सहजीवन और विच्छेद
July 7th, 2010प्रमीला के.पी
यौनिकता से मुक्ति का संकल्प सापेक्ष होता है। मगर यौनिक उच्छृंखलताओं से मुक्ति सामाजिक जीवन में अनुपेक्षणीय होती है। सभी समस्याओं को यौनिकता में चस्पाकर देखने की वृत्ति उत्तर आधुनिक संचारक्रांति का हिस्सा है। हर राजनैतिक व वैयक्तिक मुद्दे में एक या एकाधिक स्त्री को पात्र बनाने से कहानी खूब बिक जाएगी। कम से कम जायज-नाजायज के द्वंद्व खड़ा करके उलाहना की कुहरिलता में वार्ताएं उकेरी जाती हैं। काम-कुंठा को बेचने की करामतें जगजाहिर हैं।
अब किसी को यह शंका नहीं होगी कि पितृसत्तात्मक समाज में विवाह, कुटुंब और यौनिकता, पुरुष के द्वारा नियंत्रित और संस्थागत स्वरूप में परिचालित हैं। वहां के अधिकारी पुरुष हैं, उसका काम है कि सबको पराजित करके खुद की स्थापना एवं राजत्व की स्थापना करते रहें। बाकी लोगों की स्थिति है कि वे हार मानते रहें, चाहे वे स्त्री हों, बच्चे हों या वृद्ध माता-पिता। हराने व हारने की स्थितियों से गुजरते हुए इस संस्था की अंदरूनी वृत्तियों का पर्दाफाश किया गया तो यह साफ हो गया कि इस संस्था को चालू रखने के लिए स्वामी के अलावा सब किसी का दान, त्याग व योगदान की जरूरत है। यदि स्वामी भी लोकतंत्रीय जीवन के भरोसेमंद हैं तो उन्हें भी अपने समाज द्वारा प्रख्यापित ‘दायित्वों’ को निभाने हेतु त्याग करना होगा! न चाहने पर भी उन्हें परिवार को रखना होगा, पत्नी को सहना होगा, छिप-छुपकर अपने को बचाते रहना होगा। झुंझलाहट, खीझ, घुटन व तड़प की आत्मकथाएं इस तरह रची जाने लगीं, मगर कोई आसार नहीं मिला। वर्षों के दांपत्य-जीवन को आत्मप्रवंचना का कालखंड मानने वाले काफी लोग हैं। निजस्वार्थ, संपत्ति व अधिकार जमाने के मोह में पुत्र-कलत्रादि को भी यांत्रिक समझने वाले लोगों की संख्या बढ़ती गई। दूसरे छोर पर पारिवारिक संस्था में खुद के देय और त्याग से डूब कर स्त्रियां प्रश्नों व शिकायतों को उछालकर तलाक की राह देखने लगीं।
केरल में एक सर्वेक्षण हुआ था कि तलाक के लिए कौन जिम्मेदार है? यह भी पूछा गया कि तलाकनामा किसकी ओर से पहले आता है? देखा गया कि अब के आंकड़े के अनुसार पुरुष की तुलना में स्त्रियां अधिक तलाक मांग रही हैं! यहां पर इतिहास उल्टा चलने लगा। जहां पुरुष अपनी मर्जी से ब्याह करता था, पत्नी को छोड़कर जाता था, वहां पर अब स्त्रियों के नेतृत्व व अगुआपन में तलाक संपन्न हो गया। यदि वह स्त्री पराधीन या उपेक्षित है तो भी कोई सार्वजनिक संगठन का कार्यकर्ता या दूसरा कोई उसकी सहायता के लिए आगे आता है। अर्थात विवाह के संस्थागत स्वरूप की सही पहचान होने के कारण, उसके भीतर प्रवर्तित अधिकार स्वरूप की निंदा पूरे समाज की ओर से हो रही है। यह महत्वपूर्ण बात है कि केरल पूरे भारत में नारी जागरण व साक्षरता में आगे है। विवाह व पारिवारिक संस्थाओं के भीतर कुंठित-प्रताड़ित- शोषित महिलाएं अब और अधिक सह नहीं सकतीं। इसलिए