कहना जरूरी और गैरजरूरी
July 7th, 2010हरीश तिवारी
…कहना जरूरी थाः कन्हैयालाल नंदनः सामयिक प्रकाशन; मूल्य: रु. 250 (पेपर बैक) , पृष्ठ:176
ISBN : 978.81.7138.190.6
मेरे सामने कन्हैयालाल नंदन की यह संस्मरणात्मक पुस्तक है, जिसके मुखपृष्ठ पर उनकी रंगीन तस्वीर है। चश्मे के भीतर से झांकती आंखें, जिनमें ‘गोल दागने’ वाले खिलाड़ी जैसी चमक है। हाथ पीठ पर होंगे, इसलिए नहीं दिखाई देते, पर मैं उनकी खुद की पीठ थपथपाने की रिद्म सुन सकता हूं और उसके साथ ‘लाल-लाल गाल, काले-काले (डाय किए हुए) बाल जैसी किसी चालीस साल पहले की ओ.पी. नैय्यराना धुन के साथ ऐसे ‘फ्लैशबैक’ में चला जाता हूं, जिसमें नंदन का फोटोग्राफ किसी बिजली के खंभे पर ‘खतरा 440 वोल्ट’ जैसे डरावने सूचनापट्ट के नीचे दो हड्डियों के बीच धरी मानव खोपड़ी में बदल जाता है।
पुस्तक के प्रचार यानी फ्लैप में धर्मवीर भारती के गुजरने के सालहों साल बाद उन्हें ‘एक्सपोज’ किए जाने को बड़ी हिम्मत का ही काम नहीं, बल्कि (गढ़े मुर्दे उखाड़ने की) नई परंपरा की शुरुआत भी बताया गया है। वाह, मुद्दत गुजर गई, जिसे याद करने मात्र से, नंदन की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ उठती थी, अब इधर-उधर देख कर, आश्वस्त होकर कि मृतक व्यक्ति किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकता, वह उस चूहे की कहानी याद दिला रहे हैं जो बिल्ली के भय से दौड़ता हुआ शराब से भरे हौज में गिर पड़ा और गोता खा कर बाहर निकला तो बिल्ली को ललकारने लगाµकहां है बिल्ली, सामने तो आ, कैसा मजा चखाता हूं…?
पर, तब के दिनों नंदन ने बिल्ली के डर से गर्दन बचाने के बजाए चूहेदानी के भीतर प्रविष्ट होना वाजिब समझा, क्योंकि वहां हिंदी की नंबर वन रंग-रंगीली पत्रिका और मोटी तनख्वाह का प्रलोभन बतौर चारे के लटका हुआ था। तब तथा तबके सालों बाद भी नंदन के बारे में लोगों की यही राय कायम थीµधर्मयुग के सहायक संपादक के तौर पर नंदन को लाकर धर्मवीर भारती ने सिद्ध कर दिया वे मामूली से मामूली यानी ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे को धर्मयुग के सहायक संपादक की कुर्सी पर बैठाने और उस पद के लिए काबिल बनाने की क्षमता रखते हैं। अपने इसी विश्वास के मातहत वे धर्मयुग के उन ‘सीनियर्स’ की छुट्टी करते चले गए जो उनकी कार्यशैली में फिट नहीं हो पा रहे थे। यूं नंदन के पद पर नंदन के साले रामऔतार चेतन की भी नजर गड़ी हुई बताई जाती थी। पुस्तक में नंदन ने इस तथ्य की ओर इशारा तो किया है, पर उस घटना का जानबूझ कर जिक्र नहीं किया, जिसके मातहत वे चेतन के भड़कावे में नौकरी छोड़ने की बात सोचने लगे, पर तुरंत ठंडे पड़ गए, जब उनके पड़ोसी डाॅ. शुक्ला ने उन्हें अपने साले चेतन के जाल में न उलझने की राय दी।
वैसे पुस्तक में नंदन ने तथ्यों को अपनी मुर्जी मुताबिक ढालने की छूट का भरपूर लाभ उठाया है। वजह भी है, मुकदमा एक पक्षीय है याने दूसरी पार्टी है ही नहीं। तभी पुस्तक के प्रारंभ में उन्होंने कथाकार मोहन राकेश को बीरबल स्टाइल में लंबी लकीर की तरह खींचा है। सारिका के संपादक मोहन राकेश के इस्तीफे की दशकों-दशक पुरानी बात उन्होंने खोद डाली और यह सिद्ध करने की कोशिश की, मोहन राकेश को हिंदी के संपादकों ने बलि का बकरा बना कर मालिक के सामने जिबह होने के लिए धकेल दिया। लेकिन जब बकरा खुशी-खुशी बलिवेदी पर चढ़ने को तैयार हो तो उसे कौन रोक सकता है? रही बात भारती जी की, उन्होंने