तथ्यों और तारीखों के बोझ से मुक्त एक जीवनी
July 7th, 2010सुल्तान त्यागी
मक़बूल: अखिलेश; राजकमल प्रकाशन;
पृ: 95; मूल्यः 300
ISBN : 978.81.267.1863.4
अखिलेश द्वारा लिखित ‘‘(मकबूल) मकबूल फिदा हुसैन की जीवनी’’ को लेखक ने दो भाग में बांटकर लिखा, पहला भाग जिसका शीर्षक ‘लो, वो दिखाई दिए हुसैन’ कृति का लगभग आधा भाग है बाकी आधे भाग को मां, दादा, चिमनी, नई मां, बड़ौदा की तालीम, कैमरा, मालवा, आगाज, फाजिला जैसे शीर्षकों से पूरा किया। लेखक ने पहले भाग में हुसैन और अपने रिश्तों के लगभग 50 वर्षों के अंतराल का जिक्र किया। इस दौर में लेखक के हुसैन से पारिवारिक संबंध थे और कि हुसैन उनके पिता के भी मित्र थे इस नाते वे हुसैन जैसे बड़े कलाकार से लिबर्टी ले सकते थे, जो उन्होंने ली भी। लिखने के क्रम में भी वे इस लिबर्टी का मोह संवरण नहीं कर पाए।
हुसैन को ये दुनिया इसलिए नहीं जानती कि वो पंडरपुर में पैदा हुए बल्कि एक खास तरह की रचनात्मकता के वैशिष्टय से वे जाने जाते हैं। उनकी कला ने समय के दर्द को उकेरा व उनकी चित्र कल्पना मजबूत और विस्तृत संदर्भों वाली है। हुसैन एक मजबूत चित्र भाषा के धनी हैं। हुसैन की कला की महाकाव्यात्मकता ऐतिहासिकता को अधुनातन संबंधों से जोड़ती है। रेखाओं का सामथ्र्य व रंग लेपन की दु्रतगति का जादू उनकी 1950 की पहली प्रदर्शनी में ही छा गया था। 1955 में हुसैन को राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। इस दौर में ‘मकड़ी और लैंप के बीच’, ‘जमीन’, ‘नीली रात’, ‘घोड़ा’ इत्यादि चित्र बलशाली रेखाओं में आईं।
यह भी समझ से परे है कि जीवनी में हुसैन के जीवन का वह पक्ष क्यों छोड़ दिया गया जिसके लिए वे जाने जाते थे। एक साक्षात्कार में हुसैन ने कहा, ‘‘… अहमदाबाद में मियां बीबी को बैल की तरह वजन ढ़ोते देख… इससे प्रभावित होकर मैंने अनगिनत रेखांकन किए…’’ या ‘‘…जब मैं औरत का नग्न चित्र बनाता हूं तो उसकी नग्नता में नंगापन नहीं होता। उस तरह की नग्नता आपको मंदिर की कला में मिलती है। काॅस्मिक किस्म की नग्नता…’’ या बंगाल शैली के लिए, ‘‘…बंगाल में जिस तरह की कला जाग रही थी, वह हमें बिल्कुल आकर्षित नहीं करती थी… प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट गु्रप ने इन लोगों को चुनौती दी। हमारे चित्र अस्वीकृत हुआ करते थे’’ या ‘‘… आज अत्यधिक निजपन पर जोर है… शक्ति हमारे पीछे काम नहीं करती, इससे हमारी कला में निरंतरता नहीं रह गई।’’ या ‘‘हमारी कला की जबान ही अंतर्राष्ट्रीय है, उसका अपना ओरिएंटल स्वभाव भारत, चीन व जापान की कला में खोजा जा सकता है…’’
हुसैन प्रगतिशील कलाकार संघ के प्रमुख स्तंभ थे। यह संगठन प्रगतिशील मूल्यों के प्रति समर्पित था। यह संघ बीसवीं सदी के बाद के बदलते कला परिदृश्य के कलाकारों का मंच था कला के नए मानदंडों की इन्होंने पड़ताल की, विशेषतः सोवियत तंत्र के बदलाव के कारकों से यह कला जुड़ी।
हुसैन की कला शास्त्रीय कला के अनुशासन को छोड़ने की कला है, जहां बात कहने की प्रमुखता पर बल दिया जाता है इस नाते इनकी कला के सार और प्रसार के तत्व भिन्न हैं। इससे रंग, रेखा व धरातल के नए सौंदर्य का निर्माण हुआ। अब कला विशिष्टतावाद से बचकर आम आदमी के करीब आई व कला को देखने व समझने की नई दृष्टि पैदा हुई। आकार के सारल्य और रंग की नई समझ पैदा हुई तथा धरातल को बरतने की नवीन सरणीय प्रकट होने लगी।
