दिल्ली मेल

July 7th, 2010

सामंतवाद की छायाएं

एक पाक्षिक पत्रिका ने अपने आह्लाद के अतिरेक में दिल्ली की मुख्यमंत्री को शीला सुल्तान करार दिया है। रजिया सुल्तान से प्रेरित होकर यह उपाधि पत्रिका ने मुख्यमंत्री द्वारा 11 मई को बांटे गए दिल्ली अकादमी के पुरस्कारों के दौरान वर्ष 2008-2009 के साहित्यकार सम्मान पुरस्कारों की राशि को 21 हजार से बढ़ा कर 50 हजार करने की खुशी में दी थी। (यह बात और है कि उन्होंने साहित्य कृति पुरस्कार पानेवाले लोगों के पुरस्कारों की राशि को यथावत रख कर उनका अपमान किया)। सन 2009-2010 के पुरस्कारों को पहले ही 50 हजार का किया जा चुका है।
पर पत्रिका यह भूल गई कि उसने एक ही झटके में एक सामंती शासक और एक लोकतांत्रिक मुख्यमंत्री को एक ही पंक्ति में खड़ा कर दिया है। पर उसका आभार मानना होगा कि उसने अनजाने में ही एक चरम सत्य को उजागर कर दिया। जिस तरह से शीला दीक्षित ने इस राशि के दोगुने से ज्यादा किए जाने की घोषणा की वह किसी सामंती बादशाह की घोषणा से कम नहीं थी। प्रश्न है, क्या हिंदी अकादमी का अध्यक्ष जब मन में आये पुरस्कारों की राशि को घटा-बढ़ा सकता है? संभवतः नहीं। अकादमी की नियमावली के अनुसार इसकी अनुमति पहले कार्यकारिणी, संचालन समिति और वित्त विभाग से ली जानी चाहिए थी। अब होगा यह कि कार्यकारिणी और संचालन समिति अध्यक्ष/मुख्यमंत्री की एक तरफा घोषणा का अनुमोदन करेगी। स्वायत्तता और लोकतंत्र गया भाड़ में। पर सच यह है कि किसी भी राज्य में साहित्य और कला अकादमियों की कोई स्वायत्तता जैसी चीज नहीं है और इसलिए कृष्ण बलदेव वैद को लेकर हुए विवाद का एक लाभ, जैसा कि कवि केदारनाथ सिंह ने कहा है, ‘‘…मुझे आशा है हमारे पुरस्कार लेने से इंकार करने से सरकार द्वारा संचालित सांस्कृतिक संस्थाओं के काम करने के तरीकों पर चर्चा होगी और वह अनावश्यक नियंत्रण से मुक्त होंगी।’’
पर बात शीला दीक्षित के रजिया सुल्तान से तुलना की हो रही थी। हो सकता है रजिया सुल्तान और शीला दीक्षित में समान हिम्मत हो, क्योंकि उन्होंने कांग्रेस के लिए दिल्ली का किला तीसरी बार फतह किया है पर इन दोनों के बीच समय के हजार वर्ष के अंतराल के कारण मानसिकता और मूल्यों का जो अंतर होना चाहिए था कम से कम वह हमें नजर नहीं आता। रजिया सुल्तान सामंती समाज की उपज थीं और शीला दीक्षित एक लोकतांत्रिक व्यवस्था की। इसके बावजूद रजिया ने परंपराओं को तोड़ने की हिम्मत दिखलाई थी और उसकी कीमत चुकाई। सामंती व्यवस्था जहां शासक की मनमानी और मनचाही को स्वीकार करती थी वहीं लोकतंत्र किसी भी निर्णय के पक्ष विपक्ष के तर्कों को सुनने और समझने की गुंजाईश देता है। यानी इसमें जनता का सबसे ज्यादा महत्व होता है। दुख की बात यह है कि दिल्ली की लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता पर विराजमान मुख्यमंत्री ने उन लेखकों के विरोध को ही स्वीकार नहीं किया जिन को वह पुरस्कृत करने का दावा कर रही थीं।
असल में शीला दीक्षित ने न तो लोकतांत्रिक समाज के एक प्रबुद्ध नागरिक की-सी ही उदारता और संवेदनशीलता दिखलाई और न ही एक आधुनिक राजनेता की-सी ही समझ और हिम्मत का परिचय दिया। वह एक विधायक के दबाव तक का सामना करने की हिम्मत नहीं दिखा पाईं। उन्होंने एक रेशनल, सजग और संवेदनशील नागरिक के से विवेक का भी परिचय नहीं दिया जो किसी भी कलाकृति को शील-अश्लील के मापदंड पर नहीं तौलता। उसके मापदंड कुछ और ही होते हैं। सच तो यह है कि आधुनिक समाज जिस तरह की उदारता और समझ दिखलाते हैं उनमें यौन चित्रण का मूल्यांकन अंततः उसके द्वारा प्रेषित मूल्यों पर आधारित होता है न कि उसके चित्रण से। क्या यह भुलाया जा सकता है कि यौन मानवीय जीवन का एक निर्णायक पक्ष है और उसे समझे बिना किसी समाज को पूरी तरह समझा ही नहीं जा सकता। अगर ऐसा न होता तो यूलिसिस, लेडी चेटर्लीज लवर से लेकर ट्रापिक आॅफ केंसर और लोलिता तक सब प्रतिबंधित हो जाते। बहुत-से समकालीन लेखन को तो देश में प्रवेश ही नहीं करने दिया जाता उनमें गैब्रियल गार्सिया माक्र्वेज तक होते। स्वयं हमारे वांग्मय में ही एक नहीं कई ऐसी कृतियां हैं जो इन मापदंडों पर प्रतिबंधित होने लायक हैं और इन में सबसे ऊपर हैं कालिदास की रचनाएं।