दबते-घुटते जीवन से किसी भी तरह का अकेला जीना उसे बेहतर लगता है। यह काल-समय का सहज विकास है। अपनी यौनिक आकांक्षाओं के शिकार होकर पिताजी की मृत्यु के समय में, अवतारपुरुष गांधीजी पत्नी के भोग में मग्न थे। इस अपराधबोध में परवर्ती दौर के उनके पारिवारिक जीवन की दिशा एकदम बदल गई थी। यौनिकता से मुक्ति का संकल्प सापेक्ष होता है। मगर यौनिक उच्छृंखलताओं से मुक्ति सामाजिक जीवन में अनुपेक्षणीय होती है। सभी समस्याओं को यौनिकता में चस्पाकर देखने की वृत्ति उत्तर आधुनिक संचारक्रांति का हिस्सा है। हर राजनैतिक व वैयक्तिक मुद्दे में एक या एकाधिक स्त्री को पात्र बनाने से कहानी खूब बिक जाएगी। कम से कम जायज-नाजायज के द्वंद्व खड़ा करके उलाहना की कुहरिलता में वार्ताएं उकेरी जाती हैं। काम-कुंठा को बेचने की करामतें जगजाहिर हैं।
गोत्र संस्कृतियों में मातृसत्ता थी। केरल में भी अठारहवीं शदी में मातृसत्ता कुछ समुदायों में व्यवहृत थी। इसलिए यहां पर स्त्रियों का आगे आना कोई परंपराविरोधी बात नहीं होती। परंतु अधिकार और अधिशत्व के आदी पुरुष-संस्कृति को नारीजागरण की बात कलेशजन्य है। अधीन रहने वाली पत्नी व बच्चों को वे चाहेंगे, पालेंगे। इसलिए परंपरागत, पितृसत्तात्मक व्यवस्था के भीतर रहने वाली संस्थाओं का ही वे स्वागत करेंगे। को-हाबिटेशन अथवा लिव-इन संबंधों में अधिकार की कोई पूर्वनिश्चत शर्त नहीं है। इसलिए सभी परंपरागत संस्थाएं उसका विरोध करती हैं। आरोप यह है कि लिव-इन संबंध यौनिक उच्छृंखलता है। पर सामान्य विश्लेषण से ही यह पता चलता है कि किसी भी समाज में यौनिक उच्छृंखलता की भी सीमाएं होती है। दो व्यक्तियों के बीच के संबंध व संपर्क के साथ पुंसवादी यौनिकता में भी आपसी विनिमय की स्थितियों में समान व्यवहार नहीं होता। अतः उभयलिंगी, पारिवारिक यौनिक संबंधों में जिस तरह की समस्याएं हैं, वैसी समस्याएं हर तरह के युग्म के संबंध व जीवन में उपस्थित होंगी, बशर्ते वे समयौनिक हों, लिव-इन हों या किसी दूसरे प्रकार के जोड़े हों। दो लोगों के बीच का संबंध जब नियम व सामाजिक मर्यादा के दबाव को पार करता है तो उनके व्यक्तित्व अलग-अलग आजाद महसूस करते हैं। फलस्वरूप इनके बीच में कोई ऐसा वर्चस्ववादी दबाव नहीं होता जिससे पे्ररित होकर वे साथ निभाने को अभिशप्त हो जावें। बरक्स वे अपनापन महसूस करते हैं और मतभेदों पर खुलकर लड़ते हैं। यहां पर वैचारिक द्वंद्व और आपसी मतभेद को, लोकतंत्रीय चर्चा के माध्यम से सुलझाने का रास्ता खुद ब खुद खुल जाता है। देा कभी एक नहीं होता, या ऐसा नहीं होना चाहिए। यह तो एक आदर्श कल्पना है जिसका दार्शनिक पक्ष समान व लोकतंत्रीय व्यवहार की व्याख्या करता है। इसलिए दंपतियों व युग्मों के मतभेदों को सामान्य व लोकतंत्रीय जीवन की अनिवार्य परिणतियों के लिए सहायक माना जाता है। कभी किसी ने कहा था कि अपने पड़ोसी दंपतियों में कलह सुनते ही नाक पर उंगली नहीं दबाना चाहिए, विपरीत में समझना है कि वे लोकतंत्रीय जीवन की बहस में शामिल होने लगे हैं। संवाद का यह माहौल उन्हें परंपरागत परिवार में स्वायत्त नहीं था। इससे ही मनुष्य जीवन की समान सुविधाएं तैयार होंगी। पुरुष के साथ स्त्री के विचारों का भी स्थान व सम्मान होगा। चुप्पी तोड़ने का यह संदेश अगली पीढ़ी के लिए भी उचित पृष्ठभूमि तैयार करती है।
