फिल्मी दुनिया की एक अमर प्रेम कथा

July 7th, 2010

दीवान सिंह बजेली

डार्लिंग जीः किश्वर देसाई; अनु. सोनल मित्रा; हार्पर कोलिंस; पृ.ः 442; मूल्यः 299
ISBN : 978.81.7223.871.1

महबूब द्वारा निर्मित निर्देशित फिल्म मदर इंडिया का प्रथम प्रदर्शन बंबई के लिबर्टी थियेटर में 25 अक्तूबर, 1957 को हुआ। यह फिल्म भारतीय फिल्म इतिहास में सर्वश्रेष्ठ स्थान रखती है। संभवतः यह प्रथम भारतीय फिल्म है जिसने विश्व सिनेमा का ध्यान भारतीय फिल्मों की ओर आकृष्ट किया। महबूब को जहां एक और अभूतपूर्व सफलता व प्रसन्नता मिली वहां उन्हें निराशा भी मिली क्योंकि उन्हें नहीं परंतु भारत को पूर्ण आशा थी कि मदर इंडिया को आॅस्कर मिलेगा।
इस फिल्म का एक और महत्वपूर्ण पहलू है नर्गिस द्वारा नायिका प्रधान फिल्म में राधा की भूमिका। इस भूमिका में वह अपनी कला की चरम सीमा को पार कर गई। भारत के हजारों कर्ज के बोझ से दबे किसान राधा के चरित्र में अपने आपको ढूंढ़ने लगे और उससे तादात्म्य स्थापित करने लगे। दूसरी ओर शहर के दर्शक इस फिल्म के माध्यम से नेहरू की सार्थक नीतियों में एक नए समाज की रचना के प्रादुर्भाव की कल्पना करने लगे। फिल्म की लोक-प्रियता में नौशाद का संगीत व बदायूंनी के गीतों ने चार चांद लगा दिया, फिल्म के कुछ गीत दर्शकों के मानस पटल पर सदा के लिए अंकित हो गए। कुछ चिर-स्मरणीय गीत हैंµपी के घर आज प्यारी दुल्हनिया चली, दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा, दुख भरे दिन बीते रे भईया अब सुख आयो रे और ओ जाने वाले जाओ न घर अपना छोड़ कर।
भारतीय सिनेमा के विद्यार्थियों के लिए इस फिल्म का एक विशेष महत्व हैµइस फिल्म की प्रधान नायिका व फिल्म में उनके पुत्र बिरजू एक विद्रोही नवयुवक जो प्रतिशोध की ज्वाला में धधक रहा था, की भूमिका में सुनील दत्त के व्यक्तिगत जीवन में आमूल परिवर्तनµएक ऐसा अप्रत्याशित परिवर्तन जिसने दो नितांत रूप से विभिन्न सांस्कृतिक, सामाजिक व आर्थिक परिवेशों में जन्में व पले स्त्री व पुरुष कई तूफानों व अवरोधों के बावजूद पति-पत्नी के पवित्र बंधन में बांध दिया। इस फिल्म ने नर्गिस को राजकपूर से सदा के लिए दूर कर दिया, यह एक चैंका देने वाली घटना थी क्योंकि बाॅलीवुड जैसे भ्रष्ट व अवसरवादी वातावरण में पवित्र पे्रम संभव नहीं था।
इस पे्रम की जड़ दो पे्रमियों के गहनतम हृदय से प्रस्फुटित हुई। घटना इस प्रकार हैµगांव वालों के क्रोध से बचने के लिए बिरजू खेतों में पराल के अंदर छिप गया। क्रुद्ध भीड़ ने घास-फूस में आग लगा दी ताकि बिरजू बाहर निकले। राधा भीड़ के साथ बिरजू को ढूंढ़ रही थी ताकि वह गांव की मान-मर्यादा व नारी जाति के अपमान करने का दुस्साहस करने वाले अपने पुत्र बिरजू को दंडित कर सके। अचानक तेज हवा चली और हवा ने रूख बदला नर्गिस को आग ने चारों ओर से घेर लिया। सारी टीम हत्प्रभ हो गई। आग की लपटो ने भीषण रूप धारण कर लिया। सुनील दत्त अपने प्राणों पर खेलते हुए आग की लपटों के अंदर प्रवेश कर गए और नर्गिस को बाहर ले आए। दोनों बुरी तरह से झुलस गए थे पर कुछ दिनों के बाद अपने काम में वापस लौट आए। 16 मार्च, 1957 को नर्गिस ने अपनी डायरी में लिखाµ
