अपराध और दंड की राजनीति
July 7th, 2010पिछला महीना अजीब तरीके से तीन ऐसी घटनाओं के कारण चर्चा में रहा जिनमें फांसी यानी खून का बदला खून जैसे फैसले और मांग की अनुगूंज सुनाई देती रही। मुंबई हमले के डेढ़ वर्ष से भी कम समय में आया फैसला, जो भारतीय न्याय व्यवस्था की कछुआ गति को देखते हुए अपने आप में एक रिकार्ड है, कम से कम मोहम्मद अजमल कसाब के मामले में कुल मिला कर प्रत्याशित ही कहा जाएगा। हां, न्यायाधीश द्वारा फहीम अंसारी और सहाबुद्दीन को मुक्त किये जाने से यह जरूर हुआ है कि न्यायप्रणाली की विश्वसनीयता बनी रही है। इन दोनों भारतीय नागरिकों पर मुंबई हमले के षड्यंत्र में शामिल होने का आरोप था। इस फैसले ने यह भी बतला दिया कि हमारी जांच एजेंसियां किस तरह से अपनी सीमाएं लांघ कर आरोपों का जाल बिछाती हैं और अक्सर अपनी असफलताएं छिपाने या अतिरिक्त महत्वाकांक्षाओं के चलते बेकसूरों को फंसाने में लगी रहती हैं। पर यहां मसला कुछ और ही है।
निश्चय ही नंवबर, 2008 में मुंबई में जो हुआ और जिस में 166 आदमी मारे गए, वह सामान्य घटना नहीं थी। इसकी अपराधिकता की गंभीरता कुल मिला कर स्वयं सिद्ध है। पर जिस तरह से सारे मामले को पिछले डेढ़ वर्षों में हवा दी जाती रही है और नागरिकों में बदले की आग को भड़काया जाता रहा है, वह इस अपराध के अन्य आयामों की ओर तो इशारा करती ही है, अपनी विवेकहीनता के लिए भी बेचैन करनेवाली है।
अगर कोई समाज कुल मिला कर सिर्फ हिंसा और बदले की भावना से ही ग्रसित रहेगा तो निश्चित है कि वह न तो विवेक का इस्तेमाल करेगा और न ही कभी यह जानने की कोशिश करेगा कि आखिर किसी भी दौर में अपराध होते क्यों हैं? यह इसलिए चिंता की बात है कि तब ऐसा समाज अपने नागरिकों की अंतर्निहित मानवीयता पर विश्वास करने, उनकी सीमाओं को समझने, उनके सही और गलत के विवेक और समझदारी को विकसित करने, एक बेहतर, अपराधविहीन, न्यायिक, सभ्य और संवेदनशील समाज बनाने का प्रयत्न करने की जगह, कानून के आतंक से नागरिकों पर नकेल लगाने पर तुला रहेगा, जो उसके लिए आसान और सुविधाजनक भी है। ऐसी प्रवृत्तियां किसी भी समाज और व्यवस्था को आसानी से तानाशाही और एकाधिकारवाद की ओर ले जा सकती हैं क्यों कि यह मानसिकता कभी भी उन आधारभूत कारणों को जांचने, विश्लेषण करने और फिर उनका निवारण करने की कोशिश ही नहीं करेगी जो मूलतः समाज में ऐसे विकारों को जन्म देने के लिए जिम्मेदार होती हैं। ऐसा समाज अक्सर तार्किकता में नहीं बल्कि एकआयामिता में जीता है। इसलिए इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि इस समय हमारे सामने का अपराधी एक विदेशी नागरिक है। सोच की यह प्रक्रिया – हिंसा, आक्रामकता, बदला – जिस नागरिक को प्रभावित करती है वह तो हमारे समाज का ही हिस्सा होता है जिसमें अंततः हमें रहना है। कुल मिला कर समझने की बात यह है कि समाज और व्यक्ति के बीच अंतर होता है। अपराधी या विपथगामी व्यक्ति को समाज के समकक्ष रख कर नहीं आंका जा सकता या जांचा जाना चाहिए। समाज सामूहिक ज्ञान, समझ और विवेक का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए