लेखक का जीवन और पत्नी का दर्द
November 16th, 2009दिल्ली मेल
‘हुस्न बानो’ पुष्पा भारती इधर बहुत नाराज हैं। उनकी इस नाराजगी को मंच दिया है दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान ने जहां उनके एक के बाद एक दो लेख मन्नू भंडारी की ऐसी की तैसी करते हुए 7 व 8 अक्टूबर को छपे हैं। हिंदुस्तान के नये संपादक की एक विधवा के दुख को मंच देने की यह उदारता निश्चय ही प्रशंसनीय है। यह भी तब जब कि इसी वर्ष बिड़ला फाउंडेशन ने इस किताब पर मन्नू जी को ढाई लाख के व्यास पुरस्कार से सम्मानित किया है। इसलिए यह मानना पड़ेगा कि पुष्पा जी के हाथ खासे लंबे हैं। संपादक महोदय ने आसानी से साहित्य के लिए इतनी सारी जगह नहीं दी होगी, फिर चाहे विवाद कितना भी सनसनीखेज क्यों न हो (वैसे भी साहित्य में सनसनी की संभावना सदा ही नहीं के बराबर रहती है)।
किस्सा यह है कि मन्नू भंडारी की आत्मकथा एक कहानी यह भी में आपात काल के जिक्र के दौरान लिखा गया है कि धर्मवीर भारती ने भोपाल के मनोहर आशी की इंदिरा गांधी पर बनाई फिल्म सूर्य के अंश की काव्यमय कमेंट्री लिखी थी। इसकी पुष्टि पंकज बिष्ट ने की। पंकज बिष्ट का का कहना यह है कि आपातकाल के बाद समयांतर के दो अंक निकाले गए थे। पहले अंक में, जो कि 1978 में प्रकाशित हुआ था, आपातकाल के दौरान हिंदी अंग्रेजी लेखकों-पत्रकारों की भूमिका पर चाटुकारिता की कला शीर्षक से एक लेख छापा था। उसी में धर्मवीर भारती का संदर्भ भी है। लेख में अब बंद हो चुकी मासिक पत्रिका, माया के हवाले से यह बात लिखी गई थी। 1977 में माया ने अपना रूप बदला था और वह कहानियों की पत्रिका से राजनीति की पत्रिका हो गई थी। समयांतर में जो पंक्तियां उद्धृत की गई थीं वे इस प्रकार थीं:
^^सूर्य के अंश वृत्त चित्र के निर्माता भोपाल के मनोहर आशी नामक व्यक्ति थे। इस चित्रा को सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया था। इस चित्र की काव्यमय कमेंट्री डा. धर्मवीर भारती ने लिखी है और चित्र की क्रेडिट लाईन में उनका नाम भी है। कविता व चित्र का मुख्य विषय था – आज देश में हड़तालों, प्रदर्शनों, अव्यवस्था, मंहगाई, बेकारी आदि के दलदल में प्रगति के सूर्य का रथ फंस गया है, जिसे सूर्य के अंश ही अपनी रश्मियों से दलदल सुखा कर निकाल सकते हैं और सूर्स के अंश इंदिरा गांधी व संजय को बताया गया था।” माया, नवंबर, 1977
पुष्पा भारती ने पंकज बिष्ट से भी इस संबंध में संपर्क किया था। उन्होंने पुष्पा जी को भी वे अंश पढ़कर सुना दिए थे। इसके अलावा मनोहर आशी ने भी पुष्पा भारती के दबाव में बिष्ट से संपर्क किया था। उन्हें भी बिष्ट ने स्थिति से अवगत करवा दिया था। यहां तक कि आशी को समयांतर के 1979 में प्रकाशित लेख की फोटोकापी भी भिजवा दी गई थी। आश्चर्य की बात यह है कि फिल्मकार के पास भी फिल्म की अब कोई प्रति नहीं है। लगता यह है कि फिल्म को सूचना प्रसारण मंत्रालय, जिसका कार्यभार उन दिनों मध्य प्रदेश के ही वह विद्याचरण शुक्ल संभाले थे जिन्होंने अपनी चाटुकारिता और अनियमितताओं के रिकार्ड स्थापित किए, के फिल्म्स डिविजन ने वह फिल्म खरीद ली पर दिखलाए जाने से पहले ही आपात काल समाप्त हो गया और फिल्म डंप कर दी गई। अब उसका कोई अतापता नहीं है।
सब जानते हैं कि माया तब अत्यंत लोकप्रिय पत्रिका थी और वह कम से कम एक लाख छपती थी। उन दिनों तक धर्मवीर भारती धर्मयुग का संपादन कर रहे थे। उनका देहांत कई वर्ष बाद हुआ। क्या यह संभव है कि धर्मवीर भारती ने इसे देखा न हो? या उन्हें इसके बारे में उनके किसी प्रशंसक या मित्र ने न बतलाया हो, विशेष कर तब जब कि माया इलाहाबाद के प्रकाशन गृह मित्र प्रकाशन की पत्रिका थी जिससे भैरव प्रसाद गुप्त, अमरकांत, सतीश जमाली आदि कई लोग समय-समय पर जुड़े रहे थे? क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि इसके बावजूद उन्होंने माया के इस आरोप का तब खंडन नहीं किया जब कि यह उनकी छवि को कई गुना ज्यादा नुकसान पहुंचा रहा था और जिसे बचाने की उन्हें बहुत ज्यादा जरूरत थी। यहां यह बतला देना जरूरी होगा कि भारती ने उन्हीं दिनों एक ही अंक में दो ऐसे कवियों की भूमिगत (आपात काल विरोधी) कविताएं छापी थीं जिनका गला आपात काल के दौरान बीस सूत्री कार्यक्रम की प्रशंसा करते-करते बैठ नहीं रहा था। यह ठीक है कि इस आपातकाल से पहले उन्होंने जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के पक्ष में ‘मुनादी’ नाम की लंबी कविता लिख कर धर्मयुग में ही छपवा दी थी पर उससे पहले धर्मयुग गांधी-नेहरू परिवार की प्रशंसा में कितने लेख छाप चुका था क्या यह उस दौरा के लोग नहीं जानते? राजीव गांधी के विवाह का जो चित्रात्मक विवरण धर्मयुग में छपा था – मेंहदी लगाने से लेकर घोड़ी चढ़ने तक – उसे पढ़ कर समझदार लोग तभी त्राहि-त्राहि करने लगे थे। अब वह कह रही हैं कि जिस कविता को फिल्म में इस्तेमाल किया गया है उसका नाम असल में ‘सूर्योदय का गीत है’ और यह पूरी कविता देशांतर में छपी थी जो कि मूलत: ग्रीक कवि एंजेलो सिकिलियानो की थी। सवाल यह है कि तब मनोहर आशी की फिल्म के संदर्भ में भारती का नाम आया कैसे? और फिल्म का नाम ‘सूर्य के अंश’ कैसे पड़ा। अगर ऐसा ही था तो क्या यह संभव नहीं है कि भारती जानते बूझते चुप रहे हों?