इसलिए अगर दिल्ली हिंदी अकादमी की अध्यक्षा ने वर्ष 2008-2009 के शलाका सम्मान को कृष्ण बलदेव वैद को देने की उदारता दिखलाई होती तो वह इसके द्वारा जिन प्रजातांत्रिक मूल्यों की स्थापना कर रही होतीं उनका दूरगामी असर हमारे इस पीछे की ओर जाते समाज में पड़ता। शीला दीक्षित को नहीं भूलना चाहिए कि वह असल में जिन मूल्यों के लिए अड़ीं वे किसी उदारवादी समाज के तो छोड़ स्वयं कांग्रेस के भी नहीं हैं। बल्कि भाजपा और मुस्लिम लीगी हैं। जो काम भाजपा ने सत्ता से बाहर रह कर नहीं किया वह उन्होंने सत्ता में रह कर कर दिखाया। उन्हें याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि नेहरू जी ने लोलिता को प्रतिबंधित होने से बचाया था।
आखिर जो समारोह 11 मई को हुआ उससे किस की प्रतिष्ठा स्थापित हुई या बची। कम से कम साहित्य की तो नहीं ही बची। इस समारोह को जितने गुपचुप तरीके से सुरक्षा के घेरे में आम हिंदी साहित्य प्रेमी को दूर रख कर दिल्ली सरकार के सचिवालय में किया गया वह बतलाता है कि सरकार/हिंदी अकादमी की हिम्मत साहित्यकारों और साहित्य प्रेमियों का सामना करने की भी नहीं थी। उसे हिंदी का कोई वरिष्ठ साहित्यकार नहीं मिला जो कार्यक्रम में शामिल होने को तैयार हो इसलिए उड़िया लेखक जगन्नाथ प्रसाद दास को बुलवाया गया। यही नहीं कि जो लेखक सम्मान लेने नहीं पहुंचे उनके नाम नहीं पुकारे गए और न ही किसी तरह का कोई स्पष्टीकरण दिया गया बल्कि किसी भी सम्मानित लेखक को एक शब्द बोलने की इजाजत नहीं दी गई। 45 मिनट में सब कुछ हड़बड़ी में कर दिया गया। यह साहित्यिक समारोह था या कोर्ट मार्शल? साहित्य के किसी समारोह में साहित्यकार ही न बोलें इससे बड़ी विडंबना कोई हो सकती है? साहित्यकार राजनेता का भाषण सुनें और उस की घोषणाओं पर ताली बजाएं यह काम वही कर सकते थे जो अपने सम्मान और अपनी आत्मा का सौदा कर चुके होते हैं। ये सम्मान क्या अ-सम्मान में नहीं बदल गए थे?
यह घटना इस बात को भी स्पष्ट कर देती है कि अगर साहित्य और संस्कृति की अकादमियों की स्वायत्तता की कोई भी बात होनी है तो सबसे पहले उन्हें मुख्यमंत्रियों के चंगुल से निकालना होगा। दिल्ली की ही मुख्यमंत्री विभिन्न भाषाओं की छह अकादमियों की एक साथ अध्यक्ष हैं। इन संस्थाओं के तत्काल लोकतांत्रीकरण की मांग होनी चाहिए और अध्यक्षों/उपाध्यक्षों के चयन की ज्यादा खुली और स्वायत्त प्रक्रिया को अपनाये जाने की मांग होनी चाहिए।
कहावत है जैसे गुरू वैसे चेले। नेता जो करें सो करें अपने को साहित्यकार कहलाने को लालायित व्यक्ति भी वही करें जो उसके माई-बाप करें तो सिर्फ अफसोस ही किया जा सकता है। हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष ने जिस तरह से पुरस्कार समारोह को ‘मैनेज’ किया वह भी कम मजेदार नहीं था। कांग्रेस नेतृत्ववाली सरकार ने इस माह के शुरू में संसद में कट मोशन में जिस तरह जीत हासिल की और लालू-मुलायम-माया को पटाया, यह समारोह उस घटिया नाटक की और भी घटिया नकल था। सुना है घर-घर जाया गया। हाथ-पैर जोड़े गए। शीला दीक्षित की चिट्ठी भेजी गई, लालच दिए गए और सरकार का रौब दिखलाया गया। नतीजा तत्काल निकला। कवियत्री गगन गिल ने फौरन अंतरात्मा की आवाज सुन ली और वह पुरस्कार लेने पहुंच गईं।
गोकि ऐसे भी लोग थे जो दबाव के चलते निर्णय नहीं ले पा रहे थे। उनके पास दूसरे बहाने थे। लीलाधर मंडलोई, कृष्ण कुमार और बनवारी कार्यक्रम में ‘व्यस्तता’ के कारण नहीं पहुंच पाये। वैसे कमाल तो किया लीलाधर मंडलोई ने। एक दिन पहले तक कहते रहे कि मैंने समारोह में नहीं जाना था नहीं गया। पर पुरस्कार लेने में कोई झंझट नहीं किया। पर जब अकादमी के उपाध्यक्ष उनके दफ्तर पुरस्कार लेकर पहुंचे तो शुद्ध हिंदू कहावत के अनुसार घर आई लक्ष्मी को बेचारे कैसे लौटाते! सो स्वीकार कर गए। कृष्ण कुमार और बनवारी ने क्या किया कहा नहीं जा सकता। हिंदी अकादमी की ओर से सिर्फ मंडलोई के बारे में समाचार छपवाया गया है पर अन्य दो के बारे में कुछ नहीं कहा गया है। वैसे जहां तक हमारी जानकारी है उपाध्यक्ष महोदय बनवारी को सम्मान राशि देने चरखी-दादरी तक गए जहां आजकल वह रह रहे हैं।