अपनी सोच में दूरगामी और उदार होता है। पर अगर कोई समाज सिर्फ खून का बदला खून जैसे तर्क या कुतर्क पर चलेगा तो अंततः वह स्वयं अपने अंदर बहुत सारे खूनी पैदा करेगा, बल्कि कहना चाहिए सिर्फ खूनी पैदा करेगा, इसे भुलाया नहीं जाना चाहिए। हमारे समाज में वैसे ही इस तरह के न्याय की मांग और अभिव्यक्ति कोई अनोखी बात नहीं है। फिर चाहे वह जाति पंचायतों के तौर पर हो या फिर स्वयंभू नैतिकता के ठेकेदारों द्वारा आॅनर किलिंग के तौर पर। पर दिक्कत यह है कि एक समाज के तौर पर हम अक्सर अपराधियों के निर्माण में अपनी भूमिका को भूल जाते हैं और स्याह और सफेद में फैसला देने और उसे कार्यान्वित करने में लग जाते हैं।
जन अपराध और कसाब
दुनिया का अनुभव है कि न तो मृत्युदंडों से हत्याओं को खत्म किया जा सकता है और न ही किया जा सकेगा। अगर कसाब के ही मामले को लें तो हमें भूलना नहीं चाहिए कि वह भारत आया ही सिर्फ शहीद होने के लिए था इसलिए उसे मृत्युदंड देना कुल मिला कर उस मंशा को पूरा कर देना है जो उसे उसके आकाओं ने पढ़ाई थी। यह मृत्युदंड भविष्य के अन्य फिदायीनों को भी नहीं रोक पायेगा क्यों कि अंततः कसाब का अपराध सामान्य अपराध न होकर अंध धार्मिकता और अंध राष्ट्रवाद के खतरनाक तत्वों के मिश्रण से बना है। कसाब नहीं और भी न जाने कितने कसाब रोज इसका शिकार हो रहे हैं। पर कसाब को मृत्युदंड न देना धर्म के उस छल को ही ध्वस्त कर देना है जो उस परलोक जहां स्वर्ग है के नाम पर लोगों को ठगता है। जबकि इस स्वर्ग के समानांतर हम उसे जो देंगे वह साक्षात नर्क ही होगा। सोचने की बात है कि इन में कौन-सा दंड बड़ा साबित होगा?
पर इस कांड के और भी आयाम हैं। जैसे कि कसाब के इस अपराध को भारतीय राजसत्ता और राष्ट्र के खिलाफ किया गया ‘जन अपराध’ कहा गया है। जैसा कि एक प्रसिद्ध अंग्रेजी साप्ताहिक इकानामिक एंड पोलिटिकल वीकली ने अपने संपादकीय में लिखा है, हमें भूलना नहीं चाहिए कि इस तरह का यह ‘जन अपराध’ अपने आप में अकेला नहीं है। 1984 के सिख दंगे, 1990 की आडवाणी की रथ यात्रा के दौरान हुई हिंसा और फिर 1992 की बाबरी मस्जिद के बाद की हिंसा व अंततः 2002 के गुजरात दंगे जिनमें से हर दंगों में मुंबई हमले से कई गुना ज्यादा लोग मारे गए, क्या कम बड़े जन अपराध थे? इनका एक भी अपराधी आज तक दंडित नहीं हुआ है। क्या यह हमारी न्याय प्रणाली की साख में बट्टा नहीं है जो उसकी विश्वसनीयता को घटाता है? 26 वर्ष बाद भी सिख दंगों के मामले जहां के तहां हैं, 20 वर्ष बाद भी न्यायपालिका को बाबरी मस्जिद के संदर्भ में आडवाणी और उनके साथियों की भूमिका तय करनी बाकी है, गुजरात दंगों को तो अभी सिर्फ आठ ही वर्ष हुए हैं, इसलिए उस पर कुछ कहने का समय शायद नहीं आया है। देखने की बात यह है कि जहां मुंबई आक्रमण में अपराधियों की संख्या मुट्ठी भर थी वहीं अन्य दंगों में आपराधिक भागीदारी कई गुना बड़ी और गंभीर थी। उन में राजनेता और वह नौकरशाही शामिल थी जिसकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी अपने नागरिकों की रक्षा करना है। मुंबई में तो साफ है कि विदेशी (पाकिस्तानी) लोग शामिल थे।