…ऐसा लगा जैसे मेरा अतीत उस आग में खाक हो गया हो, आग जैसे उलझी हुई नर्गिस की मौत हो गई हो। एक नई नर्गिस ने जन्म ले लिया हो और वह जीने को बेताब होµहंसना चाहती हो, जिंदगी की सच्चाइयां जानना चाहती हो, सच्चाई और प्यार की अमर आग से पाक साफ हो गई, जैसे नवजात शिशु की जिंदगी की तरह नई बन गई मैं।
डार्लिंग जी नामक पुस्तक में किश्वर देसाई ने नर्गिस व सुनील दत्त के प्रणय पे्रम व शादी से संबंधित कई अछूते पहलुओं का सविस्तार वर्णन किया है। लेखिका ने व्यक्तिगत डायरियां, पत्र, जो पे्रमियों ने एक-दूसरे को लिखे, लंबे साक्षात्कार, फिल्म आर्काइव में फिल्मों का अवलोकन कर पुस्तक को व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों से बचाने का प्रयास किया है। मौलिक अंगे्रजी में लिखी पुस्तक पठनीय है। पर हिंदी अनुवाद कहीं-कहीं पर अधिक शाब्दिक लगता है जिससे भाषा के प्रवाह में अवरुद्धता का आभास होता है। पर ज्यों-ज्यों वृत्तांत आगे बढ़ता है, हमारा ध्यान पुस्तक के कथ्य की रोचकता पर केंद्रित होता है।
लेखिका दोनों पे्रमियों के भिन्न परिवेशों का वर्णन करने के साथ-साथ दोनों पूर्वजों पर भी टिप्पणी करती है।
बलराज जिन्होंने फिल्म में अभिनय के लिए अपना नाम बदलकर सुनील रखा क्योंकि फिल्मों में बलराज साहनी एक प्रसिद्ध नाम पहले से ही विद्यमान था। बलराज का जन्म एक महिवाल ब्राह्मण परिवार में हुआ था जून 6, 1929 को जो विभाजन के समय पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। उनके पिता दीवान रघुनाथ दत्त इलाके के एक प्रभावशाली व्यक्ति थे। जब बलराज की उम्र छोटी थी उनके पिता की मृत्यु हो गई। बलराज ने मैट्रिक प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की पर अभावों के कारण आगे नहीं पढ़ सके और मिलिट्री में भती हो गए। विभाजन के समय उनका परिवारµमां, भाई और बहिनµतबाह हो गए। तब बलराज लखनऊ में थे। लंबे अंतराल के बाद बलराज अपने परिवार से मिल पाए।
किश्वर पुस्तक का आरंभ दिलीपा से करती है। संभवतः बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि दिलीपा नर्गिस की नानी थी। वह बलिया की रहने वाली एक ब्राह्मणी थी। वह बाल विधवा कष्टकारक व अपमान से भरा जीवन बिताने के लिए बाध्य थी। कट्टरपंथी ब्राह्मण समाज ने उसका जीवित रहना दूभर कर दिया था। कहा जाता है कि वह चिलचिला के एक सारंगी वादक शेख मियांजान के संपर्क में आई और उनके साथ उनकी पत्नी के रूप में रहने लगी। मियांजान गाने-बजाने वाली औरतों के साथ काम करते थे। मियांजान व दिलीपा की पुत्री हुई जिसका नाम था जद्दनबाई जो एक प्रसिद्ध गायिका बनी। बाद में जद्दनबाई बंबई की तत्कालीन तथाकथित बड़ी सोसाइटी की सक्रिय सदस्य बनी और अपने को फिल्म निर्माता के रूप में स्थापित करने में सफल हुईं।
