भगवान के फैलते बाजार में चंद सवाल
July 7th, 2010अभिषेक श्रीवास्तव
द गॉड मार्केट – हाउ ग्लोबलाइजेशन इज मेकिंग इंडिया मोर हिंदू: (अंग्रेजी) मीरा नंदा; रैंडम हाउस; मूल्यः रु. 395.00; पृ.: 240
ISBN 97881.84000.955
अगर समकालीन भारत में सांप्रदायिकता का इतिहास लिखा जाए, तो किन वर्षों को महत्वपूर्ण माना जाएगा? जाहिर तौर पर पहला जवाब 1992 ही होगा, जब दक्षिणपंथी ताकतों ने अयोध्या की बाबरी मस्जिद ढहाई थी। इस घटना से पहले भी भारत में राजनीति के दो वैचारिक ध्रुव हुआ करते थे, साथ में कांग्रेस पार्टी मध्यमार्गी विचारों की वाहक मानी जाती थी। लेकिन 1992 ने दक्षिणपंथी ताकतों की पहचान इस देश को करा दी और जनता का स्पष्ट विभाजन हिंदू और गैर-हिंदू नामक कोटियों में हो गया, जिसका नतीजा हमें इसके बाद 1996 में हुए लोकसभा चुनावों के परिणाम के रूप में देखने को मिला जब हिंदूवादी भारतीय जनता पार्टी केंद्र की सत्ता में आई। तब से लेकर इसके बाद के तकरीबन डेढ़ दशक तक भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल, दुर्गा वाहिनी आदि संगठनों को दक्षिणपंथी राजनीति का प्रतिनिधि माना जाता रहा। इस धारणा को अचानक अगर किसी वर्ष में चुनौती मिली, तो वह था 2008, जब मुंबई पर 26 नवंबर को हमला हुआ। बाबरी विध्वंस के सोलह साल बाद पहली बार भारतीय समाज का ‘हिंदू आतंकवाद’ की सर्वथा नई शब्दावली से परिचय हुआ। बताया गया कि मुंबई एटीएस के पूर्व प्रमुख हेमंत करकरे मालेगांव-मोडासा बम विस्फोट कांड में हिंदू संगठनों की संलिप्तता को सिद्ध करने के काफी करीब पहुंच चुके थे, जब 26/11 में उनकी जान गई। इसके बाद 2010 में सिलसिलेवार कुछ आतंकी घटनाओं में हिंदू संगठनों के हाथ होने के साक्ष्य पाए गए, जैसे अजमेर बम विस्फोट, समझौता एक्सप्रेस कांड, हैदराबाद का बम विस्फोट और गोवा में आतंकी हमला। महज 18 साल के भीतर अचानक भारतीय दक्षिणपंथ की सुई भाजपा, विहिप और आरएसएस से घूम कर सनातन संस्था नामक एक संगठन पर आ टिकी। इस तथ्य का अभी विश्लेषण होना बाकी है कि क्या ये नई सूचनाएं भारत में सांप्रदायिकता के इतिहास से कहीं जाकर जुड़ती हैं। इसके बावजूद एक बात तय है कि भारतीय राजनीति में प्रयोगों के दौर (यानी आपातकाल से लेकर तीसरे मोर्चे की सरकारों तक) तक और उसके बाद के डेढ़ दशकों तक दक्षिणपंथ का जो मुहावरा था, वह अब बदल चुका था। जो अतीत में दक्षिणपंथी माने जाते थे, उनसे कहीं ज्यादा ‘मिलिटेंट’ दक्षिणपंथी सामने आ चुके थे। इस लिहाज से 2010 आते-आते कांग्रेस और भाजपा व उसके अनुशंगी संगठन सांप्रदायिकता की तकरीबन एक ही जमीन पर खड़े थे, जो नए प्रकट दक्षिणपंथ के मुकाबले नरम और भुरभुरी थी।
ये बातें इसलिए और महत्वपूर्ण हो जाती हैं क्योंकि बाबरी विध्वंस एक ऐसे दौर में हुआ जब देश में ठीक एक वर्ष पूर्व निजीकरण-उदारीकरण और वैश्वीकरण के लिए दरवाजे खोल दिए गए थे। 