भावनात्मक आवेश के उन क्षणों में क्या संयम और समझदारी से काम नहीं लिया जब अहिंदी भाषी प्रांतों से हिंदी की खिलाफत हो रही थी और ऐसे मंच की बड़ी जरूरत महसूस की जा रही थी जहां प्रांत-प्रांत के लेखक आपस में जुड़ सकें और सौहार्दपूर्ण वातावरण में हिंदी के प्रति दुर्भावना खत्म हो। दक्षिण के अहिंदी भाषी लेखकांे से भी टूटी-फूटी हिंदी भाषा में लंबे-लंबे उपन्यास या लेख लिखवाना और बाद में उन्हें संशोधित और पुनः लिखवा कर छापना जैसा काम करके उन्होंने जो हिंदी को लोकप्रिय और ग्राह्य बनाने का प्रयास किया, वह अंग्रेजी संपादकों बराबर वेतन और सुख-सुविधा प्राप्त करने की मांग से कहीं ज्यादा सम्मानजनक प्रशंसनीय और महत्वपूर्ण काम था।
जो लोग मोहन राकेश की वाकफियत के दायरे में रहे, वे जानते थे, उनके मस्त-मौला स्वभाव में ऐसी निश्चिंतता थी जो ‘कैलकुलेटिव’ याने जोड़-घटाना, गुणा-भाग जैसी प्रक्रिया के मातहत स्थितियों का आकलन करके निर्णय लेने की बिल्कुल मोहताज नहीं थी। वे इशारे या राय के लिए दूसरों का मुंह नहीं देखते थे। तब के दिनों याने पैंतालीस साल पहले, जब वह सारिका छोड़ कर पुनः दिल्ली आ गए थे तो एक नए और उनसे प्रोत्साहन पाने वाले नए कहानीकार की हैसियत से मैं उनसे कई बार मिला था। वे अपरिचित व्यक्ति से भी बेतकल्लुफी से मिलते थे। इतनी जल्दी नौकरी छोड़ने और दिल्ली लौट आने का माकूल जवाब वह अपने ठहाकेदार लहजे में यूं बताते थे, कि उन्हें अरसे से दिल्ली की गर्मी से बचने एयरकंडीशन की जरूरत महसूस हो रही थी, सारिका में नौकरी करते वह पूरी हुई नहीं कि वे वापस दिल्ली आ गए…। उनमें एक किस्म का राॅयल याने शाही अंदाज था और विनम्रता की चादर के भीतर भरपूर स्वाभिमान। उसी के होते नंदन के करुण क्रंदन से तंग आकर वे जो कहते होंगे, उसका इजहार नंदन ने यूं किया हैµकभी-कभी राकेश की सलाह उनके रूवभाव के अनुरूप होती, जिसमें मेरे सामने भारती जी को मुखातिब होकर विरोध में इस्तीफा देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता था।
वे दिन धर्मयुग पत्रिका के ऊंचे चढ़ने के दिन थे। नंदन जो मामूली प्राध्यापकीय हैसियत से भारतीजी द्वारा धर्मयुग के सहायक संपादक की सम्मानजनक कुर्सी पर बैठाए गए। बैठते ही उन्हें कांटे चुभने लगे। मगर, वहां मोटी तनख्वाह का भी मरहम था जो उनके घावों की मरहमपट्टी का काम करता था। ऐसी स्थिति में मोहन राकेश को अपना परम हितैषी मानने वाले नंदन का यह बयान बड़ा दिलचस्प लगता हैµ‘‘मैं इस्तीफा देने का अपना मन कभी नहीं बना पाता था, दो कारणों से एक तो यह कि याज्ञिक साहब के काॅलेज में मेरी जगह सुरक्षित होने के बावजूद मुझे लगता ‘पुनर्मूषकभव’ की स्थिति कोई सम्मानजनक स्थिति नहीं होगी। साथ ही ऊंची तनख्वाह पाने का आदी हो जाने के बाद परिवार को पुनः प्राध्यापकी की तनख्वाह में लौटा ले जाने से धक्का लगेगा।’’
इससे साफ जाहिर होता है नंदन ने नौकरी को ‘स्टेटस सिंबल’ के लबादे की तरह ओढ़ लिया था और वह उतारे नहीं उतर पाता था। भारतीजी कुर्सी से चिपकी उस जोंक को जितना खींचते, खिंचती जाती और फिर जाकर जहां की तहां चिपक जाती। भारती जी की मजबूरी थी, वे कंपनी के कड़े नियमों के तहत नंदन को पदच्युत नहीं कर सकते थे। भारतीजी की इसी विवशता के चलते अपनी कायरता और जी-हुजूरी को ढांपते नंदन जैसे कराहते थेµअब तो घबरा के ये कहते हैं कि मर जाएंगे, मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे?
