सुबह का रंग भूरा

July 7th, 2010

फ्रांक पावलोफ

‘सुबह का रंग भूरा’ (माटिन ब्रुन) नाम की 12 पृष्ठों की दस्तावेज सरीखी कहानी के लेखक हैं फ्रांक पावलोफ। फ्रांसीसी लेखक पावलोफ पेशे से मनोविज्ञानी हैं और बाल अधिकारों के विशेषज्ञ हैं। उन्होंने सामुदायिक विकास और नशा विरोधी अभियानों के तहत अपना काफी वक्त अफ्रीकी और एशियाई देशों में बिताया है। पावलोफ ने वयस्कों के लिए और बच्चों के लिए उपन्यास भी लिखे हैं। उन्होंने कविताएं भी लिखी हैं। वह फ्रांस के ग्रोनोबेल में रहते हैं।
‘माटिन ब्रुन’ नाम की कहानी 1998 में मूल रूप से फ्रांसीसी में लिखी गई थी। इसकी प्रसिद्धि के बाद 2003 में इसका अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित हुआ।
असल में यह किताब एक व्याख्यान था जो 1998 में फाशिज़्म पर हुए एक फ्रांसीसी सेमिनार के लिए तैयार किया गया था। उस दौर में फ्रांस का रोन-आल्प्स इलाका धुर दक्षिणपंथी राजनीति में मुब्तिला हो गया था। ‘माटिन ब्रुन’ फासीवाद के ख़िलाफ एक नई लहर के रूप में, एक ताजा झोंके की तरह देखी गई। शाएने नाम के एक छोटे से प्रकाशक ने व्याख्यान को किताब में बदल डाला। एक नन्हीं-सी किताब। 12 पन्नों की। देखते ही देखते किताब के चर्चे होने लगे। तीन साल में इसकी 20 हजार प्रतियां बिक गईं। 2002 में यां मेरी ली पेन नाम के दक्षिणपंथी नेता फ्रांस के राष्ट्रपति चुनावों की दौड़ में दूसरे दौर तक पहुंचने में सफल रहे। फ्रांस स्तब्ध था कि आखिर वह किस रास्ते को अख़्तियार करने जा रहा है। रेडियो फ्रांस-इंटर के प्रसारक विंसेंट योसे ने उन्हीं दिनों इस किताब और उसमें दर्ज संदेशों का जिक्र कर डाला। उससे पहले वह ली पेन का इंटरव्यू प्रसारित कर चुके थे। उस दिन जैसे ही किताबों की दूकानें खुलीं, प्रकाशकों के फोन और फैक्स घनघनाने लगे। और तब से वे बंद नहीं हुए हैं।
और तब से ही‘माटिन ब्रुन’ फ्रांस की बेस्टसेलर किताबों की सूची में शामिल रहती आई है और आकलन है कि इसकी पांच लाख से ज़्यादा प्रतियां बिक चुकी हैं। कई भाषाओं में इसका अनुवाद किया जा चुका है। उत्तर भारत के देहरादून से नटराज पब्लिशर्स ने इसका अंग्रेजी अनुवाद छापा है।
एक सर्वसत्तावादी समाज किस तरह से सोच-विचार के तरीकों से लेकर रहन-सहन और जीवनशैलियों की स्वाभाविकता में ख़लल और आखिरकार डकैती डालकर गिरवी बना लेता है, ‘माटिन ब्रुन’ मनुष्य जीवन में ऐसी राजनैतिक सामाजिक सांस्कृतिक दुर्घटनाओं, विपदाओं की सूचना का दस्तावेज है। स्वेच्छाचारी, निरंकुश और फाशिस्ट चरित्र वाला ब्राउन स्टेट जब बन रहा होता है तो क्या ‘गुल’ खिलते हैं, इस कहानी में एक सामान्य जीवन गतिविधि के अंडरकरेंट में मचे उत्पात की एक उतने ही अंडरकरेंट व्यंग्य के साथ झांकी देखने को मिलती है।
सब कुछ सामान्य तो है, लेकिन कितना कुछ बदल जाता है देखते ही देखते, जैसे एक सुबह की रंगत। ये कहानी यथास्थितिवाद से जूझने और निकलने का एक अनिवार्य पाठ मानी गई है।

चार्ली और मैं धूप में बैठे थे। हम दोनों में से कोई ज्यादा बात नहीं कर रहा था। बस दिमाग में आ रहे ऊलजलूल ख़यालों के बारे में परस्पर बतिया रहे थे। ईमानदारी से कहूं, तो मैं उसकी बात पर बहुत ध्यान नहीं दे रहा था। हम काॅफी की चुस्कियां ले रहे थे और समय सुखद गति से व्यतीत हो रहा था। हम दुनिया की गतिशीलता को निहार रहे थे। वह मुझे अपने कुत्ते के बारे में कुछ बता रहा था। किसी इंजेक्शन के बारे में जो उसे कुत्ते को देना पड़ा था। लेकिन तब भी मैंने वाकई ज़्यादा गौर नहीं किया।
बेचारे जानवर की तक़लीफ दुखद थी। हालांकि ईमानदारी से कहें तो उसकी उम्र 15 साल थी, जो कुत्ते के लिए एक भरीपूरी आयु है, इसलिए तुमने सोचा था कि वह इस बात से वाक़िफ है कि कुत्ते को किसी दिन जाना ही है।
‘देखो,’ चार्ली ने कहा, ‘मैं उसे भूरे रंग का तो नहीं बता सकता था।’
‘हां जाहिर है। वह आखिर एक लेब्राडोर था, वो काला लेब्राडोर ही तो था न ? ‘खैर छोड़ो, उसे हुआ क्या था?’