पर असली बात यह नहीं है कि कितने सारे लोगों ने पुरस्कार लिए। हिंदी के नाम पर तो सरकार द्वारा ही हर वर्ष कुछ नहीं तो सैकड़ों पुरस्कार बंटते हैं और भविष्य में भी बांटे जाते रहेंगे। लेनेवाले उन्हें लेते रहेंगे पर असली शुरूआत तो वहां से होती है जहां उनके औचित्य को तौला जाता है। यह पहली बार है जब किसी सरकार को लेखकों के विरोध के कारण अपने पुरस्कार समारोह को एक वर्ष के लिए मुल्तवी करना पड़ा था। जब पहली बार गंभीरता से इतने सारे लेखकों ने एक साथ किसी लेखक के पक्ष में खड़ा होने और पुरस्कार ठुकराने का साहस दिखलाया। महत्वपूर्ण शायद यह भी है कि पुरस्कार न लेनेवाले लेखकों की श्रेष्ठता से भी हिंदी जगत वाकिफ है। लेने और न लेने वाले लेखकों का फर्क काफी हद तक उनके लेखन की स्तरीयता और अपने लेखन के प्रति निष्ठा से भी यह किया जा सकता है। निश्चय ही इसका आगे असर होगा। आनेवाले समय में सरकार को, आज वह चाहे जितनी बहादुरी दिखा ले, लेखकों को ज्यादा गंभीरता से लेना होगा। सोचने की बात यह है कि आखिर हिंदी अकादमी या दिल्ली सरकार ने इस हठधर्मिता से क्या हासिल किया? आज स्थिति यह है कि इस संस्था से लगभग हर गंभीर और प्रतिष्ठित लेखक अलग हो चुका है या कर दिया गया है। जाने-माने लेखकों ने इसके कार्यक्रमों में जाना बंद कर दिया है। उपाध्यक्ष का सारा ध्यान और ऊर्जा सिर्फ कुछ लेखकों को येनकेन प्रकारेण बुला लेने में ही लगी रहती है। अकादमी न केवल साहित्यकारों के बीच अप्रासांगिक हो चुकी है बल्कि जनता के बीच भी उसका कोई महत्व नहीं रहा है। हां, हंसोड़ और हास्य कवियों का जरूर अड्डा हो गई है। पर यह उतना ही गंभीर और महत्वपूर्ण लेखकों से दूर होती जा रही है। अर्चना वर्मा ने इस विदूषकीय दौर को सही और समय पर पहचान लिया था। सरकार को भ्रम नहीं होना चाहिए कि सचिवालय की चारदीवारी की सुरक्षा में ‘सफल’ सम्मान समारोह कर ले जाने से उसकी प्रतिष्ठा बढ़ जाएगी। उल्टा यह घटी है और लेखकों से उसका अलगाव बढ़ा है। साहित्य की किसी भी संस्था का उद्देश्य कुल मिला कर बेहतर और उत्कृष्ट साहित्य और रचनात्मकता को बढ़ावा देना और उसका सम्मान करने के बहाने उसका प्रचार करना होता है। अगर वह यही नहीं कर पा रही है तो उसका औचित्य ही क्या है! निश्चिय है कि आनेवाले समय में इसे रह-रह कर तब तक विरोध का सामना करना पड़ेगा जब तक की वह अपने विदूषक उपाध्यक्ष से मुक्त नहीं हो जाती। अब उसके भविष्य का फैसला पुरस्कार लेनेवाले लेखक नहीं बल्कि न लेनेवाले लेखक करेंगे और इन पुरस्कारों के अखिल भारतीय कर दिए जाने से अगर सत्ताश्रयी दरबारी लेखकों की संख्या बढ़ेगी तो विरोध का दायरा भी बढ़ेगा। सरकार और हिंदी अकादेमी के कर्णधारों को समझ लेना चाहिए कि हिंदी में आत्मसम्मान के लिए कुछ कर देनेवाले लेखकों की संख्या सब कुछ के बावजूद कम नहीं है।

नकार की हुंकार

आशुतोष भारद्वाज

एक आलोचक सबसे आगे बैठे ताली बजाते थे, आवाज धीमी पड़ते ही पीछे मुड़कर दर्शकों से जोरदार तालियों की मांग करते थे। एक कवयित्री हथेली भर का सफेद गजरा बालों में टांगकर आई थी। एक पूर्व संपादक उचक-उचक कर मंच पर चढ़े जाते थे। जब मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि पिछले साल न दिए जाने की वजह से लंबित पुरस्कारों की राशि दुगुनी कर दी जाए तो सबने और जोर से करतल ध्वनि की। पुलकित आलोचक ने कामरेडनुमा अंदाज में मुट्ठी लहराई।
प्रचंड फुर्ती से यह सब हुआ। ग्यारह मई की शाम। महज तीसेक मिनट में दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी ने दो साल से लटके पुरस्कार निपटा दिए। सभी परंपराओं को सिगट्टा दिखाते हुए सत्ता ने किसी भी विजेता को धन्यवाद ज्ञापन तक के लिए मुंह खोलने की मोहलत नहीं दी। किसी को माइक थामकर दो शब्द कहने की इजाजत भी नहीं थी। मंच से नाम पुकारे जाने पर वे स्कूली छात्रों की तरह दौड़े आए, मुख्यमंत्री के सामने से गुजर और अपने सिर नवाते चलते गए। वैष्णोदेवी-दर्शन की कतार की मानिंद। उन्हें नहीं मालूम था कि दिल्ली सचिवालय के उस द्यूत क्रीड़ागृह में आकर, अपनी भाषा को जुए पर लगाकर उन्होंने परवर्ती पीढ़ी को, जो उनमें से कुछ को अपना नायक मानती थी, खो दिया है।
बहुत संभव है इन्हें कृष्ण बलदेव वैद का लेखन नापसंद हो। शायद अश्लील भी लगता हो। उन्हें पूरा हक है वैद के लेखन को नकारने का।
लेकिन जिस भाषा के ये लेखक थे, जिसने उन्हें इस मंच तक पहुंचाया था, वह उनसे त्याग मांगती थी। कम से कम इस मूलभूत दायित्व की अपेक्षा रखती थी कि वे सदा लिखे शब्द के हक में खड़े रहेंगे।
