स्मृतियों का आख्यान

July 7th, 2010

प्रेमपाल शर्मा

गांधी के देश में: सुधीर चन्द्र; राजकमल प्रकाशन; पृः 160; मूल्यः 200

जनसत्ता में प्रकाशित सुधीर चंद्र का स्तंभ ‘मगर फिर भी’ बहुपठित प्रिय स्तंभों में रहा है। उन्हीं दिनों उनके साथ लिखने वाले के. विक्रम सिंह, साजिद रसीद, कृष्ण कुमार, अलका सरावगी, नवीनतम तसलीमा नसरीन की याद भी पाठकों में देर तक बनी रहेगी। हिंदी के मौजूदा विमर्श में ऐसे स्तंभों, गद्य का पाठक निरंतर बढ़ रहा है। किसी भी सामयिक मुद्दे के बहाने इतिहास, भूगोल, कथा स्मृतियों के ताने-बाने में संक्षिप्त, मुकम्मल टिप्पणी। सुधीर चन्द्र के ही शब्दों में हर पखवाड़े 1,200 शब्द। बगैर किसी लालच, दबाव या डर के मन की बात कहते रहना। नितांत निजी से लेकर ठेठ सार्वजनिक मामलों का द्वैत मिटाते। प्रस्तुत संग्रह में ऐसे 35 आलेख शामिल हैं।
गांधी के संदर्भ में सुधीर चन्द्र के लेख मेरे लिए विशेष प्रिय रहे हैं। बावजूद इसके कि वह वामपंथी स्कूल में पले बढ़े इतिहासकार हैं, गांधी को देखने की उनकी दृष्टि उतनी ही उदार है जितनी स्वयं गांधी की रही होगी। वैचारिक जड़ता, हठ, दंभ से कोसों दूर। विचार की बहती नदी के पेंदे में पड़ी बात या मकसद के सिक्के को आप साफ-साफ देख सकते हैं। ‘हिंदू धर्म का कत्ल’ संभवतः 2007 में गुजरात में मोदी की जीत के संदर्भ में लिखा गया है। लेखक सुधीर 1990, 1992 और 2002 के दंगों के समय गुजरात में ही थे। उन सभी दिनों की ‘असभ्यताओं और घटती इंसानियत’ के कई प्रसंगों को उन्होंने इस लेख में याद किया है। पढ़ते-पढ़ते आपका सिर शर्म से झुकने लगेगा। ऐसे हर प्रसंग पर उन्हें गांधी याद आते हैं। आजादी से साढ़े चार महीने पहले, 2 अप्रैल, 1947 के दिन, अपनी शाम की सार्वजनिक प्रार्थना सभा में गांधी ने कहा: ‘मैं इतना ही कहंूगा कि यह हिंदू धर्म का कत्ल हो रहा है। आप लोग सोचिए और समझिए।’ इसके ठीक दूसरे दिन प्रार्थना सभा में ही बोलते हुए उन्होंने कहा: ‘यदि आपको झगड़ा करके ईश्वर का नाम लेना है तो वह नाम तो ईश्वर का होगा, पर काम शैतान का होगा।’ हिंदू धर्म के कत्ल की बात करने से एक दिन पहले गांधी ने अपने प्रार्थना-प्रवचन में कहा था: ‘और वे जैसा करते हैं वैसा हम नहीं करते क्या? बिहार में हमने औरतों के साथ क्या नहीं किया: हिंदुओं ने किया याने मैंने किया। यह शर्मिंदा होने की बात है।’
गांधी का न होना, गुजरात में दो दिन, हिंसा हर तरफ, नानावटी आयोग: एक प्रहसन, मुंबई के बाद, छह दिसंबर जैसे आधा दर्जन लेख गुजरात के संदर्भ में बार-बार गांधी की तरफ एक उम्मीद भरी दृष्टि से देखते हुए लिखे गये हैं। निराशा में यह तक लिखते हुए मुझे डर लगता है कि जल्दी ही गुजरात में गांधी याद किये जाने लगेंगे, देश (हिंदुओं) को नपुंसक बना देने के लिए। स्वयं लेखक के शब्दों में ‘मैं गांधी का भांड़ हूं। पर दिक्कत यह है कि गांधी के यहां