1996 में सत्ता में आई भाजपा को वैश्विक राजनीति के दबावों के कारण इन्हीं रास्तों पर चलना था, और उसने बिल्कुल वैसा ही किया। नतीजा यह हुआ कि उसका और उसके अनुषंगी संगठनों का दक्षिणपंथी एजेंडा वैश्वीकरण की आंधी में पाश्र्व में चला गया। जैसे-जैसे वैश्वीकरण मुकम्मल आकार लेता गया, भारत विश्व ग्राम का हिस्सा बनता गया, भारत का ‘टिपिकल’ दक्षिणपंथ गठजोड़ की राजनीति और आर्थिक उदारीकरण के दबावों के चलते केंद्र की ओर आता गया। इस उदारीकृत वैश्वीकरण को लंबे समय बाद झटका लगा 2008 के सितंबर में, जब समूची दुनिया मंदी की चपेट में आ गई। यही वह दौर था जब भारत, अमेरिका के साथ परमाणु संधि कर रहा था। और ठीक इसी वक्त मुंबई पर हमला हुआ। यह समय था नव-उदारवाद के एक नए अध्याय के खुलने की जद्दोजहद का, जो वाॅल स्ट्रीट में जारी थी। और यही समय था भारत में दक्षिणपंथ के एक नए चेहरे के सामने आने का, जो हेमंत करकरे की फाइलों में पैबस्त था।
कहने का अर्थ यह है कि सांप्रदायिकता के समकालीन भारतीय इतिहास में जितना महत्वपूर्ण 1992 है, शायद उतना ही 2008 भी हो, गोया इस पर अभी काम नहीं हुआ है। दोनों ही चरणों में एक समानता हम यह देखते हैं कि दक्षिणपंथ के दो चेहरों का उभार मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के दो अध्यायों के उभार के समकालीन है। सवाल उठता है कि क्या मुक्त बाजार यानी वैश्वीकरण और दक्षिणपंथ यानी मोटे तौर पर सांप्रदायिकता में कोई संबंध है? अगर है, तो वह क्या है? समानुपाती? यानी बाजार जिस तरह मंदी के बाद और कट्टर होकर उभरने की राह पर है, क्या भारतीय सांप्रदायिकता भी उसी की लीक पर चल रही है? सतह पर तो ऐसा ही दिखता है।
इन जैसे कुछ सवालों को मीरा नंदा ने अपनी नई पुस्तक द गाॅड मार्केट में काफी गहराई से उठाया है। उन्होंने बेशक भारतीय दक्षिणपंथ के हाल में उजागर नए चेहरे पर कोई टिप्पणी न की हो, लेकिन भाजपा-आरएसएस-विहिप के नेतृत्व वाले ‘टिपिकल’ दक्षिणपंथ और वैश्वीकरण के बीच संबंधों का विषद विष्लेशण किया है और निष्कर्ष दिया है कि वैश्वीकरण भारत को और ज्यादा ‘हिंदू’ बना रहा है। वह कहती हैंः
‘‘यदि हम जरा व्यापक नजरिये से धार्मिक राष्ट्रवाद को देखें और उसे सिर्फ सांप्रदायिकता तक महदूद न रखें, तो तस्वीर कुछ और बनती है। अचानक वैश्वीकरण और उसके समानार्थी नवउदारवाद व आर्थिक नीतियां धार्मिक राष्ट्रवाद की दुश्मन नहीं, बल्कि सहयोगी नजर आने लगते हैं। वास्तव में, वैश्वीकरण हर जगह भगवानों के लिए अच्छा ही साबित हो रहा है और भारत से ज्यादा अन्य कहीं ऐसा नहीं है जहां इसे हम कह सकते हैं कि ‘राज्य-मंदिर-काॅरपोरेट प्रतिश्ठान’ का समर्थन प्राप्त है। यह एक नए किस्म की हिंदू धार्मिकता है जो निजी और सार्वजनिक दायरों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में ज्यादा से ज्यादा गहरे पैबस्त होती जा रही है। फिलहाल भले ही ऐसा लगता हो कि आर्थिक सम्पन्नता के उभार ने भारतीय मध्यवर्ग को हिंदू दक्षिणपंथियों के चरमपंथी तत्वों द्वारा प्रसारित मुस्लिम, इसाई और पब जाने वाले पश्चिमीकृत अभिजात्यों के प्रति विद्वेष से दूर कर दिया है, लेकिन इस उभरती संपन्नता ने निश्चित तौर पर भारतीयों को उन सूक्ष्म तरीकों के खिलाफ नहीं खड़ा किया है जिनके रास्ते हिंदूवाद ‘धर्मनिरपेक्ष’ भारतीय राज्य का स्वाभाविक धर्म बनता जा रहा है।’’
अपने निष्कर्षों को पुष्ट करने के लिए नंदा दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों शिक्षा और पर्यटन को लेती हैं, जहां धार्मिक राष्ट्रवाद का प्रवेष सबसे ज्यादा हुआ है। समूची पुस्तक में पाठक को जो साक्ष्य मिलते हैं, उनसे इनकार नहीं किया जा सकता। खासकर सिर्फ भारत के ही नहीं, बल्कि वैश्विक संदर्भ में भी नंदा ने वैश्वीकरण को धार्मिक राष्ट्रवाद का पोषक मानते हुए तमाम उदाहरण दिए हैं, जिनसे असहमति जताना मुश्किल जान पड़ता है। पुस्तक से कुछ संक्षिप्त उदाहरण निम्न हैंः