शब्द महज लिखने को नहीं होते। वे एक पवित्र व निष्कंप लौ में शब्दकार की रूह प्रज्वलित करते हैं, उसे नैतिक पाश में आबद्ध करते हैं। मसला वैद के समर्थन या विरोध करने का है ही नहीं।
यहां शब्द की मातृभूमि पर ही सीधा आक्रमण हो रहा था। किसी नेता की शिकायत पर किसी लेखक से पुरस्कार छीन लेना एक रचनाकार का तिरस्कार ही नहीं, भाषा की जैविकीय कोशिकाओं पर, लिपि के मेरुदंड पर और शब्द के नाभिकीय बिंदु पर आघात था। राजनीतिक सत्ता का। इंडियन एक्सपे्रस में उस नेता का बयान था कि ‘‘…सरकारी पुरस्कार पाने के लिए किसी लेखक को उस सरकार की नीतियों का पालन करना ही होगा। वैद का लेखन दिल्ली सरकार की नारी-सशक्तीकरण नीतियों का विरोध करता है।’’
सत्ता कभी इतने खुले तौर पर रचना के खिलाफ नहीं खड़ी हुई थी। निर्ममता से अपनी शर्तें थोपती हुई, लेखक को महज एक मुर्गा, सरकारी नीतियों के आज्ञाकारी पालनकर्ता में सिकोड़ती हुई।
यह उस भाषा के सभी शब्दकारों कोµभाषा से अपनी प्राण-ऊर्जा ग्रहण करने के नाते बाध्य करता था कि वे अपनी लिपि के साथ खड़े नजर आएं। किसी अन्य मसले पर वे अनिर्णीत, निर्लिप्त रह सकते थे, लेकिन आज उनके पास उभयचार का रत्ती भर अवकाश न था। यह निर्णय का लम्हा था। एक दुर्लभ अवसर। उन्हें हमेशा शिकायत रहती है कि सत्ता और व्यापार हिंदी को नहीं पूछते। अन्य भाषाओं के बरक्स वे दीन-दरिद्र हैं। लेकिन इस दारिद्रय में भी वे शब्द-गांडीव की तनी हुई प्रत्यंचा पर अपने अस्तित्व का उद्घोष कर सकते थे। लेकिन नहीं।
सत्ता को मालूम है कि कितने कातर-कायर हैं इस हिंदी के सिपाही। सारी परंपरा को तोड़ कमानी या फिक्की जैसे जन-सभागृह के बजाय सचिवालय के द्यूत क्रीड़ागृह में बुलाएगी तब भी दौड़े आएंगे। किसी ने सवाल नहीं उठाया अकादमी के आकाओं से कि सचिवालय के दड़बेनुमाहाॅल में, सरकारी बाबुओं के बीच कैसा आयोजन हो रहा है। और क्यों हो रहा है। पहली बार छोटे-बड़े लेखक तो दूर, पूर्व शलाका विजेताओं तक को नहीं बुलाता गया। आयोजन को मीडिया से छुपाया गया, आयोजन से पहले पे्रस विज्ञप्ति जारी नहीं की गई, चोरी-छुपे पहुंचे पत्रकारों को भी अंदर आने से रोका गया। पुरस्कार वितरण समारोह में जहां पाठक अपने प्रिय रचनाकार से सीधा संवाद कर लेता है, यहां पाठक सिरे से अनुपस्थित थे।
नहीं, किसी ने कुछ भी नहीं पूछा। जैसे देश में आपातकाल तारी हो और किसी को कुछ सोचने, बोलने, पूछने की इजाजत न हो। बस ताली बजाने की छूट हो।
वे अभिव्यक्ति स्वातंत्रय के बड़े खिलाड़ी रहे थे। लेकिन ग्यारह मई की शाम उन्हें निःशब्द कर दिया गया था। जैसा चंचल मवेशियों को गलत जगह मुंह मारने से रोकने के लिए करते हैं, सत्ता ने उनके मुंह पर मुछीका बांध दिया था। सत्ता का शुबहा वाजिब था। बड़ा उत्पाती अतीत रहा है इनका। साम्यवाद, उत्तर आधुनिकता से ले बुद्ध के महामौन में डूबे-उतराए लोग। अखबारी स्तंभों में दुनियाभर की कूद-फांद करते हुए। लेकिन उस शाम उनमें अनेकानेक थिर-धीर गुदगुदी कुर्सियों पर बैठे थे, बैंक आॅफ इलाहाबाद का लेमिनेटेड चैक पा चुपके से खिसक लिए थे। किसी में साहस नहीं था कि खुद से यह सवाल कर सकें: अगर कल किसी नेता की चिट्ठी पर उनसे पुरस्कार छीन लिया गया तो क्या रुख होगा उनका? साहस मुख्यमंत्री तक में नहीं था। ‘नो कमेंट्स’, सिर्फ इतना भर बोलीं जब उनसे पत्रकारों ने उन रचनाकारों को पूछा जिन्होंने पुरस्कार ठुकरा दिए। क्या ये लेखक, अपनी मुखिया-मंत्री समेत, एक गहन अपराध-बोध से ग्रस्त नहीं थे? सवाल सिर्फ पुरस्कार का नहीं है, तात्कालिक छोटे स्वार्थ के लिए खुद को सत्ता की गोद के सुपुर्द करने का है।
अपनी कातर चुप्पी में ये सभी सहभागी थे अपनी जुबान के चीरहरण के। सत्ता भरी सभा में पासे फेंकती थी और वे अपने शब्दों को दांव पर लगाते, हारते जाते थे। बड़े घिसे हुए तर्क थे द्यूतगृह में चले आने के। वही जो अपने लालच को छुपाने के लिए कभी पांडवों ने दिए थे।
लेकिन शायद वे नहीं जानते थे कि भाषा के अनेक प्रहरी, उम्मीद से ज्यादा सशक्त, और भी थे जिनकी ओजस्विता के समक्ष उनकी कातरता बिलबिलाती नजर आती थी। वे इनसे ज्यादा बड़े और आवाज में दम भरने वाले कलमकार थे। जिनके नकार की हुंकार उस मिमियाते स्वीकार को कुचल देती थी।
