भारत में विदेशी उच्चशिक्षण संस्थानों का औचित्य
July 7th, 2010फिलिप जी. आल्टबाख
भारत आखिरकार विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों और निवेश के लिए अपने दरवाजे खोलने के लिए तैयार हो चुका है। कैबिनेट ने मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल के प्रस्तावित विधेयक को मंजूरी दे दी है और जल्द ही संसद में इस पर वोटिंग हो सकती है। मोटे तौर पर सरकार इसके पक्ष में है। भारत में विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के लिए दरवाजे खुलने का भारत का अपने संस्थानों के लिए अर्थ क्या होगा? नतीजे अनुमान से कुछ कम ही नजर आते हैं, साथ ही क्रियान्वयन और परिणाम को लेकर भी समस्याएं पैदा होंगी।
राजनीतिक और शैक्षणिक संदर्भ
हर कोई इस बात को स्वीकार करता है कि भारत में उच्च शिक्षा गंभीर दिक्कतों से ग्रस्त है। भले ही 1.3 करोड़ छात्रों के साथ भारत का उच्च शिक्षण तंत्र दुनिया में आकार के हिसाब से तीसरे स्थान पर आता है, लेकिन इससे शिक्षित होने वाली इस आयु वर्ग की आबादी महज 12 फीसदी है, जो चीन के मामले में 27 फीसदी व मध्य आय वाले देशों के आधे या उससे ज्यादा से कहीं कम है। इस तरह लगातार बढ़ती भारतीय युवाओं और मध्य वर्ग की आबादी को उच्च शिक्षा तक पहुंच उपलब्ध करवाना एक बड़ी चुनौती है। भारत मेें गुणवत्ता को लेकर भी एक समस्या है क्योंकि उच्च शिक्षण तंत्र का एक छोटा सा तबका ही है जो अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरा उतरता है। आआईटी और आईआईएम समेत टाटा इंस्टिट्यूट आॅफ फंडामेंटल रिसर्च जैसे संस्थान छोटे से अभिजात्य तबके की जरूरतें पूरी करते हैं, यही हाल बिड़ला इंस्टिट्यूट आॅफ टेक्नोलाॅजी एंड साइंस जैसे एकाध निजी संस्थानों और सौ शीर्ष अंडरग्रेजुएट काॅलेजों का भी है। भारत के तकरीबन 480 सरकारी विश्वविद्यालय और 25,000 से ज्यादा अंडरग्रेजुएट काॅलेज अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से औसत हैं। आबादी के विभिन्न वंचित समूहों के लिए उच् शिक्षा में आरक्षण की जटिल कानूनी प्रणाली में अक्सर आधे से ज्यादा सीटें इन समूहों को चली जाती हैं जिससे इस तंत्र पर दबाव बढ़ जाता है।
क्षमता की समस्या
कई दशकों के दौरान निम्न निवेश के कारण भारत के उच्च शिक्षण संस्थानों में क्षमता की समस्या भी गंभीर है। आजादी के आधी सदी से ज्यादा वक्त बीतने के बाद भी एक-तिहाई से ज्यादा भारतीय अशिक्षित हैं। 1 अप्रैल को एक नया कानून आया जो प्राथमिक शिक्षा को मु्फ्त और अनिवार्य बनाता है। भले ही यह कदम सराहनीय हो, लेकिन ऐसा प्रशिक्षित शिक्षकों के अभाव, अपर्याप्त बजट, लचर निरीक्षण में किया जा रहा है। मंत्री कपिल सिब्बल उच्च शिक्षण प्रतिष्ठानों में भी बदलाव करने में लगे हुए हैं। विश्वविद्यालयों और तकनीकी संस्थानों के निरीक्षण के लिए जिम्मेदार विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और एआईसीटीई को समाप्त कर एक नई इकाई गठित की जा रही है जो दोनों के काम कर सके। कोई नहीं जानता कि यह नई इकाई कैसे काम करेगी और इसमें कौन कर्मचारी होंगे। भारतीय उच्च शिक्षण संस्थानों को मान्यता देने और गुणवत्ता सुनिश्चित करने वाले संगठन राष्ट्रीय मूल्यांकन और मान्यता परिषद में भी बदलाव किए जा रहे हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि इसे कैसे अंजाम दिया जाएगा।
ताजा योजनाओं के अंतर्गत नए राष्ट्रीय ‘‘विश्वस्तरीय’’ विश्वविद्यालयों को भारत के हर राज्य में खोले जाने, नए आईआईटी खोलने और अन्य पहलों की योजना शामिल है। अपर्याप्त अनुदानों और योग्य प्रोफेसरों की कमी के चलते लगता नहीं कि ये योजनाएं कामयाब हो पाएंगी। असल तथ्य यह है कि अकादमिक जगत में दिए जाने वाले वेतन भारत के निजी क्षेत्र और अंतरराष्ट्रीय मानकों के मुकाबले बहुत पीछे हैं। भारत के कुछ शीर्ष अकादमिक अमेरिका, ब्रिटेन और अन्य देशों में पढ़ा रहे हैं। यहां तक कि इथियोपिया और इरिट्रिया भी भारतीय अकादमिकों की भर्ती करते हैं। भारत के खुले द्वार की नीति पर इस क्षमता के अभाव का असर पड़ेगा। यदि भारत ने विदेशी संस्थानों के लिए अपने द्वार खोल भी दिए, तो वह उन्हें पर्याप्त रूप से नियामित नहीं कर पाएगा।
विदेशियों का स्वागत क्यों?
