महादेवीः एक नई छवि

July 7th, 2010

हरिमोहन शर्मा

महादेवी: दूधनाथ सिंह; राजकमल प्रकाशन, पृ.ः 435, मूल्यः रु. 600 रू
ISBN: 878.81.267.1753.8
दूधनाथ सिंह की नई पुस्तक छायावाद की प्रतिष्ठित कवयित्री और अप्रतिम गद्यकार महादेवी वर्मा को समग्रता में समझने का एक नूतन प्रयास है। विशेषता यह है कि यह पुस्तक अधिकांशतः पठनीय गद्य में लिखी गई है। इस पुस्तक से महादेवी वर्मा की पीड़ावादी, पलायनवादी, रहस्यवादी छवि से इतर उनके जीवनवृत्त, क्रियाकलाप, रहन-सहन, जीवन संघर्षों के साथ उनकी रचनाओं को जांचने-परखने से उनकी एक भिन्न और अपेक्षाकृत संघर्षशील स्त्री की छवि नि£मत होती है जो पुरानी के मेल से थोड़ा अलग उनके व्यक्तित्व-कृतित्व के नए आयाम खोलती है। इसके लिए लेखक ने ‘उनके किये-धरे, उनके जीने-मरने, उनके सोचने-विचारने, उनका हठ और मौन, उनकी निर्झरिणी हंसी के पर्दे में छिपे संसार – उनके तलघर और बाहर की खुली हवा को ही अपने इतिवृत्त और विश्लेषण का आधार बनाया है।’ (उपकथन) एक प्रकार से कह सकते हैं कि महादेवी वर्मा पर के्रंद्रित यह पुस्तक उनका इतिवृत्तात्मक विश्लेषण है जिसमें उनके साहित्य में लगभग अनुपस्थित उनके जीवन का तथ्यगत शोध है तथा इसके संदर्भ में उनकी रचनाधर्मिता का विश्लेषण है।
दूधनाथ जी साठोत्तरी दौर के महत्त्वपूर्ण रचनाकार हैं। विशिष्ट रचनाकार। इस पुस्तक में उन्होंने महादेवी जी के जीवन, उनके व्यक्तित्व-कृतित्व से संबंधित एक वितान बुना है। इसके आलोक में वह बताते हैं कि महादेवी के गीत यदि उनके अंतरंग की पीड़ा की अभिव्यक्ति हैं तो गद्य उनके बहिरंग यानी समस्त स्त्री-जाति के दुख की अभिव्यक्ति। वह मानते हैं कि इन दोनों में कहीं द्वैत नहीं है। लेखक ने इसे प्रमाण-पुष्ट बनाने के लिए कभी उनके जीवन से तो कभी उनके कार्य-कलापों से कुछ सूत्र तलाश कर उन्हें अपनी इस कहानी में गूंथने का प्रयास किया है। इस पुस्तक के केंद्रीय सूत्र के विषय में दूधनाथ अपनी पुस्तक की भूमिका में लिखते हैं: महादेवी के पार्थिव प्रेम-प्रसंग की कुंजी हाथ लगते ही मैं चमत्कृत हो उठा। इसीलिए पूरी किताब में मैंने इस पद को ‘पार्थिव-अपार्थिवता’ के रूप में रखा है, जबकि महादेवी अत्यंत सचेत ढंग से इसे ‘अपार्थिव-पार्थिवता’ के रूप में रखती हैं। ऐसा क्यों हुआ – इसके कारणों का भी खुलासा करते हुए वह लिखते हैं: ‘उनके जमाने की भारतीय स्त्री अपने प्रेम-गीतों की संरक्षा इसी तरह कर सकती थी।’ ऐसे में उनके इन पार्थिव प्रेम-गीतों का आलंबन भी कोई होना चाहिए – यही वह सूत्र है, वह गुत्थी है जिसे खोलने का उपक्रम पहली बार लेखक ने इस पुस्तक में किया है।
