स्त्री आंदोलन के सवाल
July 7th, 2010शिवानी चोपड़ा
भारत में स्त्री अध्ययन का क्षेत्र 1970 के दशक से लगातार व्यापक और विस्तृत होता गया है। विभिन्न समयों में स्त्रियों के सवाल को कैसे उठाया गया, इसकी साहित्य और इतिहास में जांच-पड़ताल की गई। जिन सामाजिक-आर्थिक शक्तियों, व्यवस्था की संरचनाओं ने इतिहास को गढ़ा व रचा, और संस्कृति व परंपरा के जिस स्वरूप का निर्माण किया, अब उसका अध्ययन स्त्री व जेंडर के परस्पर संबंध के माध्यम से समझने की कोशिश की गई है। समाज के निर्माण की प्रक्रिया में या साझी स्मृतियों को संरक्षित करने में परंपरा को ढालने में औरत की क्या भूमिका रही है, औरत को केंद्र में रखकर स्त्री अध्ययन संस्थानों ने इन क्षेत्रों में नए इतिहास बोध के साथ अध्ययन शुरू किया। यह एक तरह का आंदोलन ही था जब पाश्चात्य साहित्य व समाज में स्त्री आंदोलन की द्वितीय लहर (सेकेंड वेव) उभार पर थी, तब भारत में और भारतीय साहित्य में स्त्रीवाद के तीसरे चरण की शुरुआत हुई। पहला चरण 1850 से 1910 तक माना गया और दूसरा चरण 1910 से 1970 के लगभग रहा। पहला चरण सुधार आंदोलनों का दौर था। जब पहली बार औरतों का सवाल उठाया गया और स्त्री की सामाजिक स्थितियों में सुधार की जरूरत को रेखांकित किया गया। इसके दो कारण बताए गए। एक, औपनिवेशिक गुलामी का प्रभाव और दूसरा, शिक्षित मध्यवर्ग की आधुनिक संवेदना व भौतिक जरूरतें। इस दौर में व्यवस्था में किसी तरह का परिवर्तन किए बगैर स्त्री की स्थिति में सुधार की कोशिश की गई। दूसरे चरण में राष्ट्रवाद का उभार आधुनिकता का दबाव और पूंजीवाद के विकास के साथ स्त्रियों की समस्याओं को देखा गया। ये दोनों चरण विभिन्न साहित्यिक आंदोलनों को स्त्रीवादी नजरिए से समझने में मदद करते हैं। पर अभी तक स्त्री की भौतिक-सामाजिक स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं आया था। हिंदी साहित्य में स्वतंत्र रूप से किसी स्त्रीवादी आंदोलन का इतिहास नहीं मिलता है। भारतेंदु युग, द्विवेदी युग, छायावाद, प्रगतिवाद से लेकर प्रय¨गवाद व नई कविता तक साहित्य में स्त्री सबजेक्ट बनकर अवश्य आई, पर ऐसे किसी क्रांतिकारी आंदोलन का जन्म नहीं हुआ जो औरतों की स्थिति में भी मूलभूत परिवर्तन लेकर आए। साहित्य के इन आंदोलनों में औरतों का सवाल और औपनिवेशिक राष्ट्र का विरोध, दोनों ही महत्वपूर्ण बन गए क्योंकि भारत के सांस्कृतिक-सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में औपनिवेशिक राष्ट्रवाद के उभार के साथ ही स्त्रियों का सवाल सामने आया था। भारत की आजादी स्वराज की संकल्पना, लोकतंत्र, आधुनिकता और विकास आदि को औरत की सामाजिक स्थिति से जोड़ा जाने लगा। लेकिन आजादी के बाद 1970 तक आते-आते मोहभंग की स्थिति उत्पन्न हुई जब राष्ट्रवाद, लोकतंत्र, विकास आदि पर प्रश्नचिह्न लगने लगे तब औरतों की स्थिति भी नए सवालों और नई व्याख्या की मांग करने लगी। 1974 में भारत सरकार द्वारा रिपोर्ट छपी ‘समानता की ओर’ (टुवड्र्स इक्वैलिटी)। इसमें स्त्रियों के सवाल को राष्ट्रीय विकास के मुद्दे से जोड़ा गया। अब स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में बदलाव राष्ट्रीय एजेंडा बन गया। प्रत्येक क्षेत्र में शिक्षा, नौकरी, संपत्ति, अधिकार, भूमि वितरण, स्वास्थ्य, विवाह, दहेज, परिवार की संरचना आदि सवाल आधुनिक भारत व स्त्री की वर्तमान स्थिति के संदर्भ में देखे जाने लगे।
