समाज के आइने में खुद को निहारता मन

July 7th, 2010

चन्द्रकला

लगता नहीं है दिल मेरा व और… और… औरत: कृष्णा अग्निहोत्री; सामयिक प्रकाशन;
पृ.ः 352 व 160; मूल्यः 495 व 250
ISBN : 978.93.80458.01.4, 978.93.80458.02.1

मनुष्य की यह आदिम प्रवृत्ति है कि छिपे हुए को अनावृत करने, दबे हुए को कुरेदने और अमूर्त अज्ञात रहस्य को मूर्त ज्ञात कर सामने लाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहता है। उसकी यही आदत यदि वह साहित्यकार है तो अपने साहित्य में विभिन्न विधाओं के माध्यम से स्वयं को समाहित तथा जो शेष बचता है उसे अपनी आत्मकथा में खोलने, देखने और विश्लेषित करने का प्रयत्न करता है। उसकी इस कोशिश में जहां पाठकों के साथ वह अपने सुख-दुख के नितांत व्यक्तिगत पहलुओं को अपनी परिस्थितियों के माध्मय से व्यंजित करके कुछ सहानुभूति, उन अन्यायों पर प्राप्त करना चाहता है जो उसके विचार में उसके साथ नहीं होनी चाहिए थी। जिसे समाज, परिवार और साहित्यिक बिरादरी ने जाने-अंजाने उसके साथ किया। सबसे ज्यादा यही दो धु्रव जिनके मध्य अपने आपको रखकर ज्यादातर लेखकों की आत्म कथाओं में अभिव्यक्त, प्रसंग, घटनाओं और जीवनगत पहलुओं के संदर्भ जुड़ते हैं।
सामयिक प्रकाशन से कृष्णा अग्निहोत्री की आत्मकथा दो खंडों में, ‘लगता नहीं है दिल मेरा’ तथा ‘और… और… औरत’ प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा की आत्मकथाओं ने साहित्यिक जगत की उदासीनता, एक रसता को अपने तरीके से तोड़ने का प्रयास किया। उसी शृंखला में आत्मकथा को देखा जाना चाहिए जिसमें जीवनगत सघर्षों, कठिनाइयों, विसंगतियों, के बीच अपने-आपकी तलाश, तराश को व्यवस्थित करके परिवार में तो नहीं अपितु, साहित्यिक समाज में एक वांछित मुकाम पाने के लिए जिस प्रकार अनेक धरातलों पर एक साथ लड़ाई लड़ती है वह वास्तव में एक अकेली महिला के लिए किसी युद्ध क्षेत्र से कम नहीं। वह अभिमन्यु भी नहीं कि मां के गर्भ से चक्रव्यूह तोड़ने की विद्या लेकर पैदा हुई हो अपितु सच्चाई तो इस समाज की और भी कड़वी है कि अपने ही परिवार में अपना वजूद तलाशने के लिए एक लड़की को गर्भ से लेकर जीवन पर्यंत संघर्ष करना पड़ता है। जिसमें लेखिका ने अनेकानेक मानसिक एवम् शारीरिक यातनाओं को सहने के बाद भी अपने आपको टूटने से ना सिर्फ बचाया, बल्कि सभी मर्यादाओं का निर्वाह करते हुए भी अपने आपको जो बनाने की कोशिश की उसका दंड पति, परिवार और समाज ने अपने-अपने तरीके से दिया और यहीं से लेखिका को जो शिकायत है जिनका जवाब इस आत्मकथा के बाद भी उन्हें संतुष्ट नहीं कर पाया और यह प्रश्न आज भी उनके मन में अनुत्तरित ही रह गया है।
लेकिन यह स्त्री की जीवटता ही है कि वह सब कुछ जानते हुए समझते हुए भी कहीं न कहीं अपने सृजन धर्मी गुण परवश धारा के विपरीत तैरने का जोखिम भी उठाती है पर यह स्थिति सबके साथ नहीं है। कुछ की स्थिति तो इतनी बदतर हो जाती है कि वह इस रास्ते पर आने की हिम्मत भी जुटा सकते पर हमारी लेखिका उन महिलाओं की श्रेणी में आती है जिनको परिस्थितियों ने महत्वाकांक्षी बनाया जो बुद्धि और सौंदर्य के सहारे समझौतापरस्त हो इन्हीं दुर्गम रास्तों के बीच जीवनयापन की समस्या एवम् साहित्य सजृन का रास्ता चुनती है। यहां तक पहुंचने के पीछे कि स्थितियां कितनी भयानक सुरंगों से निकली हैं यह उनके आई.पी.