दुर्गम सीमांतों की जीवंत यात्राएं

July 7th, 2010

प्रदीप पंत

सीमांत डायरी: कश्मीर से कच्छ तकः मनोहर श्याम जोशी; वाणी प्रकाशन; पृ.ः 100; मूल्यः 200; ISBN : 978.81.81.43.845.4

एक अच्छे यात्रा संस्मरण की विशेषता यह होती है कि उसमें हम न केवल क्षेत्र-विशेष से रू-ब-रू होते हैं, वरन क्षेत्र विशेष, वहां के जरूरी गैरजरूरी स्थानों, लोगों आदि के प्रति लेखक के नजरिए से भी अवगत होते हैं। मनोहर श्याम जोशी इस मायने में श्रेष्ठ संस्मरण लेखक रहे हैं। उन्होंने न केवल ‘कसप’ और ‘क्याप’ जैसे स्मरणीय उपन्यास या ‘हम लोग’, ‘मुंगेरी लाल के हसीन सपने’, ‘बुनियाद’ और ‘कक्का जी कहिन’ जैसे जीवंत टी.वी. धारावाहिक आदि लिखे, बल्कि वे साक्षात्कार लेने और यात्रा संस्मरण लिखने की कला में भी सिद्धहस्त थे। जब वे ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के संपादक थे तो उन्होंने फरवरी, मार्च और अपै्रल 1975 में खासे देसी संगठन सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ) के सौजन्य से कश्मीर से कच्छ तक के कुछ सुदूर क्षेत्रों का भ्रमण किया। भ्रमण के ये संस्मरण तब सात किस्तों में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ में प्रकाशित हुए थे। जोशी जी ने अपने जीवन-काल में इन संस्मरणों को पुस्तकाकार क्यों नहीं प्रकाशित कराया? इस प्रश्न का एक ही उत्तर है कि वे पुस्तकें छपवाने के मामले में परम आलसी थे। उनके निधन के कुछ बरस बाद ये यात्रा संस्मरण पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुए हैं। केवल 100 पृष्ठों की इस पुस्तक के संपादक भूपेंद्र अबोध हैं।
इन संस्मरणों में कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और कच्छ के सीमावर्ती क्षेत्र हैं, इसीलिए इसे ‘सीमांत डायरी’ कहा गया है। इस डायरी में इन सीमावर्ती क्षेत्रों के दुर्गम और निर्जन स्थल हैं, यत्र-तत्र एक भयावह किस्म का सन्नाटा और उजाड़ है, शहरी जिंदगी की गहमागहमी से दूर जड़ीभूत कर देने वाले बियाबान की छवियां हैं। यही रूपक उभरता है इस किताब को पढ़ने पर। इसी कारण वे पुस्तक की शुरुआत एक अमेरिकी कवि रोबर्ट लोवेल की एक रचना को पे्ररित करने वाली इन पंक्तियों से करते हैंµ‘‘बीहड़-बंजर क्षेत्र के मध्य पड़ा हुआ, हवा, पानी और धूप के असर से मंजता-छीजता-चमकता एक मामूली से पशु का कंकाल।’’
मनोहर श्याम जोशी के पास अद्भुत खिलंदड़ी और चित्रात्मक भाषा थी जिसके चलते वे इन यात्रा संस्मरणों में भी पाठक को लगातार बांधे रहते हैं और बताते हैं कि हमारे सीमांत क्षेत्रों मेंµचाहे वे कश्मीर के हरे-भरे पहाड़ हों या बाघा क्षेत्र अथवा राजस्थान के रेतीले रेगिस्तान और कच्छ के रण के मृगमरीचिका सरीखे निर्जन से क्षेत्रµजीवन का क्या अर्थ है? वहां यदि दूर-दूर तक बस्तियां नहीं हैं तो क्यों? जहां छुटपुट बस्तियां हैं, वहां लोगों की जिंदगी किस कदर अलग-थलग सी पड़ी हुई है इन्हीं सबके बीच वे बी.एस.