ज्यादातार साहित्यिक आंदोलनों ने सामाजिक आंदोलनों से प्रेरणा लेकर ही साहित्य में परिवर्तन व नए मूल्यों का विकास किया है। पर यह आवश्यक नहीं कि साहित्य हर सामाजिक आंदोलन की प्रतिच्छवि बने। स्वतंत्र रूप से भी साहित्यिक आंदोलनों ने सामाजिक यथार्थ की अभिव्यक्ति की है। स्त्रियों की स्वाधीनता, समाज व्यवस्था व जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में संघर्ष और स्वतंत्र स्त्री लेखन की शुरुआत 1970 के बाद ही आंदोलन का रूप लेती है। स्त्री अध्ययन संस्थान इस तरह के आंदोलन का संस्थानीकरण करते हैं। समाज में अपनी जगह बनाने के लिए यह आवश्यक भी था। विभिन्न स्त्रीवादी आंदोलन शुरुआती दौर में दहेज, बलात्कार,घरेलू हिंसा, गर्भ निरोध और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों के आंदोलन का आधार बनाते हैं। स्त्री अध्ययन संस्थान इस तरह के आंदोलनों के स्वरूप को समझने, उनका विकास करने की कोशिश करते हैं और क्रमशः इतिहास व साहित्य की रचना तथा पुनव्र्याख्या का काम शुरू करते हैं। इस तरह स्त्रीवादी इतिहाबोध की शुरुआत हुई जो जेंडर के निर्माण की प्रक्रिया में सहायक सिद्ध हुआ। स्त्री अध्ययन संस्थानों में ही स्त्रीवादी दृष्टिकोण के सैद्धांतीकरण के प्रयास शुरू हुए। इनके सामने सवाल यह था कि क्या स्त्रियों के लिए स्वतंत्र संघर्ष किया जाना चाहिए या नहीं। क्योंकि जब-जब स्त्रियों की स्थिति बदलने का सवाल सामने आया है, उसके साथ अन्य सामाजिक मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिए गए। जैसे स्त्रियों के सवाल के साथ जब-जब भारतीयता व राष्ट्र संबंधी सवाल आए तब-तब दिक्कतें पैदा हुईं। स्त्रियों के अधिकार से ज्यादा राजनीतिक-सांस्कृतिक एकता के सवाल को महत्वपूर्ण बनाकर प्रस्तुत किया गया।
भारतीय संदर्भ में देखें तो स्त्री के लिए राष्ट्र वस्तुतः परिवार, विवाह, जाति, धर्म, वर्ग आदि का विस्तार और मिथ है। दूसरी ओर, जाति, वर्ग, धर्म, भाषा आदि विमर्शों के आधार पर स्त्रीवादी आंदोलनों के संघर्षों को समझने में मदद तो मिली, पर बहुत बार स्त्रीवादी आंदोलन कई टुकड़ों में बंट गया या उनमें दरारें अवश्य आ गईं। साहित्य में यह विभाजन भिन्न अभिव्यक्तियों के रूप में विकसित हुआ जिससे पित्तृसत्ता के अनेक रूपों को समझने में मदद मिली। जिस प्रकार सभी स्त्रियों का संघर्ष एक जैसा नहीं है और कुछ स्त्रियां अपनी शिक्षा, वर्ग व धर्म आदि के कारण बेहतर स्थिति में हैं उसी तरह इन श्रेणियों के आधार पर पितृसत्ता के अनेक रूप मिलते हैं। पितृसत्ता का स्वरूप समय व इतिहास के साथ बदलता रहा। न केवल पुरुष वर्चस्व में भिन्नता आई, बल्कि उत्पीड़न व आधीनता का स्वरूप भी बदलता गया। पितृसत्ता के भिन्न रूपों ने स्त्री होने की परिभाषाओं को भी बदला। इसलिए वर्तमान स्त्री लेखन को अपनी स्वाधीनता समझने वाली रचनाकारों को पुनः सोचना चाहिए कि जिसे वे कलम की स्वाधीनता के माध्यम से जीवन में उतारने की कोशिश कर रही हैं, कहीं वह भटकाव में तो तब्दील नहीं हो रहा?
