रूस में कुछ दिन
July 7th, 2010सुशील कुसुमाकर
पूश्किन के देस में: महेश दर्पण; कल्याणी शिक्षा परिषद्; पृः 224; मूल्यः 300
ISBN : 978.81.88457.60.1
कथाकार महेश दर्पण का यह संस्मरणात्मक यात्रा-वृत्तांत है। लेखक ने केवल रूस के प्राकृतिक सौंदर्य का चित्र ही नहीं खींचा, बल्कि वहां की सांस्कृतिक-सामाजिक एवं राजनैतिक स्थिति को भी सूक्ष्मता से देखा-परखा है।
उपर्युक्त यात्रा-संस्मरणों में सोवियत संघ के दौर का रूसी समाज, संस्कृति एवं प्राकृतिक सौंदर्य तथा राजनीति का जीवंत वर्णन है; जबकि समीक्ष्य पुस्तक ‘पूश्किन के देस में’ विघटित रूस की साहित्यिक-सांस्कृतिक एवं सामाजिक हलचलों की तस्वीर पेश करती है।
लेखक ने ‘पूश्किन के देस में’ मिले अनुभवों को कलमबद्ध किया है। पुस्तक में उसकी कहीं जिज्ञासु प्रवृत्ति, कहीं सूक्ष्म दृष्टि, कहीं संजीदगी, तो कहीं भावकुता उभरकर आई है। महेश दर्पण को मास्को और पीटर्सबर्ग में अनेक सुखद-दुखद अनुभवों से गुजरना पड़ता है। वह एयरपोर्ट पर रूसी अधिकारियों एवं सुरक्षाकर्मियों के बर्ताव के विषय में लिखता हैµ‘‘मैं ही नहीं, बाहर निकलने को आतुर करीब-करीब सभी परेशान हो उठे थे। स्वदेशियों के लिए वहां लाइन अलग, लेकिन काफी लंबी होते हुए भी जल्दी निबटा दी गई थी। रह गए थे हम, एशियाई मूल और कुछ अन्य देशों से आए लोग, जो भारत घूमने के बाद मास्को की सैर करना चाहते थे। कड़ी जांच के नाम पर हम लोगों के पासपोर्ट लेकर रख लिए गए और करीब डेढ़ घंटा हमें रोके रखा गया।’’ (पृ.
उपर्युक्त अंश से रूसी अधिकारियों द्वारा विदेशियों के साथ किए जाने वाले भेदभावों का खुलासा होता है। यह बात और स्पष्ट हो जाती है कि सुरक्षा जांच के नाम पर विदेशियों के साथ भेदभाव अमेरिकी अधिकारी ही नहीं, रूसी भी करते हैं।
महेश दर्पण को रूसी जीवनशैली, प्राकृतिक मनोरम दृश्यों के साथ-साथ वहां के बाजार भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं। विशेषकर, वहां की बाजार व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका। लेखक ने बाजार का जायजा लेकर लिखा हैµवहां ज्यादातर विक्रेता किशोरियां, युवा, अधेड़ और वृद्ध महिलाएं हैं। पुरुष बहुत कम हैं। वह आगे यह भी बताता है कि यदि वहां की बाजार व्यवस्था, प्रशासन तथा सत्ता में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा है, तो चोरी, छीना-झपटी तथा सेक्स रैकेट में भी महिलाएं कम नहीं! लेखक ने एक अप्रत्याशित घटना के विषय में लिखा हैµ‘‘लौटते वक्त ट्राम की सवारी अच्छी रही। लेकिन मेट्रो ने तो एक झटके में सबक दे दिया। मेट्रो पर सवार होने से पहले ही, कई जिप्सी लड़कियों ने अचानक मुझे घेर लिया। अपने घेरे में लिए ही वह पलक झपकते मेट्रो में प्रवेशकर तुरंत बाहर भी निकल गईं। अनिल इस वक्त कुछ पीछे था, लेकिन वहीं से चिल्लाया ‘महेश, जरा बचके!’ मुझे लगा, वह जल्दी प्रवेश करने को चेता रहा है। बाद में जेबें देखीं तो पता चला कि जैकेट की जेब से कुछ पैसे, पेन और रूमाल गायब है।’’ (पृ. 32) वर्णित घटना से स्पष्ट है कि रूस में भी भारतीय समाज में होने वाली छीना-झपटी और चोरी जैसी घटनाएं आम है। बस फर्क इतना है कि यहां इनमें अधिकता पुरुषों की है, जबकि वहां स्त्रियों की!