अंधभक्त की गुंजाइश है नहीं। श्रद्धा मूल्यवान है वहां, पर विवेक के अभाव में अर्थहीन। सो, आजकल अचानक ऐसे पल आ जाते हैं जब गांधी का सच्चा भांड़ होने की वजह से, मैं उनको लेकर संदेह में फंस जाता हूं। ये संदेह प्रायः ऐसे होते हैं, जिनके समाधान-निर्णायक समाधान-अगर असंभव नहीं तो बहुत कठिन तो हैं ही। बावजूद इस सबके गांधी को समझने, समझाने वाले अप्रतिम इतिहासकार हैं सुधीर चन्द्र और उनके ऐसे लेखों से हिन्दी साहित्य समृद्ध हुआ है।
‘उत्तर पूर्व और भारत’ जैसा लेख बार-बार इस देश में पढ़ा और पढ़वाया जाना चाहिये कि अपने ही देश के पूर्वोत्तर राज्यों के प्रति भारत सरकार कितनी संवेदहीन हो चुकी है। हिंसा हर तरफ में कश्मीर समाधान की कुछ बातें अवश्य हैं। लेकिन कश्मीर से विस्थापितों पर कोई प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष अनुगूंज की अनुपस्थिति लेखक की संवेदनशीलता को शक के घेरे में खड़ा करती है। कश्मीर के पंडितों उर्फ हिंदुओं को भी तो गांधी के बहाने याद करते। गांधी निश्चित रूप से इतने एकपक्षीय नहीं थे।
सुधीर चन्द्र के लेखों का सर्वश्रेष्ठ कहीं हैं तो उन लेखों में जिनमें स्मृतियों की घाटी से कभी वह फेंथम साहब को उठाकर लाते हैं कभी इतिहासकार दत्ता साहब, शराफत हुसैन, कथाकार इंतजार हुसैन और गंगूबाई को। झक्क सफेद दाढ़ीवाला इतना पवित्र, सहृदय लेखक ही इतनी आत्मीयता से ऐसे रेखाचित्र लिख सकता है। पठनीयता में पूरा कथा रस घोले। स्मृतियों को क्यों खगालते हैं वे ? खुद ही लिखते हैं एक तो कभी-कभार अपने खुद के ऐसे किए-धरे-सोचे को याद कर लें जो ऐसा था कि किसी और को बताना तो दूर अपने ही चेतन से निष्कासित किए रहते हैं। दूसरे, कभी-कभार अपने जीवन में आए ऐसे असामान्य, असाधारण साधारण व्यक्तियों को याद कर लें जिनका इस बिगड़ते वक्त में होना ही एक चमत्कार है।
फैंथम साहब मुजफ्फरनगर में एडिशनल डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट (जुडिशियल) थे। अपने काम, अपने पद का अपने किसी काम के लिए उल्लेख करना भी अंकल फैंथम के लिए बेईमानी की परिधि में आता था। एक बार देर रात मेरठ रेलवे स्टेशन से पैदल चल कर वह अपने निवास स्थल की ओर जा रहे थे। रास्ते में एक पुलिस के सिपाही ने उन्हें पकड़ लिया। बताने पर भी नहीं माना कि वह घर जा रहे हैं। हो सकता है कि कुछ पैसा बनाने की इच्छा रही हो उसकी। जो इन्हें देना नहीं था। सो उसने इन्हें पुलिस चैकी में बंद कर दिया बंबई एक्ट के तहत। सुबह जब चैकी का ए.एस.आई. आया तो घबरा गया ए.डी.एम. साहब को हवालात में देख कर। फैंथम साहब ने कोई शिकायत नहीं की सिपाही की। मुस्कुराते हुए निकल गए पुलिस चैकी से। ईमानदारी अंकल फैंथम का स्वभाव थी। इसको लेकर उनके मन में अपनी अतिरिक्त श्रेष्ठता जैसा कोई भाव नहीं था। न ही कोई शहीदाना अंदाज था उनका। वह जैसे थे वैसे थे। दूसरे कैसे थे इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता था। यहां तक कि जो उनके मातहत थे उनसे भी उनको कोई विशेष अपेक्षा नहीं रहती थी। उन्हें न ही किसी से कहना था कि चपरासियों का काम दफ्तर में पूरा हो जाता है, उनसे घर का काम करवाना गलत है।