साहित्य, समीक्षा, आलोचना व इतिहास में पितृसत्ता के अत्यधिक प्रयोग के कारण इस विषय पर चर्चा करना या इस शब्द का प्रयोग मात्र ही उबाऊ लगने लगा है। पितृसत्ता की व्याख्या करना अपर्याप्त माना जाने लगा है। मानो पितष्सत्ता स्थिरता व गतिहीनता का सूचक बन गया हो। जबकि लैंगिकता को या सैेक्सुअलिटी को लेकर स्त्री-पुरुष के बीच किया जाने वाला भेद और इसके आधार पर स्त्री-पुरुष संबंधों की व्याख्या की पाश्चात्य दृष्टि की बहुत-सी सीमाएं हैं। यह दृष्टि स्त्री-पुरुष संबंधों की व्याख्या तो करती है, पर व्यवस्था को समझने में सहायक नहीं है। अब बात तीसरी दुनिया के साहित्य, स्त्रीवादी आंदोलन और पितृसत्ता के स्वरूप के बारे में की जाती है। तीसरी दुनिया में जब निजी स्वामित्व और पूंजीवादी विकास के रास्ते खुले, तब साहित्य व अध्ययन के विभिन्न क्षेत्रों में विमर्शों की बाढ़-सी आ गई। ये उत्तर आधुनिक विमर्श भी शोषण, उत्पीड़न, वर्चस्व व अधीनता के स्वरूप को समझने में मदद करते हैं। पर इनकी सीमाएं व दायरे निश्चित हैं जो कभी भी जमीनी स्तर पर किसी आंदोलन का रूप नहीं ले सकते हैं, भले ही अकादमिक जगत में हलचल पैदा कर दें। इनकी क्षमता केवल समस्या को पहचानने, उसकी व्याख्या करने और अस्मिता के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में सहायक है। पर ये किसी व्यापक आंदोलन को रूप देने में असमर्थ प्रतीत होते हैं। ना ही इससे सत्ता की संरचना को बदला जा सका है। सत्ता में भागीदारी को स्वाधीनता का नया मिथक बनाकर प्रस्तुत किया गया है। सत्ता में भागीदारी सत्ता में परिवर्तन नहीं होती है। व्यवस्था को तोड़ने के लिए एक निश्चित राजनीतिक एजेंडे और सैद्धांतिक अवधारणा के विकास की आवश्यकता होती है। हाल के दशकों में पूंजीवाद के विकास ने या उसकी गिरावट ने यह लगभग तय कर दिया है कि वह ऐसे किसी भी आंदोलन को उभरने से पहले ही निगल जाएगा। इसलिए वर्तमान साहित्य जमीनी स्तर पर हुए आंद¨लन¨ं से प्रेरित ह¨कर लिखे जाने की बजाय विमर्शों से उपजा साहित्य है जिसमें देह की मुक्ति, नैतिकता के मूल्य और परिवार व विवाह जैसे संस्थानों को फार्मूलाबद्ध तरीकों से चुनौतियां दी जाने लगीं। व्यवहारिक तौर पर ये पूरे समाज का सच नहीं बन सके। केवल शहरी शिक्षित मध्यवर्ग ही इन विमर्शों में सक्रिय रहा है।
साहित्य व इतिहास में स्त्रीवादी आंदोलन को विकसित करने के लिए स्त्री लेखन, ऐतिहासिक दस्तावेजों व रचनाओं की खोज की गई। उन्हें संग्रहीत किया गया। उनकी पुनव्र्याख्या व पुनःसृजन भी किया गया। इस पुनव्र्याख्या व पुनर्मूल्यांकन में समीक्षकों को दो तरह की सावधानियां बरतने की जरूरत पड़ी। एक, पुनव्र्याख्या करते समय तत्कालीन समाज के मानदंडों का आधार लिया जाए या वर्तमान समाज की संवेदनाओं के आधार पर उन्हें परखा जाए। दूसरा, स्त्रियों का लैंगिक बोध किस तरह का है, सामाजिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों के बीच स्त्री की छवि को किस तरह निर्मित किया गया है, इन सब बातों का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। कुछ खास तरह की साहित्यिक विधाओं में ही स्त्री लेखन की विशिष्ट पहचान को विकसित किया जा सका है। जैसे आत्मकथा व उपन्यास जैसी विधाएं स्त्री जीवन की विस्तृत व्याख्या करने में मददगार साबित हुई हैं। ऐसा माना गया कि विस्तृत जीवन की व्याख्या में ही सिद्धांतों को गढ़ना व विकसित करना संभव हो पाएगा। इस तरह स्त्री लेखन में स्त्रीवादी समीक्षा सिद्धांतों का विकास करने के भी प्रयास किए गए। जैसे पितृसत्ता का स्वरूप, लिंग व जेंडर में भेद, समाज की विभिन्न संरचनाओं के भीतर स्त्री की स्थिति आदि स्त्रीवादी समीक्षा के सिद्धांत हैं।
