प्रश्नों के दायरे में स्त्री-विमर्श

July 7th, 2010

अजहर खान

तहखानों में बंद अक्स: चित्रा मुद्गल; कल्याणी शिक्षा परिषद्; पृ.ः 208; मूल्यः 300
ISBN : 978.81.88457.61.8

वरिष्ठ कथाकार चित्रा मुद्गल की किताब ‘तहखानों में बंद अक्स’ नारी अस्मिता से जुड़े कथात्मक लेखों का संग्रह है। इस किताब के ज्यादातर लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। अहम बात यह है कि ये लेख साक्षात्कार शैली में लिखे गए हैं। जहां हर तबके की औरत पारिवारिक, सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, दैहिक मसलों से जुड़े हुए सवालों का जवाब देती है और नारी अस्मिता को रेखांकित करती है। चित्रा मुद्गल ने इन लेखों के जरिए स्त्री विमर्श के बने-बनाए फ्रेम से अलग उसे प्रश्नों के दायरे में सामने लाने का प्रयास किया है। स्त्रियां स्वयं अपनी सामाजिक अस्मिता अथवा आजादी के बारे में क्या सोचती हैं, यह किताब इसका उदाहरण है।
शुरुआती दौर में स्त्री विमर्श का मूल स्वर औरतों की आर्थिक आत्मनिर्भरता और स्त्री-पुरुष की समानता के इर्द-गिर्द नजर आता है। यह माना जाता रहा है कि पुरुष प्रधान समाज में औरतों की दीन-हीन स्थिति के लिए पुरुष ही जिम्मेदार है। वे उस स्थिति से औरतों को उबरने नहीं देना चाहते। नारी अस्मिता को केंद्र में रखकर लिखने वाली लेखिकाओं ने स्वयं इस प्रवृत्ति का विरोध किया। उन्होंने इसके लिए पुरुषों के साथ औरतों को भी दोषी माना। चित्रा मुद्गल ने अपने उपन्यास ‘एक जमीन अपनी’ में लिखा हैµ‘पुरुष विरोध करते हुए पुरुष की तरह निरंकुश और स्वच्छंद हो जाना नारी मुक्ति नहीं हैं।’ हिंदुस्तान में आठवें दशक में नारी अस्मिता पर केंद्रित काफी कथाओं-कहानियों और वैचारिक लेखन का प्रकाशन होता है। लेकिन इन कथाओं और वैचारिक लेखों में स्त्री की आत्मनिर्भरता, समानता या मुक्ति की जो बातें दर्ज हैं, वह सिर्फ उच्च मध्य वर्ग (इलीट क्लाॅस) की स्त्रियों की ही हैं। वहां निम्न वर्ग की स्त्री कहीं नहीं है। सवाल यह है कि क्या नारी अस्मिता केवल उच्च मध्य वर्ग से जुड़ी है या स्त्री मात्र से? जाहिर है कि यह स्त्री मात्र से जुड़ी हुई अस्मिता है। यही बात स्त्री-पुरुष के व्यवहार, सोच और विचार पर भी लागू होती है। जो बातें पुरुषों के लिए एक समय में अनैतिक, अव्यवहारिक हो सकती हैं वही स्त्रियों के लिए भी। नारी अस्मिता के नाम पर वर्जनाहीन जिंदगी किसी भी रूप में मानवीय नहीं हो सकती। चित्रा मुद्गल इसी तरफ संकेत करती हुई लिखती हैंµ‘मर्दों की भांति रहना, व समस्त आचार-व्यवहार व्यवस्थाएं अपनानाµयही समानता का दृष्टिकोण है? …जब वे व्यवस्थाएं मर्दों के लिए अनैतिक, अमानवीय और निरंकुश हैं तो स्त्रियों के लिए कैसे उचित हो सकती हैं?’
बहरहाल, समीक्ष्य पुस्तक में लेखिका ने प्रेम, सेक्स, दांपत्य जीवन की कड़वाहट, दूसरी औरतों की सामाजिक स्थिति, ग्लैमरस जिंदगी आदि पर विचार किया है। प्रेम और सेक्स को अब तक तमाम तरह से व्याख्यायित किया जा चुका है। प्रेम की सभी व्याख्याएं ‘तथाकथित आधुनिक’ स्त्री की हैं। जिन्हें जिंदगी जीने की तमाम सुविधाएं और मौके मिले हुए हैं। लेकिन प्रेम का मतलब उन औरतों के लिए क्या है जो मशक्कत में जी रही हैं और सुविधाओं से महरूम हैं। चित्रा मुद्गल झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वाली ऐसी ही औरतों से बात करती हैं जहां प्रेम और सेक्स ‘आधुनिक स्त्रियों’ के बरक्स बहुत ही सहज रूप में सामने आता है। इन स्त्रियों के लिए पति-पत्नी के बीच आत्मीयता ही प्रेम है। जहां न बाजार होता है और न ही ग्लैमर की दुनिया।