एफ. के जवानों के युद्ध में शहीद होने के मार्मिक विवरण प्रस्तुत करते हैं तो रोचक वर्णन भी लेकर हाजिर होते हैं। जैसे कि पृष्ठ 41 और 42 पर वे वाघा सीमा की यात्रा के प्रसंग में बताते हैंµ‘‘एक चैकी पर जब निरीक्षण-मंच से मैंने सामने काफी दूरी पर निरीक्षण-मीनार पर खड़े पाकिस्तानी जवान पर दूरबीन साधी तो पाया कि वह खुद मुझ पर दूरबीन साधे हुए है। मैंने हाथ हिलाया, जवाब में उसने भी।’’ वे आगे लिखते हैंµ‘‘वाघा चैकी पर जलपान की व्यवस्था की गई थी। हमने पाकिस्तानी रेंजर्स के एक अधिकारी को भी साथ चाय पीने बुला लिया। बी.एस.एफ. और पाकिस्तानी रेंजरों में खासी बेतकल्लुफी है, दोस्ताना है। शांतिकाल में सीमा पर होने वाली छोटी-मोटी वारदात के फैसले के लिए उन्हें अक्सर एक-दूसरे से मिलना पड़ता है। एक-दूसरे के लिए कई छोटे-मोटे काम वह अनौपचारिक स्तर पर करते रहते हैं। तो पाकिस्तानी अफसर चाय पीने लोहे के बड़े फाटक के पार आ गएµपाकिस्तान से भारत में। शुरू में मुझे भी बी.एस.एफ. का समझकर उन्होंने हर सवाल का जवाब निस्संकोच दिया लेकिन जैसे ही उन्हें समझ में आया कि मैं पत्रकार हूं, वह बहाना बनाकर वापस चल दिए।’’ लेकिन मनोहर श्याम जोशी बात को यहीं समाप्त नहीं कर देते। यह बात का केवल एक पहलू है। वे बात के दूसरे पहलू को भी इन शब्दों से सामने लाते हैंµ‘‘वाघा चैकी पर डाक के आदान-प्रदान के अवसर पर पाकिस्तान के कस्टम अधिकारी जनाब शमशाद हुसैन से मुलाकात हुईµबहुत ही शायस्ता आदमी। बातचीत का अंदाज बेतकल्लुफ। मेरे सवालों के जवाब में उन्होंने जो कुछ बताया उससे मुझे लगा कि पाकिस्तान और भारत की सामाजिक-प्रशासनिक समस्याएं एक-सी हैं। कुल मिलाकर दोनों देशों का दिल-दिमाग भी एक ही स्तर का है।’’ सीमा पार के लोगों से मुलाकात के संदर्भ में जोशी जी का यह नजरिया ही पुस्तक को महत्वपूर्ण बनाता है।
यह पुस्तक सीमा-क्षेत्रों के संबंध में अत्यंत सूचनाप्रद भी है। जैसे कि पृष्ठ 48 पर मनोहर श्याम जोशी राजस्थान में बाड़मेर से आगे के क्षेत्र के संदर्भ में कहते हैंµ‘‘जिस रेगिस्तान को हम वनस्पतिहीन समझते हैं उसमें कभी-कभार भी बूंदा-बांधी से ही पशुओं के लिए काफी चारा उग जाता है। इस प्रकार रेगिस्तान पशुओं के लिए भव्य चरागाह है। पशु ही वहां का धन हैं और किसी आदमी की हैसियत का जिक्र उसके ऊंटों, भेड़-बकरियों और गाय-बैलों की कुल संख्या का हवाला देते हुए किया जाता है। थोड़ी-सी भी वर्षा हो जाए तो चरवाहे अपने परिवार के लिए पर्याप्त बाजरा उगा लेते हें। ऊंटनी का दूध जमाया नहीं जा सकता, लिहाजा उसे वह पी लेते हैं और आहार का काफी अंश उसी से पूरा हो जाता है। ऊंटनी के दूध और बाजरे के आटे की लपसी यहां का खास व्यंजन है। गाय के दूध से मक्खन और घी बनाया जाता है जो बाहर वालों को बेच दिया जाता है। मक्खन और घी बकरी के दूध का भी बनता है लेकिन उसका जायका बाहर वालों को रास नहीं आ सकता। भेड़ के दूध के घी को मालिश के लिए अच्छा माना जाता है।’’ ये ब्योरे रेगिस्तान में कठिन जीवन बिताने वालों की तस्वीर पेश करते हैं।
