जासूसी अदब की सकारात्मकता

July 7th, 2010

अनवार रिज़वी

1. दिलेर मुजरिम, 2. जंगल में लाश, 3. औरत फरोश का हत्यारा 4. तिजोरी का रहस्य, 5. फरीदी और लियोनार्ड, 6. कुएं का राज, 7. चालबाज बूढ़ा, 8. नकली नाकः इब्ने सफी; अनु.ः चैधरी ज़िया इमाम; संपादकः नीलाफ; हार्परकॉलिंस; पृ. 125 से 140 तक; प्रत्येक का मूल्यः रु. 60; पेपर बैक शृंखला

अपने जमाने के उर्दू के बेहद लोकप्रिय जासूसी अदब के लेखक इब्ने सफी के आठ उपन्यासों के पहले सैट के हिंदी अनुवाद का प्रकाशन स्वागत योग्य है।
इब्ने सफी का असली नाम असरार अहमद था और वे इलाहाबाद के कस्बे नारा में 1928 में पैदा हुए। नारवे और इलाहाबाद में उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। इलाहाबाद के निकहत नामी उर्दू मासिक से अपना लेखन का कैरियर शुरू किया। 1952 में निकहत के मालिक व संपादक अब्बास हुसैनी ने जासूसी दुनिया नामक एक उर्दू मासिक निकाला और एक नए लेखक इब्ने सफी का परिचय कराया। उनका पहला उपन्यास दिलेर मुजरिम था।
दिलेर मुजरिम में इब्ने सफी ने दो नए जासूस किरदार पेश किए यानी इंसपेक्टर फरीदी और सारजंट हमीद। दिलेर मुजरिम के नए हिंदी रूपांतर की भूमिका ‘दो शब्द’ में इस सीरीज के संपादक नीलाभ ने बताया है कि हार्पर इब्ने सफी के संपूर्ण लगभग 245 उपन्यासों को हिंदी में प्रकाशित करेगा। आठ उपन्यास पहली किस्त है।
जासूसी दुनिया में हर महीने इब्ने सफी का एक नया उपन्यास सामने आता था लेकिन कुछ अर्से बाद उनके उपन्यास प्रतिमास हिंदी जासूसी दुनिया मासिक पत्रिका में भी छापे जाने लगे। हिंदी में मुख्य जासूस किरदार कर्नल विनोद के नाम से आया जबकि मातहत हमीद का नाम वही रहा। यह आठ उपन्यास अलबत्ता हिंदी में पहली बार छापे गए हैं और इनका मुख्य किरदार इंसपेक्टर फरीदी ही है। नीलाभ ने अपनी खासी लंबी भूमिका में जासूसी अदब और इब्ने सफी पर खुलकर रोशनी डाली है। यह भूमिका दिलेर मुजरिम में शामिल है और पढ़ने योग्य है। इसके अलावा इसमें शामिल इब्ने सफी का फोटो और संक्षिप्त जीवन वृत्तांत भी उर्दू में लगभग नायाब है और उनके अनगिनत पाठकों के लिए तोहफा है।
इब्ने सफी 1952 में ही पाकिस्तान चले गए थे। यह वही जमाना था जब उत्तर प्रदेश के बहुत से पढ़े-लिखे बेरोजगार मुसलमान युवक खानदान बंट जाने के कारण और रोजी-रोटी की तलाश में पाकिस्तान जाने लगे थे। कराची एक महानगर था और वहां उत्तर प्रदेश के लोग बड़े ओहदों पर थे और पढ़े-लिखे हिंदुस्तानी युवक आसानी से नौकरी या रोजगार पा जाते थे। इब्ने सफी कराची ही गए थे और वहां से प्रतिमास वसूल होने वाला उनका उपन्यास इलाहाबाद से पहले उर्दू में और बाद में हिंदी औ उर्दू दोनों में ही पाबंदी से प्रकाशित होता था। पाकिस्तान में इब्ने सफी खुद के प्रकाशन से प्रतिमास अपना उपन्यास छापते थे जो खूब बिकता था। बीच में दो या तीन साल के लिए दिमागी बीमारी के कारण उनका लेखन बंद रहा, वरना 1980 तक वह पाबंदी से लिखते रहे। मरने के बाद उनका एक अधूरा उपन्यास आखिरी आदमी मिला था यानी मुंशी पे्रमचंद की तरह वह मरते दम तक साहित्य सेवा और उसके लिए अपने कमिटमेंट से गाफ़िल नहीं थे।
