अखबार और पुरस्कारों का सच

July 7th, 2010

नवीन पाठक

हमारे अखबार तथाकथित बड़े-बड़े अखबार अक्सर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न जाने किन-किन मूल्यों की बात करते नहीं थकते हैं, हिंदी अखबार भी इसमें अपवाद नहीं है। दिल्ली हिंदी अकादमी के पुरस्कार समारोह को इन अखबारों ने किस तरह से देखा?
हिंदी अखबारों में अगर आपने उस दिन का जनसत्ता नहीं पढ़ा होगा तो आपको अंदाजा ही नहीं लगेगा कि दिल्ली हिंदी अकादमी के पुरस्कारों को लेकर कहीं किसी किस्म का कोई विवाद जैसी चीज भी है।
12 मई को जनसत्ता की संक्षिप्त-सी रिपोर्ट में सभी पक्ष थे। पुरस्कार दिए जाने के और वहां न पहुंचनेवालों के भी। अखबार ने यह आब्जेक्टिविटी अकादेमी से संबंधित अन्य समाचारों के दौरान आगे भी दिखलाई। यानी यह भी छपा कि लीलाधर मंडलोई ने पुरस्कार अपने दफ्तर में दो दिन बाद लिया। अन्य अखबारों ने छोटी-मोटी खबर छाप कर इतिश्री की। पर असली काम किया हिंदुस्तान और नई दुनिया ने। हिंदुस्तान में सिर्फ सम्मान दिए जाने का समाचार था। यानी कहीं कोई असहमति या विरोध जैसी बात के जिक्र ब्लैक आउट था। वह भी तब जब कि अकादमी का सबसे बड़ा पुरस्कार शलाका ही लेने से मना कर दिया गया था। ऐसा क्यों कर हुआ? क्या इसलिए कि हिंदुस्तान के संपादक से हिंदी अकादमी के उपाध्यक्ष की निकटता है।
जहां तक नई दुनिया का सवाल है उसने तो बाकायदा पूरी बेशर्मी से पिछले एक साल से अकादमी और उसके उपाध्यक्ष अशोक चक्रधर के पक्ष में सारे घोड़े खोले हुए हैं। उसके लिए लेखक का सम्मान, प्रतिष्ठा, वरिष्ठता या गुणवत्ता जैसा कोई सवाल होता ही नहीं है। यह वह अखबार है जिसका संपादक लेखक होने का दावा करता है और जहां दो और चर्चित – विष्णु नागर और मधुसूदन आनंद – कहानीकार और कवि भी वरिष्ठ पदों पर काम करते हैं। पूरी रिपोर्टिंग में इस तरह का पक्षपात शायद ही और कहीं देखने को मिले। अखबार ने पहले पुरस्कार समारोह की रिर्पोटिंग जितने धूम-धाम से की वह अपने आप में एक रिकार्ड है। पहले पेज पर दो चित्र छापे और छापा संक्षिप्त समाचार। पर अगला पेज हिंदी अकादेमी के पुरस्कारों से रंगा हुआ था और आधे पेज पर फैले इस समाचार में साथ थे नौ चित्र। ऐसा उसने केंद्रीय साहित्य अकादेमी के पुरस्कार समारोह के दौरान भी नहीं किया। लेकिन यह कहीं नहीं छापा कि शलाका सम्मान के कवि के अलावा छह अन्य लोग भी पुरस्कार लेने नहीं पहुंचे। प्रश्न है क्या यह इतनी महत्वहीन घटना थी कि इसका संदर्भ ही न दिया जाए! यह वह घटना थी जिसके कारण पिछले दो वर्षों के शलाका सम्मान समय पर नहीं दिए जा सके। दूसरा, क्या साहित्य को इतना ‘महत्व’ देने (या अवमूल्यन करने) का यह काम स्वतः हो गया था? सच यह है कि यह सब जानबूझकर किया गया था। और निश्चय ही ऊपर से मिले आदेश के अनुसार हुआ था यानी संपादक के निर्देश पर। इसके बाद इन अखबारों की विश्वसनीयता क्या रह जाती है? यह भी अजब संयोग है कि इस घटना के ठीक 12 दिन बाद इसी अखबार में असग़र वजाहत ने अपने लेख ‘सांस्कृतिक पतन के पचास साल’ के पहला ही वाक्य में मार्के की बात कहीः ‘‘सार्वजनिक तरीके से हमारे देश में जितना झूठ बोला जाता है उतना संसार के शायद ही किसी देश में बोला जाता हो।’’ यह क्या कम बड़ा झूठ था जिसे पत्रकारिता की आड़ में अंजाम दिया गया? वजाहत हिंदी के उन विरल लेखकों में से हैं जिन्होंने दुनिया घूमी है, उनकी बात पर विश्वास न करने का कोई कारण नहीं है।
साफ है कि नई दुनिया के इस उत्साह (सच को छिपाने) के पीछे मात्र साहित्य नहीं था। अगर ऐसा होता तो भी यह स्वीकार्य होता। यह इसलिए हुआ था क्योंकि अकादेमी ने आलोक मेहता को पिछले ही महीने अपनी कार्यपरिषद का सदस्य बनाया है। और आलोक मेहता इस तरह से दिल्ली अकादमी और उसके उपाध्यक्ष के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे। कल्पना की जा सकती है कि जिन अखबार के संपादक इतने छोटे लालचों या संबंधों के चलते अपनी पेशेवर और सामाजिक जिम्मेदारी को इस कदर ताक पर रख सकते हैं वे बड़े लालचों के लिए क्या नहीं कर सकते हैं और करते होंगे! यह अचानक नहीं है कि अधिकांश हिंदी संपादकों की छवि न तो अच्छे पत्रकारों की है और न ही ईमानदार आदमियों की। निश्चय ही यह हरकत हिंदी पत्रकारों की विश्वसनीयता और प्रोफेशनलिज्म के ताबूत में एक और लंबी कील साबित होगी।
दो अंग्रेजी अखबार जिन्होंने इस पुरस्कार को प्रमुखता से कवर किया उनमें द हिंदू और इंडियन एक्सप्रेस थे। विशेष कर इंडियन एक्सप्रेस ने दिल्ली हिंदी अकादमी और सरकार की खासी खबर ली। इस अंक में विशेष तौर पर अलग से दिए जा रहे लेख के लेखक आशुतोष भारद्वाज इंडियन एक्सप्रेस के ही संवाददाता हैं।

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