स्मृतियों की ऐसी ही फुहार लक्ष्मण देवानी के बहाने एक विलंबित मृत्युलेख में है। श्1964 का बसन्त था गालिबन, जब लक्ष्मण देवानी से जान-पहचान शुरू हुई मेरी। जनपथ स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार में। देवानी वहां पहले से ही काम कर रहा था। मैं नया-नया पहुंचा था वहां अपने शोध कार्य के शुरुआती दौर में। खोया-खोया, हतप्रभ, कस्बाई, रिसर्चर। शुरू के दिनों में अजीब-सी घबराहट तारी रहती थी। थोड़े दिनों बाद सब ठीक-सा हो गया। बड़ा सहारा मिला था उस वक्त देवानी से। कुछ था उसके अन्दर। वही कुछ जिसकी वजह से विदा लेते समय हमेशा गुड लक कह कर अलग होता था। पर आज यहां क्यों मैं देवानी को याद कर रहा हूं ? उसके जाने के काफी दिन बाद तक मेरी इच्छा होती रही उस पर लिखने की। न सिर्फ इसलिए कि वह इतना अच्छा आदमी था। मैं यह भी कहना चाहता था कि शोध जगत से जुड़े बड़े-बड़े लोग क्यों नहीं वह शोषण देख पाते जिसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं ? वह शोषण जिसकी वजह से देवानी जैसे ईमानदार, प्रतिबद्ध और कुशल शोध सहायकों का जीवन हताशा में बीत जाता है। जिस मान और श्रेय के अधिकारी हैं वे उससे वंचित रह जाते हैं।
फैंथम, देवानी जैसे चरित्र पूरी पीढ़ी को प्रेरणा देते हैं। अफसोस यही है कि आजादी के बाद ऐसे चरित्र विरले ही बचे हैं। यहां तक कि ऐसे चरित्रों पर यदा-कदा लिखने वाले भी इनसे शायद ही प्रेरणा लेते हों। यदि ऐसा होता तो हमारे विश्वविद्यालय, अखबारों में छाये बुद्धिजीवी हिन्दी पट्टी में इतने अप्रासंगिक नहीं होते।
दिल्ली की गोष्ठियों, सेमिनारों पर तीखी टिप्पणी है लाइलाज बौद्धिक अहम्मन्यता लेख में। ऐसी गोकष्ठयां न समय पर शुरू होती हैं, न घोषित वक्ता पहुंचते हैं। सुधीर लिखते हैं प्रख्यात समाजशास्त्री आचार्य श्यामाचरण दुबे जब भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान के निदेशक थे तो अपने चुटीले अंदाज में कहा करते थेµभाई, अभी मेरे उद्घाटन और समापन भाषण के दिन नहीं आए हैं। दुबे जी एक-एक सप्ताह चलने वाली गोष्ठियां आयोजित करते थे शिमला में और हर पर्चे को कम-से-कम डेढ़ घंटा दिया जाता था। प्रशासकीय जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी गोष्ठियों में सदा मौजूद रहते थे। दिन में गोष्ठी के दौरान उठे मुद्दे अक्सर देर रात तक छोटे-छोटे गुटों में बहस का केंद्र बने रहते थे। कोई पांच-सितारा बुद्धिजीवी नहीं होता था कि एक दिन -एक सत्र की तो बात ही नहीं- के लिए अपने ज्ञान से दूसरों को लाभान्वित कराके अगले दिन चला जाए। मैं समझ सकता हं कि गोष्ठियों के आयोजकों को कई बार महत्वपूर्ण स्थानों में बैठे लोगों को आमंत्रित करना पड़ता है। इन महानुभावों से पैसा मिलता है और दूसरे दस काम बनते हैं जो मैं नहीं समझ पाता वह है कि कैसे देखते-ही-देखते हर उम्र के बुद्धिजीवी, बौद्धिक व्यापार और शिष्टाचार दोनों के ही सामान्य नियमों को ताक पर रखे, ऐसे अभद्र और अहम्मन्य होने लगे हैं।
