पारिवारिक अंतर्द्वंदों का आईना घर

July 7th, 2010

पंकज चैधरी

बंधनः पंकज चैधरी; राजकमल प्रकाशन; मूल्य: रु. 350 , पृष्ठ: 1000

आधुनिक जीवन की त्रासदी को सबसे ज्यादा उपन्यासों में उठाया गया है। यह त्रासदी एक ओर जहां शोषकों और शोषितों के संबंधों पर आधारित रही है, वहीं दूसरी ओर बड़े पैमाने पर बड़े शहरों या महानगरों के पारिवारिक विघटनों पर भी आधारित रही है। विज्ञान, तकनीकि, शहरीकरण, बाजारीकरणµऔर औद्योगीकरण का जैसे-जैसे विकास होता गया, वैसे-वैसे उपन्यासों की आमद में वृद्धि होने लगी। हिंदी में अभी भी सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर उपन्यास लिखने का प्रचलन ज्यादा है। लेकिन इधर के वर्षों में सामाजिक-राजनीतिक विषयों से इतर भी उपन्यास लिखे जाने लगे हैं। ये उपन्यास अमूमन स्त्री-पुरुष के संबंधों पर आधारित होते हैं। और इनके बीच के द्वंद्व, तनाव और कटुता मुख्य रूप से उपन्यासों में उभरकर सामने आते हैं। मनोज सिंह का उपन्यास ‘बंधन’ स्त्री-पुरुष के इसी संबंध पर आधारित है। इसके मुख्य पात्र हैं अमित और निकिता। अमित का जीवन जहां शुरू से ही गरीबी, मुश्किलों और संघर्ष से शुरू होता है, वहीं निकिता एक खाते-पीते घर की लड़की होती है। इन दोनों की मुलाकात जबलपुर मेडिकल काॅलेज में पढ़ाई के दौरान होती है। काॅलेज के शुरुआती दिनों में निकिता अमित के उतना करीब नहीं होती जितना वह विक्रम के। विक्रम और निकिता के बीच पे्रम संबंध चल रहा होता है। लेकिन इन दोनों की दोस्ती बहुत दिनों तक नहीं चल पाती। विक्रम जहां स्वच्छंद किस्म का लड़का है, वहीं निकिता विक्रम की हरेक गतिविधि पर हंगामा खड़ा कर देने वाली लड़की। ऐसे में एक दिन दोनों के संबंध खत्म हो जाते हैं। निकिता बुरी तरह टूट जाती है और फिर उसका सहारा बनकर आता है अमित। अमित का प्यार पाकर निकिता को लगता है कि जैसे जीवन में फिर से बहार आ गई हो। फिर दोनों एक दिन विवाह के सूत्र में बंधने का निश्चय करते हैं। अमित के कंधों पर एक बूढ़ी मां और एक बीमार बहन सुप्रिया का भी दायित्व है। निकिता जैसे ही अमित के घर में दाखिल होती है उसे अमित की बीमार बहन सुप्रिया और मां मालती नहीं सुहाती। जबकि अमित की मां और बहन सुप्रिया उसे भरपूर सम्मान देने का प्रयत्न करती रहती हैं। निकिता अमित से झगड़ बैठती है जब देखती है कि अमित अपनी मां और बहन की खोज खबर या सुध ले रहा है। निकिता अपनी बेटी आकांक्षा से भी नफरत करती है, क्योंकि उसमें उसको अमित की बहन सुप्रिया दिखती है। बात-बात पर वह आकांक्षा को डांटती-डपटती और मारती रहती है। अमित को किस बात के लिए और कहां वह भला-बुरा कह देगी और उल्टे आसमान को सर पर उठा लेगी इसका कोई ठिकाना नहीं। बाहर के लोगों से भी उसे मिलना-जुलना पसंद नहीं। एक तानाशाह की तरह घर में सबसे उसका व्यवहार है। ख्ूाब मनमानी करती है। निकिता के चलते अशांति, कलह, अस्थिरता और तनाव का माहौल पूरे घर में व्याप्त हो गया है। और इस कलह के वातावरण में एक दिन धीरे-धीरे पहले अमित की बहन सुप्रिया, फिर मां, फिर अमित और फिर निकिता का भी अंत हो जाता है। मतलब पूरा घर तहस-नहस हो जाता है। और इस तहस-नहस के केंद्र में है निकिता।