जिस शाम ये लोग दिल्ली सचिवालय के कैसीनो में बैठे अपनी हस्ती को लुटा रहे थे, दिल्ली से सैकड़ों मील दूर बलिया के किसी गांव में बाघ पर सवार एक अलमस्त कवि ताजा मट्ठा पी रहा था। इन लेखकों की करतूतों से बेफिक्र वह बेलौस कवि हमारा नायक था, जिसके छंदों में उसी रात हम अपनी भाषा के अलंघ्य अक्षत कौमार्य का साक्षात करने वाले थे।
साभारः जनसत्ता

नैतिक हार और हाहाकार

भारतीय पुलिस की विशेषता यह रही है कि वह तथ्यों पर कम और जोर-जबर्दस्ती पर ज्यादा विश्वास करती है। कभी अपनी गलती स्वीकार नहीं करती। भ्रष्टाचार और गलत बयानी उसकी अतिरिक्त विशेषताएं हैं। और दुर्भाग्य या सौभाग्य से हंस के स्तंभकार भारत भारद्वाज उसी पुलिस सेवा में काम कर चुके हैं, ऊपर से जासूसी विभाग में। उनसे उम्मीद तो यह की जाती थी कि वह जिस भी विषय पर बात करेंगे उसके सभी पक्षों को पूरे तथ्यों के साथ सामने रखेंगे पर हो उल्टा रहा है। पुलिसिया गुण उनमें इस कदर कूट- कूट कर भरे हुए हैं कि वह पूरी बेशर्मी से सिर्फ उन बातों को सामने लाते हैं जिनसे उनके हित जुड़े होते हैं। असल में हंस के मंच का वह जिस हद तक संबंध बनाने, भाई-भतीजों और अपने प्रेम संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, वैसा रिकार्ड शायद ही किसी ने बनाया हो। यह भी अचानक नहीं है वह उस हंस में एक अर्से से लिख रहे हैं स्वयं जिसके संपादक के लिए पत्रिका आत्मप्रचार का सबसे बड़ा मंच है (संभवतः यही कारण है कि इस स्तंभ में हर दूसरे अंक में संपादक की चर्चा और बखान देखने को मिलता है)। यह पुरानी परंपरा है, जिसका दूसरा नाम है ‘मेरा हमदम मेरा दोस्त’।
भारत जी ने हंस के मई, 2010 अंक में समयांतर से इसलिए नाराजगी जाहिर की है कि उसने बटरोही द्वारा हंस और उसके स्तंभकार भारत भारद्वाज को कानूनी नोटिस देने को सार्वजनिक कर दिया था। आखिर पत्रिका और उसका स्तंभकार दो महीने तक इस समाचार को क्यों छुपाए रहा? जबकि हंस ऐसे किसी मौके का लाभ उठाने से नहीं चूकता जिससे उसको पब्लिसिटी मिले – जैसे कि हनुमान को आतंकवादी कहने पर मचे बवाल को याद कीजिए किस तरह भुनाया गया। क्या यह समाचार नहीं था! और अब भी यह तब छापा गया जब कि समयांतर ने इसे सार्वजनिक कर दिया।
पर लगता है उन के गुस्से का इससे भी बड़ा कारण यह था कि समयांतर ने उनके झूठ का पर्दाफाश कर दिया था। न जाने वह इतने वर्षों तक पुलिस में क्या करते रहे कि उन्हें इतना भी पता नहीं था कि दिवंगतों के नाम पर संपत्ति नहीं होती। उन्होंने यह तर्क दूधनाथ सिंह की उस पुस्तक से आंख मूंद कर लिया था जो सिंह साहब ने महादेवी पर लिखी है। स्वयं दूधनाथ के पास अब इस बात का जवाब नहीं है कि उन्होंने यह कैसे लिख दिया कि बटरोही ने महादेवी की संपत्ति का दाखिल खारिज अपने नाम करवाया? पर दूधनाथ सिंह की अपनी फितरत है। वह हर चीज को सनसनी बना कर प्रस्तुत करते हैं और महादेवी पर लिखी उनकी किताब भी इसका कम बड़ा उदाहरण नहीं है, जिसमें उन्होंने सनसनी फैलाने के नये मानदंड स्थापित किए हैं।
पर बात पुलिस अधिकारी उर्फ हिंदी के जासूस की हो रही थी। उनके कानूनी ज्ञान का एक और उदाहरण लें। उन्होंने हंस के मई अंक में लिखा है कि ‘‘…आईपीसी की धारा – 499 मानहानि – में कई अपवाद हंै जिसमें सार्वजनिक संस्था पर निःस्वार्थ भाव से अच्छे विश्वास में की टिप्पणी भी है।’’ इस टिप्पणी में कई बातें मजेदार हैं जैसे कि ‘निःस्वार्थ भाव’ और ‘अच्छा विश्वास’। इन ‘भावों’ का तौल आगे चल कर नापेंगे, पहले बेहतर होगा कि भारत भारद्वाज अपने सुप्रीम कोर्टी वकील से पूछ लें कि उन्होंने जो टिप्पणी की वह संस्था पर है या व्यक्ति पर जिसके बारे में उन्हांेने लिखा था कि बटरोही को पद से हटा दिया गया है और उन पर जांच बैठा दी गई है। प्रिय पुलिस अधिकारी जी यह व्यक्ति का चरित्र हनन है, संस्था से इस आरोप का कोई लेना-देना नहीं है और बटरोही का चरित्र हनन करते हुए उन्होंने जो आरोप लगाए हैं उन्हें सिद्ध करना उनके लिए, उनके संपादक के लिए और उनके सुप्रीम कोर्ट के वकील के लिए भारी पड़नेवाला है, यह स्वयं उनकी लिखी टिप्पणी ही सिद्ध कर देती है। क्या आपको पता नहीं है कि सरकार द्वारा किसी को किसी पद पर रखना या निकालना, उसके खिलाफ जांच करना या कोई दंडात्मक कार्रवाही करना, कोई साहित्यिक मनमर्जी का सवाल नहीं है। उसका एक तरीका होता है और वह होता है रिकार्ड। क्या वह सब हवा में हुआ है? कहां हैं वे रिकार्ड?
भारद्वाज के साहित्य के प्रति सरोकारों से हिंदी जगत वाकिफ है। समयांतर पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने पहले ही वाक्य में लिखा हैः ‘‘महादेवी वर्मा सृजन पीठ मल्ला रामगढ़ (नैनीताल) की व्यवस्था को लेकर उसके अवैतनिक और तदर्थ निदेशक डाॅ. बटरोही के प्रसंग में उठा विवाद गहरा रहा है।’’ पर तथ्य यह है कि विवाद गहरा नहीं रहा है बल्कि छंट रहा है। अभी तक यह कहनेवाले भारद्वाज ने कि बटरोही को निदेशक के पद से हटा दिया गया है, ‘‘अवैतनिक और तदर्थ निदेशक डाॅ. बटरोही’’ कैसे लिख दिया?
यही नहीं पाखी की बातों को उद्धृत करते हुए भारद्वाज ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी है। वह लिखते हैं ‘‘…डाॅ. बटरोही पर अनेक आर्थिक अनियमितताएं (ओं) के आरोप भी लगाए हैं, जिसकी (जिनकी) जांच होनी चाहिए।’’ (हमारा भारत जी से निवेदन है कि वह अपने लिंग-बोध को थोड़ा सुधार लें! इतने बड़े आलोचक को, फिर चाहे वह चांद ही क्यों न हों, एकवचन और बहुवचन की गलतियां करते देखना अच्छा नहीं लगता)। अगर पहले ही बटरोही पर भ्रष्टाचार की जांच चल रही है, जो वह छह माह पूर्व हंस में लिख चुके हैं, तो फिर वह नये सिरे से किस जांच की मांग कर रहे हैं? निश्चय ही यह कानूनी नोटिस का कमाल है। वैसे उन्हें शर्म होती तो एक सज्जन के तौर पर और लेखकीय ईमानदारी के तहत वह स्वयं ही माफी मांग चुके होते और उनके साथ ही हंस के संपादक भी, जिन्होंने उन्हें यह मंच उपलब्ध करवाया हुआ है। अब वह लिख रहे हैं कि ‘‘कानूनी नोटिस में कहीं भी इस बात का संकेत नहीं है कि राजेन्द्र यादव और भारत भारद्वाज माफी मांगें।’’ यानी वह अप्रत्यक्ष रूप से यह सिद्ध करना चाहते हैं कि बटरोही उनसे पैसा ऐंठना चाहते हैं। पर सच यह है कि उन्हें जो कानूनी नोटिस दिया गया है उसमें यह स्पष्ट है कि पत्रिका गलत बयानी के लिए माफी मांगे, जो उन्होंने प्रत्यक्ष तौर पर नहीं किया है पर अप्रत्यक्ष तौर पर कर दिया है। यह भारत भारद्वाज और हंस की नैतिक हार है, यह बात और है कि बेशर्मी के चलते वह बढ़-बढ़ कर बोल रहे हैं। समयांतर में इसी वर्ष जनवरी में लिखा गया था कि भारद्वाज पिछले छह महीने में दो बार अपना स्टैंड बदल चुके हैं। यह तीसरी बार है। यानी हर तीन महीने में एक बार।
अब बात करते हैं पाखी की रिपोर्ट की जिसे उन्होंने ‘खोज-रपट’ कहा है। पाखी की क्या मंशा है वह हम नहीं जानते पर भारद्वाज की जो मंशा है वह हमें मालूम है। पहली बात तो यह स्पष्ट होनी चाहिए कि इस ‘खोज-रपट’, दूधनाथ सिंह की खोज और गांव प्रधान के आरोपों के बीच क्या अंतर है? यानी ये सब वही बातें हैं जो ग्राम प्रधान लक्ष्मीदत्त जोशी और उसके भाई बटरोही पर लगा रहे हैं। यहां याद करना जरूरी है कि जोशी का कुल उद्देश्य महादेवी की रामगढ़ स्थिति संपत्ति पर कब्जा करना है और उनका दावा यही है। वह मामला पहले से ही अदालत में है। पाखी की रिपोर्ट उन्हीं आरोपों का चरबा है जो पाखी/दि संडेपोस्ट के संवाददाता ने तीन दिन रामगढ़ में लक्ष्मीदत्त जोशी के मेहमान के रूप में रह कर लिखी। यह कुल मिला कर एकांगी तो है ही बचकाना भी है और निश्चित ही संवाददाता को स्पष्ट निर्देश देकर लिखवाई गई है। इससे भी ज्यादा मजेदार बात यह है कि भारत भारद्वाज ने जो आरोप एक से छह तक नंबर गिनवाए हैं वे इतने बोदे हैं कि कोई हवलदार भी उन्हें अपने एफआइआर में दर्ज करना पसंद नहीं करेगा। मलवा कहां बेचा, छत की चादर बदलने में क्या घपला किया? महादेवी से जुड़े सामान को अपने उठा ले गए, पुस्तकालय की राशि में हेर-फेर किया। और हां, अपनी पत्नी को सोसाइटी का सदस्य बनवाया।
क्या भारत जी को मालूम है कि मीरा कुटीर कितनी बड़ी बिल्डिंग है? उसकी छत पर संभवतः बीस भी चादरें क्या ही लगती होंगी। पहाड़ों में मलवे को मुफ्त ले जानेवाला भी कोई नहीं होता, खरीदने की बात तो छोड़ो। और अगर मीरा कुटीर का मलवा ही कर दिया गया है तो फिर वह बंगला आज भी यथावत कैसे खड़ा है जिसका चित्र पाखी ने अपने प्रथम पृष्ठ पर छापा है और ‘वरिष्ठ लेखक’ दूधनाथ सिंह ने अपनी पुस्तक में बिना साभार लिया है। अगर बटरोही महादेवी का सारा सामान उठा ले गए थे तो फिर रामजी पांडे क्या कर रहे थे? उस मकान का नियंत्रण तो कम से कम कानूनी तौर पर उन्हीं के पास था। क्या वह उस सामान को इतनी आसानी से जाने देते? उन्होंने यह बात कभी क्यों नहीं कही? आज जो सामान संग्रहालय में है, वह कहां से आया? मीरा कुटीर तो वर्षों से लावारिस पड़ी थी। पुस्तकालय की राशि में हेर-फेर का क्या प्रमाण है? उसका तो हर साल आॅडिट होता है। अंत में अगर बटरोही ने अपनी पत्नी को सोसाइटी का शुरूआत में सदस्य बनाया था तो इसमें क्या गलत था? तब सोसाइटी के पास कुछ नहीं था और बटरोही को लोगों की जरूरत थी। क्या वह किसी लाभ का पद था? क्या दीपा बिष्ट कोई अंगूठा टेक महिला हैं? वह अध्यापिका हैं और देश के एक नामी-गिरामी शिक्षण संस्था में अध्यापिका हैं। आज जब सृजन पीठ के पास संसाधन हैं तो क्या तब भी दीपा जी इससे जुड़ी हैं? इस संस्थान को लेकर लूट की जो मानसिकता नजर आ रही है वह समझ में आनेवाली है।
जहां तक हमारा उत्तराखंड के अपूर्व जोशी से संबंध होने का सवाल है वह वैसा ही है जैसा उनका बिहार के गोपाल राय से या फिर प्रेम भारद्वाज से है। दिक्कत यह है कि जातिवादी और क्षेत्रीयतावादी कभी भी उससे ऊपर उठकर न तो संबंधों को समझ सकते हैं और न ही लोगों का मूल्यांकन कर सकते हैं। इस तरह की कुत्सित मानसिकता और घटियापन के बारे में क्या कहा जाए, इसलिए हमारी मंशा उस पर ज्यादा बात करने की नहीं है। असली बात यह है कि पूर्व जासूस यह बतलाएं कि जो बिंदु उन्होंने पाखी से लेकर अपने मई के हंस के स्तंभ में बटरोही के खिलाफ गिनाए हैं उनमें वे कहां हैं जो उन्होंने हंस के विभिन्न अंकों में लगाए थे? क्या वे उनसे मुकर नहीं रहे हैं?
इस टिप्पणी के कई आप्त वाक्यों में से एक यह भी है कि ‘‘वैसे भी साहित्यिक विवाद का फैसला अदालत नहीं, हिंदी का बौद्धिक समाज करता है।’’ अजीब बात है कि भारत जी को पता ही नहीं कि साहित्यिक विवाद क्या होते हैं और चरित्रहनन क्या होता है। मीरा कुटीर के लिए होनेवाला बटरोही और जोशी के बीच का विवाद कैसे साहित्यिक हो गया? क्या सिर्फ इसलिए कि भारत भारद्वाज और दूधनाथ सिंह ने इसे निहित स्वार्थों के तहत तूल दिया हुआ है? यह मामला शुद्ध संपत्ति के विवाद का है। हां, भारत भारद्वाज इस के बहाने जो कर रहे हैं वह साहित्यिक विवाद नहीं खुलेआम लाॅबीईंग है और यह बेशर्म लाबीईंग क्यों हो रही है, यह देखना भी हिंदी समाज के लिए जरूरी है।
हमने शुरू में कहा था कि आगे बतलाएंगे कि भारत भारद्वाज के इस ‘निःस्वार्थ भाव’ और ‘अच्छा विश्वास’ के मूल में क्या है। इसलिए उसी पर आते हैं।
भारद्वाज बतलाएं कि वह पिछले दिनों दो बार क्यों रामगढ़ गए थे? किसके साथ गए थे? वहां वह क्या देखने गए थे? वहां किस का मकान बन रहा है? वह किस की निगरानी में बन रहा है?
पुस्तक वार्ता में उत्तराखंड के भाजपाई मुख्यमंत्री की किताब की समीक्षा किसने की? वह छद्म नाम कौन था? किसने उसका पारिश्रमिक लिया? कौन निशंक को महाकवि बनाने में लगा है? इसके पीछे क्या उद्देश्य है?