पुस्तक व्यावसायिक नाचने-गाने वाली औरतों के प्रचलन में निरंतर कमी और उनके निम्न जीवन स्तर के कारण पर टिप्पणी करती है। पर मनोरंजन के इस सामंती समाज में लोकप्रियता के द्दास के कारण सतही हैं। किश्वर के विश्लेषण में अंतर्दृष्टि की कमी है।
जद्दनबाई एक खूबसूरत औरत, एक गायिका के साथ-साथ उसका व्यक्तित्व प्रभावशाली था। उसमें संगठन की प्रतिभा थी। एक उच्चकुलीन ब्राह्मण नवयुवक उससे इतना आसक्त हो गया कि उसने अपनी डाॅक्टरी की पढ़ाई को दांव पर लगाकर जद्दनबाई से शादी कर ली और अपना धर्म परिवर्तन कर लिया ताकि जद्दनबाई से शादी कर सके। उसके घर वालों ने उसका परित्याग कर दिया। नर्गिस इन्हीं ब्राह्मण की लड़की थी, जद्दनबाई के दो लड़के और थे। कुछ लोगों का कहना है कि उनका पिता कोई और शक्स था।
जद्दन बाई का परिवार शातो मरीन में बड़ी शान-शौकत से रहता था। घर में उसका अनुशासन कठोर था। वह खुले हाथ पैसा खर्च करती थी। उसके घर में मेहमान आते-जाते रहते थे और पार्टियां होती रहती थी। फिल्म निर्माता के रूप में उसकी कमाई हो रही थी। पर लगातार घाटा आने से वह आर्थिक संकट से घिर गई और उसने अपने गांव में जाने की सोच ली। उसने अपने नौकर को बुलाकर अपना सोने का कड़ा दिया और उसे बेचने के लिए कहा। उस पैसे से बंबई के फिल्मी दुनिया के ऊंचे तबके के लोगों को एक भव्य दावत दी। पार्टी के समापन पर उसने घोषणा की वह लगातार घाटा आने से बंबई में ठहर नहीं सकती है और अपने गांव वापस जा रही है। यह उसकी अपने मित्रों व शुभचिंतकों की विदाई पार्टी है। अतिथि भौचक्के रह गए। उन्होंने उसकी फिल्मों में पैसा लगाने की घोषणा कर दी और जद्दनबाई बंबई में उसी शानों-शौकत से रहने लगीµऐसी थी नर्गिस की मां जिसने उसे इंगलिश शिक्षा दिलाई और बाल कलाकार के रूप में फिल्मों में प्रविष्ट करवाया। इससे पूर्व जद्दनबाई उसके पति मोहन बाबू, जिनका मुस्लिम नाम था अब्दुल रशीद पर वे हमेशा मोहन बाबू के नाम से ही जाने जाते थे, कई शहरोंµलखनऊ, इलाहाबाद व कलकत्ताµमें गए नए जीवन व ऊंचे जीवन स्तर की खोज में। कलकत्ता में नर्गिस का जन्म जून 15, 1929 को हुआ। इसका बचपन का नाम था फातिमा अब्दुल रशीद जो तेजेश्वरी मोहन के नाम से भी जानी जाती थी।
जब से नर्गिस ने बाल कलाकार के रूप में काम करना प्रारंभ किया उसका व्यक्तिगत जीवन उत्पीड़न, नैराश्य व असंतोष से भर गया। बाल्यवस्था में जब उसकी उम्र के बच्चे खेलते थे, हंसते थे और स्कूल जाते थे वह फिल्मों की शूटिंग में व्यस्त रहती। यहां तक कि उसके साथ पढ़ने वाले बच्चों ने उसके साथ बात करना व खेलना बंद कर दिया क्योंकि उन दिनों फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं माना जाता था। जब उसे बड़ी-बड़ी फिल्में मिलने लगी शातो मरीन की शानो-शौकत का भारी खर्चा उसी की कमाई से चलता।