निश्चय ही कसाब विदेशी है पर इससे उसके अपराध के सामाजिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक कारणों को क्या नजरंदाज किया जा सकता है या किया जाना चाहिए? कसाब मात्र भारत पर ही हमला नहीं करने आया था बल्कि वह शहीद होने आया था एक ऐसे मुल्क को तबाह करने के बाद जो उसकी नजरों में काफिरों का देश है और जिसके बाशिंदे या कम से कम शासक उसके धर्म और मुल्क के दुश्मन हैं। यहां यह बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है कि अंततः हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच घृणा और संदेह के ऐतिहासिक कारणों को आज भी सुलझाया नहीं जा सका है। और इसके पीछे दोनों ओर के राजनीतिक निहितार्थ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कसाब एक ऐतिहासिक गलती की देन है जो राजनीतिक कारणों से बरकरार रखी जा रही है।
कसाब कुल 23 वर्ष का है। यानी वह उन जिहादियों की गिरफ्त में जब आया होगा तो 17-18 वर्ष से क्या ही ज्यादा होगा। वह एक गरीब परिवार में पैदा हुआ है। समझा जा सकता है कि आर्थिक कारणों की मजबूरी ने उसे धार्मिक कट्टरपंथियों की ओर आकर्षित किया होगा और फिर राष्ट्रवाद व धार्मिकता के संहारक घोल ने उसे जिहादी में बदल दिया। कसाब में और जम्मू और कश्मीर में घुसपैठ करनेवालों के बीच यही अंतर है कि उसने मुंबई पर हमला करने की हिम्मत दिखलाई थी। सब कुछ के बावजूद क्या यह स्पष्ट नहीं है कि वह कुल मिला कर एक मोहरा ही है।
अफजल गुरू का मामला
अफजल गुरू को पहले ही मौत की सजा सुनाई जा चुकी है और वह पिछले कई वर्षों से फांसी का फंदा उसके सर पर झूल रहा है। उसकी माफी की अर्जी अटकी हुई है जिस पर फैसला नहीं लिया जा रहा है। अफजल का मामला बहुचर्चित है और मूलतः इस बात से जुड़ा है कि वह कश्मीर में भारत को एक आक्रामक के रूप में देखता है इसलिए उसे उखाड़ फेंकना चाहता है। या कम से कम उस पर ऐसा आरोप है। इस संदर्भ में अफजल गुरू की वकील नंदिता हक्सर ने मई के अंत में मेनस्ट्रीम साप्ताहिक में प्रकाशित लेख में स्पष्ट कहा है कि ‘‘हमने अफजल के पक्ष में जो अभियान चलाया उसका कारण यह था कि उसे न्याय नहीं मिला। उसे अपनी बात कहने का मौका ही नहीं मिला। और यह अकेला तथ्य इस बात को स्पष्ट कर देता है कि उसकी मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया जाए।’’ हक्सर ने अपनी बात के पक्ष में कई तर्क दिए हैं। साथ ही यह भी बतलाया है कि किस तरह से अफजल को दी जानेवाली फांसी के कारण कश्मीर में बेचैनी है। यानी उसको फांसी वहां की स्थिति को विस्फोटक बना देगी।
नृशंषता की कहानी
मौत की तीसरी सजा इसी माह के शुरू में एक और व्यक्ति को मिली जिस पर दिल्ली से लगे नोएडा के इलाके में कई बच्चों की निर्मम हत्याओं का अपराध है। वह है सुरेंद्र कोली। इस मामले में जिस तरह से हत्याएं की गईं वे लोमहर्षक हैं जिन्हें नृशंषता की हद कहा जा सकता है। पर यहां भी कुल मिला कर यह सवाल नहीं पूछा गया है कि आखिर कोली इस हद तक निर्मम और आततायी कैसे बना?