उन दिनों जो भी भारती जी का कृपापात्र या स्नेहभाजन होता, उस पर नंदन अपनी वह कराह केबिन के अंदर भारतीजी तक पहुंचाने की पेशकश करते। वैसे, उनकी व्यथा की गूंज टाइम्स के प्रबंधकों के कानों तक भी जा पहुंची थी, पर बिक्री के हिसाब से भी धर्मयुग लाखों के आंकड़े छू रहा था। इसमें प्रबंधकों की क्या मजाल जो भारतीजी से उनके एक सहायक के लिए पंगा लेने की बात सोचें। नंदन बड़ी सफाई से और चालाकी से यूनियन वाली बात टाल रहे थे, क्योंकि वह रास्ता भी ‘पुनर्मूषकभव’ जैसा खतरनाक था।
तब के दिनों नंदन जिस मानसिक क्लेश की स्थिति से गुजर रहे थे, उसमें उनका स्वास्थ्य गड़बड़ा रहा था। पतली-दुबली काया और उतरा-उतरा चिंतित चेहरा, तिस पर गाल पिचके हुए और चश्मे के भीतर दोनों आंखें धंसी हुईं। मुंबई जैसी बारहमासा चिपचिपी गर्मी से त्रस्त शहर में, खासकर किसी लोकल ट्रेन के लोगों से अटे हुए डिब्बे में किसी सूटेड-बूटेड साहब का मिलना दुर्लभ था। ऐसे में टैरेलिन का सूट और टाई पहने पसीने से तर नंदन अपनी आज के फोटो के कार्टून लगते थे। ‘धर्मयुग’ के प्रमुख उप संपादक मनमोहन सरल जो नंदन के आस-पास ही किसी बैरकनुमा क्वार्टर में रहते थे, नंदन से कम भला कैसे रहते? वैसे भी दोनों में अफसरी दिखाने की होड़ के चर्चे आम थे, पर कुछ भी हो धर्मयुग में मनमोहन सरल जरा निश्चिंत दिखाई देते थे। वे बड़े ही इश्क मिजाज भी थे। मौके बेमौके, महिला पृष्ठ संभालने वाली छायाजी या मायाजी के साथ मजेदार ‘दृश्यव्य’ भी प्रस्तुत करते थे, जिसे अन्य संपादकीय विभाग के लोग टेलीविजन की तरह देखा करते थे। कथाकार रवींद्र कालिया ने अपनी कहानी ‘काला रजिस्टर’ में ‘वास्तव में छोटा विभाग का सबसे दिलचस्प आदमी था’, बताते हुए बड़ा यथार्थ वर्णन किया हैµछोटे की पत्नी को जब इस प्रेम प्रसंग की खबर मिली तो उसे हंसी आ गई। उसका छोटे से वर्षों का संबंध था और वह उसकी क्षमताओं से परिचित थी।
कहानी में ‘मंझले’ का चरित्र-चित्रण बड़ा प्रामाणिक हैµमंझले को मोटी तनख्वाह मिलती थी, मगर इसमें शक नहीं इसके लिए उसे भारी कीमत चुकानी पड़ती थी। पर जब वह इस दफ्तर में आया था, उसका वजन 150 पाउंड था जो स्पष्टीकरण देते-देते अब सौ पाउंड से भी कम रह गया था।
ऐसे में इंद्रप्रकाश पांडे जो नंदन के मित्र थे या कोई भी व्यक्ति नंदन के घटते वजन को लेकर चिंतित होकर राय दे सकता था, वह कुर्सी के बजाए घर की खाट पर लेट कर अपनी जान बचाएं याने नौकरी छोड़ दें। पर, नंदन हैं जो इतने सालों बाद अपनी उस मरणांतक स्थिति को सोच-समझ कर मन-मुताबिक विश्लेषण करते हैं कि नौकरी छोड़ देने की बात मुझे एक तरह की कायरता और अकारण थोपी गई भूलों की आत्मस्वीकृति जैसी लगती थी। बहरहाल, अपने को तपेदिक का मरीज बताकर नंदन छह सप्ताह की मेडिकल छुट्टी लेने में सफल हुए। दरअसल, नंदन इस खौफ के शिकार थे जो नौकरी के साथ उनकी सारी मान-प्रतिष्ठा और हिंदी की सिरमौर पत्रिका में महत्वपूर्ण पद पर होने के गौरव की धज्जियां उड़ा कर उन्हें पहले वाली स्थिति या ‘पुन: अध्यापक भव’ वाली स्थिति में धकेल सकता था। पर, अब वे चालीस साल पहले की स्थिति का विवरण देते हैं तो अपनी कायरता पर बहादुरी का मुलम्मा चढ़ा रहे हैं और डाॅक्टर से कहलवा रहे हैं, ‘‘भारती जी से कहिए, लोगों को बीमारियां बांटना बंद करें।’’ वह कर्तव्य तो स्वयं डाॅक्टर का होना चाहिए था जो कंपनी के लोगों के स्वास्थ्य की देख-रेख का जिम्मेदार था?
वैसे समय में टाइम्स आॅफ इंडिया में परिवर्तन भी हो रहे थे। मोहन राकेश के बाद सारिका के संपादक चंद्रगुप्त विद्यालंकार का कार्यकाल जो दो साल का था, समाप्त हुआ तो वहां कथाकार कमलेश्वर का पदार्पण हुआ। आते ही वे मुंबई के फिल्मी माहौल और मुंबई के दूरदर्शन पर छा गए। जहां बी.आर. चोपड़ा जैसे निर्माताओं के लिए वे पति पत्नी और वह और गुलजार के लिए मौसम जैसी फिल्म लिख रहे थे, वहां कुछ अजीब-ओ-गरीब बढ़ती का नाम दाढ़ी टाइप ज्यादा फटीचर-कम- इंटलैक्चुएल लोग उनके आगे-पीछे मंडराते दृष्टिगोचर होते थे। यह बात तय थी, कमलेश्वर की किसी कहानी पर फिल्म फायनेंस कारपोरेशन ढाई लाख रुपए का ऋण मंजूर कर लेता था और बाद में फिल्म न चली तो सारा कर्ज माफ कर देता था। धर्मयुग के उप संपादक प्रेम कपूर ने जिसे प्रूफ रीडिंग से फुर्सत नहीं मिल पाती थी, अवसर का भरपूर फायदा उठाया और ‘बदनाम बस्ती’ शीर्षक उनकी कहानी के बल पर धर्मयुग की नौकरी को लात मार ‘ऐज ए डायरेक्टर’ फिल्म निर्माण के बंबइया समंदर में कूद पड़े।
ये वो जमाना था, जब टाइम्स आॅफ इंडिया प्रकाशन संस्थान को ‘बोरीबंदर की बुढ़िया’ कहा जाता था, पर हकीकत में वे उसकी जवानी के दिन थे। हिंदी और अंग्रेजी की रंग-रंगीली पत्रिकाएं निकल तो रही थीं, मगर हिंदी के धर्मयुग और अंग्रेजी के इलस्ट्रेटेड वीकली ने लाखों की संख्या में पाठकों की जमात तैयार कर ली थी। वह बड़ा सा जो हाॅल था, उसमंे विभिन्न संपादकीय विभाग थे और हर संपादक के विभाग के सामने उनके केबिन बने हुए थे। इलस्ट्रेटेड वीकली के संपादक का नाम अगर खुशवंत सिंह की जगह ठहाकामार सिंह होता तो उन पर खूब फबता। ढीली-ढाली बुश-शर्ट पैंट और चप्पल चटकाते, बगल में पत्रिकाएं दबाए सरदारजी अकेले कम ही दिखाई देते थे। उनके साथ साड़ी या जींस-शर्ट धारिणी या बाब्ड अथवा खुले बालों वाली कन्याकुमारी जरूर होती। सरदारजी के जोर के ठहाके उस कोने में भी कौंध पैदा करते थे जहां ‘धर्मयुग’ का संपादकीय विभाग था।