लेखक ने ‘दाचा’ में बने बगीचे, चेखव का बगीचा तथा मास्को विश्वविद्यालय के प्रागंण में छटा बिखेरती प्रकृति का चित्रात्मक शैली में वर्णन किया है। वह मास्को के बाग का जीवंत चित्रण इस प्रकार करता हैµ‘‘बुलवार संस्कृति अद्भुत है/ पार्क में दोनों ओर वृक्ष लगे होंगे और बीच में चलने का रास्ता/ रास्ते के किनारे बेंचें/ बेंचों पर इत्मीनान से आराम करते लोग/ पढ़ते हुए लोग/ बतियाते हुए लोग/ ऊंघते हुए लोग/ प्रतीक्षा करते हुए लोग… और प्रेमावेश में एक-दूसरे को चूमते हुए जवां जोड़े… पीछे खड़ा खामोश चर्च उन्हें देख रहा है।’’ (पृ. 30)
ताल्स्तोय, पूश्किन और अंतोन चेखव के देश में एक ओर शहर की भीड़-भाड़ से दूर बुलवार संस्कृति एवं दाचा जैसे शांत स्थानों में सपने बुनती जिंदगियां हैं, तो दूसरी ओर पुलिस, प्रशासन एवं सत्ता की ज्यादतियां, जुल्म और बेकारी एवं तंगहाली भी है। तथ्य बताते हैं कि भारतीय पुलिस एवं सत्ता की तरह रूस में भी इन्हीं महकमों की तानाशाही है। महेश दर्पण ने रूसी पुलिस की अमानवीयता को उजागर किया है। वे लिखते हैं, ‘‘सहयोगी ने बताया कि कैसे पिछले दिनों एक लड़की को रातभर पुलिस ने रोके रखा। उसके साथ रेप किया। लड़की के पे्रमी ने हर तरीके से लड़की को छुड़वाने की कोशिश की, लेकिन पुलिस का दिल नहीं पसीजा। सुबह इसकी रपट तभी लिखी गई जब मीडिया ने हंगामा किया।’’ (पृ. 58) उद्धृत अंश साबित करता है कि दुनिया के अधिकांश देशों की पुलिस अमानवीय, भ्रष्ट तथा सत्ता की पिट्ठू हो गई है; चाहे वह भारतीय पुलिस हो या रूसी या फिर किसी अन्य देश की!
रूस वाले चेचन्या, रूसियों और यहूदियों के आपसी तकरार तथा पूंजीवाद का बढ़ता प्रभाव आदि प्रमुख समस्याओं से पुस्तक हमें रू-ब-रू कराती है। इसी के चलते वहां की सत्ता नीति में परिवर्तन हुए हैं। उसे यह जानकर आश्चर्य होगा कि जो साम्यवादी देश धर्म एवं ईश्वर को अफीम कहता था, वही अब गिरजे की शरण ले रहा है। इतना ही नहीं, जिस देश ने माक्र्स-ऐंगिल्स के सिद्धांतों पर चलकर पूंजीवाद तथा सामंतवाद का विरोध किया, वही अब वैश्वीकरण तथा बाजारवाद के चलते पूंजी तथा मल्टीनेशनल कंपनियों को शह देने पर मजबूर है। लेखक ने वर्तमान रूसी प्रशासन की बदली धार्मिक नीतियों के संदर्भ में लिखा है, ‘‘समय और इतिहास के खेल निराले हैं। स्तालिन के समय कभी खूबसूरत बड़े चर्च तोड़कर स्नानागार और पेशाबघर बनवा दिए गए थे। उनका आर्किटेक्ट इतना खूबसूरत था कि उसे किताबों के जरिए सुरक्षित रखा गया। बहरहाल, समय बदलने पर अब उन जगहों पर वैसे ही चर्च बनाए जा रहे हैं।’’ (पृ. 22)
समीक्ष्य पुस्तक में, लेखक ने रूसी साहित्यिक एवं सांस्कृतिक विशेषताओं का सूक्ष्मता से वर्णन किया है। उसने मास्को और पीटर्सबर्ग के पयर्टक स्थलों, ऐतिहासिक- सांस्कृतिक संग्रहालयों, विश्वविख्यात लेखकों-राजनीतिज्ञों की धरोहरों का बारीकी से अध्ययन किया और उनके अतीत में भी झांकने की कोशिश की है। महेश दर्पण ने अंतोन चेखव, ताल्स्तोय और पूश्किन आदि के म्यूजियम, उनके पोट्रेट, सलीके से रखे