उत्तराखंड के एक दलित परिवार का कोली पंजाब के एक समृद्ध किसान पंढेर का घरेलू नौकर था। उसे कुल दो हजार रुपये महीना मिलते थे। सुरेंद्र एक अत्यंत गरीब परिवार से आता है। गांव में उसके माता-पिता, पत्नी और दो छोटे बच्चे हैं। वह स्वयं 30-32 के आसपास का है।
सवाल यह है कि ऐसा व्यक्ति जो पहाड़ी सरल जीवन का हिस्सा रहा हो पर गरीबी के कारण किशोरावस्था में ही घर से निकल कर आजीविका के लिए मैदानों में पहुंचा हो और इस उम्र में भी कुल दो हजार रुपये महीने ही पाता हो, आखिर इस तरह का दानव कैसे बना और निकृष्टतम यौन विकृतियों (परवर्शन) का शिकार हो कैसे गया? जैसा कि कहा गया है कि उसने यौनाचार के बाद एक नहीं कई बच्चों के खून किए तो भी यह सवाल है कि अगर वह पंढेर की कोठी में नहीं होता तो क्या एक ही खून के बावजूद भी बच पाता? सच्चाई यह है कि इस तरह की यौन विकृतियां सामान्य जीवन जीनेवाले आदमियों में संभव नहीं हैं। अगर कोई ऐसा करता है तो निश्चय ही उसके जीवन में कहीं कोई गंभीर विचलन है जिसे समझा और देखा जाना चाहिए। आखिर किसी ने क्यों कोली का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण कराने की कोशिश नहीं की?
विडंबना यह है कि जिस कोठी में रह कर कोली ने ये सारे अपराध किए बताए जाते हैं उनका मालिक इस बिना पर छूट रहा है कि वह उस दिन कहीं और किसी वेश्या के साथ था? सच यह है कि यह कोठी पंढेर की अय्यासी का अड्डा थी। पर कोली को एक के बाद एक दो मौत की सजाएं सुनाई जा चुकी हैं और उसका यही मालिक हर सजा से छूटता जा रहा हो, क्या कहीं यह न्याय व्यवस्था में कुछ गड़बड़ी की ओर इशारा नहीं करता? कोली की दुर्दशा का आलाम यह है कि उसके परिवारवालों के द्वारा कानूनी तौर पर उसे बचाया जा सकना तो रहा दूर वे उस मौके पर भी आर्थिक कारणों से उससे मिलने आने की स्थिति में नहीं थे जब कि उसे मौत की सजा सुनाई जा रही थी। यह असंभव नहीं है कि सुरेंद्र से मिलने उसके परिवार का एक भी व्यक्ति इन पिछले वर्षों में, जब से वह जेल में है, आ पाया हो। विडंबना का एक और पक्ष यह है कि कोली के पक्ष में जो वकील है वह पंढेर ने ही किया हुआ है। आखिर ऐसा व्यक्ति कोली को क्यों बचाएगा यह सोचने की बात है? क्या राज्य की यह जिम्मेदारी नहीं थी कि वह कोली को वकील मुहैया करवाये? कहां है वह सिविक सोसाइटी और स्वयंसेवी संस्थाएं जो अन्यथा हर मुद्दे पर सक्रिय नजर आती हैं?