दांपत्य-जीवन चाहे वह पारंपरिक हो या उससे मुक्तµमें भी कई तरह की दिक्कतें आती हैं। दांपत्य जीवन में जड़ता न आए इसके लिए प्यार और आपसी समझ जरूरी है। पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति सम्मान भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस संबंध को बरकरार रखने के लिए ‘शारीरिक कम्यूनिकेशन’ से ज्यादा ‘मानसिक कम्यूनिकेशन’ की भूमिका होती है। क्योंकि जब स्त्री-पुरुष के बीच कम्यूनिकेशन ही समाप्त हो जाता है, तो संबंधों में जड़ता आना स्वाभाविक है। इसे निभाना किसी भी संवेदनशील इंसान के लिए बहुत बड़ी सजा है।
‘दूसरी औरत बनाम समाज की गैरत’ लेख में चित्रा मुद्गल स्त्रियों से दूसरी औरत के बारे में पूछती हैं तो तरह-तरह केे जवाब मिलते हैं। दूसरी औरत जिसे समाज में रखैल कहा जाता है, उसका भी सम्मानजनक स्वीकार भाव होना चाहिए। अक्सर समाज के ताकतवर लोगों ने दूसरी औरत को तरह-तरह से जस्टीफाई किया और इसके लिए तर्क भी गढ़ा। लेखिका स्वयं दूसरी औरत को समाज में बेगैरत नहीं मानती हैं। लेकिन वे यह सवाल जरूर करती हैं कि ‘क्या यह निर्दोष स्त्री के साथ स्त्री का शोषण नहीं है?’ जवाब मिलता हैµ‘बिल्कुल है।’ लेकिन औरतों के सामाजिक सम्मान और बराबरी के लिए यह जरूरी है। यह भी सही है कि स्त्री-पुरुष के बीच बिना विवाह के दूसरी औरत का आना सामाजिक रूप से कभी स्वीकार्य नहीं हो सकता। फिर भी यह सवाल रह ही जाता है कि अस्मिता या मुक्ति के नाम पर ‘कहीं अनजाने ही स्त्री अपने लिए नए कटघरे तो नहीं निर्मित कर रही है?’ वहीं ‘भीतर दरकी सच्चाईयों का आईना’ लेख में तलाक शुदा औरतों की सामाजिक स्थिति का जिक्र है। इन औरतों ने प्रताड़नामय दांपत्य जीवन से स्वयं तलाक लेने का निर्णय लिया। फिर भी सामाजिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पाई हैं क्योंकि ‘‘औरत के लिए अकेली रहना और अपनी जरूरतों के लिए लड़ना बड़ा जीवट का काम है। उससे भी अधिक कुरूप और प्रताड़नामय है किसी तलाकशुदा औरत के लिए उसी समाज में जिंदा रहना, संघर्ष करना जहां औरत की जिंदगी के कुछ मायने परंपरागत रूप से तय हैं।’’ (पृ.59) भले ही औरत आत्मनिर्भर हो लेकिन पुरुष सत्तात्मक समाज में तलाकशुदा औरत की सामाजिक हैसियत वही नहीं रह पाती। समाज में स्वतंत्र रूप से जीने के लिए ‘कानून तो हक सौंप देता है, मगर जीने की सुविधा-असुविधा समाज देता है।’ इसके लिए जरूरी है कि पुरुष सत्तात्मक समाज अपनी परंपरागत मनोविकृतियों से मुक्त हो।
आज स्त्री किसी भी क्षेत्र में नौकरी करते हुए पुरुषों के बराबर मेहनत व मशक्कत कर रही है। उसे सभी तरह की चुनौतियां स्वीकार है। इसीलिए स्त्री होने के नाते वह समाज से कोई रियायत नहीं चाहती बल्कि समाज में सम्मानजनक स्पेस चाहती है। ‘वे कोई रियायत नहीं चाहतीं’ लेख में पुलिस सेवा से जुड़ी औरतों के अनुभवों का जिक्र है। यह माना जाता रहा है कि पुलिस विभाग के लिए औरतें उस हद तक उपयुक्त नहीं हैं जितना कि पुरुष। जबकि इस विभाग में रहते हुए औरतों ने पुरुष से भी बेहतर कार्य किया है। यह अलग बात है कि एक स्त्री का पुलिस सेवा में आना समाज किस नजरिए से देखता है। तमाम औरतें पुलिस विभाग में बिना किसी अपराध बोध के कार्य करते हुए पुरुष वर्चस्व को चुनौतियां दे रही हैं। इसी तरह एअर होस्टेस की नौकरी करने वाली लड़कियांे के कार्य को पुरुष सत्तात्मक समाज सम्मान की नजर से नहीं देखता। वह हमेशा की तरह आज भी स्त्रियों की निजी जिंदगी में दखल देना चाहता है। यद्यपि ‘‘रूढ़िवादी समाज में शिक्षा और स्वावलंबन ने मुट्ठी भर ही सही, स्त्री को समता और मुक्ति का एहसास तो करवाया है, लेकिन क्या स्त्री मुक्ति के अंतर्पाठ के मर्म को मानवीय अर्थों में स्वीकार कर रहा है पुरुष वर्चस्व?’’ (पृ.115) आज स्त्रियां पुरुषों की वर्चस्ववादिता को ठोकर दे रही हैं। उन्हें यह एहसास है कि जिंदगी को आत्मसम्मान के साथ जीने के लिए स्वावलंबन जरूरी है, वही उनकी अस्मिता का संवाहक भी है।