युवा उपन्यासकार मनोज सिंह ने निकिता को केंद्र में रखकर पूरे उपन्यास का वितान खड़ा किया है। निकिता के माध्यम से ही वे समस्याओं की तह तक पहुंचते हैं। वे दिखाते हैं कि निकिता की मानसिक स्थिति के लिए बहुत हद तक उसके माता-पिता या उसके घर का वातावरण भी जिम्मेदार है। निकिता के साथ जो मानसिक समस्या है, वह समस्या पिता और बहन के साथ भी है। वे लोग दिल्ली के एक व्यावसायिक घराने से ताल्लुक रखते हैं। और इनमें से किसी के पास भी आपसी सुख-दुख को बांटने के लिए समय नहीं है। यहां तक कि निकिता से मिलने के लिए भी उन लोगों के पास समय नहीं है। सही ढंग से इस उपन्यास का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि निकिता की मानसिक स्थिति के लिए अमित के घर का वातावरण नहीं बल्कि उसके अपने दिल्ली वाले घर का वातावरण ज्यादा जिम्मेदार है। पारिवारिक विघटन, अकेलापन, आधुनिक जीवन की चुनौतियां और अनवरत तनाव, यही निकिता की मनोरचना का निर्माण करते हैं। और इसी नतीजे के फलस्वरूप निकिता में विभिन्न प्रकार के मनोविकारों का जन्म होता है। इतना ही नहीं ये मनोविकार दिनानुदिन जब तक निकिता जिंदा रहती है, उसमें बढ़ते ही जाते हैं। अमित के लाख प्रयास के बावजूद निकिता के मनोविकार दूर नहीं हो पाते। इससे हमें यह भी पता चलता है कि समाज का अनुभव प्रमाण है कि मनोरोग अन्य किसी भी शारीरिक रोग से न सिर्फ ज्यादा गंभीर होते हैं, बल्कि कष्टदायक और भयंकर पीड़ादायक भी। मनोज सिंह ने निकिता के माध्यम से कई समस्याओं का चित्रण किया है। उन्होंने दिखाया है कि मनोरेागी स्वयं तो उस अवस्था में होते हैं कि उसे अपनी पीड़ा का अनुभव नहीं होता, बल्कि उसकी पीड़ा, दुख उन लोगों के हिस्से में आ जाती है जो उसके सगे-संबंधी होते हैं या उसके आसपास रहते हैं। जैसे उनके मित्र-परिजन, सगे-संबंधी और रिश्तेदार वगैरह। उन्हें न सिर्फ उसकी देखभाल करनी पड़ती है और उसके उपचार आदि के लिए अपने सुख-चैन को कुर्बान भी करना पड़ता है। उसे उन सामाजिक-लांछनों को भी झेलना पड़ता है जो हमारे समाज में मनोरोगों और मनोरोगियों के साथ जुड़ा हुआ है।
भारत में आज मनोरोगियों की संख्या का आंकलन विभिन्न अस्पतालों में लंबी कतारें देखकर लगाया जा सकता है। इनका जीवन बड़ा ही भयावह होता है। आधुनिक जीवन की जटिलताएं जैसे-जैसे बढ़ती जा रही हैं वैसे-वैसे मनोरोगियों की संख्या भी बढ़ती जा रही है। मनोज सिंह का यह उपन्यास ‘बंधक’ सामाजिक, पारिवारिक और वैयक्तिक पहलुओं का अन्वेषण करते हुए स्नेह और पे्रम के उस बंधन को रेखांकित करता है जो भारतीय समाज के ताने-बाने का आधार है। दूसरी ओर यही वह तत्व है जिसके चलते भारत में मनोरोगियों को परिवार का अंग बनाकर रखने की परंपरा चली आ रही है। उपन्यास में कथ्य के सम्पे्रषण पर पूरा जोर है। उपन्यासकार अपनी बात कहने में सफल हुआ है और यही इस उपन्यास की जान है।

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