फांसी की राजनीति
सवाल है इस व्यक्ति को फांसी चढ़ा कर समाज क्या हासिल करेगा? क्या गरीबी और असहायता इसी तरह के अन्य सुरेंद्र कोलियों का निर्माण नहीं कर रही होगी? सच यह है कि इस मामले पर जिस तरह की चर्चा की जरूरत थी वैसी चर्चा न तो मीडिया में हुई और न ही हमारे समाज में। असल में हमारे समाज में फांसी की भी अपनी ही राजनीति है। रिकार्ड बतलाता है कि जिन लोगों को भी फांसी दी गई वे गरीब और असहाय लोग ही थे। फांसी दिए जाने का सबसे नया मामला बंगाल के एक लिफ्टमैन था। शायद ही कोई मध्यवर्ग तक के आदमी को फांसी दी गई हो। इसे देखते हुए कहा जा सकता है कि सुरेंद्र कोली फांसी पर चढ़ाए जाने का प्रबल उम्मीदवार है।
फांसी की यह राजनीति किस तरह से सामने आती है उसका उदाहरण कसाब ओर अफजल गुरू हैं। जहां तक कसाब का सवाल है उसे फांसी चढ़ाए जाने में जितना हित भाजपा का है उतना ही हित कांग्रेस का भी है, इसलिए दोनों ही चाहते हैं कि एक आक्रामक को जितनी जल्दी हो सके फांसी पर लटका दिया जाए और देश प्रेम का तगमा हमारी छाती पर टंगे। दूसरी ओर है अफजल गुरू का मामला। जहां तक भाजपा का सवाल है उसे अफजल को फांसी पर लटकाने की मांग करने में सारे राजनीतिक लाभ नजर आ रहे हैं, पर कांग्रेस के लिए इसे लेकर संकट है। स्वयं भाजपा ने जब वह सत्ता में थी अफजल को फांसी पर नहीं चढ़ाया क्योंकि तब उसे अगला चुनाव लड़ना था, जो आसन्न था और उस फांसी का बुरा असर सिर्फ कश्मीर में अव्यवस्था के रूप में ही नहीं पड़ता बल्कि उसकी छवि और भी ज्यादा मुस्लिम विरोधी के रूप में सारे देश में फैलती और वोटों के बड़े पैमाने पर कांग्रेस के पक्ष में ध्रुवीकरण की संभावना रहती। अब कांग्रेस की समझ में नहीं आ रहा है कि वह अफजल को कैसे फांसी पर चढ़ाये? अगर वह उसे माफ करती है तो हिंदू वोटों के उसके खिलाफ जाने की संभावना रहेगी क्योंकि भाजपा इस बात को जितना हो सके भुनाएगी और अगर माफ न करके फांसी चढ़ाती है तो निश्चित है कि कश्मीर में खासा तनाव पैदा होगा और शेष भारत में भी मुस्लिम वोट उसके खिलाफ, कुछ अंशों तक ही सही, पर जाएगा जरूर। इसलिए लगता नहीं है कि सारे हो-हल्ले के बावजूद अफजल गुरू को फांसी लग पाएगी।
क्या इससे स्पष्ट नहीं हो जाता कि फांसी अपने आप में एक राजनीतिक मोहरा है जिसका इस्तेमाल सरकार यानी सत्ताधारी वर्ग अपनी सुविधा के अनुसार करता है। इसका औचित्य समाज को बदलने और अपराध रोकने में इतना नहीं है। पर इस संदर्भ में अफजल गुरू को फांसी दिए जाने पर मुहर लगाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने जो बात कही वह सारी स्थिति का सार है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहाः ‘‘उस घटना (संसद पर हमले की) ने, जिसके कारण बहुत सारी जानें गईं, पूरे देश को हिला दिया था और समाज की सामूहिक भावना (कलक्टिव कांशेंस) तभी संतुष्ट होगी जब अपराधी को मृत्युदंड दिया जाएगा।’’
क्या दंड समाज की ‘सामूहिक भावना’ को संतुष्ट करने के लिए होते हैं या अपराध को रोकने के लिए? क्या हम अपनी मध्ययुगीन मानसिकता से आगे नहीं बढ़ पाये हैं?
प्रश्न कठिन नहीं है, पर इसका जवाब जरूर कठिन है।