अपने लगभग 30 वर्षीय लेखन कैरियर में इब्ने सफी उर्दू में सबसे ज्यादा न सही मगर बहुत व्यापक पढ़े जाने वाले लेखक थे। इसके बावजूद उर्दू आलोचना ने उनको लेखक नहीं माना। जहां तक मेरी मालूमात है न उनको कोई साहित्यिक पुरस्कार मिला न किसी विश्वविद्यालय में उन पर कोई शोध ही हुआ। यहां तक कि उन पर या उनके जीवन पर कोई लेख भी नहीं लिखा गया। इस अनदेखी के जुर्म में हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों बराबर के शरीक हैं और हिंदी-उर्दू दोनों भाषाएं भी। पाॅपुलर अदब (लोकप्रिय साहित्य) को उर्दू- हिंदी में अच्छा खासा अछूत के दर्जे पर रखा जाता है। हम जानते हैं कि अंगे्रजी के सुप्रसिद्ध लेखक आर्थर काॅनिन डायल को अपने लोकप्रिय जासूसी अदब के बल पर सर का खिताब मिला और अपार आदर सत्कार।
इब्ने सफी की उर्दू, जबान और मुहावरे के लिहाज से बेदाग और खां-रवां है। उनके उपन्यासों ने बहुतों को उर्दू सिखाई और इस जबान का शौक पैदा किया। शायरी में जो योगदान जबान के ताल्लुक से उर्दू के महाकवि दाग देहलवी का है और उसको सब मानते भी हैं, इब्ने सफी का कारनामा और देन उसी से मिलते-जुलते हैं।
असल में कोई भाषा केवल बोलने भर से नहीं आती क्योंकि बोलने या अपनी बात कहने का काम कम शब्दों से चल जाता है। साथ में चेहरे के हाव-भाव और लहजे के उतार-चढ़ाव सहायक रहते हैं। शायरी हो या गद्य शब्दों का पूरा परिचय और उनके जौहर वहीं खुलते हैं और शब्दावली का विस्तरित होना लाजमी है। पाठक का शब्द ज्ञान बढ़ता है तो उसकी भाषा और साथ में उसके मस्तिष्क का स्तर भी ऊपर उठता है।
उर्दू शायरी ने ही उर्दू भाषा को शब्दों से मालामाल किया है। लोगों में उर्दू का शौक पैदा किया और सौंदर्यबोध को परवान चढ़ाया। इसी के समानांतर गद्य का भी काम है। पाॅपुलर अदब की अहमियत यहीं खुलती है और उसका कारनामा भी। हम जानते हैं कि पाॅपुलर अदब का एक हिस्सा वह है जिसमें बाजारीपन और फूहड़पन होता है। भाषा का इस्तेमाल लापरवाही से होता है। ऊंची कद्रों को सामने लाने और बढ़ावा देने पर जोर नहीं दिया जाता बल्कि उसके बरक्स सैक्स, धन प्राप्ति के उल्टे-सीधे तौर-तरीकों आदि को चमकदार बनाकर पेश किया जाता है। यह भी पढ़ा जाता है। खूब बिकता है लेकिन इससे पाठक को फायदे के बजाय नुकसान ज्यादा होता है। इब्ने सफी का पूरा साहित्य इन कोताहियों से पाक है। उनकी भाषा सही और बामुहावरा है। उनका लेखन चुस्त है। वह पाॅपुलर लेखक होने के नाते अपने उपन्यासों में सनसनीखेजी और हल्का-फुल्का हंसी-मजाक लगातार भरते जाते हैं। उनके प्लाट बेशक मुजरिमों के जीवन पर आधारित हैं मगर वह उनको चमकदार नहीं बनाते। इब्ने सफी लगातार ऊंची कद्रों की परवरिश करते हैं। जीवन को संवारने वाले पैगाम देते हैं। उनके