- योरोप के कई धर्मनिरपेक्ष देशों में पारंपरिक ईसाई मान्यताएं तेजी से उभार पर हैं। स्वीडन, हाॅलैंड, जर्मनी और ब्रिटेन में ईसाई धर्म प्रचारक ज्यादा समावेशी और सष्श्णिु हो रहे हैं। रोमन कैथोलिकवाद भी इमैनुएल समुदाय के माध्यम से अब 50 देषों में फैल चुका है, जिसका आरंभ फ्रांस में हुआ था।
- रूस में नए किस्म के धर्मगुरु सार्वजनिक स्वीकृति के साथ पैदा हो रहे हैं। रूसी आर्थोडाॅक्स चर्च अब राज्य का आध्यात्मिक औजार बन चुका है। यहोवा के गवाह, हरे कृष्ण और साइंटोलाॅजी जैसे नव-धार्मिक अभियान यहां जोर पकड़ रहे हैं।
- कभी नास्तिक रहा चीन अब दुनिया के सर्वाधिक धार्मिक देशों में गिना जा रहा है।
- आॅनलाइन धर्म का विस्तार।
- अमेरिका में 40 फीसदी वैज्ञानिकों और इनमें सात फीसदी प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने ईश्वर में आस्था जताई है। ब्रिटेन में यह आंकड़ा 20 फीसदी है।
- धार्मिक पुस्तकों को सही ठहराने के लिए विज्ञान का प्रयोग काफी जोर पकड़ चुका है। अमेरिका में एक नया चलन है ‘वैदिक रचना’ जिसके बचाव में हरे कृष्ण मूवमेंट और दीपक चोपड़ा जैसे लोग उतर गए हैं।
- इस्लामिक जगत में कुरान की शिक्षाओं में आधुनिक विज्ञान की जड़ें खोजी जा रही हैं।
इन तमाम उदाहरणों के बाद वह एक दिलचस्प सवाल उठाती हैं। वह कहती हैं कि ‘‘धर्म के इतने व्यापक उभार के बाद एक सवाल खड़ा होता है कि आखिर हम सभी कैसे इतना गलत हो सकते हैं?’’ हम सब यानी सामाजिक दर्शन के सभी विद्वान माक्र्स, वेबर, फ्राॅयड और नीत्शे आदि, जिन्होंने माना था कि भविष्य धर्मनिरपेक्षता का है और धर्म के दिन गिने-चुने ही बाकी हैं। क्लासिकीय सिद्धांतों में माना गया था कि औद्योगीकरण और मुक्त बाजार के दौर में इंसान की धार्मिकता कम होती जाएगी। इसके बाद नंदा सवाल उठाती हैं कि आखिर वह कौन-सी धर्मनिरपेक्षता थी जिसका इतना उत्सव मनाया जा रहा था? इसका जवाब आगे के अध्याय में उन्हें प्रसिद्ध विचारक बर्गर के सिद्धांत में मिलता है, जहां वह अपनी मूल प्रकृति में ‘नास्तिक’ भारतीय संविधान का जिक्र करते हुए कहती हैं, ‘विडंबना यह है कि धर्मनिरपेक्ष शिक्षा तक साथ ही साथ पहुंच को और लोकतांत्रिक बनाने के बजाय उच्च हिंदूवाद तक पहुंच को लोकतांत्रिक बना दिया गया, जिसने एक कम धर्मनिरपेक्ष नागरिक समाज को जन्म दिया।’ ’ इस तरह भारत द्वारा धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद को गले लगाने की सामाजिक गतिकी बर्गर के सिद्धांत को पुष्ट करती है, साथ ही बर्गर के मुताबिक इसने भारत में ‘चेतना का धर्मनिरपेक्षीकरण’ नहीं किया है।
यहां तक आते-आते लेखिका राजनीतिक प्रस्थान बिंदु से चल कर दार्शनिक व्याख्या में फंस जाती हैं। जो सवाल बहुत कायदे से पुस्तक की शुरुआत में उठाया गया था, उसके ठोस और तथ्यात्मक जवाब देने के बजाय दार्शनिक सिद्धांतों की आड़ में कुछ ऐसे सामान्यीकरण कर दिए जाते हैं, जो सुपाच्य नहीं। इस संदर्भ में इस पुस्तक पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी में विजय प्रशाद ने बहुत मार्के की बात कही हैः