नर्गिस का आंतरिक द्वंद्व व पीड़ा और अधिक हो गई जब राजकपूर से उसकी शादी की आशा धूमिल हो गई। वह राजकपूर को अथाह पे्रम करने लगी। वह मन ही मन कामना करने लगी कि एक दिन वह राजकपूर से शादी करेगी। उसने आर.के. बैनर के लिए 1948 से 1956 के बीच 16 फिल्मों में यादगार अभिनय किया था आवारा फिल्म में राजकपूर व नर्गिस ने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त की। उनकी फिल्म श्री420 ने भारतीय दर्शकों के मन में अमिट छाप छोड़ दी। इस प्रेम के कारण राजकपूर के घर में तनाव बढ़ता गया और एक ऐसी स्थिति आई कि राजकपूर ने अपनी पत्नी से तलाक के पेपर तैयार करा लिए। पर धीरे-धीरे नर्गिस व उसके परिवार को लगने लगा कि राजकपूर उसका शोषण कर रहा है। नर्गिस का बड़ा भाई उसकी राजकपूर से शादी के बहुत खिलाफ था और उसने आक्रामक रूप ले लिया। पर मदर इंडिया की वजह से पर्दे की इस रोमांटिक जोड़ी के वास्तविक जीवन में एक नया मोड़ आ गया। यह पे्रम त्रिकोण के रूप में उभरा और इसका समाधान कई उतार-चढ़ाव, गहरी पीड़ा के बाद सुखांत में हुआ।
सुनील दत्त व नर्गिस एक-दूसरे को दिल की गहराइयों से प्यार करते थे, वे शीघ्र शादी के पवित्र बंधन में बंधना चाहते थे। पर उनके पे्रम पथ में कांटे बिछे थे। सुनील दत्त अभी तक जूनियर कलाकार ही था और फिल्मी दुनिया में अपना स्थान बनाने के लिए संघर्ष कर रहा था। मदर इंडिया के रिलीज के बाद उसकी लोक प्रियता आसमान को छूने लगी। आर्थिक, सामाजिक व उपलब्धियों में दोनों के बीच एक बहुत बड़ी खाई थी। इसके अलावा नर्गिस व राजकपूर के पे्रम संबंधों की काली छाया समय-समय पर सुनील के मन मस्तिष्क को कलुष करती रहती। नर्गिस अपने भूत को हमेशा के लिए भूलना चाहती थी पर राजकपूर ने अपनी हार नहीं मानी। वह समय-समय पर नर्गिस से मिलता रहा ताकि वह उसकी दुनिया में फिर से आ जाए वह उसके साथ फिल्म बना सके। किश्वर के शब्दों में, ‘‘अगर वह (राजकपूर) नर्गिस के साथ ईमानदार रहता, तो शायद राज की जिंदगी कोई और मोड़ ले लेती। नर्गिस का तो दिल टूट गया था। उसने राज के लिए सब कुछ छोड़ दिया था, यहां तक की शादी करने का ख्याल।’’
नर्गिस के घर वाले शादी के खिलाफ थे। उनके अनुसार सुनील एक गरीब है, उसे फिल्म उद्योग में, बहुत कम लोग जानते हैं। पर पहले नर्गिस के लिए ऊंचे-ऊंचे घरानों से शादी के प्रस्ताव आए, यहां तक कि जुल्फिकार भुट्टो के, घर वालों ने साफ मना कर दिया क्योंकि इतना बड़ा खुनबा नर्गिस की कमाई से गुलछर्रे उड़ा रहे थे। किश्वर के शब्दों में, ‘‘…वह चाहती थी कि सुनील उसे यकीन दिलाए कि वह जल्दी ही उसे सबसे दूरµशातो मरीन से दूर ले जाएंगे।
‘‘इसकी हवा में लालच और बनावटीपन की बू आती थी। एक अच्छी तरह से सजा हुआ घर लेकिन प्यार और अपनत्व से कोसों दूर…’’
उनकी शादी में एक और रुकावट थीµमहबूब की यह शर्त थी कि जब तक मदर इंडिया रिलीज नहीं हो जाती नर्गिस व सुनील दत्त शादी नहीं कर सकते हैं क्योंकि उन्हें इस बात का भय था कि इससे फिल्म की व्यवसायिक सफलता में अवरोध पैदा हो सकता है।
