में धक्के खाते रहते हैं। …अब पुलिस भला किस-किस का ख्याल रखे?’’; तीन, ‘‘यदि ईमानदार रहकर भी पुलिस से हड्डी पसली एक करवानी है तो सारा दिन पसीना बहाने की क्या जरूरत है? पहले काम में क्या बुराई थी? सारा दिन सोए रहो, रात को घर से निकलो। एक-दो घरों में सेंध लगाओ, आधा पुलिस को दो। आधे से मौज करो।’’; चार, पुलिस में पैसा कमाने का दूसरा तरीका है डंडा परेड। बेरों के पेड़ को जितने ज्यादा पत्थर पड़ें, बेरी से उतने ही ज्यादा बेर झड़ते हैं। यही उसूल पुलिस का है।’’; पांच, ‘‘वैसे तो सिपाहियों की बेगारें ही कम नहीं है। दिन ढलते ही बोतल मांगने आ जाते हैं। हवलदारों-थानेदारों का महीना अलग और बेगार अलग।’’, छह, ‘‘पुलिस के सिस्टम में कई बदलाव आ गए। हर किसी ने अपना भाव दो गुणा कर दिया था। जेब पांच सौ की काटो, उन्हें हजार चाहिए।’’; सात, ‘‘अब तो पहले यह पूछते हैं कि कैसी रिपोर्ट चाहिए? जैसी फीस वैसा मुआयना। कत्ल को खुदकुशी बना देते हैं, और खुदकुशी को कत्ल।’’; आठ, ‘‘खूंखार नक्सली की छवि बनाकर बसंत को पकड़ा और पुलिस मुकाबला बनाकर गोली से उड़ा दिया।’’; नौ, ‘‘रंडियां थानों में बैठी रहती हैं। थानेदार उन्हें बराबर की कुर्सी देते हैं। उनकी सुनवाई जनप्रतिनिधियों से ज्यादा है।’’
पुलिस-संसार की एक नई सड़ांधभरी अनेक परतें तफ्तीश में मौजूद हैं। पढ़ते समय पाठक को यह जरूर महसूस होगा कि किस प्रकार की पुलिस के बल पर देश का शासक वर्ग भारतीयों की पीठ पर लदा हुआ है। उदाहरण के लिए, मुख्यमंत्री बंटी की तलाश और अपराधियों को पकड़ने की तारीख निर्धारित कर देता है। डेड लाइन करीब आती जाती है। पुलिस महकमें के हाथ-पांव फूलने लगते हैं। अंततोगत्वा पुलिस के चक्रव्यूह में दो निर्दोष व्यक्ति ‘पाला और मीता’ फंस जाते हैं। दोनों ही गरीब और मलिन बस्तीवासी होते हैं। पाॅकेटमारी जैसे मामूली अपराधों से वे जीवन गुजर बसर करते हैं। पुलिस भी उसमें हिस्सेदार होती है। इन दोनों को बंटी का अपहरणकर्ता घोषित कर दिया जाता है। मुख्यमंत्री और जनता से वाहवाही लूटने के लिए बंटी की लाश बरामद कहीं होती है, दिखाया कहीं जाता है।
रामराज्य के दूसरे खंड कटैहरा में निचली अदालतों, जजों और वकीलों की दुनिया को उघाड़ा गया है। जब पाला और मीता का मामला अदालत में पहुंच जाता है और पुलिस उन्हें फांसी की सजा दिलवाना चाहती है, तब क्रूर न्यायिक प्रक्रिया का नया सिलसिला शुरू होता है। ‘कटैहरा’ में यह दिखलाया गया है कि किस प्रकार निर्दोष लोगों को दंडित किया जाता है; फैसले कैसे बदलवाये जाते हैं; न्याय को कैसे खरीदा जाता है; मजिस्ट्रेट व जजों की नियुक्तियां किस प्रकार की जाती हैं; पुलिस और न्यायिक अधिकारियों के बीच किस प्रकार गठबंधन होता है; दोनों की परस्पर अपेक्षाएं क्या होती हैं। संक्षेप में, अदालतें एक ‘नीलाम-बाजार’ का रोल अदा करती हैं। लेखक ने अमानवीय अदालती प्रक्रिया को लेकर कई मार्मिक टिप्पणियां की हैंः ‘‘एक, मुलजिम सिरे के नंगे भूखे थे। वैसे भी निर्दोष थे। थोड़ा-सा भी दम होता तो वह केस में क्यों फंसते? दूसरों की तरह पैसे देकर छूट न गए होते; दो, सभी शाम को शराबी हुए होते हैं। कोई किसी वकील के खोखे में लेटा होता है, कोई किसी चैक पर, कोई किसी आवारा औरत को लेकर रिटायरिंग रूम में घुसा होता है और कोई ताश को लेकर कोर्ट रूम को जुआखाना बनाए बैठा होता है; तीन, कौन-सा ऐसा जुर्म है जो तुम लोग नहीं करते? मिसलें वकीलों के