भूमंडलीकरण का हमला आज बेहद खौफनाक है। आधी आबादी इसके दबाव से त्रस्त है। नारी जीवन का कोई भी ऐसा पक्ष नहीं है जो इससे प्रभावित न हो। भूमंडलीकरण से उपजे सांस्कृतिक संक्रमण ने भारतीय संस्कृति को भी प्रभावित किया है। भारतीय समाज में विषमता व शोषण ने मानवीयता की जगह ले लिया है। महानगरों में जहां प्रेमी-प्रेमिकाआंे का एक साथ रहने का जुनून दिखाई देता है वहीं दूसरी ओर गांवों में परिवार के सदस्यों द्वारा उनकी हत्या हमारे समाज के ऐसे विरोधाभास हैं जिन्हें बदलना और नियंत्रित करना बेहद जरूरी है। ये मामले स्त्री की स्वतंत्रता, स्वायत्तता, अस्मिता को आज भी रौंद रहे हैं। ‘आप हरिजन को दामाद बनाएंगे?’ लेख में चित्रा मुद्गल ऐसे ही सामाजिक हालात की पड़ताल करती हैं। इस समाज में जहां लोग सामाजिक समता और अपने आधुनिक होने का जितना मुखर ढंग से दावा करते हैं, उनकी कथनी और करनी में उतना ही फर्क होता है। आज भी भारतीय समाज में आत्मनिर्भर होने के बावजूद स्त्री ऐसे फैसले स्वयं नहीं ले पाती।
दरअसल, पितृसत्तात्मक समाज में पुरुषों का वर्चस्व हमेशा से रहा है। उसने औरतों पर किसी न किसी रूप में अपना प्रभाव बनाए रखा। लेकिन आज औरत अपने अधिकारों के प्रति सचेत है। इसे पुरुष वर्चस्व बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। यही वजह है कि सफल स्त्रियों की अस्मिता भी संकट में है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ पुरुष ही इसके लिए जिम्मेदार हैं बल्कि स्वयं स्त्रियां भी। जो हर तरह से पुरुषों के साथ हैं इसे वे अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा समझती हैं। इसलिए यह जानना जरूरी है कि ‘‘बदलते समय में उसके अस्तित्व को चुनौती देते उन मुद्दों की असलियत क्या है जो सामाजिक संक्रमण से उपजे हैं, उपज रहे हैं। मार इकतरफा नहीं है। कुछ मुद्दे और हैं जो स्वयं स्त्री के द्वारा स्त्री के लिए पैदा किए गए हैं। स्त्री स्वायत्तता और ‘स्पेस’ के भ्रम में। जो उससे उसका स्पेस किसी न किसी बहाने छीन रहे हैं। वह अनजान है। सोच नहीं पा रही है। स्त्री को स्त्री के विरुद्ध खड़ा करने में किनकी स्वार्थ सिद्धि है।’’ (पृ.11) पुरुषांे द्वारा तय किए गए सामाजिक मूल्यों को स्त्रियों द्वारा स्वीकार कर लेने का नतीजा है कि स्त्रियां स्वयं स्त्रियों के बरक्स पुरुषों के पक्ष में खड़ी हो जाती हैं अनजाने ही सही।
अंत मंे, चित्रा मुद्गल की किताब ‘तहखानों में बंद अक्स’ स्त्री जीवन की तमाम समस्याओं को सामने लाती है जिनसे स्त्रियों का आज भी सामना होता है। ये समस्याएं उनकी निजी जिंदगी से लेकर सामाजिक दायित्व तक में शामिल है। जिन्हेें दूर करना कठिन है लेकिन नामुमकिन नहीं। यह किताब औरतों की जिंदगी का ऐसा सच पेश करती है जिसे नकारा नहीं जा सकता। क्योंकि आज भी औरतों को कभी खाप पंचायतों, कभी फतवों तो कभी संस्कृति के रक्षकों के फैसलों को झेलना पड़ता है। जहां स्त्री अपनी अस्मिता, स्वतंत्रता, स्वायत्तता के लिए जद्दोजहद करती हुई समाज की सोच और संरचना को नहीं बदल पा रही है। शंका व भय में जी रही है।

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