कई समुदायों व परिवारों में पुरुषत्व की प्रामाणिकता के लिए ब्याह करना और बच्चा पैदा करना अनिवार्य है। विवाह पर्यंत दंपतियों के कुछ तयशुदा कार्यक्रम हैं, बच्चा पैदा करना, घर बसाना इत्यादि। तभी पुरुषत्व व स्त्रीत्व की रक्षा होगी। नहीं तो दोनों का अपमान होगा। यहां पर निरीह बच्चा परिवार जमाने और सामाजिक दर्जा हासिल करने का उपकरण बन जाता है। बच्चों का इस तरह वस्तुकरण एवं निजीकरण काफी समय से हो रहा है। आधुनिकताबोध में इसका एकोन्मुखी रूप स्थापित सा हो गया। भविष्य के नागरिक की मानसिकता और सामाजिक व्यवहारों पर इसका कोई असर हैµइस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
लिंगनीति और यौननीति को लेकर समाज में पूर्वधारणाएं जबरदस्त फैली मिलती हैं। इस बंद समाज को खोलकर उसी में सहजीवन के रास्ते ढूंढने हैं। बर्बर यौनिक विकृतियां हर कोने व समाज से सूचित हैं। परिवार के भीतर बाल-यौनिक उत्पीड़न के आंकड़े तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। अपनी ही पत्नी या पे्रमिका को छूने या चुंबन करने के लिए इजाजत लेने का विवेक कब ‘सामाजिक’ को स्वायत्त होगा? यह मनुष्य-विवेक व मानव अधिकार की बात है, न कि कोई असमंजस की रीत। यह मनुष्य-मनुष्य के आपसी जीवन के लिए जरूरी विवेक है। हमारे घरों में इसके ठीक उल्टे आक्रमण, उत्पीड़न व बलात्कार होता आ रहा है। यौनिकता जीवन की जरूरत है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि कोई हमेशा इसी पर चिंतित रहता है। यह बात समझ में आएगी तो यौनिक जबरदस्ती से खुद को रोकने का विवेक स्वायत्त होगा। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि घर में लोकतांत्रिक सहजीवन सुरक्षित रखने के लिए पे्रम या यौनिकता की ही नहीं, आपसी व्यवहार, विवेक एवं सहयोग की जरूरत है। पर इस संस्था के भीतर जब यौनिक आजादी सिर्फ पुरुष को दी जाती है और स्त्री सिर्फ ‘शयनेषु वेश्या’ का अलंकरण है तो सब कुछ बिगड़ जाता है, सवाल उठाया जाता है। कई संदर्भों पर उपेक्षित व कुंठित यौनिकता घर के बाहर जाकर विवाहेतर संबंध या सार्वजनिक छेड़छाड़ में परिणत हो जाती है। नलिनी जमीला की किताब पढ़ने से यह समझ में आता है कि यौनिक मजदूरनी के पास जाने वालों में शादीशुदा पुरुष अधिक हैं। वेश्या के पास जाने वाले इन पतियों की मनोवैज्ञानिकता को भी वे खुलकर बताती हैं। तमाशा यह है कि इनकी कीमत पर उन्हीं पुरुषों की परिवार वाली औरतों को कपटी समाज में कुलस्त्री का पद मिल जाता है। यह सब संस्कृति की पुंसव्याख्या नहीं तो और क्या है?