धर्मवीर भारती का अपने केबिन में प्रविष्ट होने से पहले एक उचटती नजर अपने स्टाॅफ पर डालना जरूरी था। कभी-कभी उनके हाथ में सिगार भी होता था, जिससे उनका व्यक्तित्व बड़े रौबदाब वाला लगता था। हालांकि उनके विभाग के लोग भारतीजी की उस उचटती दृष्टि के कायल थे, पर पहले से ही सूटेड-बूटेड नंदन को उस एयरकंडीशन हाॅल में फिर पसीना आ जाता था। उनके साथ सभी के चेहरे लटक जाते थे, हालांकि वे लोग क्रांतिदूत, विद्रोही और नेता टाइप थे, पर सब अव्वल दर्जे के डरपोक और शादीशुदा लोग थे। बकौल रवींद्र कालिया के ‘काला रजिस्टर’ कहानी केµवे लोग इतने समझौतापरस्त हो चुके थे हर बात पर जी हां कहने और रद्दी की टोकरी से भी ठोकर लगने पर माफी मांगने की उन्हें आदत पड़ चुकी थी।
इलस्ट्रेटेड वीकली और धर्मयुग के बरख्श माधुरी का संपादकीय विभाग था। वहां सबसे पहले संपादक अरविंद कुमार सहमे बच्चों की तरह प्रविष्ट होते थे। फिर हर मेज पर पड़े अनदेखे प्रूफ बटोरते थे और अपने केबिन में बैठकर बड़ी तन्मयता से उन्हें सही करने में जुट जाते। आॅफिस टाइम के घंटे भर बाद वहां उपसंपादक लोग जुटते थे। वे लोग ऐसे हंसी मजाक करते थे जैसे आॅफिस नहीं काॅलेज की कैंटीन में बैठे हों। हंसी-ठठ्ठे में वह जैनंेद्र जैन आगे रहते थे, जिसे बकौल नंदन भारती जी द्वारा प्रसिद्ध लेखक जैनेंद्र कुमार का नाम भुनाने का आरोप लगाया गया था। यूं तो कहा तो भारती जी ने नंदन से कि वह जैनेंद्र की चालबाजियों पर नजर रखे, पर दूसरे ‘प्रमुख’ की इस चुगली ने उसका बेड़ा पार कर दिया कि वर्किंग अवर्स में बार-बार जेब से निकाल कर मायके गई बीवी का फोटो देखता और आहें भरता है। बात-बात में बीवी की कसम खाता है और कामचोरी ढांपने की कोशिश करता है। जम्हाई लेने पर भी तीन बार अपनी बीवी का नाम लेता है आदि आदि।
इस चुगली के साथ ही जैनेंद्र जैन का ‘अहिल्या उद्धार’ हो गया और उसे ‘खूबसूरत औरतों के नाज नखरों पर बहुत अच्छा लिखता है’ की सिफारिश के साथ नई पत्रिका माधुरी के गुदगुदे गद्दे में पटक दिया गया। माधुरी में आते ही वह सरदारजी जैसे ठहाके लगाते धर्मयुग के संपादकीय विभाग की तरफ कानी आंख कर देखना न भूलता और कभी-कभी वहां के लोगों को जलाने के लिए किसी हीरोइन बनने की शौकीन को भी दफ्तर बुलाकर अपने बगल में बैठा लेता।
पर, उन्हीं दिनों कहानीकार रवींद्र कालिया धर्मयुग के उदास कोने में आ चुका था। उसके आते ही वहां के लोगों को हंसना मुस्कुराना और बात-बात पर ठहाके लगाना भी आ गया था। गणेश मंत्री और विश्वनाथ सचदेव में गाढ़ी इसलिए भी छनती थी दोनों राममनोहर लोहिया के चेले थे पर, जब विभाग में कालिया न होता तो बात करना तो दूर एक दूसरे की तरफ देखते भी न थे। ‘उप प्रमुख’ की नजरें दोनों पर लगी रहतीं और दोनों उस विद्यार्थी की तरह सहमे रहते कि कहीं माॅनीटर खटका भर होते ही उनका नाम ब्लैकबोर्ड पर न लिख दे कि दोनों वर्किंग अवर्स में भी क्रांति की बातें करते हैं।