अपनी खिलंदड़ी भाषा के सहारे मनोहर श्याम जोशी बी.एस.एफ. वालों के कर्तव्य- समर्पित जीवन पर प्रकाश डालते हैं। पृष्ठ 75-76 पर वे लिखते हैंµ‘‘आसूतर और कुछ अन्य चैकियां देखते हुए रात को हम जैसलमेर पहुंचे। रास्ते में बी.एस.एफ. के एक इंजीनियर अधिकारी से भेंट हुई जिन्हें इस अंतर्राष्ट्रीय महिला वर्ष में निश्चय ही पत्नी विशिष्ट सेवा मेडल दिया जाना चाहिए। इनका हाल ही में विवाह हुआ है और पत्नी सेना के ऐसे पद पर हैं कि बच्चा साथ नहीं रख पातीं। तो अपने नौ महीने के युवराज को वह अपने साथ ही रखते हैं, आज से नहीं तब से जबकि वह बीस दिन का था। माता का हर कर्तव्य वह बहुत कुशलता से पूरा करते हैं। इस पर तुर्रा यह है कि उनकी ड्यूटी सीमा पर दौरा करने की है। बच्चा भी साथ-साथ दौरे पर जाता है और नौ महीने की इस उम्र में वह इतना घूम चुका है जितना लोग जीवनभर नहीं घूमते।’’ ऐसी कठिन स्थितियों के बीच बी.एस.एफ. के अधिकारी और जवान जिस समर्पित भाव से काम करते हैं, उनकी जानकारी पहली बार मनोहर श्याम जोशी की यह पुस्तक देती है। युद्ध के समय वे सीमित साधनों और हथियारों के बावजूद सेना के अधिकारियों और जवानों की भांति मोर्चा संभालते और शहीद होते हैं तो शांति काल में अत्यंत सीमित साधनों से क्वार्टर, बैरेक, बंकर बनाते हैं।’’ मिसाल के लिए एक परित्यक्त हवाई अड्डे से प्राप्त इस्पात की जालीदार चादरों से कच्छ में बैरेक, मेज, कुर्सी, सीमा-निरीक्षण-मंच और मार्ग-दर्शक चिह्न जैसी तमाम चीजें जवानों ने बना डाली हैं।’’ (पृष्ठ 80) दरअसल ये यात्रा संस्मरण कई अर्थों में बी.एस.एफ. के कार्यों के प्रति जोशी जी के मार्फत देश का आभार प्रदर्शन भी हैं। निश्चय ही इस पुस्तक को पढ़ने पर किसी भी संवेदनशील पाठक को यह अवश्य महसूस होगा कि एक ओर बी.एस.एफ. के पास सेना की अपेक्षा सीमित साधन उपलब्ध होते हैं, दूसरी ओर उसके अधिकारी और जवान सैनिकों से किसी मायने में कम बहादुर और कर्तव्यनिष्ठ नहीं हैं।
इस सीमांत डायरी की एक अन्य विशेषता यह है कि इसमें मनोहर श्याम जोशी कहीं अपना ज्ञान नहीं बघारते, बल्कि बी.एस.एफ. वालों के साथ यात्रा करते हुए उनसे ज्ञान प्राप्त करते और सीखते हैं। साथ ही मौका पड़ने पर वे अपने ऊपर व्यंग्य-वाण भी चला डालते हैं। जैसे पृष्ठ 34 पर वे बी.एस.एफ. के कमांडेंट मुल्लर साहब को करतबी बताते हुए उनके द्वारा पंजाब के सीमा क्षेत्र में यात्रा का कठिन-सा कार्यक्रम बनाए जाने पर कहते हैंµ‘‘मुझे भी करतबी मानते हुए उन्होंने दौरे का जो कार्यक्रम बनाया था, वह बैठे-बैठे कुर्सी तोड़ने वाली बिरादरी के मुझ जैसे सदस्य के बूते से बाहर था।’’ इस तरह स्वयं पर व्यंग्य करना जोशी जी की खिलंदड़ी भाषा का ही नहीं, खिलंदड़ी तबीयत का भी प्रतीक है। एक और उदाहरण देकर यहां बात खत्म की जाती है। पृष्ठ 80 पर वह लिखते हैंµ‘‘तो सारा दिन अहमदाबाद में बिताया और रात को गाड़ी पकड़ने पहुंचे। वह दो घंटा लेट थी। समय बिताने के लिए साथ आए इंस्पेक्टर लक्ष्मण सिंह से गपशप शुरू की। औपचारिक किस्म की जिज्ञासाओं से सहसा यह भेद खुला कि मैं और लक्ष्मण सिंह अजमेर के स्कूल में सहपाठी रह चुके हैं। लक्ष्मण सिंह के लिए मुझमें वह मरियल-सा चश्मुद्दीन पढ़ाकू लड़का ढूंढ़ सकना मुश्किल हुआ और मेरे लिए उनमें वह फुटबाल खिलाड़ी हीरो खोज सकना।’’

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