प्रधान मंत्री के सवाल
July 7th, 2010पत्रकारिता
लोकतंत्र में हर किसी को सवाल पूछने का अधिकार है, मीडिया को तो खासकर, लेकिन आज मीडिया किस तरह के सवाल कर रहा है और किस पत्रकार को सवाल पूछने का मौका मिलता है, यह जानना भी महत्वपूर्ण सवाल है। क्योंकि जिस तरह के सवाल पूछे जाएंगे, जवाब भी उसी तरह के होंगे या अगर नहीं होंगे तो सवालों की रोशनी में जवाब देने वाले का पर्दाफाश जरूर हो जाएगा।
अपने देश में मीडिया को प्रधानमंत्री से रू-ब-रू होकर सवाल पूछने का मौका कम मिलता है। इसका एक कारण तो यह है कि प्रधानमंत्री की दिलचस्पी मीडिया के सामने इस तरह आने की कम होती है और उनकी कुछ व्यस्तताएं भी होती हैं। यूपीए सरकार दो के कार्यकाल में प्रधानमंत्री का यह दूसरा पे्रस कांफ्रेंस था। गत दिनों यूपीए-सरकार-दो का एक वर्ष पूरा होने पर यह पे्रस कांफ्रेंस आयोजित की गई थी। जाहिर है, प्रधानमंत्री अपनी उपलब्धियां गिनाना चाहते थे और देश के ज्वलंत मुद्दों से रू-ब-रू होना चाहते थे तथा इस बहाने वह कई तरह के संकेत भी देना चाहते थे।
विज्ञान भवन में आयोजित पे्रस कांफ्रेंस में अनुमानतः तीन-चार सौ पत्रकार रहे होंगे। एक एजेंसी की खबर के अनुसार उसमें करीब 500 पत्रकार थे और केवल 25 प्रतिशत पत्रकार ही सवाल पूछ पाए। विज्ञान भवन में सभी पत्रकार तख्तियां हाथ में लिए थे जिन पर उनका नाम नहीं बल्कि नंबर लिखा था। पत्रकार सवाल पूछने के लिए तख्तियां हवा में उठाते और इस तरह इशारा करते कि वे सवाल पूछना चाहते हैं। जब प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार हरीश खरे की निगाहें उन पर पड़तीं तो वह उन्हें सवाल पूछने की अनुमति देते। इस पूरे प्रसंग में पीटीआई, यूएनआई, भाषा, यूनीवार्ता, एएनआई, रायटर जैसी एजेंसियों तथा हिंदुस्तान टाइम्स, टाइम्स आॅफ इंडिया, इंडियन एक्सपे्रस और कई महत्वपूर्ण अखबारों के पत्रकार सवाल पूछ नहीं पाए जबकि कई चैनलों तथा कुछ दैनिकों के दो-दो पत्रकारों को प्रश्न पूछने की इजाजत दी गई। कुछ पत्रकारों को तो प्रधानमंत्री के मीडिया सलाहकार ने नाम से पुकारा जबकि वह अन्य पत्रकारों को तख्ती का नंबर देखकर सबको अनुमति दे रहे थे। क्या इसका अर्थ यह लगाया गया कि मीडिया सलाहकार ने उन्हीं पत्रकारों को ज्यादा तवज्जो दी जिन्हें वह पहचानते और जानते थे। क्या यह उचित था? जाहिर है ऐसे में कई महत्वपूर्ण पत्रकार सवाल पूछने से वंचित रह गए? हालांकि यह संभव नहीं है कि सभी पत्रकारों को सवाल पूछने का मौका मिले ही। यह बात समझ में आनेवाली है कि प्रधानमंत्री 500 पत्रकारों के सवालों का जवाब नहीं दे सकते। ऐसे में तब क्या लाॅटरी से पत्रकारों को सवाल पूछने की इजाजत दी जाए या प्रधानमंत्री को इस तरह की पे्रस कांफ्रेंस और करनी चाहिए ताकि अधिक से अधिक पत्रकार इस बार नहीं तो अगली बार सवाल पूछ सकें। आखिर कोई भी सरकार या प्रधानमंत्री पत्रकारों के सवालों से बचना क्यों चाहते हैं? वह मीडिया के बहाने देश की जनता के सामने खुलकर जवाब क्यों नहीं देना चाहते और पत्रकार भी वाजिब सवाल क्यों नहीं करते?