दत्ता साहब के ऊपर लिखे लेख में सुधीर लिखते हैंµदिल्ली बड़ा चकमेबाज शहर है। यह उनको भी अपने फरेब में ले लेता है जो इसे पसंद नहीं करते। अधिकांश को व्यस्त रहने या दिखने का भ्रम भी देता है। लेकिन सुधीर जी को इसमें यह भी जोड़ना चाहिये कि यह शहर चापलूसी, समझौते, विचारधारात्मक, मौकापरस्ती सीखने सिखाने का भी अद्भुत अड्डा है। बुद्धिजीवियों में इसे हर दिन सुबह से शाम तक देख सकते हैं। मुझे यहां याद आ रहा है मगर फिर भी मैं 2006-07 में लिखा लेख जो तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री द्वारा एक विश्वविद्यालय में अपने नाम के भवन और सड़क का स्वयं द्वारा उद्घाटन पर था। तत्कालीन वाइस चांसलर मुसीरुल हसन से अपनी दोस्ती को याद करते हुए भी सुधीर चन्द्र ने पूरी घटना की जो लानत मलानत की थी, वैसे उदाहरण दिल्ली के बुद्धिजीवियों के बीच विरले ही मिलेंगे।
पूरा हिंदी समाज जो एक विशेष रंग से भड़ककर तुरंत सड़क पर आने की ताक में रहता है तब कहां था इस केंद्रीय मंत्री की चापलूसी के खिलाफ? सुधीर चन्द्र अकेले उठ खड़े हुए। लेकिन वह लेख इस किताब से गायब क्यों है सुधीर चन्द्र जी। क्या प्रकाशक ने धमका दिया? या लिखने के बाद की प्रतिक्रियाओं ने कोई डर पैदा किया? तब छपवा कर वाहवाही लूटी और अब छिपाकर सत्ता से कोई उम्मीद? ऐसे प्रसंगों पर एडवर्ड सईद भूले नहीं भूलते। ‘बुद्धिजीवी की भूमिका’ लेख के कुछ अंश याद आ रहे हैंः ‘‘मेरे लिए बुद्धिजीवी की भूमिका यह है कि वह यथास्थिति पर प्रश्न उठाये, सत्ता को चुनौती दें। सरकारी रिपोर्टों की तह तक पहुंचने की कोशिश करे। …बुद्धिजीवी को राजनीतिक पद या सत्ता में हिस्सेदारी की आकांक्षा नहीं पालनी चाहिये क्योंकि सत्ता आपकी आजादी का अंत करती है।… हमेशा सच बोलने की कोशिश करनी चाहिए, परेशानी मोल लेने की हद तक भी…।’’
क्या मौजूदा दौर में देश पर सबसे लंबा शासन करने वाली सत्ता से देश विदेश की स्काॅलरशिप इसी करीबी, धमकियों का उपहार नहीं है? क्या पता भविष्य में मिलने की आकांक्षा ही हमारे हिन्दी बुद्धिजीवियों का मुह बंद रखती हो।
पूरी किताब ही स्मृतियों का आख्यान हैµकभी व्यक्ति के बहाने कभी तत्कालीन मुद्दों के प्रसंग में इतिहास के कथारस में डूबे ये सब रेखाचित्र बताते हैं कि सुधीर चन्द्र किसी उपन्यास पर हाथ आजमाएं तो घर-बाहर कईयों के छक्के छुड़ा दें। गांधी के शिष्य से ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है।

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