दलित और बाल्मीकि समाज का सच
July 7th, 2010सुधांशु कुमार
दलितों के दलित (पे.बै.): हरकिशन संतोषी; सस्ता साहित्य मंडल; पृ: 339; मूल्यः 200
ISBN : 978.81.7309.341.8
भारतीय संविधान में आरक्षण की व्यवस्था इसलिए की गई ताकि सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक रूप से हाशिए पर पड़े दलित एवं पिछड़े समुदाय के लोगों का विकास हो सके तथा हाशिए पर पड़े ये लोग समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बन सकें। समाज से अस्पृश्यता का उन्मूलन हो एवं मानव तथा मानव के बीच का भेदभाव खत्म हो सके। आज जबकि हमारे गणतंत्र की आयु 60 साल से अधिक हो चली है क्या वास्तव में दलित तथा पिछड़े वर्ग की सभी जातियों ने आरक्षण का समान रूप से लाभ उठाया है? क्या इस समुदाय की सभी जातियों का विकास एक समान हो सका है? क्या छुआछूत की समस्या का अंत हो पाया है? क्या एक मनुष्य को मनुष्य होने के नाते मिलने वाले सभी प्रकार के सामाजिक, राजनैतिक अधिकार मिल पाए हैं? इन सभी सवालों का उत्तर नकारात्मक है। क्योंकि हुआ यह है कि आरक्षण का लाभ दलित वर्ग की उन जातियों ने ही उठाया जिनका स्थान समाज में पहले से ऊंचा था। बाल्मीकि, भंगी, डोम, आदि सफाईपेशा से जुड़ी जातियां आज भी अपने अधिकारों से वंचित हो, अस्पृश्यता तथा अपमान का दंश झेल रही हैं।
हरकिशन संतोषी ने ‘दलितों के दलित’ रचना के माध्यम से दलित समाज की ही एक जाति ‘बाल्मीकि’ की जीवन दशा का शोधपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया है। अपने अध्ययन के माध्यम से उन्होंने यह साबित किया है कि दलितों में भी जो अति दमित बाल्मीकि समाज है, उनके लिए अलग से कुछ किए जाने की जरूरत है। अगर अनुसूचित जाति के समुदायों का वर्ग क्रम निर्धारित करें तो जनसंख्या के आधार पर दूसरे स्थान पर बाल्मीकि समाज आता है। परंतु यदि सुविधाओं के आधार पर इसका स्थान निर्धारित किया जाए तो इस जाति का दलितों में वही स्थान है जो मनु की वर्णव्यवस्था में शूद्रों का था।
संतोषी जी आंखों में उंगली डालकर यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि किस प्रकार आजादी के 60 साल बाद भी देश एक तरफ जहां इक्कीसवीं सदी में छलांग लगाने की तैयारी कर रहा है, वहीं दूसरी ओर बाल्मीकि समुदाय कुत्तों से बदतर जीवन जीते हुए सर पर मैला ढोने को मजबूर है।
आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था से क्षुब्ध होते हुए संतोषी जी की यह प्रस्तावना है कि अगर दलित समुदाय की सभी जातियों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना है तो यह आवश्यक है कि दलितों में जो जातियां अभी भी सामाजिक स्तर पर काफी पीछे छूट गई हैं, उनके लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था करनी होगी। केवल इस काल्पनिक भय से कि इसमें दलितों का विभाजन होगा, जिससे वे सामाजिक संघर्ष में कमजोर पड़ जाएंगे, सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। ‘‘यों तो दलितों के विभिन्न वर्गों के मध्य दीवार खड़ा करना अथवा भिन्नता की रेखा खींचना जैसे कार्य फूट डालो राज्य करो वाला हो सकता है किंतु इस नीति को ध्यान में रखा जाए तो हम अपने गले नहीं झांक पाएंगे और वास्तविकता हमसे कोसों दूर होती चली जाएगी। अतः अब आत्मविवेचन और आत्ममनन का समय आ चुका है जो बड़ी मछली छोटी मछली को खा रही है उसे आगाह करना है उसके कारणों को ढूंढना है जिससे वास्तविक अधिकारी को अधिकार मिले।’’
सफाई पेशा से जुड़े बाल्मीकि समाज की स्थिति आज यह है कि उच्च वर्ग के लोग तो उन्हें अस्पृश्य समझते ही हैं, उच्च स्थान प्राप्त दलित भी उनसे छुआछूत का बर्ताव करते हैं। लेखक प्रश्न करता है कि ‘‘देश में ऐसी कौन सी जाति है जो बाल्मीकि समाज के प्रति अस्पृश्यता के व्यवहार की मानसिकता नहीं रखती है?’’