वाकई, कालिया ने उन लोगों के भीतर का भय अपने उन्मुक्त व्यवहार से निकाल दिया था। बकौल नंदन, रवींद्र कालिया भारती के अत्यंत विश्वसनीय अधीनस्थों में थे, इतने कि वे उनके सामने सिगरेट भी पी सकते थे। पर, यह कालिया में दुर्गुण था वह चापलूसी और चुगली का सहारा लेकर अपने किसी मित्र या सहकर्मी का नुकसान करके अपने को फायदा पहुंचाने की बात सोच भी नहीं सकता था। भारती जी के निकटस्थ लोगों से मैत्री बढ़ाने में नंदन कितने पटु थे, उसकी चर्चा यहां करना बेकार है, पर मानना पड़ेगा कालिया मेें भी मोहन राकेश जैसी गालिब के ‘बंदगी में भी वो आजाद-ओ-खुदबीं हैं कि हम’ शेर जैसी शेरदिली थी। बहरहाल, नंदन फरमाते हैंµरवींद्र कालिया ने एक दिन नौकरी छोड़ दी और छोड़ दी तो छोड़ दी।
फिर, नंदन ने ‘चोर की दाढ़ी में तिनका’ जैसी सफाई भी लगे हाथों दे डाली, लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल न था वहां जो भी टिके थे या टिके रहना चाहते थे उनमें अपने स्वाभिमान का कोई ख्याल न था…मेरी अपनीे मजबूरी थी कि मैं भारतीजी के प्रति भी गैरमुनासिब नहीं होना चाहता था कि भारतीजी की किसी व्यावसायिक सनक या गलतफहमी से पैदा की गई नाराजगी के फलस्वरूप बेकार में अपने परिवार को कष्ट में डाल देता और समाज में अपनी वही स्थिति बना लेता जो उन अट्ठारह-बीस व्यक्तियों की हुई जिन्हें निकालने में भारती जी ने सफलता पाई थी।’
पुस्तक की उक्त पंक्तियों में नंदन की सामाजिक स्तर खोने के खौफ से उपजी हीनता ग्रंथि और वह कायरता उद्घाटित होती है जो उन्हें नौकरी बचाए रखने में अन्याय सहने के लिए सदैव तत्पर पाती रही। भारती जी लोगोें को नौकरी से निकालने में सफल हुए जैसी बात इसलिए नहीं जमती कि तब तो पहला नंबर नंदन का आना था। और, नंदन अपने ‘पुनर्मूषक’ वाले उस फार्म को प्राप्त होते, जिसका डर उनके मन में गहरे बैठ गया था। पर, अब जब मैदान साफ है वे ताल ठोंक कर ललकार रहे हैंµहै कोई…?
धर्मयुग से जिन अट्ठारह-बीस आदमियों को नंदन, भारतीजी द्वारा निकाले जाने की बात करते हैं, वे ऐसे लोग थे जो अपने आत्मसम्मान के बड़े कद्रदान थे। वे निकाले नहीं खुद निकल गए थे। उनका नौकरी छोड़ने के बाद वह हश्र नहीं हुआ जैसा नंदन अपने बारे में सोचते थे। उनमें कई सफल बिजनेसमैन बने, कई ऊंचे ओहदों पर गए। विश्वनाथ सचदेव का उदाहरण क्या कम है, वे एक ही समय में ‘धर्मयुग’ नवभारत टाइम्स के प्रमुख संपादक बने। ऐसा ही उदाहरण रवींद्र कालिया का है।
भारती जी की कोसा-काटी में कहिए या जम कर उन पर कीचड़ उछालने की प्रक्रिया में नंदन ने राममनोहर त्रिपाठी की पुत्री के बीमार होने पर भी उन्हें छुट्टी न देने और नंदन की माताजी की मृत्यु होने पर उन्हें ‘ज्यादा’ छुट्टी देने से इंकार करने के प्रसंगों का और ऐसे कई प्रसंगों का जिक्र किया है जो मुद्दत हुई जो नहीं रहा उसका पुतला फूंकने जैसी मूढ़ता के सिवा कुछ नहीं। पुस्तक में नंदन ने अपनी उपलब्धियों का ढोल भी पीटा है, मगर उनका काइयां रूप भी झलकने लगता है। वह समय-समय पर कंपनी के अधिकारियों के आगे अपना दुखड़ा रोते रहे और भारती जी के खिलाफ लाॅबी तैयार करते रहे। फिर बड़े गर्व से कहते हैंµगोल हो ही गया।