आज भारत में जमीनी स्तर पर स्त्रीवादी आंदोलन की जड़ें मजबूत नहीं हैं क्याोंकि यह आंदोलन बिखरे हुए और खंडित हैं। स्त्रीवादी आंदोलन के विभिन्न वर्गों में जिन कारणों से मतभेद उभरते हैं, वे हैं राष्ट्रवादी विचारधारा, धार्मिक कट्टरता, सांप्रदायिकता, जातीय तनाव और भारत की संवैधानिक व कानून व्यवस्था। सुधार आंदोलनों के समय राष्ट्र, आधुनिकता और स्त्री ये तीनों मुद्दे एक साथ महत्वपूर्ण हो गए थे। राष्ट्र की जो परिकल्पना उस समय उभरकर आई, वह हिंदू राष्ट्रवाद, उच्च जाति-वर्ण पर आधारित थी। आधुनिकता का अभिप्राय था औपनिवेशिक सत्ता के आलोक में नई शिक्षा व तर्कपद्धति तथा संस्कृति व परंपरा की नई व्याख्या। स्त्री की भी नई छवि निर्मित की गई जो परंपरागत छवि से बहुत अलग नहीं थी, पर सामाजिक कुरीतियों के बहिष्कार पर जोर देकर स्त्री की सामाजिक स्थिति को बेहतर बनाने की कोशिश की गई। स्त्री की यह नई छवि थी मातृत्व की, राष्ट्रवादी आदर्शों के निर्वाह की, भक्ति की देवी अपनी दैहिक व भौतिक जरूरतों को नियंत्रण में रखने वाली या उनका लगभग दमन कर जीने वाली, परिवार व विवाह जैसी संस्थाओं में निभाने वाली, कुल मर्यादा की रक्षा करने वाली भारतीय स्त्री मानी गई। इस समय स्त्री शिक्षा का मसला काफी लंबे समय तक स्वीकार्य नहीं माना गया क्योंकि यह प्रचारित किया गया कि यदि स्त्री शिक्षित हो जाएगी तो वह उपरोक्त भारतीय स्त्री की छवि में खुद को ढालने से इनकार कर देगी और विद्रोह करेगी। परंतु शिक्षित शहरी मध्यवर्गीय पुरुष की आकांक्षाएं व जरूरतें इस धारणा को तोड़ने में स्वतः ही सहायक सिद्ध हुईं। जो पढ़ी-लिखी नई स्त्री इसलिए चाहता था कि वह पूर-परिवार की देखभाल, साफ-सफाई, स्वास्थ्य संबंधी जानकारी आदि सभी कामों को भली प्रकार कर सके।
भारतीय स्त्री की यह नई छवि जातीय और वर्गीय आधार के साथ-साथ धार्मिक आधार की जकड़बंदी में कैद है। स्वाधीन भारत में कानून व राज्य की व्यवस्था धर्मनिरपेक्ष होते हुए भी सांप्रदायिकता की ओर झुकी हुई है। इसलिए स्वाधीन भारत में बहुत बार स्त्रीवादी मुद्दे व आंदोलन सांप्रदायिक नजरिए का शिकार हुए हैं। स्वाधीन भारत में राष्ट्र-राज्य का नया चरित्र उभरता है, आधुनिकता के स्थान पर उत्तर आधुनिकता व उत्तर औपनिवेशिक स्थिति ले लेती है और एक बार फिर स्त्री की एक नई छवि निर्मित की जाती है। स्वाधीन राष्ट्र-राज्य एक ओर पंूजीवादी विकास के साथ राष्ट्रीय व सांस्कृतिक सीमाओं का अतिक्रमण करने लगा तो दूसरी ओर राज्य द्वारा निर्मित पितृसत्ता का परंपरागत स्वरूप भी ढोता रहा। एक ऐसा राज्य जहां की कानून व्यवस्था धर्म के आधार पर निजी कानूनों को बनाती है ऐसे में स्त्री के अधिकारों को सुरक्षित रखने का जिम्मा लोकतांत्रिक व बराबर की नागरिकता के आधार पर न होकर धर्म के ठेके दारों के हाथ में चली जाती है। उत्तर आधुनिकता दरअसल आधुनिकता का विकसित मिथक ही है। जब दुनिया का एक हिस्सा विकास की मंजिलें पार कर गया और दूसरा अत्यंत पिछड़ा रह गया, इसे उत्तर औपनिवेशिक स्थिति माना गया। इतिहास व विचारधारा के अंत की