सभी जानते हैं कि महादेवी की कविताओं- गीतों का रचनाकाल 1930 से 1942 तक रहा है। यानी छायावाद के उत्कर्ष काल से अपनी काव्य-रचना प्रारंभ कर महादेवी उसके तुरंत बाद यानी उत्तरछायावादकाल में अपने गीतों से उपराम ले लेती हैं। इस समय तक उनकी काव्यभूमि, काव्यगति, उसकी दिशा और उसके रंगरूप स्पष्ट हो चुकते हैं जिस पर कहीं अपने समय के इतिहास-राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन, कांग्रेस या गांधी का प्रत्यक्ष प्रभाव लक्षित नहीं होता। जबकि उसी समय उनकी अनन्य सखी सुभद्रा कुमारी चैहान राष्ट्रीय भावों से ओत-प्रोत होकर इतिहास-लेखन करती हैं तो महादेवी अमूर्तन में चली जाती हैं। इनकी तुलना करते हुए दूधनाथ लिखते हैं: ‘‘सुभद्रा जी समय और अंतर्कथ्य के एक विशिष्ट आसंग से बंधी हुई हैं। वह उस इतिहास के साथ ही पृष्ठभूमि में चली जाएंगी। उनकी कविता एक सरल हृदय की सरल अभिव्यक्ति है। लेकिन महादेवी की कविता? जब सब कुछ बीत जाता है, सब अतीत हो जाता है, इतिहास और समय की धूल और धुंध जब बैठ जाती है तो महादेवी की कविता सामने आती है।’’ यानी महादेवी की कविता अपने समय का अतिक्रमण करती एक नई दुनिया का निर्माण करती है। कभी-कभी रहस्यमय होकर अमूत्र्तन के संसार में चली जाती हैं। ¯कतु यहां अमूत्र्तन का अर्थ आध्यात्मिक या रहस्यवादी होना नहीं है। बल्कि एक निजी दुख है। दूधनाथ मानते हैं कि यह उनका अपने को समाज से बचा ले जाने का तरीका है। इसी से दूधनाथ ¯सह यह कल्पना करते हैं कि महादेवी के बौद्ध भिक्षुणी बनने की इच्छा का कारण भी यही रहा होगा जिसे संघ के अर्हता लक्ष्य नहीं कर पाए। महादेवी को दीक्षा देने के लिए वह एक पर्दे की ओट रखना चाहते थे। इससे खिन्न होकर महादेवी लौट आईं और अपने दुःख को, और अपने निर्वाण की प्रबल आकांक्षा को, अपनी कविताओं में व्यक्त करती रहीं। यह भिक्षुणी बनने का विचार उनके मन में क्यों आया, इसके बारे में महादेवी एकदम चुप हैं। परंतु दूधनाथ ¯सह महादेवी के इस ‘पार्थिव-अपार्थिव’ को उनके प्रेमगीतों तथा इस विषय में उनकी चुप्पी को यों ही नहीं छोड़ देते वरन् इसके पीछे छिपे आलंबन की खोज में निकल पड़ते हैं – खोजी यात्री की तरह। तब उनकी जन्मतिथि का विवाद, उनके किशोर जीवन के प्रेम की पड़ताल तथा नरसिंहगढ़ में उनके माता-पिता द्वारा उनके विवाह का रोचक आख्यान जन्म लेता है। इस तरह के कुछ अन्य विवाद आलोच्य पुस्तक तथा उसके परिशिष्ट में देखने को मिल जाएंगे जो पुस्तक को संदर्भवान और पठनीय बनाते हैं।
इस पुस्तक की मुख्य उपलब्धि महादेवी की कविताओं µ गीतों, गद्य के विश्लेषण से बनने वाले उनके व्यक्तित्व के निर्माण में हैं। लेखक सिलसिलेवार ढंग से उनके गीत-संग्रहों, उनकी अन्य पुस्तकों के प्रकाशन, उनके चित्रों, उनके रेखांकनों के पीछे छिपे भावों से जोड़कर जो उनकी व्याख्या करता है, उसे ¯हदी साहित्य के विशेषतः कविता के, पाठकों को अवश्य पढ़ना चाहिए। ‘पार्थिव-अपार्थिव’ की चर्चा दूधनाथ अपनी विशिष्ट शैली में अनेक बार करते हैं। महादेवी अपने पार्थिव भावों को ‘रहस्य’ का आवरण क्यों देती हैं, उनकी ऐसी कौन-सी विवशता है जो उन्हें बिंबों-प्रतीकों में बात करने को मजबूर करती है। इसे विश्लेषित करते हुए वह इसे मध्यकालीन ‘रहस्यवाद’ या ‘साकार-निराकार’ से जोड़ कर देखने की बजाय आधुनिक संदर्भों में इन्हें खोलने की सलाह देते हैं। दूधनाथ ¯सह लिखते हैं: ‘‘अतः जब मैं बार-बार ‘पार्थिव की अपार्थिव अनुभूति’ की बात करता हूं तो इसका अर्थ यह नहीं कि मैं मध्यकालीन अर्थों में ‘साकार’ ‘निराकार’ की बात करता हूं। अगर महादेवी को समझना है तो इन शब्दों को उन पुराने अर्थों से पीछा छुड़ाना होगा। महादेवी में ये शब्द हैं लेकिन रहस्यरहित, ईश्वर विहीन और तभी आधुनिक।’’ (पृष्ठ-62) लेखक रूढ़िवादी भारतीय समाज में घुटती-पिसती स्त्री के रूप में उसे पढ़ते हुए, महादेवी के प्रसिद्ध गीत – मैं नीरभरी दुःख की बदली/ विस्तृत नभ का कोई कोना की यह व्याख्या करता है: ‘‘ मैं नीर भरी दुख की बदली में ‘मैं’ दुनिया की एक सार्वजनिक औरत है, केवल महादेवी नहीं। इस ‘विस्तृत नभ’ के किसी कोने में उसके लिए कोई जगह का न होना पुरुष सत्ता पर एक कठिन व्यंग्य है। उसका ‘उमड़ना’ और ‘मिट जाना’ एक सार्वजनिक स्त्री-नियति का प्रतीक।’’ (पृष्ठ-63) कथनीय है कि छायावाद के कुछ आलोचकों ने छायावाद के प्रेम-गीतों की फ्राॅयडीय ‘कामवासना’ सिद्धांत के अनुरूप व्याख्या की है परंतु दूधनाथ के अनुसार यह संकुचित अर्थ की ओर जाना है। महादेवी के संदर्भ में इस अर्थ-संकुचन का विरोध करते हुए वह लिखते हैं: ‘‘मेरा यही कहना है कि महादेवी की कविताएं कामवासना से प्रेरित नहीं, प्रेम की अटूट, दबी-घुटी इच्छा की अभिव्यक्तियां हैं, और इसी रूप में वे सारी भारतीय स्त्रियों की इच्छाओं का प्रतीक हैं।’’
इसी प्रकार छायावाद और गांधी के प्रभाव का आंकलन करते हुए दूधनाथ सिंह का मानना है कि इस समय गांधी राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान जहां मध्यवर्गीय तबके की कुछ स्त्रियों को अपने साथ लाते हैं तथा उन्हें मुक्ति के अहसास से जोड़ते हैं, वहीं महादेवी अपेक्षाकृत बृहत्तर भारतीय स्त्री-समाज के भावों को अपने साहित्य में वाणी देती हैं तथा उन्हें अपने गीतों के माध्यम से मुक्ति के भाव से जोड़ देती हैं। यह निश्चय ही महादेवी के पाठ की एक नई व्याख्या है। दूधनाथ के शब्दों में महादेवी महात्मा गांधी की स्त्रियों – यानी आंदोलन में खींचकर लाई गईं स्त्रियों – से सर्वथा अलग, उनके समानांतर एक दूसरे और बहुसंख्यक स्त्री-समाज को अपने भीतर से वाणी देती हैं जहां तक महात्मा गांधी की पहुंच नहीं है। जिनके दुःख को महात्मा गांधी स्पर्श नहीं कर सके उनके दुःख को महादेवी ने अपनी कविताओं और चित्रों में वाणी दी। ‘‘स्पष्ट है कि स्त्री महादेवी-साहित्य के केंद्र में रही है। चाहे उनकी कविता हो या उनके संस्मरण-रेखाचित्र या उनके लेख-आलोचनात्मक निबंध। उन्होंने अपने आसपास फैले समाज में स्त्री-दशा से प्रेरित होकर अपना लेखन किया है। गद्य के रूप में उनके बहुच£चत ‘ शृंखला की कड़ियां’ के नाम से छपने वाले आलेख हों या चाँद पत्रिका के संपादकीय के रूप में लिखे गए लेख – ये सभी संपादकीय भर नहीं हैं बल्कि भारतीय स्त्री के बारे में एक चुनौतीपूर्ण, आहत और संवेदनशील विमर्श की अभिव्यक्ति है। वह भी उस समय जब स्त्री-विमर्श का उद्वेलन भारतीय समाज में प्रस्फुटित भी नहीं हुआ था। तब यह एक लेखिका की अपने समाज के प्रति निष्ठापूर्ण अभिव्यक्ति थी जो सचेत रूप से उनके गद्य-लेखन में स्थान पा रही थी। इसे ही दूधनाथ ने ‘‘भारतीय स्त्री का परम अंतःकरण’’ कहा है। ‘‘यह अंतःकरण संवेदनशील और सावधान है जो अपने समय की चुनौतियों को भलीभांति समझता-बूझता है। इसीलिए वह कह पाती हैं बेड़ियों के साथ ही उसी अस्त्र से बंदी यदि पैर भी काट डालेगा तो मुक्ति की आशा, दुराशा मात्र रह जाएगी।’’ ऐसे में स्त्री-शिक्षा बहुत जरूरी थी। इसी से प्रेरित उनके सोच-विचार और उनके सिद्धांतों का व्यावहारिक रूप बना था ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ की स्थापना जहां गरीब बालिकाओं के शिक्षण-प्रशिक्षण से वे आजीवन जुड़ी रहीं।
इस पुस्तक की एक अन्य विशेषता यह है कि लेखक महादेवी के रेखांकनों, चित्रों और कविताओं को एक साथ पढ़ने तथा उनके बीच अंतर्संबंध बैठाने का प्रयास करता है। हालांकि महादेवी अपने चित्रों और रेखांकनों का अंतर्संबंध बहुत दूर तक अपनी कविताओं से जोड़ना नहीं चाहतीं। फिर भी वह ¯हदी की पहली कवयित्री हैं जो चित्रों-रेखांकनों के साथ अपने गीतों के संग्रह का प्रकाशन कराती हैं। भले ही कविता की अंतर्वस्तु के साथ उन रेखांकनों का संबंध न बैठता हो, भले ही साज-सज्जा के लिए ही कली, फूल, पत्ती, टहनी का इस्तेमाल किया गया हो ¯कतु सांध्यगीत (1936) के प्रकाशन से ही उनके संग्रह चित्रों-रेखांकनों से युक्त होने लगे थे। यामा संकलन (1939) की 186 कविताओं के लिए 104 चित्रों और रेखांकनों का प्रयोग हुआ हैं, जिनमें कमल, टहनियों, शंख, स्त्रियां, तांडव करते शिव बनाए गए हैं। यहां तांडव का भाव शिव में व्यक्त नहीं हुआ है µ इन सबको देखकर महादेवी के भावबोध का एक ‘सुसंस्कृत सांस्कृतिक पिछड़ापन’ उभरता है। फिर भी प्रश्न है कि कविता की सारवत्ता के साथ इनका कोई संबंध है या नहीं? क्या इसे रीतिकालीन खनक मात्र कहकर छोड़ा जा सकता है? लेखक मानता है कि महादेवी के भाव-बोध में एक प्रकार का आधुनिक रसायन भी है जो वर्णाश्रम और स्त्री-धर्म के अनुशासन को चिढ़ाता हुआ एक नया ‘स्पेस’ रचता है। दूधनाथ ¯सह भी प्रश्न करते हैं: ‘क्या ये सुधड़, बांकी छवि वाली स्त्रियां, क्या ये प्रणत, नमित, मुग्ध, प्रतीक्षारत स्त्रियां – क्या यही आधुनिक नहीं हैं? क्योंकि वे ‘पति’ की खोज में नहीं, दीपक लेकर ‘प्रियतम’ की खोज में खड़ी, या अनंत प्रतीक्षा में बैठी, या दर्पण में अपने सौंदर्य को निहार रही हैं। फूलों का अहर्य लेने वाला देवता ‘प्रियतम’ है, ‘बासी-तिरासी’ पति नहीं। ऊब की नहीं, अनंत प्रतीक्षा की पूजा है। (पृ.-120) मान लें यह सब न भी हो, यहां सार्वजनिक क्षेत्र में एक स्त्री अपने एक-एक स्वतंत्र ‘स्पेस’ की मांग करती अवश्य दिखाई देती है। प्रायः ¯हदी पाठकों, लेखकों, आलोचकों ने उनके चित्रों की उनकी कविता के संबंध में चर्चा नहीं की है। यदि करते हैं तो वे इसे भी उनके अध्यात्म और रहस्यवादी भावों से जोड़ देते हैं। उनके जीवन को ‘विरह का जलजात’ मानने वाले या अलौकिक ‘प्रियतम का पथ’ आलोकित करने वाले दीपक की बार-बार चर्चा करने वाले (रामविलास शर्मा के अतिरिक्त) सभी आलोचकों ने उनके चित्रों को ‘धुंधले और अस्पष्ट भावों की अभिव्यक्ति’ मान उन्हें व्यर्थ के खाते में डाल दिया। इसमें मौन सहयोग महादेवी वर्मा का भी रहा है। आखिर उन्होंने ही लखनऊ चित्र-प्रदर्शनी में अपना ‘मीरा’ वाला चित्र प्रद£शत किया तथा 1937 में रामगढ़ नैनीताल में ‘मीरा-कुटीर’ का निर्माण कराया। इसके पीछे दूधनाथ ¯सह के अनुसार ¯हदी समाज की तथा अंशतः महादेवी की भी रूढ़ मानसिकता झलकती है। वह लिखते हैं ‘‘¯हदी आलोचकों ने महादेवी को ऐसे ही खड़ी बोली कविता की ‘नई मीरा’ नहीं कहा है। महादेवी स्वयं ऐसा चाहती हैं। इस तरह पार्थिव को अपार्थिव बनाने में और ‘आत्मगोपन’ (महादेवी का शब्द) में उन्हें मदद मिलती है और सुविधा होती है। अपने रहस्यमय ग्राहस्थ्य और सामाजिक चेहरे को, जो महादेवी तरह-तरह से सुरक्षित रखती हैं, उनमें सबसे सुरक्षित तरीका यही है।’’ (पृ.-137) जो कुछ हो महादेवी की कविताओं के साथ उनके चित्रों को देखकर उन्हें ‘स्त्री-सुलभ-अलंकृति-चेतना’ कह देना, उनकी कविता और चित्र दोनों के साथ अन्याय है। दोनों हाथों की आपस में उलझी हुई उंगलियों और शृंगार के निम्नमुख लटक रहे कमल-पुष्प के साथ – ‘निमिष-से मेरे विरह के कल्प बीते’, क्या यह गीत महादेवी का ‘आत्मनिवेदन’ मात्र है। लेखक इसे अस्वीकार करता है। वह लिखता है: ‘‘यह गीत जैसा कि महादेवी अपने गीतों के बारे में एक जगह कहती हैं? नहीं, यह चुप और निमीलित नेत्रों वाली, अनंत प्रतीक्षा में युगों से दबी-घुटी, मात्र एक दिये के धुंधले उजाले में बैठी, थकी निद्रालस वह भारतीय स्त्री है, जिसकी इच्छाओं और मुद्राओं को महादेवी ने अपने चित्रांकित गीतों (और दूसरे गीतों में भी) में, अपने आत्मनिवेदन के माध्यम से वाणी दी है। यही एक कवयित्री के रूप में महादेवी की महानता है, जिसे स्वयं महादेवी ने अपने आत्मकथनों के पर्दे में हमेशा धुंधला कर रखा है।’’ (पृ.-146) इस तरह के कुछ महत्त्वपूर्ण प्रश्न हैं जो पुस्तक में जगह-जगह उठाए गए हंै।
दूधनाथ ¯सह एक अन्य महत्त्वपूर्ण प्रश्न ‘स्मृति ही संस्कृति है’ नामक अध्याय में उठाते हैं। रचनाकार में स्मृति अपने समाज की ठोस वास्तविक स्थिति से पैदा होती है, दुख से उत्पन्न होती है µ जिससे लेखक रोज-बरोज टकराता है। लहूलुहान होता है। कुछ करने की सोचता है पर फिर अपने से ही हारकर झख मार चुप हो जाता है। लेखक महादेवी के एक सूत्र – ‘मेरी रुचि पर – कथा-व्यथा और आत्मगोपन में है में ‘पर-कथा-व्यथा’ पर टिप्पणी करता है। इसे महादेवी के संस्मरणों-रेखाचित्रों-लेखों के माध्यम से व्याख्यायित करता है। इसकी लगभग समाजशास्त्रीय ढंग से व्याख्या करते हुए वह अपनी तथा अपने अन्य लेखक-साथियों की वर्गीय स्थिति के संदर्भ में विश्लेषण करता है। वह बताता है कि ‘‘महादेवी अपनी अक्षय सहानुभूति स्मृति की रेखाएं और अतीत के चलचित्र की विपन्न, सर्वहारा, जीवित-मरती हुई स्त्रियों को दे सकती हैं लेकिन न उन्हें उनके दुःखजाल से मुक्त कर सकती हैं, न उनके लिए अपना सर्वस्व त्यागकर कोई आंदोलन, कोई कार्यभार अपने ऊपर ले सकती हैं। कोशिश जरूर करती हैं लेकिन एक बार असफलता हाथ लगते ही वह खीझकर या निराश होकर छोड़ देती हैं। एक रचनाकार के रूप में यह महादेवी पर कोई आरोप नहीं, उनकी एक विकट विवशता है, जिससे वह अपने ही ऊपर बार-बार झींखती रहती हैं या अपने सुरक्षित आरामदेह कोने में लौट आती हैं। ‘‘निस्संदेह स्मृति की रेखाएं और अतीत के चलचित्र में जीवन की ठेठ वास्तविकताएं उजागर हुई हैं। उनमें दूसरों के अवसाद की तीखी रेखाएं हैं जिन्हें व्यक्त करने के लिए इतिवृत्त का सहारा लेकर महादेवी उन सामान्य चरित्रों की जिजीविषा को उभार देती हैं। इस प्रकार के गद्य में लेखिका का यथार्थवादी रूप उभरकर आता है। भले ही वह सिद्धांत रूप में यथार्थवाद का विरोध करती हों परंतु अपने गद्य-लेखन में वह यथार्थ-चित्रण से चूकती नहीं। इस संदर्भ में दूधनाथ महादेवी की तुलना प्रेमचंद से करते हुए लिखते हैं: ‘‘दरअसल, महादेवी ने छायावादी भाषा में प्रेमचंदी यथार्थ की संरचना ही की है। अगर प्रेमचंद कल्पना और चरित्रवाद का सहारा लेते हैं तो महादेवी करुणा और यथातथ्यवाद का।’’ (पृष्ठ-158) इसे स्मृति की रेखाएं के एक संस्मरणात्मक रेखाचित्र ‘जंगबहादुर’ के माध्यम से सहज ही समझा जा सकता है। दूधनाथ ¯सह इस संस्मरण का विस्तृत विश्लेषण करते हुए बताते हैं कि महादेवी अपनी बदरीनाथ की यात्रा के दौरान हुए जंगबहादुर और धनबहादुर जंगिया और धनिया नामक कुलियों को अपने साथ लेती हैं जो उनका सामान पीठ कर लादकर सीधी चढ़ाई चढ़ते हैं। तीर्थ यात्री तो टट्टू या डोली में बैठकर भी पुण्य कमा लेते हैं पर इन कुलियों का क्या? इनके भयप्रद जीवन का वर्णन करते हुए महादेवी इनके जीवन की ठेठ वास्तविकाओं से साक्षात्कार करती हैं कि इन कुलियों में से किसी के बीमार पड़ने पर या इनमें से किसी के मर जाने पर कुलियों के दाह-संस्कार का इंतजााम भी यात्रियों से मांग जांच कर किया जाता है। नहीं तो यह खाइयां-घाटियां ही उनकी सहज-समाधि बनती हैं। कुलीगीरी के पेशे के लिए घर से चलते समय का इनका वर्णन करते हुए महादेवी लिखती हैं: ‘‘ जीवित लौटने के साधनों के अभाव में इनकी यात्रा (कुलीगीरी के लिए सबसे, सारे परिजनों से) अंतिम विदा के उपरांत ही आरंभ होती है जैसे यह अंतिम सफर हो।’’ यहां कहीं प्रकृति का रोमानी वर्णन या नदी, पहाड़ियों-घाटियों का चित्रण नहीं मिलता। इन संस्मरणों में मिलता है कुलियों का उपहासात्मक व्यंग्य से भरा भयानक जीवन। दूधनाथ अज्ञेय या निर्मल वर्मा के यात्रा-वर्णनों से महादेवी के इस संस्मरण की तुलना करते हुए उनकी खरी मनुष्य-दृष्टि को उजागर करके रख देते हैं।
यहां यह भी कथनीय है कि साहित्य हो या संस्कृति µ इनके विषय में महादेवी का दृष्टिकोण अधिकांश में अमूत्र्तन की ओर जाने वाला नहीं है। उनके यहां भावनाओं की अभिव्यक्ति में गोपन – या पर्दादारी मिलती है जिसके लिए तत्कालीन समाज की रूढ़ नैतिकताएँ जिम्मेदार बताई गई हैं। बकौल दूधनाथ ¯सह ‘¯हदी समाज घिनौने नैतिकतावादियों का समाज है।’ अन्यथा वह अपने गद्य में दैनंदिन जीवन से जुड़े ठेठ प्रश्नों को बड़े मूत्र्त ढंग से उठाती हैं। वे धर्म को बरतने यानी ‘रूढ़िग्रस्त सूक्ष्म’ (ईश्वर) के प्रश्न को भी ‘विधि-निषेधमय सिद्धांतों का संग्रह’ मानती हैं ‘जो अपने प्रयोग रूप को खोकर हमारे जीवन के विकास में बाधक हो रहे हैं।’ इसीलिए महादेवी कला और साहित्य में सिद्धांतों का घटाटोप खड़ा करने के पक्ष में नहीं रही हैं। बल्कि वह सिद्धांतमुक्त सत्य का आग्रह करती हैं क्योंकि वही सर्वग्राह्य हो सकता है। उनके अनुसार गांधी और माक्र्स दोनों के सत्य सिद्धांतों से बंधे हुए हैं अतः वह सबके नहीं हो सकते। संभवतः यही कारण है कि महादेवी के यहां गांधी और माक्र्स दोनों से एक समान दूरी हैं, वे जीवन-व्यवहार पर अधिक बल देती हैं। महादेवी को ‘गंगा, त्रिवेणी और हिमालय’ जो हमारी संस्कृति के प्रमुख प्रतीक हैं, बहुत आक£षत करते हैं परंतु ‘अंतर की गंगा’ में उनका अधिक विश्वास है। ‘मैं और मेरा: परिवेश’ नामक लेख में वह बताती हैं: ‘‘ मैं किसी कर्मकांड में विश्वास नहीं करती। कोई कहे कि गंगा-स्नान से मैं पवित्र हो जाऊंगी, ऐसा भी कुछ मेरे मन में नहीं है। गंगा को मैं बहुत चाहती हूं, यह सही है, लेकिन आंखों में जो गंगा है, उसे और ज्यादा चाहती हूं। यह मेरे मन में नहीं आता कि आंखों की गंगा की अवज्ञा करके, उस गंगा में नहाने से कुछ मिलेगा। मेरा अंतर्जगत दूसरे प्रकार का है। वह दूसरी अभिव्यक्ति चाहता है। पूरे संस्कार में हम न जाने कितने अतीत लिए घूम रहे हैं।’’ इस प्रकार के विवरणों से दूधनाथ ¯सह महादेवी वर्मा का जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण उजागर करते हैं तथा उन्हें पीड़ा, रहस्य, अध्यात्म के धुंधलके से निकाल हाड़, मांस से बनी, मानवीयता से ओतप्रोत अपने समय के अंतर्विरोधों से युक्त मनुष्य के रूप में उपस्थित कर देते हैं।
अब कुछ बातें इस पुस्तक की शैली-शिल्प के बारे में। दूधनाथ सिंह ने महादेवी पुस्तक की शैली को ‘खुशफैल’ शैली कहा हैं। संभवतः खुशी ‘फील’ कराने वाले वार्तालाप को ‘खुशफैल’ शैली कहा जाता है। पुस्तक की भूमिका में दूधनाथ ¯सह लिखते हैं: ‘‘इस किताब की ‘खुशफैल’ शैली भी अनजाने में अपनाई गई है। लेकिन एक बार उस शिल्प में अपने अंतर्कथ्य को नियोजित करते ही शिल्प एक नई सूझ की तरह प्रकट हुआ और अपनी बात कहने में मुझे अद्भुत मुक्ति का अहसास हुआ। ‘रूढ़ियों’ और ‘क्लिशेज’ के साथ किसी भी समझौते से छुट्टी मिल गई।’’ दरअसल यहां दूधनाथ ने विधाओं और शैलियों के बंधे-बंधाए नियमों से भिन्न, अनेक शैलियों-विधाओं का इस पुस्तक में प्रयोग किया है जिसे उसने ‘खुशफैल’ शैली में लिखा है। इसे हम प्रसन्न गद्यशैली कह सकते हैं जिसमें पाठक सहज ही लेखक की बात को हृदयंगम कर लेता है। दूधनाथ अधिकांश में इसे प्रमाणित भी करते हैं। पाठक समीक्ष्य पुस्तक को एक बार पढ़ना प्रारंभ करता है तो उसमें रम जाता है। फिर विधाओं का ऐसा सम्मिश्रण है कि लेखक उसे भले ही ‘डायरी’ कहे परंतु उसमें जीवनी, संस्मरण, रेखाचित्र, आलोचनात्मक निबंध सभी किसी न किसी रूप में आते-जाते रहते हैं। बत्तीस अध्यायों में लिखी गई पूरी पुस्तक इस अर्थ में डायरी भले ही कही जा सकती है कि ‘‘अध्यायों के नीचे जो तारीख दी गई है वह इस तथ्य की ओर इशारा करती है कि उस दिन उस अध्याय का लिखा जाना शुरू हुआ।’’ बस। इसके बाद लेखक स्वतंत्र होकर लगभग संस्मरणात्मक शैली में ‘महादेवी’ के इतिवृत्त का गुंफन करता चला जाता है। संस्मरण लिखते हुए जब वह आवेश में आ जाता है (जो कि अक्सर वह आ जाता है) तो लंबे-लंबे वाक्यों की सृष्टि हो जाती है। कभी-कभी तो वह प्रसंग ‘महादेवी’ संबंधी अपने मुख्य विषय से कितना जुड़ रहा है, कितना नहीं µ इसकी भी परवाह नहीं करता। ‘लेखक सम्मेलन- 1974’ ‘जयप्रकाश नारायण और महादेवी’ तथा ‘महादेवी और फैज़’ नामक अध्याय इसके उदाहरण हैं।
‘जयप्रकाश नारायण और महादेवी’ अध्याय वैसे कम रोचक नहीं है। लेखक इलाहाबाद में उस घटना का न केवल साक्षी रहा है, बल्कि कत्र्ता-धत्र्ता भी रहा है। किस प्रकार ‘संपूर्ण क्रांति’ के जनक जयप्रकाश की सभा के लिए पूर्वनिर्धारित हाॅल सत्ता पक्ष में बैठे लोग ऐन मौके पर छीन लेते हैं। तब महादेवी जो उस समय नैनीताल में छुट्टियां मना रही होती हैं, केंद्र और राज्य सरकार की सत्ता से निरपेक्ष, निर्भीक होकर ‘प्रयाग महिला विद्यापीठ’ का हाॅल उपलब्ध करा देती हैं। महादेवी वर्मा से इस संस्मरण का इतना भर संबंध है। परंतु दूधनाथ उस समय का एक विस्तृत जीवन संस्मरण लिखकर इस पुस्तक में जोड़ देते हैं। जो ढीले-ढाले इस पुस्तक में खप भी जाता है।
दूसरे, कभी-कभी बौद्धिक परिचर्चा में दूधनाथ ¯सह इतने तन्मय हो जाते हैं कि उस बहस के सभी पक्षों से लोहा लेने के लिए उतारू योद्धा की भूमिका में आ जाते हैं। ‘महादेवी का स्त्री-विमर्श’ नामक लेख को इसी श्रेणी में रखा जा सकता है या दूधनाथ किसी विषय पर एक ऐसा परचा लिखने बैठ जाते हैं कि पाठक का मन उस गुरु-गंभीर विषय से उचाट-सा होने लगता है। ‘संबोधि के बारे में’ या ‘मृत्यु का रोमांस’ इसके उदाहरण हैं। कहीं-कहीं वह अपनी बुद्धि का ऐसा चमत्कार दिखाने लगते हैं कि वह विषय बौद्धिक-खेल में परिणत हो जाता है। इस संदर्भ में जन्मतिथि या कविता में सर्वनामों का खेल संबंधी प्रकरण देखे जा सकते हैं। परंतु ऐसे अध्याय इस पुस्तक में अपेक्षाकृत कम हैं। और महादेवी से कहीं न कहीं उनका जुड़ाव, चाहे वह बहुत झीना ही क्या न हो, उसे पुस्तक में संकलित होने योग्य बना देता है।
अंततः समीक्ष्य पुस्तक में महादेवी के जीवन से संबंधित कुछ तथ्यों का अन्वेषण, कुछ विवाद, कुछ बहसें, कुछ उनके साहित्य का विश्लेषण इस प्रकार मिला-जुलाकर किया गया है कि यह पुस्तक महादेवी वर्मा के व्यक्तित्व-कृतित्व संबंधी समझ में विस्तार करती है। महादेवी को मिथक बन जाने से रोकती है। उन्हें अपने समय के इतिहास तथा अनेक अंतर्विरोधों से युक्त एक जीवंत रचनाकार के रूप में उपस्थित करती है। यदि हम इस पुस्तक में चित्रित महादेवी के ‘उन्मत्त प्रेम-प्रसंग’, नरसिंहगढ़-निवास तथा उनके जन्मतिथि-संबंधी विवाद को छोड़ दें, तब भी यह पुस्तक महादेवी की एक आधुनिक स्त्री की ‘अग्निमय पहचान’ बनाने में सफल होती है। शायद यही दूधनाथ सिंह का इष्ट भी है।

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