स्त्री जीवन की रचनात्मक अभिव्यक्ति
July 7th, 2010रेखा एस. यादव
मिलजुल मनः मृदुला गर्ग; सामायिक प्रकाशन; पृ.सं.ः 319; मूल्य-495. ISBN : 978.81.7138.201.9
यह सुखद है कि हाल के वर्षों में स्त्री लेखिकाओं ने अधिक सामथ्र्य के साथ अपने लेखन की चैहद्दियों का विस्तार किया है। अब उनके लेखन में ऐसे मुद्दे केंद्र्रीयता प्राप्त कर रहे हैं, जिन पर अब तक बात न करके उनकी उपस्थिति से लगातार इनकार किया जाता रहा है। मृदुला गर्ग के ताजा तरीन उपन्यास ‘मिलजुल मन’ के विभिन्न नारी पात्र ‘नीर भरी दुख की बदली’ का न तो शोक गायन करते हैं न ही ‘अबला जीवन हाय…’ का कारूणिक आख्यान, न ही यहां शरीर मुक्ति की व्याकुलता है और न ही वे स्त्री आंदोलन की वैचारिकता से प्रभावित हैं, लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं है कि लेखिका स्त्री प्रश्नों से बच कर निकलना चाहती है। वस्तुतः लेखिका जिन स्त्री मुद्दों को उठाती है, वह अपने आप में बिलकुल नयापन लिए हुए हिंदी भाषा माध्यम में होने वाले स्त्री विमर्श को एक नई दिशा में सोचने को मजबूर करती है। लेखिका आजादी के बाद के संक्रमण काल, प्रेम तथा पारिवारिक संबंधों की विभिन्न स्तरीय जटिलताओं को जिस बखूबी से सामने लाती है, वह उपन्यास को मात्र साहित्यिक संरचना तक ही सीमित न रखकर, इसे सामाजिक तथा मनोवैज्ञानिक संरचना के रूप में भी पढ़े जाने की मांग करती है।
उपन्यास का समय काल आजादी के ठीक बाद का समय है, जब विडंबना और वास्तविकता का भेद मिट चुका था। विडंबना, वास्तविकता थी और वास्तविकता विडंबना बन गई थी। यह स्थिति विचार में थी, व्यवहार में थी और राजनीति में भी थी। वास्तविकता और विडंबना के इन्हीं झंझावतों के बीच झूलते हुए उपन्यास का ताना-बाना जैन परिवार, विश्वनाथ जैन के इर्द-गिर्द बुना गया है। विश्वनाथ जैन जो कभी मारवाड़ी लाला के मुलाजिम थे, बदलते समय का रूख भाप, तमाम आदर्शों को ताक पर रखकर अपनी वाक् पटुता तथा चतुरता के द्वारा विदेशी कंपनी के दलाल बन जाते हैं। दलाल बनते ही उन तमाम कार्यों में लिप्त हो जाते हैं, जिन्हें वह स्वयं अब तक हिकारत की दृष्टि से देखते थे। ‘जी हां, वही दलाल बनते ही बैजनाथ, आला शहरियों की फेहरिस्त में आ गए। उस नाते अनकों बार प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से कंधे-से-कंधा मिलाकर अमेरिका, रूस, ब्रिटेन ही नहीं युगोस्लाविया, बुल्गारिया, ईरान, कुवैत, सऊदी अरेबिया और जाने किस-किस मुल्क के सरताजों की अगुवायी में दिल्ली हवाई अड्डे पर कतार में खड़े पाए जाएं।’ (पृ.-44) दलाली के इस पेशे में उतरते ही वैजनाथ जैन को दलालों के साथ अपनी नजदीकी कायम करने हेतु खुद को चार बताने से भी कोई गुरेज नहीं है। ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वी आर वन फैमिली।’ (पृ.-43) ध्यान रहे यह वही वैजनाथ जैन हैं, जो कभी आई.सी.एस. का इम्तिहान देकर नौकरशाह बनने के बजाए आजादी की लड़ाई में कूद गए थे। दरअसल वैजनाथ जैन का पूरा कार्य व्यापार आजादी के बाद की उस विडंबनापूर्ण स्थितियों को दर्शाता है, जिसके तहत विभिन्न जहीन देशभक्त तरह-तरह से पूंजीवादी दलाल में तब्दील हो रहे थे।