नर्गिस को पदमश्री द्वारा भारत सरकार ने सम्मानित किया। नर्गिस का सम्मान और आर्थिक स्तर निरंतर ऊंचा होता गया। सुनील अभी जूनियर आर्टिस्ट ही था। नर्गिस और राज के संबंधों को लेकर अफवाहों का बाजार गर्म था। इन सबका परिणाम यह हुआ कि नर्गिस व सुनील के संबंधों में दूरियां आने लगी। लेखिका ने सुनील की मानसिक स्थिति, उसकी असुरक्षा का भाव व अकेलापन परदेसी अध्याय में वर्णन किया है, ‘‘उसने सोचा उसने ऐसी हस्ती से प्यार किया जो उसकी पहुंच से बहुत दूर है।’’ दूर सोवियत में शूटिंग करती हुई (परदेसी फिल्म के लिए जो भारत और सोवियत के सहयोग से बन रही थी) बहुत उदास, थकी और असुरक्षा की भावना से ग्रसित थी। वह आशंकित थी कि कहीं सुनील उससे दूर तो नहीं जा रहा है? कहीं उसकी परीक्षा तो नहीं ले रहा है। वह ‘फिर टूटने की सीमा तक पहुंच गई।’ एक पत्र में नर्गिस ने सुनील को लिखाµ
‘‘…मुझे समझ न आता कि तुम मुझे (मुझ) से दूर क्यों रहने लगे हो। मैं खुद को गलत समझने लगती। क्या फायदा ऐसे प्यार का जब मैं तुम्हें इतना दुख देती हूं। तुम कहते हो तुम्हें हीन भावना होती है। क्यों होती है। जब मैं तुम्हें प्यार करती हूं और तुम्हारी हूं… प्यार इन सब (हीन भावनाओं) से दूर है।’’
सारे सामाजिक, आर्थिक व धार्मिक अवरोधों को दूर कर अंततः नर्गिस और सुनील दत्त ने बंबई में हिंदू रीति-रिवाजों के आधार पर गुप्त रूप से शादी मार्च 11, 1958 को कर ली। शादी में सुनील दत्त की छोटी बहिन व दो-तीन सुनील व नर्गिस के अंतरंग मित्र थे। नर्गिस के परिवार से कोई नहीं था।
शादी के बाद सुनील दत्त धीरे-धीरे बाॅलीवुड के पहली पंक्ति के फिल्म निर्माता व सितारे बन गए। उनकी महत्वाकांक्षा बढ़ती गई वे अंतर्राष्ट्रीय फिल्म जगत में अपनी पहचान के लिए हर संभव प्रयास करने लगे। इस महत्वाकांक्षा को फलीभूत करने के लिए उन्होंने रेशमा और शेरा फिल्म बनाई। महत्वाकांक्षा के वशीभूत फिल्म निर्माण का बजट इतना बढ़ गया कि दत्त परिवार को घोर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। वे इस फिल्म को अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों में ले जाने का भरसक प्रयास करने लगे। अंततः रेशमा और शेरा को भारत की ओर से ताशंकद में दिखाया। 1965 में वे यादें फिल्म को लेकर वर्लिन अंतर्राष्ट्रीय महोत्सव में ले गए। उन्होंने वहां पाया कि सत्यजीत रे की कापुरुष सरकारी तौर पर भाग ले रही है। वे निराश हो गए और उन्होंने नर्गिस को लिखा, ‘‘जर्मन के लोगों की नजरों में वे ही एक ऐसे निर्देशक हैं जो भारत की सही तस्वीर सामने लाते हैं,’’ पर सुनील दत्त ने हार नहीं मानी। यादें फ्रैक फर्ट फिल्म महोत्सव में शामिल हुई और उसे ग्रैड प्रिक्स पुरुस्कार से सम्मानित किया गया। यादें फिल्म को भारत सरकार पहले ही मैरिट सर्टिफिकेट दे चुकी थी।