पर पुष्पा भारती की मासूमियत देखने लायक है। उनके लेख का पहला ही वाक्य है: ”इधर (धर्मवीर) भारती जी के निजी जीवन तथा कार्यालयीन व्यवहार को लेकर निहायत बेतुकी और विद्वेषपूर्ण बातें आत्मकथा लेखन के बहाने से लिखी गई हैं।” निश्चय ही उनका इशारा मन्नू भंडारी के अलावा कन्हैयालाल नंदन की धर्मयुग के अपने कार्यकाल के संस्मरणों की किताब ‘…कहना जरूरी था की ओर है। इस किताब में नंदन ने धर्मवीर भारती को निहायत ही षड़यंत्रकारी और सैडिस्ट (परपीड़क) संपादक के रूप में चित्रित किया है जो अपने मातहतों को एक दूसरे से लड़वाता रहता था और उन्हें एक दूसरे के खिलाफ निकालने के लिए इस्तेमाल करता था। अगर नंदन की मानें तो रवींद्र कालिया ने धर्मयुग इसलिए छोड़ा कि भारती कालिया के माध्यम से नंदन को धर्मयुग से बाहर कर देना चाहते थे।
चलो माना कि ये किताबें भारती जी के देहांत के बाद आई हैं इसलिए इन की विश्वसनीयता कुछ अंशों तक संदिग्ध मानी जा सकती है। पर लगता है पुष्पा जी यह भूल गई हैं कि कालिया ने ‘काला रजिस्टर’ भारती के जीवन काल में ही लिख दिया था जो भारती की ही करतूतों का चिट्ठा है।
इसके अलावा एक किताब उस दौरान और भी छपी जो भारती की परित्यक्ता स्व. कांता भारती (बाद में पंत) ने लिखी थी। यह उपन्यास रूप में भारती के साथ गुजारे उनके दांपत्य जीवन का हाल है। उपन्यास का नाम है रेत की मछली। शीर्षक ही बतला देता है कि लेखिका ने क्या लिखा होगा!
अब पुष्पा जी कहती हैं कि छात्रों को लेखकों के बारे में सही जानकारी दी जानी चाहिए। जिसका अप्रत्यक्ष मतलब यह है कि उसकी सिर्फ अच्छी-अच्छी बातें ही बतलाई जानी चाहिए। फिर बड़ा लेखक अपने जीवन में भी सिर्फ बड़ा ही होता है। यानी वह अवतार होता है जो कोई गलती ही नहीं करता। पर सवाल यह है कि यह छात्रों की बात आई ही क्यों? क्यों कि एक कहानी यह भी एनएनडीटी विश्वविद्यालय के पाठयक्रम में लगाई गई है और वहां पुष्पा जी सुना है धर्मवीर भारती की कविताएं पढ़ कर अपनी साहित्यिक प्रतिभा को सिद्ध करती हैं। उन्होंने पहले यही कोशिश की थी कि विश्वविद्यालय इस किताब को लगाए ही नहीं। पर जब यह नहीं हो सकता तो उन्होंने आगे का संघर्ष किया। इससे यह जरूर हुआ है कि नयी पीढ़ी जो धर्मवीर भारती को उनकी कनुप्रिया o अंधायुग जैसी रचनाओं के कारण जानती थी उसे उनके अन्य पक्षों को भी जानने का मौका मिल गया। प्रश्न यह है कि अगर छात्रों को तथ्यों से ही परिचित करवाया जाऐ तो लेखकों और कलाकारों की सिर्फ अच्छाईयों से ही क्यों परिचित करवाया जाए? वे यह क्यों न जाने कि अंतत: हम सब आदमी हैं जिसमें कई तरह की कमजोरियां होती हैं। हमारी कोशिश अपने निजी जीवन में भी बेहतर आदमी बनने की होनी चाहिए। *
- दरबारी लाल