‘कुछ भी नहीं। बस यही कि वो भूरा कुत्ता नहीं था। बस इतना ही।’
‘क्या? तो उन्होंने अब कुत्तों पर भी शुरू कर दिया।’
‘हां।’
पिछले महीने बिल्लियों के साथ ऐसा हुआ था। मैं बिल्लियों के बारे में जानता था। मेरे पास भी एक थी। एक आवारा बिल्ली जिसे मैंने पाला था। काले और सफेद रंग की एक नन्ही गंदी-सी बिल्ली। मैं उसे पसंद करता था। लेकिन मुझे उससे छुटकारा लेना पड़ा।
मेरे कहने का मतलब है कि उनके पास भी तर्क है। बिल्लियों की आबादी बेक़ाबू हो रही थी। और जैसा कि सरकारी वैज्ञानिक कह रहे थे कि मुख्य चीज है भूरी बिल्लियों को ही पालना। ताजा प्रयोगों के मुताबिक भूरे पालतू जानवर दूसरों के मुक़ाबले हमारी आधुनिक शहरी जिंदगी के लिहाज से ज्यादा अनुकूल हैं। वे कम गंदगी करते हैं और खाते भी बहुत कम हैं। किसी भी हालत में, बिल्ली आखिर बिल्ली है और भूरे रंग से इतर रंग वाली बिल्लियों से छुटकारा पाकर एक बार में ही समस्या का निदान कर लेना समझदारी की बात है।
सैन्य पुलिस आर्सेनिक की गोलियां मुफ्त दे रही थी। आपको करना ये होता था कि उनके खाने में गोलियां मिला दो और कहानी ख़त्म।
एकबारगी मेरा दिल टूट गया। लेकिन मैं जल्द ही इससे उबर गया।
मुझे ये बात मान लेनी चाहिए कि कुत्तों की ख़बर ने मुझे थोड़ा-सा झिंझोड़ दिया था। मुझे नहीं पता था कि क्यों, ख़ासकर। शायद इसलिए कि वे अपेक्षाकृत बड़े होते हैं। या शायद इसलिए कि, वे मनुष्य के सबसे अच्छे दोस्त होते हैं, जैसा कि कहा जाता है।
खैर, चार्ली ने इस मामले में क़दम बढ़ा ही दिए थे। और ये सही भी था।
आखिरकार, इन चीजों के बारे में ज़्यादा ही माथापच्ची करने से कुछ होना-हवाना नहीं था। और जहां तक भूरे कुत्तों की बात है कि वे औरों से बेहतर हैं, मैं समझता हूं ये बात सही ही होगी।
हम दोनों के बीच ज्यादा कुछ बात करने लायक नहीं बचा तो थोड़ी देर बाद हमने अपनी अपनी राह ली।
लेकिन दिमाग के कोने में मुझे लग रहा था कि कुछ अनकहा रह गया है। बाकी का दिन, इसी संदेह के साए में गुजरा।
इस घटना को बीते ज़्यादा दिन भी न हुए कि चार्ली को ब्रेकिंग न्यूज देने की मेरी बारी आ गई। मैंने उसे बताया कि डेली अब कभी नहीं छपेगा।
द डेली, जिसे वह काॅफी पीते हुए हर सुबह पढ़ता था।
‘तुम कहना क्या चाहते हो? क्या वे हड़ताल पर हैं ? क्या वे दिवालिया हो गए हैं या कुछ और?’