इस संदर्भ में बाजार की बात भूलना ठीक नहीं होगा। अब की पीढ़ी में रति समान तीव्र है बाजारी पिपासा। दोनों समान रूप से कलंकित हैं। रति या यौनिकता को जिस प्रकार हमने कलंकित कर रखा है, उसी प्रकार मार्केट या बाजार को भी हमने अपवित्र और प्रदूषित कर दिया है। सिने-तारिकाओं की कीमत बड़ी है, टेली-तारिकाएं पीछे हैं, शहरी महिला आगे हैं, ग्रामीण स्त्रियां पीछे। इन सबके पीछे तो आदिवासी व शरणार्थी औरतें आती हैं। सब कौन नहीं जानता। इंटरनेट खोजिए, सबके सब आपके सामने उभर आएंगे। कृत्रिम रूप से बढ़ी-बढ़ाई बाजारी मार्केटिंग पर यौनिक विकृतियों का विश्लेषण आसान होगा। यौन-पिपासा नहीं तो उसकी जागृति की दवाएं आपके पास आ जाएंगी। इतना सब कुछ बाजार के अलावा कौन करेगा? यौनिकता का बाजारीकरण इसके पहले इतना पुरजोर कभी नहीं था। उल्लास व जश्न के समय में किसी ने यह प्रश्न नहीं किया कि यौनिकता के ट्रेजिक अनुभवों का व्याख्यान बच्चियों व स्त्रियों से बराबर क्यों आ रहा है? कहानियों में पुरुष का स्वरूप हमेशा खल नायकीय पद पर क्यों है? स्त्रियों के अशरीरी पे्रम की कहानियां अब की पीढ़ी को क्यों अभिभूत नहीं करती हैं? पुरुष-बयानों में उपस्थित मांसल पे्रम की नायिकाएं पार्थिव पे्रम की सच्चाईयों व विकृतियों पर क्यों लिखने लगीं? भारतीय समाज का मंडीकरण हो गया तो इसके हर इलाके, प्रदेश, जंगल, पानी, स्त्री व बच्चों की भी दुर्दशा शुरू हुई। दहेज के बल पर पति को खरीदने वाले करोड़पतियों की बेटियां अपने स्थान और अधिकार हेतु शर्तें रख देती हैं तो इसमें हैरानी की बात नहीं। शर्तोंवाले दांपत्य-जीवन में तभी दरार पैदा होता है जब कोई एक शर्त टूट जाती है। करोड़पति की बेटी दूसरे विकल्प की ओर जाएगी। कभी भी जीवन से न सीखने वाला पुरुष अगली शादी भी वैसी ही शर्तों पर करेगा और अपने ‘पति’ स्वरूप को नियत रखेगा। शर्तों पर हो या न हो, अनवसर टूटने की संभावना हर विवाह में होती है। संचारक्रांति के युग में टी.वी. में आने वाले धारावाहिकों की कहानियों का क्रमनुसार पुनराविष्कार परिवारों में संपन्न हो जाता हैं। कोई पत्नी को बेरहम छोड़ देता है तो कोई रूग्ण पति को बेहिचक छोड़कर दूसरे के पास चली जाती है।
इसी संदर्भ में स्वत्व-स्थापना और शरीर की आबरू बचाने हेतु अद्यतन पीढ़ी लिव-इन संबंधों पर सोच रही है। खुशबू हो, सुहासिनी हो या कोई अनपढ़ औरत, लिंग विवेचन की विभीषिकाओं के सामने वे समान विचार पेश करती हैं। कपट व गुप्त रिश्तों को छोड़कर, मन खोलने की जरूरत पर ये लोग प्रकाश डालती हैं। रूपकीय अर्थ में लिव-इन संबंध व्यक्तिमहिमा का पर्यायवाची है। पर उसमें अहं की स्थापना नहीं होती, समानता की सुविधा होती है। इसलिए इसका तौबा-तौबा होता है। यह मात्र एक विकल्प है। बरसों के उत्पीड़न व शोषण से डूबे इंसान के सामने जब एक