एस. पति सत्यदेव अग्निहोत्री के साथ बिताई प्रत्येक रात की नीली सूजी देह और निरंतर की प्रताड़ना, अवहेलना की अंधेरी राह किसी भी तरह के उजाले से आलोकित होने से रही। ससुराल पक्ष ने उन्हें आत्मनिर्भर बनने के लिए बाहर का रास्ता तो दिखा दिया किंतु मनन के सारे रास्तों को ही बंद कर दिया। मां एवं भाई से तो उन्हें पहले से ही बहुत उम्मीद नहीं थी, किंतु सबसे ज्यादा आहत, आत्मनिर्वासन तथा उपेक्षित किया पिता के बदले व्यवहार ने। जिसकी वह लाड़ली बेटी, जिसने अपनी महत्वाकांक्षाओं के पंख कृष्णा के कंधे पर बांधे, सबके विपरीत जीवन साथी भी अपनी तरफ से सुयोग्य ही तलाशा। शायद उनकी कटुता और उपेक्षणा के पीछे अपने लिए निर्णय की असफलता का निरंतर सामने रहने की पीड़ा की असहनीयता ही रही होगी। यह एक टूटते, हारते, उस पिता और व्यक्ति की स्थिति है, जिसका स्वयं का आत्मविश्वास कमजोर पड़ना, बेटी को कैसे आत्मविश्वास देता।
जिस स्वाभिमान तथा आत्मनिर्भरता के लिए कृष्णा ने अपनों से भी संघर्ष किया, समाज की वर्जनाओं, मान्यताओं का उस सीमा तक निर्वाह भी किया, जितना अपने आपको मारे बिना संभव हो सकता था। यह गुण जो बचपन से अपने भीतर संस्कार रूप में सुरक्षित रख पाई थीं। बहुत बड़ा सहारा बना। जबकि यह जीवन के संघर्षों में अक्सर सबसे छूट जाता है। सबसे अलग-थलग पड़ने, नौकरी ढूंढ़ने, उसे अपने बूते निभा ले जाने की कठिन परिस्थितियों से निरंतर जूझती स्थितियों ने आत्महत्या जैसे पड़ाव भी कदम-कदम पर उपस्थित ही किए। जिस शासकीय स्थिति से पुरुष समाज भी नहीं जूझ पाता है, उससे एक महिला किस तरह पार पाती है, जिसमें भी उसके पहुंचने से पहले ही रसिक जनों द्वारा अपने मनोरंजन और तृष्णा शांति के लिए उत्तेजक कहानियों तथा संदेहप्रद परिवेश की गोट पहले ही बिछा दी जाती थी। स्थिति की यह विपरीतता जब साहित्यिक बिरादरी की ओर से मिलने लगती है, तब कहीं अधिक टूटती-बिखरती वह लेखकों, प्रकाशकों एवं संपादकों की संवेदनहीनता से आहत होती है। यह स्थिति सचमुच सांस रोकने लगती है बहुतों के विश्वास इस आत्मकथा को पढ़ने के बाद खंडित होंगी। होने भी चाहिए। यही वह पीढ़ी जो आज पूरी तरह सधुवायी हुई अपने जमाने की दुहाई युवा के सामने बार-बार दोहराती है, उसका कच्चा-चिट्ठा यहां खुलता दिख रहा है। जिस खेमेबाजी, गुटबाजी पर आज सबसे ज्यादा लानत-मलानत हो रही है, उसकी नींव तो हमारे इन्हीं महानुभावों ने पहले ही रख दी थी।
रिश्तों की ढहती, खंडित होती दीवारें, मासूम बचपने में घटी घिनौनी हरकतें मन को मथने वाले दृश्य, आज की छोटी बच्चियों के साथ होते हादसे, और भी भयावह रूप में अपनों के चेहरों में ही निरंतर गुंफित मिलते हैं। कुछ नहीं बदला है न सोच, न हरकतें।
इससे पूर्व भी जितनी आत्मकथाएं पढ़ी हैं। उनमें लगभग सभी ने सामाजिक, पारिवारिक अवरोधों की बाड़ से स्वयं को लहुलूहान होने की स्थिति से सहेजा और अपना रास्ता बनाया। परंतु महिलाओं के लिए यही बाड़े दोहरी-तीहरी होकर कई कोणों से बेंधने को तैयार की जाती हैं। उसी दुनिया में लेखिका अपना अस्तित्व तलाशने, पहचान बनाने के लिए जिस तरह संघर्ष करते हुए बराबर साहित्य, सेक्स एवं लेखनी तथा देह संबंध को समानांतर रखकर शिकायत रोष प्रकट करती चलती है, उनकी यह शिकायत अंत तक बनी हुई है अब जबकि यह सुंदरता किसी को बांधे रखने के आकर्षण से रीत रही है, किंतु उनका यह बार-बार कहना कि आदर्शवादिता एवं देह को बचाए रखने के कारण ही वह उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाईं, जहां वह आसानी से किसी से बंधकर पहुंच सकती थीं। यह मलाल है या मन की कचोट है, जो स्वयं को बचाए रखने को, द्वंद्व से परे नहीं है। स्वीकार-अस्वीकार में दोनों ही स्थितियां निरंतर टंगी हुई दिखाई देती हैं आद्योपांत।