घरों में पहुंचा देते हो। सभी गुप्त दस्तावेजों की नकलें उनके पास होती हैं। तुम लोग वसीयतों, प्रनोटों और रिकार्ड में हेराफेरी करते हो; चार, पाले और मीते को सजा होने में सबका भला था। दो सच्चे लोगों को फांसी लग भी गई तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ना था। पहले भी हजारों निर्दोषों का कत्ल हो गया था। दो और हो गए तो कौन सा संसार सूना हो जाना था?; पांच, जज ने कौन सा कोल्हू खींचना था। वसीयत को झूठा करार दे दिया और झूठी को असली बना दिया; छह, खुश हुआ मुख्यमंत्री उसे सुप्रीम कोर्ट भी भेज सकता था। कोई जांच आयोग बिठाकर उसका चेयरमैन भी बना सकता था। राज्यपाल या राजदूत बनाने की सिफारिश भी कर सकता था।’’
वास्तव में बंटी और पाला व मीता केस के माध्यम से मित्रसेन ने दर्जनों प्रकरणों को उठाया है। इन प्रकरणों के माध्यम से न्यायिक प्रक्रिया की निम्नतम तलहटी की पड़ताल की गई है। लेखक ने विभिन्न घटनाओं के माध्यम से यह दर्शाया है कि न्यायिक प्रक्रिया स्वतंत्र नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व का वर्चस्व रहता है। न्यायिक अधिकारी भी छोटे-छोटे प्रलोभनों में धंसे रहते हैं। पुलिस वाले भी जजों और वकीलों की सही-गलत जरूरतों को पूरा करने के लिए तत्पर रहते हैं। सामान्य व कमजोर वर्ग के खिलाफ एक कुचक्र चलता रहता है जिसमें शरीक हैं नेता, पुलिसकर्मी, जज-मजिस्ट्रेट, वकील और समाज के हैसियतदार।
उपन्यास का पटाक्षेप ‘सुधार घर’ खंड से होता है। असलियत में इसे ‘यातना और अपराधी जनन घर’ कहा जाना चाहिए। जेल में सुधार कार्यक्रम को छोड़कर वे तमाम स्थितियां मौजूद हैं जो किसी भी निर्दोष व भले इंसान को ‘दाउद इब्राहिम’ बना सकती हैं; एक भली औरत को गर्भवती बना सकती हैं। इस तथाकथित सुधार घर में जुआ, सट्टा, रिश्वतखोरी, तस्करी, हत्या के षड्यंत्र, आतंकवाद, बलात्कार, लौंडेबाजी, जातिवाद आदि प्रचुर मात्रा में मौजूद हैं और ये लोकतंत्र व न्याय व्यवस्था को चिढ़ाते रहते हैं। यदि कोई कैदी ‘जेल मैन्युअल’ की मांग करता है तो उसे विद्रोही व हिंसक घोषित कर दिया जाता है। यदि आपके खीसे में पैसा है तो अच्छे बैरक में भेज दिया जाता है। बीमारी व उपचार के नाम पर आपको तमाम प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध करा दी जाती हैं। जेल को भी वृंदावन बना दिया जाता है। वरना, आप नरक में रहने के लिए अभिशप्त हैं ही। मीता की यह सटीक टिप्पणी है, ‘‘…मुशकत्ती लगाने के लिए भी जेल वाले पैसे मांगेंगे, हम पैसे लाएंगे कहां से? हमें एड़ियां रगड़कर ही जीना होगा।’’, या ‘‘जेल में बंद आधे से ज्यादा कैदियों को सजा वकीलों की लापरवाही अथवा लालच के कारण होती है।’’ इसमें गुरनाम सिंह जैसे पात्र हैं जो सुनियोजित ढंग से जेल में आते हैं और बंद रहते हुए अपना काला कारोबार चलाते हैं। ऐसे अपराधी पैसे के बल पर विशेष सुविधा भी प्राप्त कर लेते हैं। इस सुविधा की ओट में कैदी सुरंग बनाते हैं, भागने की कोशिश करते हैं। बंटी के असली अपराधी पकड़े भी जाते हैं, लेकिन किसी दूसरे जुर्म में। जेल में उन्हें तमाम सुविधाएं प्राप्त हैं। दूसरी तरफ मीता और पाला फांसी का इंतजार कर रहे हैं। उपन्यास में कहा गया है ‘बंटी कत्ल केस की सुनवाई मुकम्मल हो चुकी है। अदालत फैसला सुनाने वाली है। सारे गवाहों ने पाले व मीते को दोषी ठहराया है। पाले व मीते को निर्दोष ठहराने पर पुलिस के साथ-साथ सरकार की भी थू… थू होगी। पहले पुलिस अफसरों की खिंचाई होगी। बहुत सारों को नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा।’ जेल के कारनामों की एक और बानगी। जेल में खूंखार अपराधी ‘‘घड़े में पर्चियां डालते थे। जिसका नाम निकल आता उसको दुनिया से उठा देने का हुक्मनामा जारी करते थे। डाॅक्टरों, वकीलों व उद्योगपतियों का अपहरण करते थे। भारी फिरौतियां वसूलते थे।’’