‘नहीं, नहीं। ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका संबंध कुत्तों वाले मामले से है।’
‘क्या, भूरे वाले ?’
‘बिल्कुल सही। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरा जब उन्होंने उस नए कानून के बारे में बात न की हो। बात यहां तक आ पहुंची कि उन्होंने वैज्ञानिक तथ्यों पर ही सवाल उठाने शुरू कर दिए थे। मेरे कहने का मतलब ये कि पाठकों को पता ही नहीं था कि वे और क्या सोचें। उनमें से कुछ ने अपने कुत्ते छिपाने शुरू कर दिए थे !’
‘लेकिन ये तो संकट को बुलावा है !’
‘हां, बिल्कुल, और इसीलिए अब अखबार पर पाबंदी लगा दी गई है।’
‘तुम मजाक कर रहे हो। रेसिंग का क्या होगा ?’
‘हूं, मेरे पुराने दोस्त, तुम्हें तो उस बारे में टिप्स आने वाले दिनों में ब्राउन न्यूज से लेनी शुरू करनी होगी। नहीं लोगे क्या। और कुछ भी नहीं है यहां। ख़ैर घुड़दौड़ का उनका सेक्शन ऊपरी तौर पर बुरा नहीं है।’
‘दूसरे बहुत आगे निकल गए। लेकिन आखिरकार तुम्हें किसी तरह का अखबार तो मिल ही रहा है। यानी क्या चल रहा है ये जानने का तुम्हारे पास कोई जरिया तो रहेगा ही। क्यों ?’
मैं चला था कि चार्ली के साथ इत्मीनान से काॅफी पिऊंगा। और यहां मैं ब्राउन न्यूज का एक पाठक बनने की चर्चा में ही उलझा हुआ था। कैफे में मेरे आसपास बैठे और लोग अपने में व्यस्त थे जैसे कुछ हुआ ही न हो। मैं जाहिरा तौर पर ख़ामाख़्वाह हलकान हुए जा रहा था।
उसके बाद बारी थी लाइब्रेरी की किताबों की। इस बारे में भी कुछ ऐसा था जो सही नहीं था। ‘द डेली’ सरीखे संगठनों से जुड़े प्रकाशन संस्थानों को अदालत में घसीटा गया था और उनकी किताबें, पुस्तकालयों और किताबों की दुकानों से हटा ली गई थीं। लेकिन फिर दोबारा उनकी प्रकाशित हर चीज में कुत्ता या बिल्ली शब्दों का उल्लेख होता महसूस होता था। हमेशा ‘भूरे’ शब्द के साथ न भी हो, तब भी। तो उनकी मंशा जाहिर थी।
‘ये तो बिल्कुल बुड़बक बात है,’ चार्ली ने कहा। ‘कानून, कानून है। उसके साथ चूहे बिल्ली का खेल करने का कोई मतलब नहीं।’
‘भूरा,’ उसने जोड़ा, अपने आसपास देखते हुए कि कहीं कोई हमारी बातचीत सुन तो नहीं रहा था। ‘भूरा चूहा।’
सुरक्षा के लिहाज से हमने वाक्यांशों, या दूसरे खास शब्दों के पीछे ‘भूरा’ जोड़ना शुरू कर दिया था। हम ब्राउन पेस्टी के बारे में दरयाफ्त करते, शुरू में ये थोड़ा अटपटा लगा लेकिन स्लैंग तो यूं भी हमेशा बदलता रहा है, इसलिए हमें कोई फर्क नहीं पड़ता था कि हम अपनी बात के आखिर में ‘भूरा’ जोड़ें या कहें, भाड़ में जाओ। जो कि हम आमतौर पर कहते ही थे। कम से कम इस तरह हमने कोई मुसीबत मोल नहीं ली थी। और यही तरीका हमें अच्छा लगता था।
यहां तक कि हमें घोड़ों पर भी जीत नसीब हुई। मेरा मतलब, ये कोई जैकपाॅट या और कुछ नहीं था। लेकिन ये थी तो जीत ही। हमारी पहली भूरी विजय। और इस तरह बाकी हर चीज ओके लगने लगी।

चार्ली के साथ बिताया एक दिन मैं हमेशा याद रखूंगा। मैने उसे कप का फाइनल देखने के लिए अपने घर बुलाया था। और जैसे ही एक दूसरे से मिले, हम हंस पड़े। उसने नया कुत्ता लिया था। वह एक विशाल भारी जानवर था। पूंछ की नोक से लेकर थूथन तक भूरा का भूरा। उसकी आंखें भी भूरी थीं।
‘है न गजब का !, ये मेरे पुराने कुत्ते से ज़्यादा दोस्ती वाला है। ज़्यादा स्वामिभक्त भी। मैं भी उस काले लेब्राडोर के बारे में क्या बातें लेकर बैठ गया था।’
जैसे ही उसने ये कहा, उसके नए कुत्ते ने सोफे के नीचे डाइव मारी। और भौंकना शुरू कर दिया। और हर भूंक में मानो वह कहता था, ‘मैं भूरा हूं! मैं भूरा हूं ! और कोई मुझे नहीं बताता कि मुझे क्या करना है !’