विकल्प खड़ा किया जाता है तो उस पर उम्मीद जताकर वह खुश हो जाता है। शायद वह उस तरह के जीवन को आत्मसात करने की स्थिति में नहीं होगा। पर विकल्प की चिंता एवं आशा उसे तुष्ट रखती हैं। यदि आप तब भी नाराज हैं तो समझें कि समाज ही नहीं, खुद आपका मन भी बंद है। वहां स्वस्थ जीवन, आजाद हवा और आपसी निभाव का नामोनिशान नहीं है। एक बंद और कपटी समाज में स्त्रियों के लिए स्वस्थ-समान जीवन की उम्मीदें बहुत कम होती हैं। इसी कारण से नवोन्मेष से पोषित ऐसा विकल्प संभव होता रहेगा। समानता और मानव अधिकार की बातों को लेकर मनुष्य की अभिभूतता अब भी शेष है, उनका यूं ही अंत नहीं होगा। बौद्धिक बातों में उन्मुक्तता नर एवं नारी, दोनों के लिए जरूरी है। यथा यह सामाजिक विस्तार के लिए भी अनिवार्य है। अतिक्रमण, अतिरेक या अपवाद के शब्दों को सामने रखकर जब आप सामाजिक विस्तार की राहें बंद कर देते हैं तो समझें कि आप विशाल सामाजिकता के विरोधी हैं, मात्र सांप्रदायिकता के पोषक हैं।
बताया जाता है कि नियमानुसार ब्याह करने से पुरुष की संपत्तियों पर स्त्री अधिकार हो जाएगा। बहुसंख्यक निम्न-मध्यवर्गीय लोगों का आंकड़ा लेता है तो यह सरासर निराधार सिद्ध होता है। अधिकाधिक स्त्रियां, यों कहिए कि कोई भी रास्ता यदि सामने उपलब्ध है, तो उपेक्षित स्त्रियां अब पति की संपत्ति के पीछे जाने को तैयार नहीं। इस तरह वनितागृहों में पहुंचने वाली औरतें हैं। न्यायिक चूक, वर्षों की लंबी कार्रवाइयां और अंत में सिर्फ नाम मात्र का जीवनांशµइन सबके जानकार कोई भी आत्मगौरव रखने वाली स्त्री यह नहीं चाहती कि अपने पूर्वपति से उसे कुछ मिलता रहे। आत्मसम्मान भी मनुष्य के लिए जरूरी होता है। पता नहीं कि हमारी न्यायव्यवस्था इंसान के लिए अत्यंत जरूरी आत्मसम्मान की बात कब पहचानेगी। वैसे ही नियमानुसार संपत्ति का हिस्सा मिलने पर भी उसका तिरस्कार करने वाली महिलाओं का आंकड़ा भी बढ़ने लगा है। इन सब चर्चाओं से गुजरते हुए समाज को यह भी देखना चाहिए कि उपेक्षित स्त्री अपना जीवन कैसे संभालती है। फिर विवाह संस्था पर समझौता एवं त्याग की लीपापोती नहीं करते रहेंगे। सिमोन द बोउवार और सात्र्र, एक साथ सहजीवन जीते थे और कभी शादी नहीं की। बीचोबीच सात्र्र व सिमोन दोनों दूसरे के आकर्षण में पड़ जाते थे तो खुलकर अपनी-अपनी, अलग-अलग पे्रम की बातें, एक-दूसरे को सुना देते थे। आपसी निभाव व आदर खोए बिना उनका जीवन समान हैसियत में व्यतीत हुआ। इसी तरह कल्पना लाजमी से एक बार पूछा गया कि वे परिवार के, विशेषकर माताजी के निरंतर बताने के बावजूद क्यों शादी नहीं कर लेती, काफी समय से ‘लिव-इन’ कर रही हैं तो उनका जवाब था कि वे यही सोचती हैं कि अगर शादी कर लेंगी तो अगले ही दिन डिवोर्स की नौबत आ जाएगी। अपने लंबे जीवन में आपसी मतभेदों को उन्होंने पहचान लिया है और विवेक के आधार पर आगे बढ़ रही हैं। हर संबंध के समान इस तरह ‘लिव-इन’ की भी समस्याएं-सुविधाएं हैं।