उपन्यास का कैनवास बहुत बड़ा है। बंटी प्रकरण को लेकर कांगे्रस, भाजपा और अन्य दलों के बीच चली सियासत को भी नंगा किया गया है। नेताओं की दिलचस्पी ‘वोट’ के इर्द-गिर्द घूमती है। ‘बंटी प्रकरण’ एक हथियार बन जाता है अपनी-अपनी राजनीति को चमकाने का। लेकिन लेखक मीत ने इस नरक में भी आशा के कुछ द्वारों को खुला रखा है। पूर्व क्रांतिकारी बाबा के नेतृत्व में शहर की प्रगतिशील शक्तियां संगठित होती हैं। उनके मार्ग में पुलिस और सरकार की तरफ से अनेक बाधाएं पैदा की जाती हैं। लेकिन बाबा और उनके साथी आरंभ से अंत तक संघर्ष करते हैं, असली दोषियों को उजागर करते हैं और मासूम पाला व मीता को बाइज्जत बरी करवा लेते हैं। इस उपन्यास का यह सबसे सशक्त पक्ष है जिसमें सामूहिकता के महत्व को स्थापित किया गया है। उपन्यास के अंत में बाबा कहता भी है, ‘‘…संघर्ष निजी फायदों के लिए नहीं, उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं। इस संघर्ष की बुनियाद एक व्यक्ति के मन में सुलगी चिंगारी से पड़ी थी। अब देखो इस चिंगारी ने कितना प्रचंड रूप धारण कर लिया है।’’ वास्तव में लेखक ने बाबा के किरदार के माध्यम से हिंसा, अंहिसा, व्यक्तिवादिता, सामूहिकता, प्रतिरोध की शक्ति जैसे मुद्दों के व्यावहारिक और सैद्धांतिक पक्ष को प्रस्तुत किया है। देश में लोकतंत्र का जिस कदर तेजी से हाशियाकरण किया जा रहा है, बाबा और उसके साथियों ने संघर्ष से उसे रोकने की कोशिश की है। वैज्ञानिक सोच सत्य और मानवतावाद का एक विशाल फलक ये लोग समाज के समक्ष रखते हैं। कोई निर्दोष मीता और पाला जेलों में न रहे, वे खुले आकाश में सांस लें, इस सुखद व आशा भरे स्वप्न के साथ रामराज्य का पटाक्षेप हो जाता है!
उपन्यास में कई कमजोरियां भी हैं। इसमें दोहराव की मात्रा कचोटती है। कई अनावश्यक विवरणों को छोड़ा जा सकता था। उपन्यास में कसाव की आवश्यकता है। लेखक ने स्वयं स्वीकार किया है कि हिंदी अनुवाद में झोल हैं। उपन्यास की मूल भाषा पंजाबी में कृति को जितना ‘पावरफुल’ माना गया है, हिंदी में यह वैसी नहीं बन सकी है। इस उपन्यास का महत्व इसके शिल्प या कलापक्ष में नहीं है। इसकी उपादेयता, इसकी कथावस्तु, लेखक की दृष्टि और जनपक्षधरता में निहित है। यह भारतीय लोकतंत्र का महागद्य काव्य, विराट रिपोर्ताज और प्रयोगात्मक डाक्यूड्रामा है। व्यवस्था के पुर्जे होते हुए भी मित्रसेन मीत ने जिस दुस्साहसिकता का परिचय दिया है, इसके लिए वे हम सभी के ‘सलाम’ के हकदार हैं।
और अंत में।
रामराज्य की प्रकाशक हरियाणा पुलिस अकादमी भी बधाई की पात्र है जिसने पुलिस के चरित्र के विपरीत यह उदाहरणीय काम किया। अकादमी के पूर्व कर्ताधर्ता विकास नारायण राय ने उपन्यास के आरंभ में सही ही कहा है, ‘‘हरियाणा पुलिस अकादमी के संवेदी पुलिस, संवेदी समाज पाठ्यक्रम के अंतर्गत यह प्रकाशन निश्चय ही भारतीय अपराध-न्याय व्यवस्था के तीन आयामोंµपुलिस, अदालत, जेलµसे जुड़े सभी पक्षों को संवेदित करने की क्षमता लिए हुए है।’’