मंत्री सिब्बल ने भारतीय बाजार में विदेशी विश्वविद्यालयों को प्रवेश देने को लेकर कई लक्ष्य तय किए हैं। उम्मीद की जा रही है कि विदेशी उच्च शिक्षा प्रबंधन पर नई क्षमताएं और नए विचारों, पाठ्यक्रमों, शिक्षण विधियों व शोध को लाएंगे। माना जा रहा है कि वे निवेश भी लाएंगे। भारत के पोस्ट सेकंडरी व्यवस्था में शीर्ष विश्वविद्यालय प्रतिष्ठा को ही बढ़ाएंगे, ऐसा माना जा रहा है। इन सभी मान्यताओं पर कम से कम सवाल तो खड़े किए ही जा सकते हैं। दुनिया भर में विदेशी संस्थानों ने भले ही लोगों की शिक्षा तक पहुंच में बढ़ोतरी की हो, लेकिन इससे छात्रों की संख्या में कोई इजाफा नहीं हुआ है। तकरीबन सभी शाखाएं छोटी और विषयों के मामले में सीमित हैं। फारस की खाड़ी, वियतनाम और मलेशिया में, जहां विदेशी संस्थानों की शाखाएं काफी सक्रिय हैं, छात्रों की उन तक पहुंच पर बहुत मामूली फर्क पड़ा है। शाखा परिसर आम तौर पर छोटे होते हैं और इनमें तकरीबन उन्हीं विषयों की विशेषज्ञता होती है जो काफी महंगे होते हैं, जैसे बिजनेस, प्रौद्योगिकी और आतिथ्य प्रबंधन इत्यादि।
अकादमिक नवाचार के मामले में तो कुछ ही शाखा परिसर योगदान दे पाते हैं। वे आजमाए हुए ठस प्रबंधन, पाठ्यक्रम और शिक्षण विधियों का प्रयोग करते हैं। अपने मातृ विश्वविद्यालयों से इनकी स्वायत्तता बहुत कम होती है और इन्हें बाहर से ही नियंत्रित किया जाता है। भले भारत में इनके माध्यम से आने वाले कुछ विचार उपयोगी हों, लेकिन ज्यादा उम्मीद नहीं की जा सकती।
विदेशी सेवा प्रदाता उच्च शिक्षा में कुछ तो निवेश करेंगे ही, क्योंकि नए कानून के मुताबिक प्रवेश के लिए न्यूनतम 1.1 करोड़ डाॅलर के प्रवेश शुल्क की बाध्यता है। इसके बावजूद कुल राशि जो निवेश के रूप में आएगी, वह बहुत बड़ी नहीं होगी। अनुभव बताते हैं कि प्रायोजक विश्वविद्यालय अपनी शाखाओं पर बहुत खर्च नहीं करते, बल्कि प्रमुख निवेश मेजबान देशों से ही आता है जैसे कि तेल संपदा संपन्न खाड़ी के देशों से। यह संभव है कि विदेशी भारत में आने से पहले ‘‘पानी नाप लें’’ ताकि यह अंदाजा लग सके कि उनक पहल टिकाऊ होगी या नहीं, और इसीलिए वे अपने प्रारंभिक निवेश को सीमित रखना चाहते हैं।
वैश्विक अनुभव बताते हैं कि किसी विदेशी बाजार में प्रवेश करने वाले उच्च शिक्षण संस्थान प्रतिष्ठित विश्वद्यालय नहीं होते बल्कि दोयम दर्जे के संस्थान होते हैं जिन्हें सिर्फ नए बाजारों और आय की तलाश रहती है। मुनाफा कमाने वाला यह क्षेत्र वैश्विक विस्तार में दिलचस्पी रखता है। हो सकता है कि शीर्ष के संस्थान भारतीय संस्थानों के साथ गठजोड़ कर शोध/अध्ययन केंद्र आदि खोल लें, लेकिन संभावना कम ही नजर आती है कि वे अपने स्तर पर एक संपूर्ण शाखा यहां खोल सकेंगे। कुछ अपवाद भी हो सकते हैं, जैसे जाॅर्जिया इंस्टिट्यूट आॅफ टेक्नोलाॅजी, जो हैदराबाद में बड़े निवेश के बारे में सोच रही है।
कम से कम निकट भविष्य में और उसके बाद भी यह असंभव जान पड़ता है कि विदेशी पहलों से वह सब कुछ हो जाएगा जिसकी उम्मीद भारत सरकार को है।
दरवाजा आधा खुला
भारत में उच्च शिक्षा क्षेत्र को खोले जाने पर भी कई शर्तें और सीमाएं लागू हैं। बेहतर है कि इसे ‘‘अर्द्ध खुला द्वार’’ कहा जाए। इन वजहों से कई संस्थान भारत में आने से हिचकेंगे। प्रस्तावित विधेयक के अनुसार प्रवेश के लिए ही एकमुश्त 1.1 करोड़ डाॅलर की अदायगी का प्रावधान है। इसके अलावा विदेशी सेवा प्रदाता को भरतीय शाखा से कोई भी मनुाफा कमाने पर भी प्रतिबंध है।