परंतु मूल प्रश्न जो बिना इस आत्मकथा के भी बार-बार पूरी विद्रूपता में अनावृत होता ही रहता है कि क्या वास्तव में कुछ संस्थाएं काजल की कोठरी ही बनी रहेंगी जहां महिलाएं किसी भी रास्ते से जाएं, बाहर निकलेंगी तो वह काजल यहां-वहां लगे बिना यश, मान-सम्मान नहीं दिलवाएगा। क्या यह स्वीकारना सही है कि जिसकी पहचान बनी है वह अवश्य ही किसी सफल लेखक की पत्नी, अफसर की अफसरी के कारण अथवा किसी गाॅड फादर की अंतरंग सखी बनने से ही संभव हुआ है। तो यह भी स्वीकारना होगा कि जिस पुरुष की सफलता का मोर्चा उसके पीछे की स्त्री संभालती है, वह साहित्य की इस दुनिया में पलटकर पुरुषों के आगे किस तरह खड़ी है। उसके अनेक पाठ हो सकते हैं जो कहीं नहीं बदलता, वह साहित्य में तो अवश्य ही परिवर्तित हो सकता है। यह स्वीकारोक्ति ही तो इस उत्तर-आधुनिक समाज की पहचान है जहां पहली बार महान वृत्तांतों के घेरे को नकारकर हम अपनी अस्मिता की स्थापना कर पाने में सक्षम हो पाए हैं। ‘‘अपनी जीवनयात्रा को सफल बनाने वाली अस्मिता की लड़ाई में जूझती, पसीना बहाती इस स्त्री को उसकी साहित्यिक प्रगति धारा में बहते देख कुछ मनुष्यों के लिए ऐसा था जो अकेले रहकर तड़प-तड़पकर रक्त लिखने वाली महिला की हस्ती को छूकर कहना-मानना चाहते हैं कि देखा हमने कैसा पचाया, बुद्धू बनाया, नाटक रचा, हाथ मिलाया और भाग आए’’।
बहुत सारे प्रश्नों, जिज्ञासाओं तथा संघर्ष के रास्तों से निकलती यह कथा आज उस पाठक के हाथों में पहुंच चुकी है, जिसकी उत्सुकता लेखकों के निजी जीवन में भी उतनी ही होती है जितना वह अपने साहित्यकार के साहित्य में ढूंढ़ता है। बहुत कुछ हैµसहमति-असहमति, वाद-विवाद के लिए। जिसका जीवन ही विवाद रहित न रहा हो उसकी संघर्ष यात्रा के दस्तावेज में मतवैभिन्न न हो, यह संभव नहीं। विशेषकर उन प्रसंगों में जहां कोई न कोई साहित्यकार अपने नैसर्गिक स्वभाव में यथार्थ हुआ है, उसका कुहासा छटने से बहुतों के हृदय में मंथन चलेगा। परंतु यह भी एक स्वस्थ किंतु अनिवार्य आवश्यकता है कि जब समाज के आइने में हम स्वयं को निहारते हैं तो स्पष्टतः हमारे चेहरों की झाइयों के बीच पीछे की तस्वीर भी पूरी सच्चाई से दिखाई देती है। उसे कैसे काटकर फेंका जा सकता है। इस समाज से जो अच्छा-बुरा मिला है वस्तुतः जाने से पहले इसे लौटा देना ही ठीक है। दूसरे भाग में अधिकांशतः आत्मानुशीलन के मध्य बार-बार दोनों पलड़ों में अपने और परिवेशगत आचरण को तौलती लेखिका कुछ ऐसे ही सवालों को बार-बार सामने रखकर उत्तर तलाशती दिखाई देती है।
कृष्णा जी का इन दो खंडों में खुली किताब के उड़ते पन्नों में स्वयं को प्रस्तुत करना भी किसी लड़ाई से कम नहीं लगा होगा। यद्यपि जिंदगी की इस सांझ-बेला में जो कुछ भी रचा-बुना जाता है उसमें कितनी तटस्थता आ पाती है, यह तो जानने और भोगने वाले के बीच का सत्य है, किंतु निरपेक्षता एवं परिपक्वता अवश्य घुली-मिली दिखती है। राय बनाने के लिए स्वतंत्रता और अपेक्षित स्थान जगह-जगह छोड़ा गया है। यही इस संघर्ष एवं फिसलन भरी इस यात्रा की उपलब्धि और संतोष में द्रष्टव्य होता है। ‘‘यह सब सार्वजनिक करना यदि अनुचित है तो इस सबको भोगना कितना दारुण रहा होगा। उसे सामान्य व्यक्ति सा सहना, क्या नाटकीय पतिव्रतापन एवं गलत बातों की परंपरा डालना ठीक रहता? इधर सब कहते हैं कि किशोरों को भी ‘सेक्स’ शिक्षा देनी चाहिए। आप इसी का कुरुप चित्रण लेखक द्वारा करने पर इसे अनुचित क्यों कहें जब स्त्री-पुरुष के सच्चे संबंधों का खुलासा एवं उनके दोष हमारे किसी अनुभव के निचोड़ हैं तो उसके कसैलेपन को तो समझें। आत्मकथा मात्र ऐसे सुखद, रोमांटिक, सेक्सी किस्मों की किस्सागोई तो नहीं। रोजमर्रा की लड़ाई भी तो जीवट कर्म है।’’ (और… और… औरत से।)

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