कश्मीर: अंतहीन यातना, अंतहीन लड़ाई
July 7th, 2010अजय सिंह
कश्मीर: फ्रीडम थॉट्स, स्ट्रगल ऐंड टिरैनी (अंगे्रजी): रामरतन चटर्जी; रामरतन चटर्जी, कोलकाता; पृ.ः 524; मूल्यः 200
मार्च, 1990 में अंग्रेजी व हिन्दी में एक पुस्तिका आई थी, ‘इंडियाज कश्मीर वार’ (भारत की कश्मीर जंग)। कमेटी फाॅर इनीशिएटिव आॅन कश्मीर, दिल्ली से छपी इस पुस्तिका को, जो मुश्किल से पचास पेेज थी, गौतम नवलखा, दिनेश मोहन, सुमंत बनर्जी और तपन बोस ने मिलकर लिखा-तैयार किया था। तब कश्मीर समस्या नई करवट ले रही थी और कश्मीर में अपनी किस्मत अपने हाथ में लेने के इरादे से ‘आजादी की लड़ाई’ शुरू हुए (अक्टूबर 1989) कुछ ही महीने हुए थे। पुस्तिका के शीर्षक से जाहिर था कि भारत ने कश्मीर में कश्मीर की जनता पर µसैनिक लड़ाई छेड़ रखी है। कश्मीर में भारतीय फौज व अर्द्ध सैनिक बलों का आक्रामक अभियान शुरू हो चुका था और उनके अत्याचार व नृशंसता के कारनामे धीरे-धीरे सामने आने लगे थे। उस दौर में यह संभवतः ऐसी पहली पुस्तिका थी, जिसने कश्मीर समस्या के विभिन्न पहलुओं और जटिलताओं की तरफ ध्यान खींचा, जिसे आमतौर पर ‘मुख्यभूमि भारत’ कहा जाता है।
पुस्तिका के लेखकों ने कश्मीर में भारत सरकार की सैनिक कार्रवाई का दृढ़तापूर्वक विरोध किया था और कहा था कि कश्मीरी जनता से बिना शर्त बातचीत से ही समस्या का समाधान निकल सकता है। तब केंद्र में प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में राष्ट्रीय मोर्चा गठबंधन सरकार थी। उसने कश्मीर को पूरी तरह सेना के हवाले कर देने में जरा भी हिचक नहीं दिखाई। नतीजा: अनवरत कत्लेआम, बलात्कार, लोगों का अपहरण और उनका गायब हो जाना, गैर कानूनी हत्याएं, फर्जी मुठभेड़ेें और यातना…कश्मीर अंतहीन यातना व अंतहीन लड़ाई की अंधेरी सुरंग में प्रवेश कर रहा था।
तब से बीस साल बीत चुके हैं। कश्मीर में भारत सरकार की खूनखराबा नीति खौफनाक रूप ले चुकी है। कश्मीर समस्या और भी ज्यादा जटिल व विकराल हो चली है। कश्मीरी जनता में भारत से ‘आजादी की चाह’ व ‘आजादी की लड़ाई’ नए धरातल पर पहुंच चुकी है, और भारत से कश्मीरी जनता का अलगाव अपने चरम रूप में मौजूद है। कश्मीर की जनता पर सुरक्षा बलों (फौज व अद्ध्र्र सैनिक बल) द्वारा किए गए व किए जा रहे अत्याचार की भीषणता और बर्बरता ने कई पुराने रिकार्ड ध्वस्त कर दिए हैं। कश्मीर आज जिस मुकाम पर है, वहां से भारत की ओर उसकी वापसी लगभग नामुमकिन हो चली है। इसके लिए भारत की कश्मीर नीति को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इस संदर्भ में, कश्मीर समस्या को समग्रता में समझने के लिहाज से, वरिष्ठ पत्रकार, शोधार्थी व मानवाधिकार कार्यकर्ता रामरतन चटर्जी की काफी मेहनत से तैयार की गई अंग्रेजी किताब ‘कश्मीर: फ्रीडम थाॅट्स, स्ट्रगल ऐंड टिरैनी’ (जून 2009, ‘कश्मीर: आजादी के खयालात, संघर्ष व अत्याचार’) पर ध्यान