‘‘लेखिका इस बात को भूल जाती हैं कि धर्मनिरपेक्षता दरअसल राज्य की अवस्थिति नहीं होती, बल्कि संघर्ष का एक बिंदु होता है- किसी जड़ सिद्धांत की तरह नहीं बल्कि एक गढ़े जाते सिद्धांत और एक व्यवहार में आने वाले आचार के जैसा। कांट की शब्दावली में भारतीय राज्य एक धर्मनिरपेक्ष राज्य नहीं है, लेकिन भारतीय समाज और राज्य के बीच अंतर्विरोध निश्चित तौर पर धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिकता के संघर्ष, आस्था और जीवन के संघर्घ से जाकर जुड़ता है। राज्य अब भी इस लिहाज से एक युद्धभूमि बना हुआ है, क्योंकि इसके संस्थानों ने पूरी तरह हिंदुत्व के लक्ष्य के सामने घुटने नहीं टेक दिए हैं।’’
विजय प्रशाद इस टिप्पणी से एक निष्कर्ष यही निकालते हैं कि दरअसल नव-हिंदूवाद ने उच्च उपभोक्तावादी समाज के साथ अपना सामंजस्य बैठा लिया है। और मीरा नंदा यहां तक ठीक हैं। लेकिन ‘‘उपभोक्तावादी किस्म के नव-हिंदूवाद और हिंदुत्व के बीच की दूरी अब भी बहुत ज्यादा है।’’ और यहीं मीरा नंदा सरलीकरण में फंस जाती हैं जिसके चलते ‘राज्य-मंदिर- काॅरपोरेट प्रतिष्ठान’ जैसी शब्दावली का प्रयोग पुस्तक में बार-बार करती हैं।
नंदा की यह पुस्तक बेहद पठनीय है। उन्होंने हिंदुत्व के ताजा संदर्भों को अगर लिया होता, तो निश्चित तौर पर उनके तर्क की दिशा कुछ अलग होती। एक बात समझने वाली है कि जिस नए किस्म के हिंदुत्व का उभार अजमेर, गोवा आदि बम कांडों की जांच में देखने में आया है, उसके पीछे खड़ी ताकतों को फिलहाल देश में खेलने के लिए खुला मैदान नहीं मिला हुआ है। जिन्हें मिला है, वे कब का नव-उदारवाद की भेंट चढ़ चुके हैं। यह बिल्कुल संभव है कि हिंदुत्व के नए संस्करण पुराने दक्षिणपंथी संगठनों की पैदाइश हों, लेकिन अब तक ऐसा कुछ सामने नहीं आया है। अगर ऐसा हो भी, तब भी तर्क की दिशा नहीं बदलेगी। ऐसा इसलिए क्योंकि संसदीय राजनीति के अपने अंतर्विरोध होते हैं। इन्हीं अंतर्विरोधों का नतीजा है कि मौजूदा कांग्रेस सरकार पर कोई दबाव नहीं है, इसके बावजूद न तो वह हिंदू आतंकियों का कुछ बिगाड़ पा रही है न ही नक्सलियों के खिलाफ कुछ ठोस कर पा रही है। यह आशावाद का एक बिंदु हो सकता है। हालांकि ऐसा आशावाद भी मीरा नंदा के यहां नहीं मिलता।
द गाॅड मार्केट का तर्क मूलतः दो छोरों पर खड़ा नजर आता है- पहला, जिसे हम आर्थिक नव-उदारवाद के दौर के हिंदुत्व या नए किस्म के धार्मिक राष्ट्रवाद को लेकर लेखिका की संघाती मानसिक अवस्था कह सकते हैं (एक किस्म का ‘सिजोफ्रेनिया’, जो सपने में भी गुजरात नरसंहार को ही देखता है, वरना राज्य-मंदिर-काॅरपोरेट के गठजोड़ की अवधारणा कोई अमेरिकी सैन्य-औद्योगिक गठजोड़ जैसी थोड़े ही है)। दूसरा छोर एक ऐसा आशावाद है जिसकी कोई ठोस जमीन नहीं। नंदा लिखती हैं, ‘‘हमें ज्यादा से ज्यादा ऐसी जगहें बनानी होंगी जहां हिंदू, मुस्लिम और अन्य सभी सहकर्मी, पड़ोसी और मित्र की तरह रह सकते हों।’’ सवाल उठता है कि इस वक्तव्य में ‘हम’ आखिर किसे संबोधित है – जब सामाजिक दायरे में लेखक के मुताबिक पूरी तरह हिंदूवादियों का ही कब्जा है (राज्य-मंदिर-काॅरपोरेट गठजोड़) और यह अंतर्विरोधों से मुक्त है, तो यह कार्यभार कैसे पूरा होगा? एक सुस्पष्ट ‘डायलेक्टिक्स’ के अभाव में इतने समृद्ध और गहन विश्लेषण के बावजूद धर्मनिरपेक्षता को राहत की गोली कहां से मिलेगी, पाठक इसी सवाल में अटका रह जाता है। यही पुस्तक की सीमा है और यही इस पुस्तक से आगे बढ़ने की प्रेरणा भी, लेखक और पाठक दोनों के लिए।