हमने उसे हैरत से देखा। और तभी सिक्का गिरा।
‘तुम भी ?’ चार्ली ने कहा।
‘मैं डर गया हूं।’
आप देखिए, उसी वक़्त मेरी नई बिल्ली कमरे में कूदी और अलमारी के ऊपर छिपने के लिए पर्दे पर जा चढ़ी। भूरे फर वाली बिल्ली। और वे भूरी आंखें जो लगता था, आप जहां-जहां जाते हैं, वे आपका पीछा करती रहती हैं। और इसीलिए हम दोनों हंस पड़े थे। संयोग के भी क्या कहने !
‘मैं भी बिल्ली वाला आदमी हूं वैसे। देखो कितनी प्यारी है, है न ?’।
‘सुंदर,’ उसने अपना सिर हिलाते हुए कहा।
फिर हम टीवी की ओर मुखातिब हुए। हमारे दोनों भूरे जानवर अपनी आंखों के कोनों से एक दूसरे को होशियारी से घूर रहे थे।
मैं आपको नहीं बता सकता कि इतना सब होने के बाद आखिर उस दिन फाइनल किसने जीता। मैं उस दिन को वास्तविक हंसी के दिन की तरह याद रखता हूं। हमने वाकई महसूस किया कि शहर भर में जो बदलाव किए जा रहे थे उनके बारे में आखिरकार चिंतित होने की कोई वजह नहीं थी। मतलब, आप वही करते थे जो आपसे अपेक्षित था। और आप सुरक्षित थे। शायद नए निर्देशों ने हरेक की जिंदगी आसान बना दी थी।
जाहिर है, मैंने उस छोटे बच्चे को भी अपने ख़यालों में जगह दी थी जो उस दिन सुबह मुझे दिखा था। वह सड़क के दूसरे किनारे पर घुटनों के बल बैठा रो रहा था। उसके सामने जमीन पर एक नन्हा-सा सफेद कुत्ता मरा पड़ा था। मैं जानता था कि वह जल्द ही इस हादसे से उबर जाएगा। आखिरकार ऐसा नहीं था कि कुत्तों की मनाही कर दी गई थी। उसे करना ये था कि भूरा कुत्ता लाना चाहिए था। आपको ठीक वैसा ही गोद में खिलाया जाने वाला पूडल मिल सकता था, जो वहां उस बच्चे के पास था। तब वह भी हमारी तरह होता। ये जानकर अच्छा लगता है कि आप कानून का सही पालन करते हैं।
और फिर कल, ठीक ऐसे वक़्त जब मुझे लगता था कि सब कुछ सही है, मैं बाल-बाल बचा वरना सेना पुलिस ने मुझे धर लिया होता। भूरी पोशाक वाले लोग। वे कभी भी आपको यूं ही नहीं जाने देते। ख़ुशकिस्मती से उन्होंने मुझे नहीं पहचाना क्योंकि वे इलाके में नए थे और हर किसी को अभी नहीं जानते थे। मैं चार्ली के घर जा रहा था। इतवार का दिन था, और मैं उसके घर ताश खेलने जा रहा था। मैं अपने साथ बीयर की कुछ बोतलें भी ले जा रहा था। आपको ताश के मजेदार खेल तो जब-तब खेलते ही रहने होंगे। मेज पर ताल बजाते हुए और कुछ चना-चबैना करते हुए दो-एक घंटे बिताने की बात थी।
जैसे ही मैं सीढ़ियों पर चढ़ा, मुझे अपनी जिंदगी का पहला धक्का लगा। उसके घर का दरवाजा खुला पड़ा था और सेना पुलिस के दो अफसर दरवाजे के सामने खड़े थे। वे लोगों से चलते रहने को कह रहे थे। मैंने ऐसे जाहिर किया जैसे मैं ऊपर की मंजिल के फ्लैट में जा रहा हूं और सीढ़ियों पर चढ़ गया। ऊपर से मैं लिफ्ट के जरिए नीचे उतर आया। बाहर सड़क पर फुसफुसाहटें शुरू हो चुकी थीं।
लेकिन उसके पास तो भूरा कुत्ता है। हम सबने देखा है।
‘ठीक है, हां, लेकिन वे कह रहे हैं कि पहले तो उसके पास काला था।
‘पहले ?’