वैजनाथ जैन, चमनदास, करमचंद भार्या, जुग्गी चाचा, आर्मस्ट्रांग, नर एवं मादा पीटरसन जैसे चरित्रों के माध्यम से लेखिका ने जिस तरह से तत्कालीन सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक परिस्थितियों की पड़ताल करने के साथ विभिन्न घटनाओं, नीतियों आदि पर टिप्पणी की है, वह उपन्यास को महत्वपूर्ण बनाता है। उदाहरण के लिए चमनदास द्वारा नेहरू की विदेशी नीति पर की गई टिप्पणीµ‘इतना नहीं जानता कि लंबे दौर में इस बेतुके आधे समाजवाद से किसी का फायदा नहीं होगा। उद्योग में फायदा नहीं होगा तो सरकार टैक्स बढ़ाकर हमारा खून चूसेगी न? कंगाल होकर कितने दिन रोजगार दे पाएगी? अभी भी दूसरे मुल्कों के रहम पर जी रहे हैं कि नहीं? भिखारी बनाकर रख दिया हमें। खुद भिखमंगा बेगैरत, हम तमाम चुगद भिखमंगे…? (पृ.-58) इसी प्रकार पीटरसन की यह टिप्पणी भी काबिलेगौर है ‘वाह भई वाह क्या उसूल गढ़ा है, गुटनिरपेक्षता का। न इधर के न उधर के। औजार खरीदेंगे तो कभी इस गुट से कभी उस गुट से। अफसरों की मौज है। माल खरीदो उससे जो तकनीक में सिफर हो पर रिश्वत देने में अव्वल। …हमसे हथियार लेगें तो लड़ने के बजाय यू.एन.ओ. के पहलू में मुंह नहीं छिपाना पड़ेगा। लड़ाई के मैदान के बजाए गणतंत्र दिवस पर हथियार बंद सिपाहियों से परेड नहीं करवानी पड़ेगी। (पृ.-160) वैजनाथ जैन, आर्मस्ट्रांग तथा पीटरसन के कार्य कलापों तथा टिप्पणियों के द्वारा लेखिका ने नेहरूवादी विकास माॅडल की जबरदस्त आलोचना की है।
उपन्यास में गुल तथा मोगरा की कथा, मुख्य कथा है। जिसमें उनके बचपन, युवा अवस्था से लेकर वैवाहिक जीवन तक की कहानी है। गुल तथा मोगरा उच्च मध्य वर्ग की प्रतिनिधि चरित्र हैं। जिनके पास आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है। चुनाव की स्वतंत्रता है। गुल तथा मोगरा की कहानी कहने के दौरान लेखिका स्त्री आंदोलन का नारा बुलंद करने की बजाए एक खास समय में वर्ग विशेष की युवतियों की सोच तथा उनके रंग-ढंग को समझने का प्रयास करती है। इस दौरान स्त्रियों के प्रति सामाजिक नजरिया, उनकी नियति भी स्पष्ट होती जाती है। गुल तथा मोगरा का जीवन चरित्र गढ़ने के दौरान ऐसी लेखकीय सजगता भी देखने को मिलती है, जो विभिन्न समाज वैज्ञानिकों के लेखन में लक्षित होती है।
गुल तथा मोगरा की शादी के साथ, उपन्यास अपने ‘क्लाइमेक्स’ पर पहुंचता है। गुल अपनी इच्छानुसार शमित के साथ प्रेम विवाह करती है। गुल के विपरीत मोगरा यद्यपि प्रेम विवाह नहीं करती, लेकिन अमेरिका पलट पवन के साथ शादी करने की सहमति प्रदान करती है। गुल तथा मोगरा की शादी ही वह बिंदु है, जहां उपन्यास स्त्री जीवन की विभिन्न स्तरीय सच्चाईयों पर सोचने को मजबूर करता है। उच्च शिक्षा प्राप्त गुल जो अब तक अपनी जरूरत, हितों के प्रति सदैव सचेत रहती है, शादी होते ही अपने हित, व्यक्तित्व सबको बदल डालती है। फैशन तथा अपनी पसंद को सदैव प्राथमिकता देने वाली गुल, जो हर मौसम तथा हर किस्म की साड़ी के साथ सूती पेटीकोट पहनती थी, मिसेज शमित बनने की तैयारी में साटन का पेटीकोट पहनने लगती है। शमित की छोटी-छोटी परेशानियों के लिए खुद बड़ा से बड़ा कष्ट उठाने को तैयार हो जाती है। गर्भावस्था के दौरान यात्रा न करने की, डाॅक्टर की सख्त ताकीद के बावजूद सात महीने के गर्भ में शमित के साथ कानपुर जाकर नई गृहस्थी बसाने का ऐलान करती है। ‘मैं साथ जाऊंगी। …वैसे अभी से क्या फिक्र करनी, दो महीने पड़े हैं। (पृ.