पूंजी और फासिस्ट फैक्टर के वर्चस्व के इस दौर में क्यों समानता, स्वतंत्रता वा बंधुत्व जैसे मूल्यों को साम्यवादी बताकर अनदेखा किया जा रहा है जबकि उदारवादियों ने ही इन मूल्यों को स्थापित किया था। आखिर क्यों कला का ऐसा जनपद बनाया जा रहा है जहां मानवीय सार न हो, सामाजिक सरोकार न हो केवल हो तो शैल्पिक भव्यताएं, स्वैरकल्पिक संवेदनाएं और हों ऐसे स्वायत्त लैंडस्केप, सीस्केप व हवाई स्कैपीय कल्पनाएं जिसको मानवीय प्रदूषण ने छुआ तक न हो एकदम टटके, ताजा व विशुद्ध दैवीय, यहीं से उपजा पाप, आप व दादा आर्ट के विकास का क्रम।
ऐसे समय में यह भी अचानक नहीं हुआ कि हुसैन की जीवनी में उसके निर्वासन के तीन सालों का जिक्र तक नहीं है। इस जीवनी में उनके किसी चित्र, रेखांकन की कोई फोटो अनुकृति नहीं है जो एक पेंटर की जीवनी के लिए जरूरी हो और तो और एक कलाकार की इस जीवनी में उनके रचनासंघर्षों व रचना प्रक्रिया का कतई जिक्र नहीं है केवल है तो बकौल कृष्ण बलदेव वैद के ‘एक बेमिसाल जवां मर्द बुजुर्ग कलाकार के बचपन, लड़कपन और इब्तदाई जवानी की कहानी।’’
इस जीवनी में उस खबर का भी कोई जिक्र नहीं है जिसने दुनिया के बौद्धिक जगत को सन्न कर दिया था, ‘‘आई, द इंडियन ओरिजिन पैंटर, एम.एफ. हुसैन एट 95, हैव बीन आनर्ड बाई कतर नेशनालिटी’’। इसके साथ एक कोणात्मक व उखड़ी रेखाओं वाला एक चित्र भी साया हुआ। इस चित्र के अंकन में कलाकार की यंत्रणा, त्रासदी व आक्रांतता की बानगी मिलती है। हालांकि पहले हुसैन के लिए थोड़ा एक ऐसा रूपक था जिसमें गति व शक्ति के सांस्कृतिक मिथकों की कथा पूरी होती होµचाहे उसे आप ताजियों के दुलदुल घोड़े के रूप में देखें या समुद्र मंथन के उच्चैश्रवा। वस्तुतः इस चित्र के शारीरिक छंद में भयानक रस की उत्पत्ति हुई। ऐसा लगा जैसे यह हुसैन की तरफ से भारत के लिए लास्ट लोगो हो। हुसैन ने इस देश के मिथ व परंपरा की पहचान अपनी कला में दी और इसको एक वैश्विक विस्तार दिया, उसको नए संदर्भों, नए शिल्प में ढालने के आंदोलन में शामिल हुए।
ऐसे समय में जब हुसैन निर्वासन की त्रासद जिंदगी जी रहे हों तब उनकी जीवनी पर कृष्ण बलदेव वैद की यह टिप्पणी गैर जरूरी लगती है कि ‘‘अखिलेश ने इसे तारीखों और तथ्यों के बोझ से आजाद कर जो बहाव दिया है उसमें से मकबूल की मासूम और शरारती सूरत खूब उभरी…’’ हुसैन एक जिम्मेदार और संघर्षशील कलाकार थे क्यों ये तथ्य और तारीखें छुपाई गई यह भी समझ में आने वाली बात है। पाठकों को हुसैन की रचना प्रक्रिया से संबंधित कुछ और ब्यौरे, कुछ और तथ्य और कुछ और तारीखें मिल जाती तो क्या बुरा था। क्यों कला के ऐसे-ऐसे एंगल विकसित हुए कि हड्डीय, मांस चबाने की चीस व चीत्कार पे्रक्षक को हिंसक न लगे हिंसा को आमफहम बनाने के विभावों को सौंदर्य का हिस्सा बताया जा रहा है तथा हिंसा को नई तरह से देखने की दृष्टियां ईजाद की जा रही हैं।
अंत में भूमिका के उपसंहार की यह टिप्पणी, ‘‘अपने मित्रों उदयन वाजपेयी, मदन सोनी, पीयुष दहिया, ओम शर्मा, राकेश श्रीमाल का भी आभार व्यक्त करता हूं जिनकी समालोचक दृष्टि के कारण ही मैं पाठ को पटरी पर रख सका।’’ काश ये पाठ कुछ और तिरोहित, कुछ और पटरी से बेकाबू हो जाता तो कुछ और तथ्य कुछ और तारीखें मिल जाती।