लिव-इन संबंधों में उपलब्ध लोकतंत्रीय व्यवहार की उम्मीदें, उस पर सकारात्मक सोचने की पृष्ठभूमि बन जाती है। सहजीवन मानव अधिकारों में एक है। अपनी बौद्धिक व मानसिक स्वायत्तता और स्फूर्ति के लिए सहायक जीवनशैली का मोह हर किसी में होगा। आदर्श पे्रम की जलरेखा में यह उपलब्ध नहीं होता। तभी व्यावहारिक जीवन में पारस्पर्य खोजा जाता है। वहां पर मासनिबद्धता के साथ मानसिक सहयोजन का भी सही समावेश होता है। आश्रितता से बढ़कर अनुराग और आपसी लेन-देन होता है। परिवार के परंपरागत संस्थागत स्वरूप पर प्रश्न लगाने के कारण इसकी कटु आलोचना की जाती है। परंपरावादियों को अधिकार प्रिय है। इसलिए रोशनी व आजादी के नाम सुनने मात्र से वे मुंह मोड़ कर बैठते हैं। सहजीवन की संभावनाएं ढूंढ़ने के लिए इस विकल्प का स्वागत करना चाहिए। इसकी संभावनाओं को सही तरीके से आंकना चाहिए। इनके जोड़ों के बीच का यौनिक संबंध अतिचार और उत्पीड़न न होकर आपसी विवेक और सहयोग पर आश्रित स्त्री-पुरुष का इंसानी रिश्ता होता है। एक आरोप यह भी है कि ये परिवार नहीं बनाते, बच्चे पैदा नहीं करते। आबादी से जूझनेवाले भारतीय समाज में दस या बीस प्रतिशत लोग भी बच्चे न पैदा करने का फैसला लेंगे तो परवरिश, संपत्ति स्थानांतरण, कुलमहिमा आदि की कपट व मानव निर्मित दिक्कतें कम होंगी। गरीबी से तड़पने वाले हमसफर लोगों के उपयोग में इनका योगदान होता तो कितना अच्छा होता। ऐसे स्त्री व पुरुष, दोनों की ऊर्जा समाज निर्माण के लिए प्रस्तुत हो जाएगी। पर यहां भी सतर्कता, विवेक और स्वार्थहीन सामाजिक व्यवहार की बुनियाद अनुपेक्षणीय है। लिव-इन होने से किसी का जीवन खुशहाल होने का अंतिम निर्णय वृथा है। अतः पाठकों से निवेदन है कि निम्नलिखित संभावनाओं पर गौर करें और उन्हें अपनी मर्जी व विवेक के अनुसार स्वीकारें या नकारें। आपके स्वीकारने से इसकी मान्यता बढ़ेगी। नकारने पर भी ऐसा संबंध होता रहेगा, क्योंकि मनुष्य में आजादी का मोह जन्मजात प्रवृत्ति है। धर्म, जाति, गोत्र और परिवार की संस्थाएं अधिकार के पक्ष में मजबूत खड़ी हैं। सांप्रदायिक जाति, धर्म एवं राजनीति की संस्थाओं का स्वभाव यह है कि वे अपने किस्म के अलावा और कुछ नहीं मानेंगी। कभी ‘इनक्लूसिव’ नहीं सोचती। परंतु विविधता के समाज में अपनी रीति के समान दूसरों का भी मानने में मनुष्यत्व है। बेहतर-बदतर के द्वंद्व में कोई शांतिपूर्ण भविष्य नहीं होगा। इसलिए धर्म की ओर से सांप्रदायिक परिवार जमाने और अधिकाधिक बच्चे पैदा करने की सलाह दी जा रही है। धर्म या जाति नियंत्रित राजनैतिक पार्टी इसका पोषण करती है। क्योंकि उन्हें मात्र वोट बैंक की चिंता है। द्वंद्ववादी संसार में