यह साफ नहीं है कि किसी विदेशी संस्थान को यहां शाखा खोलने की मंजूरी दिए जाने से पहले उसका मूल्यांकन किया जाएगा अथवा नहीं- और यदि ऐसा होगा भी तो कौन करेगा। यह साफ नहीं है कि विदेशी संस्थानों को भारत के जटिल और विवादास्पक्ष आरक्षण प्रणाली के दायरे में लाया जाएगा या नहीं जिसके तहत आम तौर पर आधे से ज्यादा सीटों पर वंचित तबकों के छात्र आते हैं। यदि विदेशी संस्थानों को कम आय वाले परिवारों के छात्रें को प्रवेा देने के लिए बाध्य किया जाता है जो कि वहां की उच्च फीस न भर पाएं, तो शाखाओं की वित्तीय स्थिरता खतरे में पड़ सकती है और उन्हें चलाना तकरीबन असंभव हो जाएगा।
एक और जटिलता राज्य सरकारों द्वारा विदेशी शाखाओं के लिए अपने नियम-कायदे बनाने की स्थिति में पैदा हो सकती है। भारत में शिक्षा केंद्र ओर राज्य दोनों की संयुक्त जिम्मेदारी का विषय है- और कई राज्यों में उच्च शिक्षा पर नियमन बिल्कुल भिन्न हैं, खासकर विदेशी संस्थानों को लेकर। इसके उलट आंध्र और कर्नाटक जैसे राज्य इसमें ज्यादा दिलचस्पी लेते हैं। हो सकता है कि कम्युनिस्ट शासन वाले पश्चिम बंगाल में इसे शक की नजर देखा जाए। दूसरी ओर छत्तीसगढ़ जैसे राज्य भी हैं जिन्होंने सबसे ज्यादा बोली लगाने वाले संस्थानों को विश्वविद्यालय का दर्जा दिया है।
विदेशी संस्थानों को भारत की दुर्गम और भ्रष्ट अफसरशाही से भी निपटना होगा। मसलन, हालिया रिपोर्टें बताती हैं कि आवेदकों और उच्च सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से कुछ भारतीय संस्थानों को ‘‘मानद’’ विश्वविद्यालय का दर्जा दे दिया गया था। यह साफ नहीं है कि विदेशी शाखाओं का भारतीय अधिकारियों द्वारा कोई मूल्यांकन किया जाएगा अथवा नहीं या फिर विदेशी मान्यता प्रदाता एजेंसियों को इस काम में संलग्न किया जाएगा या नहीं।
संक्षेप में कहें तो कई ऐसे सवाल हैं जिनके जवाब खोजे जाने हैं, जैसे विदेशियों को भारत में कैसे प्रवेश मिलेगा, उनका प्रबंधन कैसे होगा और कौन इनके संबंधों को नियंत्रित करेगा।
संभावित परिदृश्य
भारत में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अभी बहुत कुछ किया जाना है। शिक्षण तंत्र के आधार के तौर पर ज्यादा पंजीकरण क्षमता के साथ-साथ अभिजात्य संस्थानों में शीर्ष पर ज्यादा लोगों को लिए जाने की देश को जरूरत है। व्यवस्थागत सुधार की यहां जरूरत है। इसके अलावा, विदेशी हवाओं का असर स्थानीय सोच को परिष्कृत करने पर भी पड़ सकता है। इसके बावजूद विदेशियों के लिए यह संभव नहीं जान पड़ता कि वे भारत के उच्च शिक्षण तंत्र को जरा-सा भी दुरुस्त कर पाएंगे, उसे हल करना तो दूर की बात है।
एक बार भारत के माहौल को भांपने के बाद विदेशी संस्थान अप्रत्याशित कदम उठा सकते हैं। हो सकता है कुछ यहां पानी नापने के लिए ही आएं। कई अन्य का शायद स्थानीय परिस्थितियों की अनिश्चितता और भारतीय शर्तों के चलते ही मोह भंग हो जाए।
कुल मिला कर कहा जा सकता है कि सिब्बल के आने से पहले विदेशी शिक्षण संस्थानों की भारत से संलग्नता जितनी संदिग्ध थी, वह आज भी बनी हुई है।
(फिलिप जी. आल्टबाख अमेरिका के बोस्टन काॅलेज में सेंटर फाॅर इंटरनेशनल हायर एजुकेशन के निदेशक हैं।)
अनुः अभिषेक श्रीवास्तव
साभारः द हिंदू