साफ है कि षड़यंत्र का एक त्रिकोण है जो दिल्ली-रामगढ़-वर्धा तक जुड़ा हुआ है। इसके पीछे एक निश्चित उद्देश्य है। वह है एक ऐसी शख्सियत को महादेवी सृजन पीठ का निदेशक बनाने की मंशा, जिसको भारत भारद्वाज सारे भारत में लेकर डोलते हैं और कुमाऊं से लेकर दिल्ली विश्वविद्यालय और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय तक में नौकरी लगाने के लिए आकाश-पाताल एक कर चुके हैं। बटरोही के खिलाफ अभयान छेड़ने का एक बड़ा कारण यह भी है कि वह इस व्यक्ति को बटरोही के विभागाध्यक्ष होने के दौरान सारी कोशिशों/तिकड़मों के बावजूद कुमाऊं विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में व्याख्याता नहीं लगवा पाये थे। इसके लिए उन्होंने कई लोगों के माध्यम से बटरोही पर दबाव भी डलवाया था। अगर उन्हें याद न आ रहा हो तो हम उन्हें उन लोगों के नाम भी याद करवा देंगे।
यह बात और है कि वह बटरोही के चरित्र हनन के इस खेल में महादेवी सृजन पीठ को ही मिटा देने पर उतारू हैं, एक अयोग्य और नामहीन व्यक्ति को हर हालत में निदेशक के पद पर बैठाने की बेशर्म जिद्द के चलते ही नहीं बल्कि महादेवी के मकान को भी ठिकाने लगवाकर। यहां यह दोहराना जरूरी है कि आज पूरे उत्तर भारत में महादेवी सृजन पीठ महादेवी के नाम पर ही नहीं बल्कि अन्यथा भी अकेला ऐसा संस्थान है जो बटरोही के नेतृत्व में साहित्यिक गतिविधियों में इतनी ईमानदारी से लगा हुआ है। वहां जो भी संस्था आज खड़ी है और जिसे हथियाने के लिए इतनी तिकड़म की जा रही है, अकेले बटरोही के दम पर है। गांव बसा नहीं कि सियारों ने धावा बोल दिया है। इसलिए इस हू-हूकार को काटना हर साहित्य प्रेमी का नैतिक कर्तव्य है।
भारद्वाज ने लिखा है ‘‘छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा के नाम पर एक सार्वजनिक संस्था के हश्र से मैं चिंतित था।’’ आहा! उनकी पीड़ा! हम नतमस्तक हैं! इस नाइट एट आम्र्स का ट्रैक रिकार्ड देखें! महोदय निश्चय ही आप ‘सार्वजनिक’ साहित्यिक संस्थानों की चिंता में मिटे जा रहे हैं, पर क्या कभी आपकी कृपा दृष्टि अपने गृह राज्य बिहार की उस सरकारी संस्था (जिसे बिहार राजभाषा विभाग कहा जाता है) पर भी पड़ी है जिसमें अभी-अभी इतना बड़ा घपला हुआ है और जिसने पिछले सात साल से अपने वार्षिक पुरस्कार नहीं दिए हैं। क्या आप को कभी याद नहीं आया कि बिहार में हिंदी साहित्य के नाम पर क्या हो रहा है! हां, दिल्ली अकादमी के बरक्स आप जरूर केंद्रीय साहित्य अकादेमी की तारीफ कर रहे हैं। क्यों? क्या इसलिए कि रह-रह कर आप वहां अपनी सेवाएं अर्पित करने को तत्पर रहते हैं और विदेश यात्राओं से लेकर अनुवाद के कामों में लगे हुए हैं। क्या यही कारण नहीं है कि आपने पिछले सात साल में साहित्य अकादेमी के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला तब भी नहीं जब नारंग ने वहां गदर मचाया हुआ था और अब भी नहीं जब वह पर्दे के पीछे से अकादेमी को नचा रहा है। आप नारंग के उस भ्रष्टाचार को भी भूल गए जिसके तहत उस आदमी ने जनता के खून-पसीने का पैसा जो साहित्य के नाम पर आया था उससे अपने टायलट पर ही 15 लाख खर्च कर दिए थे, अपनी बीवी को अकादेमी के खर्च पर पेरिस ले गया था और जिसने अपनी ही कार को अकादेमी में पीछे के रास्ते से 20 हजार रुपये प्रति माह की दर से किराये पर लिया हुआ था। इस आदमी की साहित्यिक चोरी जो अब तक जग जाहिर हो चुकी है, क्या उस पर भारद्वाज की कभी एक शब्द भी लिखने की हिम्मत हुई या आज भी है? क्या भेड़ की खाल में भेड़िया नहीं गुर्रा रहा है!
अपने आप में यह आश्चर्य की बात है कि इन्हीं साहित्य के खेवनहार भारत भारद्वाज ने पिछले डेढ़ वर्ष से भी ज्यादा से लक्ष्मण सिंह बिष्ट बटरोही के खिलाफ एकतरफा आंदोलन चलाया हुआ है। समयांतर ने तो उस में हस्तक्षेप पहली बार इस वर्ष जनवरी में किया है। और जैसे ही समयांतर ने तथ्यों को सही ढंग से रखना शुरू किया उस पर जातिवाद का आरोप लगाया जाने लगा। क्यों? क्योंकि आरोप लगानेवालों के पास कोई उत्तर नहीं रह गया है। वह जानते हैं कि समयांतर ने ढोल की पोल खोल दी है। वैसे मजेदार यह है कि आरोप भी उनके द्वारा लगाए जा रहे हैं जो हर दूसरे अंक में अपना प्रचार करते हों, अपने भाई का प्रचार करते हों, अपने कुनबे का प्रचार करते हों और स्वयं जातिवाद के चलते पटना से दिल्ली होते हुए वर्धा तक पहुंचे हुए हों। वह सिद्ध करें कि हमने जातिवाद के चलते बटरोही का पक्ष लिया हो या किसी तरह का कोई लाभ उठाया हो! निश्चय ही वह हमारे प्रिय हैं पर उतने प्रिय तो आप भी हैं। जब जरूरत हुई है समयांतर ने बटरोही को भी नहीं बक्शा है, और जब जरूरत हुई तो उसने बटरोही का ही नहीं भारत भारद्वाज का भी पक्ष लिया है और भविष्य में भी उसकी नीति में कोई परिवर्तन नहीं होनेवाला है। हमें आशा है भारत भारद्वाज इस बात से परिचित होंगे कि समयांतर न तो डर कर और न ही स्वार्थवश अपना स्टैंड बदलता है।

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