दिया जाना चाहिए। यह किताब पाठक को बेचैन करती है और उसे कुछ सोचने व बहस करने के लिए प्रेरित करती है। यह कई अखबारी लेखों, टिप्पणियों, खबरों व स्वतंत्र रूप से लिखे गए लेखों का संकलन है, जिसमें रामरतन की अपनी संपादकीय टिप्पणियां शामिल हैं। यह कश्मीर पर संदर्भ सामग्री का जबरदस्त खजानाµलगभग कश्मीर विश्वकोश-जैसा है, जिसकी सामग्री का इस्तेमाल कश्मीर की जनता के इतिहास व संघर्ष का प्रामाणिक इतिहास लिखने में किया जा सकता है। यह कश्मीरी जनता की यातना, संघर्ष व जिजीविषा का जीवंत दस्तावेज है।
17 अध्याय और 524 पेज में फैली किताब ‘कश्मीर आजादी के खयालात’ की प्रस्तावना कश्मीर के जाने-माने वयोवद्ध पत्रकार व कश्मीर टाइम्स के संस्थापक संपादक वेद भसीन ने लिखा है। द ग्रेटर कश्मीर अखबार के कार्यकारी संपादक रह चुके जहीरूद्दीन ने जो मानवाधिकार कार्यकर्ता भी हैं, इस किताब की भूमिका लिखी है। रामरतन चटर्जी ने यह किताब 2005 में तैयार कर ली थी, पर यह छप पाई 2009 मेंµउन्हें खुद इसे छापना पड़ा। यह उनकी लगभग पांच साल कर मेहनत का नतीजा है, जिस दौरान वह श्रीनगर, जम्मू व अन्य जगहों में रहते हुए विभिन्न स्रोतोें से, खासकर अखबारों से, सामग्री जुटाते रहे।
किताब में ऐसे कई लोगों के लेख व टिप्पणियां संकलित हैं, जो कश्मीर से अच्छी तरह वाकिफ हैं और कश्मीर आंदोलन की विभिन्न धाराओं से जुड़े रहे हैं। पंद्रह साल (1989-2004) की अवधि में फैली यह सामग्री कश्मीरी जनता के लगभग सभी तरह के सामाजिक-राजनीतिक विचार, प्रभाव कार्यभार, सक्रियता व अंतर्विरोध को सामने लाती है।
किताब के नौवें अध्याय में, जिसका शीर्षक ‘मकबूल भट की शद्दादत’ है, 1984 मेें मकबूल भट को फांसी दिए जाने से संबंधित अखबारी सामग्री का संकलन खास तौर पर उल्लेखनीय है। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के संस्थापक मकबूल भट को दिल्ली की तिहाड़ जेल में 11 फरवरी 1984 को फांसी दे दी गई थी। तब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फ़ारूक अब्दुल्ला ने उन्हें फांसी से बचाने के लिए कोई हस्तक्षेप नहीं किया था। मकबूल भट के वकील कपिल सिब्बलµजी हां, मौजूदा केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री! की अपील को µकि यह फांसी न दी जाएµसुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई वी चंद्रचूड़ ने 10 फरवरी 1984 को खारिज कर दिया था। मकबूल भट को तिहाड़ जेल में ही दफना दिया गयाµउनकी लाश न उनके परिवारवालों को सौंपी गई, न कश्मीर ले जाने दी गई। फांसी दिए जाने के विरोध में वेद भसीन ने 14 फरवरी 1984 को ‘कश्मीर टाइम्स’ में लेख लिखा था। मकबूल भट को फांसी कश्मीर जनता के संघर्ष के इतिहास में निर्णायक घटना बन गई। इस घटना ने कश्मीरी जनता के दिलों में दिल्ली के प्रति अलगाव व नफरत के बीज बो दिए, जिसने 1989 में ‘आजादी की लड़ाई’ का रूप ले लिया।