अदूरदर्शिता की नीति
November 17th, 2009सरकार द्वारा इस माह से नक्लवादियों के खिलाफ किए जानेवाले सैनिक अभियान को लेकर कई तरह की चिंताएं सामने आ रही हैं। इस में सबसे बड़ी चिंता इनके दूरगामी घातक परिणामों को लेकर है। लगता है गृहमंत्री चिदंबरम कश्मीर या पूर्वोत्तार में उग्रवाद की समस्या और नक्सली उग्रवाद को एक ही पैमाने पर रख कर तौल रहे हैं। जबकि ये दोनो ही समस्याएं एक दूसरे से भिन्न हैं इसलिए पूरी तरह से भिन्न तरीके इनका सामना करने के लिए अपनाये जाने की जरूरत है। वैसे भी अब तक के अनुभव बतलाते हैं कि सिर्फ सैनिक बल से समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
जहां तक नक्सली समस्या का सवाल है उस संदर्भ में सबसे बड़ी बात यह है कि यह समस्या किसी एक क्षेत्र या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। यह सही है कि इसका बड़ा हिस्सा उन राज्यों में है – पश्चिम बंगला, उड़ीसा, छत्तीसगढ़ और झारखंड – जहां कि आज सबसे ज्यादा खनिज संपदा है और जहां के निवासी आदिवासी हैं। फिलहाल यह समस्या इन क्षेत्रों में उग्र नजर आ रही है तो इसका कारण साफ तौर पर वह विस्थापन और शोषण है जिसका सामना आदिवासी जनता सदियों से करती चली आई है और जो अब नवउदावाद के दौर में अपने चरम पर पहुंच गई है। हमें भूलना नहीं चाहिए कि आदिवासियों ने ब्रिटिश औपनिवेशिक सत्ता का भी अंतत: हिंसक विरोध किया था और इसका कारण मूलत: वही था यानी उनको दरकिनार कर उनके जीवन यापन के साधनों का विनाश और उनकी जमीन का अधिग्रहण, जो आज चरम पर है। इस बीच सिर्फ छत्तीसगढ़ से जो रिपोर्टें आ रही हैं उनके अनुसार 2005 से अब तक सात सौ गांवों को खाली करा कर साढ़े तीन लाख लोग उजाड़े जा चुके हैं। पर इसके साथ ही देश के विभिन्न भागों में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो भुखमरी के कगार पर है और जिसके अस्तित्व को नवउदारवादी नीतियों ने और कठिन कर दिया है। वैसे भी भूमि पर पूंजीवादी विकास के मॉडल का दबाव देशव्यापी है और इससे जुड़े तनाव को जगह-जगह देखा जा सकता है। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरे देश में फैला यह वर्ग वह संभावित और वास्तविक वर्ग है जो माओवाद को कभी भी स्वीकार सकता है और कर रहा है। इसलिए यह मानना तथाकथित रेड कॉरीडोर में माओवादियों का सफाया कर देने से समस्या का समाधान हो जाएगा, कोई बहुत सही धारणा नहीं कही जा सकती है।
इस सैन्य कार्यवाही से, जैसा कि कुछ विश्लेषकों का कहना है, अब तक जो माओवादी हिंसा कुछ क्षेत्रों में सीमित थी उसके पूरे देश में फैलने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। देश पहले ही कश्मीर से लेकर पूर्वोत्तर में कई तरह की हिंसक विद्रोही गतिविधियों का समाना कर रहा है। माओवादियों के खिलाफ इस सैनिक कार्यवाही से एक नया मोर्चा और खुल जाएगा। यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि इससे देश की अर्थव्यवस्था को तो नुक्सान पहुंचेगा ही उसकी स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी।
इसलिए बेहतर यह है कि सरकार मानवतावादी व सिविक संगठनों की बातों पर गंभीरता से विचार कर अपनी रणनीति में परिवर्तन करे। उसे यही नहीं कि बातचीत का रास्ता अपनाना चाहिए बल्कि नवउदारवादी आर्थिक नीतियों को अंधाधुंध लागू करने की जगह ऐसी नीतियों को अपनाना चाहिए जिनसे विकास के लाभ में सब लोगों की हिस्सेदारी हो सके, चाहे इससे विकास की दर कुछ समय तक मंद ही क्यों न रहे। मानवतावादी संगठनों का यह आरोप कि सलवा जुडुम जैसी कार्यवाहियां मूलत: आदिवासियों के दमन और विस्थापन का काम कर रही हैं जिससे कि इस जमीन को विशाल राष्ट्रीय और बहुराष्ट्रीय कंपनियों को सौंपा जा सके, बहुत गलत प्रतीत नहीं होता है। अकेले झारखंड सरकार ने ही 102 एमओयू पर दस्तखत किए हुए हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि आदिवासियों को शासकों पर विश्वास ही नहीं रहा है और यह सैनिक कार्यवाही उसे और मजबूत ही करेगी। सरकार पर पहले ही आरोप लग रहे हैं कि वह बड़ी कंपनियों के लिए जमीन खाली कराने की मंशा से यह युद्ध की स्थिति पैदा करने पर उतारू है इसलिए सरकार को यह समझ लेना चाहिए कि जैसे-जैसे सैनिक कार्यवाही का चक्का तेज होगा उसी तेजी से वह अपनी विश्वसनीयता और जन समर्थन खोती जाएगी क्योंकि यह निश्चित है कि इससे जो खून-खराबा होगा, उसमें अधिसंख्य मासूम आदिवासियों की ही जानें जाएंगी और अदिवासियों का अलगाव और बढ़ेगा।
फिलहाल सर्वोपरी यह है कि सरकार आदिवासियों का विश्वास जीतने की कोशिश करे। इसके लिए जरूरी है कि उनकी परंपराओं और मान्यताओं का ख्याल रख कर उन्हें अपना विकास स्वयं करने का मौका दिया जाए और उन्हें मुख्यधारा में लोकतांत्रिक तरीके से लाने की प्रक्रिया तेज की जाए। यानी विकास की नीतियों में उनकी भागीदारी को बढ़ाया जाए। उन्हें यह लगना चाहिए कि उनकी समस्याओं को सुननेवाले सिर्फ माओवादी ही नहीं बल्कि सत्ता भी है जो फिलहाल पूरी तरह से उनके खिलाफ नजर आ रही है।