प्रधानमंत्री की प्रेस कांफ्रेंस में महंगाई, नक्सलवाद, भारत-पाक रिश्ते, जम्मू-कश्मीर, थ्री-जी स्पेक्ट्रम में भ्रष्टाचार से लेकर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रधानमंत्री के रिटायर होने के बारे में भी सवाल पूछे गए पर शिक्षा, स्वास्थ्य, भुखमरी, महिला आरक्षण, कला-संस्कृति आदि के बारे में कोई सवाल नहीं पूछे गए। आखिर इसका क्या कारण है? क्या हमारे पत्रकारों की दृष्टि में ये सवाल महत्वपूर्ण नहीं हैं? अगर जिस पत्रकार ने यह सवाल पूछा कि राहुल गांधी के लिए क्या आप कुर्सी छोड़ देंगे, वह पत्रकार अगर आदिवासियों, पिछड़ों तथा वंचितों की शिक्षा के बारे में सवाल पूछते तो पे्रस कांफ्रेंस की क्या दूसरी तस्वीर नहीं होती और अखबारों में एक दूसरा पहलू नहीं छपता। जिस पत्रकार ने यह पूछा कि सोनिया गांधी के साथ उनके मतभेद तो नहीं; अगर हमने ग्रामीण स्वास्थ्य के बारे में सवाल पूछा होता, तो क्या पे्रस-कांफ्रेंस की दूसरी तस्वीर नहीं होती। जिस पत्रकार ने यह सवाल पूछा कि घर में और बाहर की मैडम में से किसको आप तवज्जो देते हैं। अगर उसने यह पूछा होता कि देश में यह संस्कृति क्यों फैल रही है, तो पे्रस कांफ्रेंस का परिदृश्य ही कुछ दूसरा नहीं होता। अगर किसी ने किसानों की आत्महत्या और भुखमरी का सवाल पूछा होता तो पे्रस कांफ्रेंस की एक अलग तस्वीर सामने नहीं आती? लेकिन हमारे पत्रकारों में से ज्यादा पत्रकारों के पास यह दृष्टि नहीं है। एक ने रिटायरमेंट का सवाल पूछा तो अगले दिन ज्यादातर अखबारों में प्रधानमंत्री के रिटायरमेंट की ही मुख्य खबर छापी गई। कइयों में राहुल गांधी से संबंधित प्रधानमंत्री के जवाब को मुख्य खबर के रूप में छापा। आखिर हमारा मीडिया क्या बताना चाहता है? वह किसका एजेंडा लागू कर रहा है। ऐसे में यह शंका स्वाभाविक है कि क्या पे्रस-कांफ्रेंस कहीं प्रायोजित तो नहीं थी। क्या मनमोहन सिंह की छवि को चमकाने के लिए अखबारों ने इस तरह की खबरों को प्रमुखता दी। दरअसल मीडिया जनता से जुड़े मुद्दे को केंद्रित ही नहीं करना चाहता है। वह सोनिया गांधी और राहुल गांधी से भी ज्यादा उतावला है कि राहुल गांधी इस देश के प्रधानमंत्री बनें। पिछले कुछ वर्षों से मीडिया ने यह मुहिम छेड़ रखी है कि राहुल गांधी कैबिनेट मंत्री और फिर प्रधानमंत्री बनें।
जो पत्रकार इस तरह के कई सवाल पूछते हैं, वे प्रकारांतर से जाने-अनजाने किसी का एजेंडा ही लागू करते हैं, पर हमारे पत्रकारों को समझाए कौन? यही कारण है कि संसद के गलियारे में घूमने वाले ज्यादातर पत्रकारों के पास कोई ‘दृष्टि’ नहीं है और अगर है तो अपनी-अपनी बीट कवर करने वाली पार्टियों की दृष्टि है। ये पत्रकार काफी सफल, बड़े और रसूखवाले माने जाते हैं। इनमें से कई चैनलों पर बहस में नजर भी आते हैं। मंत्रियों के साथ इनके रिश्ते अच्छे हैं, विमानों में उनके साथ अक्सर उड़ते हैं। इन पत्रकारों को किसी भी तरह की गंभीर वैचारिक बात में दिलचस्पी नहीं है। वे देरिदा या एडवर्ड सईद के मरने जीने, भिखारी ठाकुर की जन्मशती, या हबीब तनवीर या नागार्जुन आदि के योगदान पर चर्चा नहीं करते। आखिर क्यों करें, जब संसद को इस तरह की बातों में दिलचस्पी नहीं है कि देश में पुस्तक नीति कैसी हो, भारतीय फिल्मों का यथार्थ कैसा हो, साहित्य और संस्कृति की दिशा किस तरफ जा रही है, जो जाहिर है, पत्रकारों की भी रुचि नहीं है क्योंकि उनके मालिक और संपादकों की भी रुचि नहीं है कि कोई गंभीर बात उनके अखबार में छपे। वे सभी ‘बिकाऊ’ बात को छापकर, पेड न्यूज को छापकर पैसा कमाने में लगे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और हरीश खरे इस बात को जानते हैं, शायद इसलिए वे चाहते हैं कि हमारे पत्रकार भी इसी तरह के सवाल पूछें और देश के असली सवाल उनसे न पूछे जाएं, बुनियादी सवाल तो हरगिज नहीं। संभवतः इसी कारण कोई भी प्रधानमंत्री नियमित रूप से न तो जनता दरबार आयोजित करता है और न ही पे्रस कांफ्रेंस। साल-दो साल पर एक बार पे्रस कांफ्रेंस कर प्रधानमंत्री की छवि का निर्माण जरूर किया जाता है और पत्रकार महोदय भी इस बात से खुश रहते हैं कि उन्हें पीएम की पे्रस-कांफ्रेंस कवर करने का मौका मिला, वे टी.वी. पर दिखे, बढ़िया लंच किया जाए। पत्रकार महोदय तो सवाल पूछ पाए पर क्या इस मुल्क का एक आम आदमी प्रधानमंत्री से सवाल नहीं पूछ सकता? क्या आम आदमियों के लिए भी कभी प्रधानमंत्री की पे्रस-कांफ्रेंस नहीं होनी चाहिए जो अपनी जिंदगी की कशमकश से जुड़े किसी मुद्दे पर भी कोई सवाल कर सके। पता नहीं, भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वह दिन कब आएका जब आत्महत्या पर उतारू किसान कोई सवाल पूछ पायेंगे?