उपन्यासों में मुजरिम को समझने और समझाने की लगातार कोशिश है। उनका मुख्य किरदार इंसपेक्टर फरीदी ही एक आदर्श पुरुष की तरह सामने आता है। फरीदी बेहद पढ़ा-लिखा शख्स है। लालच उसको छू भी नहीं गया है। जासूसी के काम में जरूरत पड़ने पर वह अपनी गांठ का रुपया भी खर्च कर देता है। औरतों से कोई दिलचस्पी नहीं रखता। अपने समय का एक- एक पल कारामद बनाता है। संवेदन शील है, न्यायप्रिय है, बहादुर है और अपनी पैनी बुद्धि, व्यापक मालूमात और बारीक सोच से अपराध की गुत्थियां सुलझाता और अपराधी की चालबाजियों का पर्दाफाश करता रहता है। यह भी सही है कि फरीदी का किरदार एक अच्छा आदर्श पेश करता है। और उसका जासूसी का कार्यक्रम हवाई के साथ-साथ यथार्थवादी भी है जो ज्यादातर विश्वसनीय बना रहता है।
इब्ने सफी के उपन्यासों में पठनीयता गजब की है। 50 और 60 के दशकों में उत्तर प्रदेश के छोटे-बड़े शहरों में पचासों लाइबे्ररियां खुल गईं थीं। किराने के दुकानदार तक इब्ने सफी के उपन्यास किराए पर चलाने के लिए रखने लगे थे। लोगों के पास हर महीने नया उपन्यास खरीदने के लिए दस आने नहीं होते थे। वे एक आना रोज पर जासूसी दुनिया लाकर पढ़ते थे। एक-एक लाइबे्ररी 20-20 कापियां खरीदती थी और धड़ाधड़ किराए पर चलाती थी। पढ़ने वाले नंबर लगाया करते थे, जो पहले आया पा गया नहीं तो कल का इंतजार करें। मैं समझता हूं कि इनके माध्यम से उर्दू और हिंदी पढ़ने का शौक लोगों में जागा और फैला था। जाहिर है इनके जरिए उर्दू और हिंदी दोनों का कितना विस्तार हुआ होगा।
मैं समझता हूं यह श्रंृखला कामयाब होगी और हिंदी भाषा का विस्तार करेगी। जरूरत तो यह है कि इब्ने सफी के उपन्यासों को उर्दू में भी फिर से छापना चाहिए। उर्दू में पढ़ने योग्य किताबों की बहुत कमी है। यहां मजहबी किताबों की बहुतात है जो खरीदी ज्यादा जाती हैं और पढ़ी कम। इब्ने सफी की कोई किताब बाजार में नहीं मिलती। युवा उर्दू पाठकों ने इब्ने सफी का नाम सुना भी हो तो किताब न पढ़ी होगी। अच्छी लोकप्रिय किताबों की कमी से भाषा सिकुड़ने और ठिठुरने लगती है।
इस सैट की किताबों के हिंदी अनुवाद अच्छे हैं और जिन्नाती (क्लिष्ट) हिंदी से दामन बचाया गया है। इससे इब्ने सफी की मीठी उर्दू में जहां-तहां हिंदी की नमकीनी शामिल हो गई है। इन उपन्यासों के माध्यम से हिंदी में उर्दू के त्यागे जा चुके मुहावरे इक्का-दुक्का दुबारा परिचय पा सकते हैं।
इब्ने सफी इलाहाबाद के रहने वाले थे और पाकिस्तान चले जाने पर भी वह सदा इलाहाबाद की गंगा-जमुनी संस्कृति के ही नुमायंदे रहे। उनके उपन्यासों में हिंदू-मुस्लिम किरदार घुले-मिले हैं और ऐसा समाज पेश करते हैं जिसमें हिंदू-मुसलमान अमन-चैन से रहते हैं और एक-दूसरे पर निर्भर हैं।
मैं समझता हूं इब्ने सफी को दोबारा से छापने और मुहैया करने में फायदे के बहुत से पहलू हैं और इसकी हिम्मत अफ़जाई होनी चाहिए।

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