दरअसल, वह गोल नहीं हुआ था। इत्तफाक से मूषक का पिंजरा खुला रह गया था, वह भी ऐसी जगह जहां राजनीति के धुरंधर ऋषि-मुनियों की खलबली याने कर्मस्थली थी। बस किसी की गोद में चढ़ जाओ, शेर बन जाओ। डाॅक्टर हो जाओ, पद्मश्री लो और विदेश यात्राएं करो। नंदन तुम्हारा अभिनंदन जैसे कार्यक्रम रखवाओ और खूब तालियां बजवाओ। पर, तब भी भारतीजी को तुम उनकी जीविता अवस्था में हमेशा दंडवत प्रणाम क्यों करते रहे? बेहतर तो यही था नंदन ‘कहना जरूरी था’ की जगह ‘नौकरी करने के लिए जरूरी बातें’ जैसी कोई बैस्ट सैलर लिखते तो लोगों का भला होता।
मेरी पंद्रह-बीस साल पहले नंदन जी से बड़ी दिलचस्प मुलाकात हुई। उन्होंने फोन किया वह मुंबई में हैं, सैंटोर होटल जुहू में ठहरे हैं। उससे पहले उनके एक अंतरंग मित्र ने बताया था, उन्होंने विदेश में किसी राजदूत के यहां कवि सम्मेलन करवाया, जिसके पुरस्कार स्वरूप उन्हें भारत के एक टीवी चैनल में ऊंचे पद पर प्रतिष्ठित किया गया। तब माधुरी की नौकरी छोड़े मुझे बीस साल हो चुके थे। मैं हालांकि, कई विज्ञापन एजेंसियों और दूरदर्शन के लिए सीरियल बनाने में व्यस्त था, नंदन से मिलने की उत्सुकता न रोक सका। वाह क्या ठाठ। वहां से वे अपनी कार में अंधेरी स्थित अपने आॅफिस में ले गए। वहां बड़ा-सा केबिन, टाइपिस्ट वगैरह। काम कुछ नहीं। शायद उन्हें मेरे पर रौब गालिब करना था या नौकरी के बाद मुझे पुनः सड़क पर याने ‘मूषकभव’ की स्थिति में समझा था कि फरमाने लगे, अब उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश है जो बाहर उनका प्रतिनिधित्व कर सके। उन्होंने अफसोस जताया कि वह फलां मिनिस्टर (अब मुझे नाम याद नहीं) के गुजरने पर उसके घर नहीं जा पाए…?
मुझे उनसे मिलने, उनकी तरक्की और उनका वैभव देखने की जो खुशी थी वह हल्की पड़ने लगी। जिस तरह का व्यवहार अपने ड्राइवर, आॅफिस के लोगों और फोन पर बात करने से झलक रहा था। उसमें बजाए गरिमा के वही धर्मयुगीन दीनता और लिजलिजाहट ज्यादा प्रदर्शित हो रही थी।
तभी मैंने उन्हें कहानी सुनाई कि एक बड़े दार्शनिक, बीवी की जिद से तंग आकर बादशाह के पास नौकरी मांगने लगे। उन्हें शाही महल में जब मर्जी आने-जाने की पूरी छूट थी। बादशाह के कमरे में घुसे तो पाया बादशाह सलामत सर झुकाए नमाज का सजदा अता करने में मशगूल हैं। उल्टे पैरों लौटने को हुए तो बादशाह ने नमाज खत्म की और दार्शनिक को रोकते हुए बोले, ‘‘कैसे आना हुआ, वो भी बेवक्त, जरूर कोई जरूरी काम होगा?’’
‘‘बस यूं ही’’, कह कर दार्शनिक जाने के लिए मुड़ा। बादशाह ने बहुतेरी कोशिश की उनके आने की वजह जानने की, पर उन्होंने कुछ नहीं बताया। घर आते ही इंतजार करती बीवी की ‘क्या हुआ’ के जवाब में बोले, ‘‘जिसे तुम बादशाह समझती हो वह परले दर्जे का भिखारी है…जिस अल्लाहताला से वह मांग रहा था, उसी से हम भी तो मांग सकते हैं?’’