अधिकारी-गुलाम, संस्कृति-प्रकृति, नैतिकता- अनैतिकता, धार्मिकता-अधार्मिकता, स्वायत्तता- आश्रयता, सार्वजनिक-निजी, प्रकृतिसिद्ध-प्रकृति विरोधी, स्वामी-सेविका, सही-गलत, कारण-अकारण, मनुष्य-जानवर आदि के आधार पर बनाई गई खंडित धारणाएं हिला देने में इस तरह की नव-अस्मिता का कार्य है। अब के समय में यह कोई दुर्बल पक्ष होगा। ऐसे दुर्बल प्रतिपक्ष को जमने के लिए समय की जरूरत है। लिव-इन संबंधों की विशेषताओं का संक्षेप में आंकलन इस तरह है:
1. शर्त बिना जीवन स्त्री व पुरुष को आपसी मर्यादा बरतने के लिए तैयार रखते हैं। विशेष कर पुरुष को संतुलित होने को विवश कर देता है। जबरदस्ती करता है तो उसे बाहर करने या खुद बाहर जाने का अधिकार स्त्री को होगा। पुरुष की समान हैसियत होगी।
2. पितृसत्तात्मक व पुंसवादी समाज में स्त्री को समान हैसियत मिलने का रास्ता या संभावना कम है। संपत्ति का अधिकार स्त्री के हाथ में रह जाने से इसमें अंतर आ जाता है। सामान्यतः स्वाश्रयी औरतें खुद पर ऐसा निर्णय लेती हैं।
3. यौन-लिंग नीति का लोकतांत्रिक द्वार खुल जाएगा। सांप्रदायिक सामाजिक जगह में अपने से अलग लिंग-यौन स्वत्व के रूप में पुरुष, स्त्री को समझने लगेगा। लिंग संवेदना रहित समाज में बाल-यौनिक उत्पीड़न सबसे अधिक होता रहता है। यौनिक व्यवहार में विवेक की अनुपेक्षणीय स्थिति उभर जाएगी।
4. दो व्यक्तियों के आपसी निभाव में सगे-संबंधियों व पारिवारिक सदस्यों का दखल कम होगा। दांपत्य जीवन में रिश्तेदारों की ज्यादती की शिकायत पर तलाक लेने वाली स्त्रियां काफी हैं! मिल-जुलकर रहने से सभी हमसफर बन जाएंगे, आपसी सहायता बेशर्त करेंगे।
5. स्त्री के साथ पुरुष के व्यवहार में भी लोकतंत्रीय वृत्तियां क्रमशः विकसित होंगी। दायित्व की जगह सहजीवन का परिपे्रक्ष्य कायम होता रहेगा।
6. बच्चे न होने या बच्चों की संख्या कम होने से आबादी, बेरोजगारी की समस्याएं कम होंगी। आबादी कम होने पर ही बच्चों की संख्या पर सोच-विचार करें। यह समाजवैज्ञानिकों का मत है।
7. नए मानकों व प्रतिमानकों की भूमिका में अधिकार, वर्चस्व और अधिशत्व के रिश्तों का लोकतंत्रीय विकल्प प्रस्तुत होगा। इसका दूरव्यापी असर पर शंका जायज है। पर कम से कम एक विकल्प होगा ही।
8. स्त्री व पुरुष के यौनिक व्यवहारों में सकारात्मक अंतर आएगा। किसी को छूने या चुंबन करने के लिए उसकी इजाजत मांगने का सामाजिक व लोकतांत्रिक विवेक व्यवहृत होगा।
9. मतभेद व वैचारिकी द्वंद्व को आपस में सुलझाने की पद्धति दंपतियों में विकसित होगी। आपसी स्फूर्ति की खोज की जाएगी। बंद समाज में परिवार के लिए कमाने के दायित्व में ऋण से पीड़ित होकर आत्महत्या करने वाले पति की दारूण खबरें हमारे सामने हैं। कई मामलों में ‘धर्मपत्नी’ व ‘खून के बच्चों’ को यह भी मालूम नहीं कि उनका कहां, कितना ऋण है?