‘हां, पहले। आपके पास पहले से ही कोई भूरा कुत्ता न होना भी अब एक जुर्म है। और इस बात की जानकारी मिलना मुश्किल नहीं है। वे कुछ नहीं करेंगे सिर्फ पड़ोसियों से पूछ लेंगें, बस।’
मैं फौरन चला आया। मेरी गर्दन के पीछे पसीने की ठंडी धार रेंगती हुई गई।
अगर पहले आपके पास किसी और रंग का जानवर होना अपराध है तो सेना पुलिस किसी भी वक़्त मेरे पीछे भी लग जाएगी। मेरे ब्लाॅक में सब जानते थे कि पहले मेरे पास काली-सफेद बिल्ली थी। पहले ! मैने इस बारे में तो कभी नहीं सोचा था।
आज सुबह, ब्राउन रेडियो ने समाचार की पुष्टि कर दी। गिरफ्तार किए गए पांच सौ लोगों में चार्ली भी था। अधिकारियों का कहना था कि भले ही उन लोगों ने हाल में भूरा जानवर खरीद लिया हो लेकिन इसका ये अर्थ नहीं था कि उन्होंने वास्तव में अपने सोचने का तरीका भी बदल दिया हो।
‘किसी पुराने समय में ऐसे कुत्ते या बिल्ली का स्वामी होना जो समरूप नहीं है, एक अपराध है,’ उद्घोषक ने एलान किया। फिर उसने जोड़ाः ‘ये राज्य के विरुद्ध अपराध है।’
उसके बाद जो हुआ वह और भी बुरा था। अगर आपने खुद कभी कुत्ते या बिल्ली न रखे हों लेकिन अगर आपके परिवार में किसी नेµआपके पिता या भाई या रिश्तेदार नेµअपनी जिंदगी में कभी भी ऐसे कुत्ते-बिल्ली पाले हों जो भूरे न रहे हों तो ऐसी स्थितियों में भी आप दोषी हैं। आप हर हाल में दोषी हैं।
मुझे नहीं मालूम कि उन्होंने चार्ली के साथ क्या किया।
ये पूरा मामला हाथ से निकल रहा था। दुनिया बौरा गई थी और मैं, भला मानुष सोच रहा था कि मैं अपनी नई भूरी बिल्ली के साथ सुरक्षित हूं।
जाहिर है, अगर वे पहले पाले गए जानवर के रंग को आधार बनाएं तो जिसे चाहें उसे गिरफ्तार कर सकते हैं।

मैं उस रात पलक तक नहीं झपका सका। मुझे शुरू से ही ‘ब्राउंस’ पर संदेह होना चाहिए था। जानवरों के बारे में उनका पहला कानून। मुझे उस समय कुछ कहना चाहिए था। आखिरकार, वह मेरी बिल्ली थी। और कुत्ता चार्ली का था। हमें सिर्फ ये कहना चाहिए थाः नहीं। उनके सामने खड़ा हो जाना चाहिए था। लेकिन हम क्या कर सकते थे? मतलब, सब कुछ इतनी तेजी से हुआ। और फिर कामकाज भी था और दुनिया भर की दूसरी चिंताएं। और यूं भी हम कोई अकेले तो थे नहीं। हर किसी ने ऐसा किया था। अपने सिर झुकाए रखे। हम महज थोड़ी-सी शांति और तसल्ली चाहते थे।
कोई दरवाजा खटखटा रहा है। ये तो सुबह का वक़्त है। बहुत सुबह। इस समय तो कोई राउंड पर नहीं आता। अभी तो उजाला भी नहीं फूटा है। अभी तो सुबह का रंग भूरा है।
जोर-जोर से दरवाजा पीटना बंद करो। मैं आ रहा हूं…।

प्रस्तुति और अनुवादः शिवप्रसाद जोशी

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