पत्रों तथा स्मारकों का सूक्ष्मता से अध्ययन करके, उन विश्वप्रसिद्ध साहित्यिक हस्तियों के तत्कालीन पारिवारिक, सामाजिक तथा साहित्यिक महत्ता की विस्तृत चर्चा की है। लेखक चेखव और ताल्स्तोय तथा गोर्की की मित्रता के संदर्भ में लिखता है, ‘‘चेखव और ताल्स्तोय की पहली मुलाकात 1895 में यस्नाया पल्याना में हुई थी। इसके बाद 12 सितंबर, 1901 को चेखव फिर ताल्स्तोय से मिले। इस मुलाकात का चित्र यहां रखा हुआ है। …याल्ता में उनकी मुलाकात गोर्की से हुई। जनवरी, 1900 में चेखव को रूस की विज्ञान अकादमी के साहित्यिक विभाग का मानद सदस्य बनाया गया। 1902 में गोर्की को भी यही सम्मान मिला। बाद में जब गोर्की से यह सम्मान वापस ले लिया गया तो इसके विरोध में चेखव व करालेंको ने भी अपने सम्मान लौटा दिए।’’ (पृ. 154) लेखक ने ताल्स्तोय के शहर यस्नाया पल्याना की ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक महत्ता का भी वर्णन किया है। इसी के साथ उसने पास्तरनाक, यून्नामोरेत्स और पूश्किन की रचनाओं की प्रसंगानुसार चर्चा की है, जिसके तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य से पाठक परिचित होते हैं।
महेश दर्पण ने जहां रूसी साहित्य-संस्कृति तथा लेखकों के संबंधों और उनकी जीवनशैली की चर्चा की है, वहीं जनता में साहित्य एवं कला के प्रति बदलती अभिरूचियों का भी वर्णन किया है। लेखक लिखता है, ‘‘पहले बाजारों में लेनिन और पूश्किन के चित्र और मूर्तियां खूब बिका करती थीं। अब बहुत कम मिलती हैं। मूल्य भी तो बदल रहे हैं। अब ज्यादातर मूर्तियां पीटर प्रथम और पूतिन की नजर आ रही हैं। व्यवस्था की प्रतीक पुलिस का आचरण भी कहते हैं काफी बदल रहा है। उसका बर्ताव हर जगह पैसा खींचने वाला ही रहता है।’’ (पृ. 163) यहां स्पष्ट रूप से यदि एक ओर जनता की अभिरूचियों का पता चलता है, तो सत्ता और पुलिस के गंठजोड़ का भी पता चलता है।
समीक्ष्य पुस्तक रूस में बसे स्थायी-अस्थायी रूप से भारतीयों की स्थिति को भी उजागर करती है। लेखक अपने रूस प्रवास के दौरान, जब-जब अपने भारतीय मित्रों से मिलता है, तो उसे अपना भारत और उसकी मिट्टी याद आती है। महेश दर्पण ने कवि-कथाकार अब्दुल बिस्मिल्ला से अपनी मुलाकात के बारे में लिखा है, ‘‘…मिल बैठे हैं तीनों दीवाने। अब साहित्य, कला और संस्कृति का परिदृश्य है। पोलैंड, रूस और भारत है। भाषा न जानने या जानने के कारण होने वाली असुविधाओं या सुविधाओं की चर्चा है।…जश्न का माहौल है। बढ़िया भारतीय भोजन है। और हैं ढेर सारी बातें।’’ (पृ. 157) इसके अतिरिक्त लेखक ने मित्र अनिल जन विजय तथा लीना नियाज की उठापटक भरी जिंदगी का वर्णन किया है।
पुस्तक के जरिए हम रूसी संस्कृति, साहित्य और लोगों के रहन-सहन से भी परिचित होते हैं। एक बार और, जहां पाठकों का ध्यान जाना स्वाभाविक है। लेखक की भाषा जीवंत होने के बावजूद कहीं-कहीं सामान्य हो गई है। लेकिन जहां कहीं भी वह प्रकृति चित्रण तथा रोचक प्रसंगों का वर्णन करता है, वहां उसकी भाषा चित्रात्मक एवं आकर्षक है।