10. यौनगत असंगतियां व गलतफहमियां दूर होंगी। साथी और साथिन आपसी बहस या कलह के माध्मय से अपनियत दर्ज करते रहेंगे, कपट व तयशुदा यौनिक कारगुजारियां या वैवाहिक बलात्कार नहीं होंगे। घर के भीतर की मानसिक दूरियां कम होंगी।
11. अपने जीवन को संभालने की स्वाश्रयी भावना जागृत होगी। आश्रितता की आड़ में शोषण नहीं होगा। पर स्त्री व पुरुष के मिलने पर होने वाली सभी समस्याएं इनके बीच में भी होंगी। सामाजिक परिसर पितृसत्तात्मक रहने के कारण एक ‘अलग दुनिया’ का सृजन एकदम संघर्षात्मक रहेगा।
12. पितृसत्तात्मक व पुरखों की संपत्ति के वितरण की समस्याएं व दहेज जैसी सामाजिक विभीषिकाओं पर रोक लगाएगी।
13. परिवार, राजनीति, समुदाय, जाति, भाषा, राष्ट्र, नागरिकता और धर्म की परिधि के बाहर मनुष्य मात्र के संबंधों के रूप में लिव-इन का विकास होगा तो वह पूरी मानवराशि के लिए अच्छी परिणति होगी।
14. शर्त बिना रहने के कारण खुद पर फैसला लेने की आजादी या संभावना बनी रहेगी। विपरीत अर्थ में ऐसी स्थिति दुर्बल व्यक्ति के लिए भारी पड़ सकती है।
15. परिवार का नया विकल्प सामने आएगा। इसमें औपचारिक पति, पत्नी व बच्चे की जगह अलग-अलग मनुष्यों का पुंज रहेेगा। व्यक्ति रिश्ता, संपत्ति या अन्य बाहरी कारणों पर आपस में मत लड़ेगा, अतिचार नहीं करेगा। जीवन को लेकर हर व्यक्तित्व का समान वैचारिक व आर्थिक अधिकार होगा।
16. संकल्पनागत अर्थ में इसे तो लिव-आउट संबंध मान लेना चाहिए। क्योंकि आपसी औपचारिकता एवं शोषण को छोड़कर, इनका भागीदार लिव-आउट की स्थिति में होता है। इनके संबंध व संपर्क में सह-अस्तित्व का व्यवहार होगा, दूसरे की स्वभाव हत्या की गुंजाइश कम होगी, छोटे-बड़े का फासला कम होगा। इसलिए तो इस पर युवापीढ़ी की दृष्टि है। सांस्कृतिक व नैतिक विघटन पर परेशान लोग इस पर आग बरसाते रहेंगे, क्योंकि पुंससंस्कृति में जो-जो छिपा-छुपाकर रखे गए थे, वे सब एक-एक होकर इस तरह की ‘नव-अस्मिताओं’ के चुनौतीपूर्ण हस्तक्षेप में सामने आते जाएंगे।