-265) कानपुर में भी अपनी इच्छा के विरूद्ध शमित के तमाम शौकों को बिना किसी विरोध के पूरा करती है। ‘ना नुकुर की मोहलत दिए बगैर गाड़ी में जा बैठना। गुल को पीछे दौड़ना पड़ता। …और दोनों हाथों से पेट थाम, वह उसे बचाने में लगती। (पृ.-289)
दरअसल गुल एक आम भारतीय स्त्री की तरह, अपनी व्यक्तिगत हित को अपने पति तथा परिवार के हित से अलग करके नहीं देख पाती है। व्यक्तिगत हित को शमित तथा परिवार वालों के हित से अलग करके न देख पाने के कारण, शमित की तमाम इच्छाओं का न तो विरोध कर पाती है, न ही उस पर कोई सवाल उठाती है और उसी व्यवस्था में अपने लिए थोड़ा बहुत ‘स्पेस’ निर्मित करने की कोशिश में, पूरी जिन्दगी शमित की इच्छानुसार गुजार देती है। जबकि ‘यह वही गुल थी जो जाती आजादी के लिए कम उम्र में, मां-पिताजी से ही नहीं, मिस हुक्कू, मादा पीटरसन, कमरचंद भार्या और जाने किस-किस से लोहा लेती रही थी।’ (पृ.-262)
गुल की तरह ही मोगरा भी शादी के बाद, जानकी देवी महाविद्यालय की नौकरी छोड़कर पूर्णतः घरेलू स्त्री बन जाती है और ताउम्र फिर से शिक्षक बनने की कसक झेलती है। मोगरा की कहानी, वर्तमान संदर्भ में स्त्री सशक्तीकरण की उस अवधारणा को प्रश्नांकित करती है, जिसके तहत आर्थिक सशक्तीकरण को ही स्त्री सशक्तीकरण का आधार मान लिया जाता है। मोगरा आर्थिक रूप से सशक्त है, उसके पास ‘भौतिक स्पेस’ भी उपलब्ध है बावजूद इसके मोगरा स्त्री सशक्तीकरण की प्रतीक नहीं बन पाती है। यहां स्त्री सशक्तीकरण को जिस आयाम पर लेखिका सोचने को मजबूर करती है, वह है, ‘मेन्टल स्पेस’। ‘मेन्टल स्पेस’ के अभाव में मोगरा तथा गुल न तो कोई निर्णय ले पाती है और न ही किसी तरह की चुनौती स्वीकार कर अपनी इच्छाओं को पूरी करने की कोशिश करती हैं।
मूलतः उपन्यास में लेखिका एक खास समय काल के दौरान स्त्री जीवन की हलचलों को रचनात्मक अभिव्यक्ति देती है। इस दौरान कई बार स्त्री जीवन के उन गोपनीय क्षेत्रों में भी प्रवेश करती है जिन पर बात करना निषिद्ध है। ‘हर औरत के अंदर एक समलैंगिक अंग्रेजी में जिसे कहते हैं, लेस्बियन, छिपी रहती है। …हर औरत अपने हमसफर मर्द में औरतनुमा ग़मख़्बारी की तवक्को रखती है, पर मिल जाए तो उसे जनाना बतलाकर मुंह बिचका लेती है तो जाहिर है मर्द में औरत या औरत में मर्द ढूंढ़ती है। (पृ.-35) लेकिन स्त्री जीवन की हलचलों की रचनात्मक अभिव्यक्ति के दौरान लेखिका बदलते समय के चरित्र की अनदेखी नहीं करती। इस दौरान देश की बदलती रीति नीति को भी समेटती चलती है। संरचना के स्तर पर उपन्यास आख्यानपरक न होकर संवादधर्मी है। जिरह और बयानों के द्वारा औपन्यासिक कथ्य की विविध पर्तों को जिस दक्षता के साथ सम्मिश्रित किया गया है वह लेखिका की विस्तृत औपन्यासिक दृष्टि के माध्यम से ही संभव हो पाया है।