घोषणा कर दी गई। लेकिन भिन्न सांस्कृतिक अस्मिताएं समाज के हाशिए पर पड़े पिछड़े वर्ग जो मुख्यधारा से लंबे अरसे तक कटे रहे, उनके पक्ष को सामने लाने की कोशिश की गई। ऐसा केवल एक बाजार की संस्कृति में संभव हो सकता है जहां सभी को अपनी बात बेचने का मौका मिल रहा है, पर वास्तविक परिवर्तन नहीं हो पा रहा है। यह विरोधाभास इन विमर्शों के साथ भी है, एक ओर जहां हाशिए के वर्गों को अपना पक्ष सामने रखने का मौका मिलता है वहीं प्रगतिगामी वैचारिक आंदोलनों के खड़ा करने में कई तरह की दिक्कतें भी आती हैं।
साहित्य में औरत की विभिन्न छवियां सामने आईं। देवी, मां व सहचरी से लेकर द्रौपदी, डायन व यशोदा तक सभी छवियों के माध्यम से स्त्री जीवन की कड़वी व भयावह सच्चाइयों को सामने रखा गया। जिस प्रकार साहित्य की कुछ विधाएं स्त्रीवादी दृष्टिकोण को विकसित करने में सहायक हुईं, उसी प्रकार अध्ययन के क्षेत्र में साहित्य व इतिहास स्त्रीवादी आंदोलन को आगे बढ़ाने व गहन शोध करने में ज्यादा कामगार सिद्ध हुए। स्त्रीवादी नजरिया केवल स्त्री द्वारा लिखित साहित्य के माध्यम से विकसित नहीं किया गया, बल्कि पूर्वरचित ऐतिहासिक रचनाओं व घटनाओं की व्याख्या के जरिए भी इस दृष्टिकोण को विकसित किया गया। स्त्री के आत्मकथ्य और उनकी आत्मकथाएं उन महत्वपूर्ण दस्तावेजों के रूप में लिए जा रहें हंै जिनके भीतर से परंपरागत सिद्धातों के विकल्प निर्मित करने में मदद मिलेगी।
वर्तमान नारीवाद जिन सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रियाओं का सामना कर रहा है, वे आज तक धर्म, जाति, वर्ग, क्षेत्रवाद के प्रभुत्व से मुक्त नहीं हैं। ऐसा कई बार हुआ है कि जब-जब सामाजिक आंदोलनों ने औरतों के सवाल को उठाया है, उनकी कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते वे अपने वास्तविक उद्देश्यों से भटक गए। औरत के हक की लड़ाई को दरकिनार करते हुए वह अन्य अस्मिताओं के संघर्ष ओर सत्ता के दांव-पेचों में सिमट कर रह गए। इसलिए बिना राजनीतिक प्रेरणा या विचारधारा के किसी आंदोलन को विकसित करना या लक्ष्य तक पहुंचाना मुश्किल है। बहुत से मुद्दे जिनसे स्त्रीवादी आंदोलन में तेजी आई पितृसत्ता के नए रूपों ने उन्हें मिटा दिया। आंदोलन का कभी जातीय या कभी सांप्रदायिक प्रतिपादन कर उन्हें उनके मकसद से विच्छिन्न कर दिया गया। ऐसी स्थिति उत्पन्न कर दी कि यह अपने में एक सवाल बन गया कि स्त्रियों के लिए स्वतंत्र रूप से जगह बनाने का मुद्दा उठाया जाना चाहिए या नहीं। क्या सवाल सिर्फ स्त्रियों के लिए जगह बनाने का है, या उन्हें बराबरी का हिस्सा मिलने का है। सवाल है शोषण की उस संरचना की सही व्याख्या का। सत्ता व शोषण के कई रूप हैं। स्त्री के अधिकारों की मांग व पूरी स्थिति में परिवर्तन की मांग के बीच महीन रेखा है जहां स्थितियों की सही व्याख्या करने की बजाय उनका राजनीतिकरण कर दिया जाता है ओर पितृसत्त्सा की राजनीति को ज्यादा टिकाऊ व मान्य बना दिया जाता है। हिेदी या भारतीय भाषाओं के आगे सवाल यह है कि वे किस तरह अपने लिए आंदोलनों की जमीन तैयार करें जिसमें विभिन्न हाशियों से स्त्री के आत्मकथ्यों को दर्ज़ करते हुए नए वैचारिक आयाम तलाश किए जाएं। हमारी भाषा और साहित्य की दुनिया में स्त्रीवादी आंदोलनों के लिए अभी ठोस जमीन तैयार करने का काम बाकी है, यह प्रेरणा वास्तविक जमीनी आंदोलनों से ही मिल सकती है।