यद्यपि रेशमा और शेरा को कई राष्ट्रीय पुरस्कार मिले पर आर्थिक रूप से दत्त परिवार को झकझोर दिया। यहां तक कि हालात इतने बिगड़े कि उनके निवास स्थान 58 पाली हिल को बेचने की नौबत आ गई। दत्त परिवार एक बार फिर उठ खड़ा हुआ। अब उसकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी होने लगी। नर्गिस को राज्य सभा का सदस्य कलाकार के रूप में मनोनीत किया गया और सुनील दत्त लोकसभा के सदस्य कांगे्रस पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में निर्वाचित हुए। जैसा कि किश्वर लिखती हैं नेहरू परिवार से दिलीपा व जद्दनबाई का संपर्क रहा और नर्गिस ने इस संपर्क को आगे बढ़ाया और इसी परंपरा में आज उनकी बेटी प्रिया कांगे्रस पार्टी की प्रत्याशी के रूप में लोक सभा की सदस्य हैं। (उनके पुत्र संजय दत्त ने इस परंपरा को तोड़ा)
डार्लिंग जी पुस्तक सुनील दत्त व नर्गिस के जीवन व उनकी अद्वितीय उपलब्धियों का विस्तृत वृत्तांत है। उनका परिवार व तत्कालीन फिल्मी विभूतियां जो उनके संपर्क में आए को भी उचित स्थानों पर सम्मिलित किया गया है। राजकपूर, नर्गिस व सुनील के पे्रम त्रिकोण में विभिन्न प्रकार की उलझनें, आशा-निराशा पाठकों को रुचिकर लगते हैं। इस त्रिकोण में महान कलाकार नर्गिस का प्रतिबिंब हृदयग्राही है। उस प्रतिबिंब में एक सच्ची कला में अंतर्रहित आशा व जीवित रहने का संकल्प प्रस्फुटित होता है। पर ज्यों-ज्यों पुस्तक समाप्ति की ओर बढ़ती हैµहमारी रुचि कम होती जाती है।
एक स्थान पर लेखिका कहती हैं कि सुनील दत्त अलग तरह की फिल्म बनाना चाहते थे। पर लेखिका ने इस विषय पर विस्तार से नहीं लिखा है। अधिकतर स्पेस उन फिल्मों की कहानियों, किस्से व संबंधित लोगों के विचारों से भरा है। फिल्मों के नैरेटिव स्ट्रक्चर, कैमरा वर्क, ऐडिंटिंग की स्टाइल व थिमेटिक कंटेंट का विश्लेषण होना चाहिए था। क्या उनकी फिल्में भारतीय यथार्थ को परिलक्षित करती हैं। नर्गिस व सुनील दत्त के लंबे व सक्रिय फिल्म अभिनय व निर्माण काल में भारतीय सिनेमा में क्या-क्या ट्रेंड आए और उन नई धाराओं ने उनकी कला को कहां तक प्रभावित किया। नर्गिस ने राज्यसभा में सत्यजीत रे की फिल्मों की आलोचना करते हुए कहा था कि रे अपनी फिल्मों में भारत की निर्धनता दिखाते हैं और उनकी फिल्में वर्तमान भारत की आर्थिक व सामाजिक यथार्थ की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत नहीं करती हैंµलेखिका को इस विषय पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी करनी थी। सिने-सौंदर्यशास्त्र के गंभीर विद्यार्थीµइस पुस्तक को शायद बहुत अधिक उपयोगी न समझें। पर साधारण फिल्म के पे्रमियों के लिए इस पुस्तक का एक विशिष्ट आकर्षण रहेगा। इसके अधिकांश अध्याय मानवीय संवेदनाओं से भरपूर हैं। यह पुस्तक एक वृत्तांत है। रैग्स टू रिचेज का, यह वृत्तांत है एक सोने की चिड़िया का जो एक पिंजरे में कैद है जिसके सोने के पंखों को स्वार्थी तत्व नोच रहे और जो पीड़ा से आक्रांत सच्चे पे्रम व आजादी के लिए तड़प रही हैµअपने आत्मविश्वास व आंतरिक शक्ति के बल पर अंत में अपने को आजाद कर उन्मुक्त आसमान में उड़ने में सफल हुई।

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