‘दलितों के दलित’ पुस्तक मोटे तौर पर दो भागों में विभक्त हैµप्रथम भाग में जहां बाल्मीकि समाज की उत्पत्ति, उसकी आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक दशा तथा उनके कारणों पर शोधपरक निबंध लिखे गए हैं, दूसरे भाग में बाल्मीकि समाज के उत्थान के लिए चलाई जा रही सरकारी योजनाओं एवं संस्थाओं का विस्तृत एवं शोधपरक विवरण प्रस्तुत किया गया है।
बाल्मीकि समाज की उत्पत्ति को हरकिशन जी ने राजपूतों से जोड़ा है। उन्होंने अपने शोध एवं गहन अध्ययन के आधार पर यह साबित करने का प्रयास किया है कि ‘बाल्मीकि समुदाय उन राजपूतों से बना है जो मुसलमानों से पराजित हुए हों एवं बंदी हो जाने के कारण उन्हें मलमूत्र साफ करने के लिए बाध्य कर दिया गया हो।’ हरकिशन जी ने अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए बाल्मीकियों की उपजातियां चैहान, चंदेल, चंदेलिया आदि की चर्चा की है जो आज भी राजपूतों का सरनेम है।
बबन रावत ने इनकी उत्पत्ति का संबंध गुप्तकालीन ग्रामीण मुखियाओं से जोड़ा है जो महतर कहलाते थे। ये महतर किसी कारणवश ब्राह्मणों का कोपभाजन बने और ब्राह्मणों ने उन्हें चंडाल घोषित कर दिया।
बाल्मीकि समुदाय की उत्पत्ति के संदर्भ में एक दिलचस्प, परंतु तर्क यह कि किस प्रकार साजिश के तहत हिंदू धर्म के संरक्षकों ने भंगी समुदाय को बाल्मीकि समाज से जोड़ा। दरअसल हिंदू धर्म से विक्षुब्ध इस समुदाय का पलायन रोकने के लिए हिंदू ऋषि-मुनियांे से उनका संबंध जोड़ने की साजिश रची गई और उन्हें आदि कवि बाल्मीकि के वंशज के रूप में प्रचारित किया गया।
बाल्मीकि समाज की आज जो दशा है उसके आधारभूत कारणों की खोज करते हुए इसके लिए समाज में व्याप्त जातीय विद्वेष, सरकारी स्तर पर सफाई कर्मचारियों के साथ की जाने वाली लूट-खसोट, अशिक्षा, समुदाय के लोगों का जादू-टोना में विश्वास, ऋण की समस्या आदि को जिम्मेदार ठहराया गया। आजादी के 60 साल बाद भी यह जाति ऋण में पैदा होती है, ऋण में जीवन यापन करती है और ऋण में ही मर जाती है।
दरअसल काम करने के लिए उपयुक्त संसाधनों के अभाव के कारण सीवर में इन सफाई कर्मियों की बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं पर उनकी यह मौत शहादत नहीं कहलाती। वह एक सामान्य मौत बनकर रह जाती है, जबकि ‘‘सफाई कर्मचारियों की सेवाएं किसी भी सैनिक की सेवाओं से कम महत्वपूर्ण नहीं। सैनिक देश की सीमाओं पर तैनात रहकर देश की रक्षा करता है जबकि सफाई कर्मचारी समाज को साफ-सुथरा व स्वच्छ रखकर हमारे स्वास्थ्य व जीवन की रक्षा करता है।’’
इस कृति का दूसरा उद्देश्य बाल्मीकि तथा अन्य दलित समुदाय तक विभिन्न प्रकार की जानकारियां पहुंचाकर उन्हें जागरूक करना भी है। कृति के दूसरे भाग में दलित / बाल्मीकि समुदाय के उत्थान से जुड़े आयोगों, अधिनियमों तथा संस्थाओं की विस्तृत जानकारी प्रस्तुत की गई है। संतोषी जी ने इसके अंतर्गत लोक आयुक्त, अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग, राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग, के संबंध में विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराई है। इसके अतिरिक्त ‘प्रथम सूचना रिपोर्ट कैसे लिखेें, पायलेट कैसे बनें तथा दलित नर्स किस प्रकार अमेरिका व ब्रिटेन में नौकरी पा सकती है इसका विस्तृत विवरण भी दिया गया है।
दरअसल यह कृति केवल बौद्धिक बहस उत्पन्न करने के लिए नहीं लिखी गई है बल्कि इसके माध्यम से संतोषी जी ने दलितों विशेषकर बाल्मीकि समुदाय को जागरूक करने तथा सूचना के इस युग में उन तक उनके विकास से संबंधित सभी जानकारी पहुंचाने के लिए भी लिखी है।
यद्यपि पुस्तक में बाल्मीकि समाज की दशा-दिशा पर शोधपूर्ण अध्ययन प्रस्तुत किया गया है परंतु, पुस्तक के पृथक-पृथक लेखों में तारतम्यता का अभाव दिखलाई पड़ता है। एक ही विषय पर कई लेखकों द्वारा लिखे लेखों के संकलन के कारण उनमें दुहराव की समस्या आन पड़ी है।
पुस्तक में योजनाबद्धता का अभाव दिखाई देता है। जिससे पढ़ने के क्रम में तारतम्यता का अभाव खटकता है। इन कमियों के बावजूद यह पुस्तक बाल्मीकि समाज की वर्तमान दशा एवं उसके आधारभूत कारणों की खोज में सफल रही है। हरकिशन संतोषी जी इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं।