हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और

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सरकार ने गत वर्ष आठ नवंबर को, विमुद्रीकरण या नोटबंदी के नाम पर, जिस आर्थिक संकट को यह कहते हुए देश पर थोपा था कि कि इससे एक महीने के अंदर कालेधन का सफाया हो जाएगा और उसके बाद बहार ही बहार है, वह संकट आज तीन महीने बाद किस तरह गहरा गया है इसे समझने के लिए अर्थशास्त्री होने की जरूरत नहीं है। यह दीगर बात है कि सरकार उसे मानने को तैयार नहीं है और न ही शहरी मध्यवर्ग का बड़ा हिस्सा जो अभी भी मोदी से – आधा समय निकल जाने के बावजूद- चमत्कार की उम्मीद में बैठा है। पर ऐसा भी नहीं है कि मोदी या सरकार डरी हुई न हो। ऐसा न होता तो उसे उत्तर प्रदेश के चुनावों के लिए फिर से राम की शरण में न जाना पड़ ता और स्वयं को अन्य दलों से अलग बतलाने के उसके वे सारे दावे एक के बाद एक सूखी पपडिय़ों की तरह आदर्श के महल की दीवारों से एक के बाद एक इतनी तेती से गिर नहीं रहे होते। इन्हीं आदर्शों की आड़ में वह कांग्रेस और समाजवादी पार्टी पर जम कर कीचड़ उछालने का काम किया करती थी। उदाहरण के लिए परिवारवाद से बचना या फिर दल बदलुओं को बढ़ावा न देना।
पर असली मुद्दा अभी भी कुछ और है। वह है काले धन को समाप्त करने का। नरेंद्र मोदी ने पणजी में 28 जनवरी को दिए अपने भाषण में कहा है कि वह ”भ्रष्टाचार व काले धन को मिटाने के लिए निकट भविष्य में कड़े कदम उठाने से झिझकेंगे नहीं।‘’ इस चेतावनी (?)से उनका क्या तात्पर्य हो सकता है? क्या यह सिर्फ वोट लेने यानी जनता को भरमाने के लिए है, जिसके वह जादूगर हैं? अगर ऐसा है तो बात दूसरी बात है। निश्चय ही मोदी भक्त, जिनकी संख्या को सोशल मीडिया से नापा जा सकता है, इसे ब्रह्मवाक्य ही मानेंगे, इसलिए इस पर बात कर ली जानी चाहिए।
पर मोदी देश में भ्रष्टाचार को लेकर कितने चिंतित रहते हैं यह उनके भाषण बतलाते ही रहते हैं। इस तरह कह सकते हैं, पहला सवाल देश और समाज के सामने भ्रष्टाचार का है। लेकिन यहां उस पर बात करने का हमारा इरादा नहीं है। कम से कम उस सरकार के संदर्भ में, जिसके दो मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रों को लेकर ही गंभीर शंकाएं हों या फिर उसके पिछले ढाई वर्षों के कार्यकाल में ईमानदारों की जो गति हुई है उसका उदाहरण संजय चतुर्वेदी और अशोक खेमका जैसे केंद्रीय सरकार के ईमानदार अधिकारी हैं। दूसरी ओर इसी दौर में किस तरह के लोगों का उत्थान हो रहा है उसका उदाहरण दो-दो राज्यों के राज्यपाल पद की गरिमा बढ़ाने वाले ब्रह्मचारी आरएसएस केसमर्पित कार्यकर्ता रहे षणमुगनाथन जी हैं। लगता है भाजपा ने नारायणदत्त तिवारी को बुढ़ापे में मिले पुत्र समेत यों ही गले नहीं लगाया है। न जाने और कितने राज्यपालों ने उनसे गुप्त सबक लिया हुआ है और कब कौन कहां अपनी राजकीय निष्क्रियता में क्या करता नजर आ जाए, इसके लिए कांग्रेस युग का एक मानक तो होना ही चाहिए!
चूंकि काले धन का मामला विवाह और विवाहेत्तर संबंधों जितना व्यक्तिगत नहीं है – गोकि विवाह एक सामाजिक संस्था है और कम से कम हिंदू धर्म की सबसे पवित्र संस्थाओं में से एक है और इस बात की पुष्टि 22 जनवरी के एक फैसले में दिल्ली उच्च न्यायालय ने कही है। उसके अनुसार हिंदी विवाह एक पवित्र संबंध है न कि समाजिक अनुबंध, इसलिए कम से कम भारतीय संस्कृति और परंपरा की दुहाई देने वाले उसे निजी मामला कहकर दरकिनार नहीं कर सकते; ऊपर से उसके साथ कानूनी बाध्यता भी जुड़ी है। – जो भी हो, इससे यह तो स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री के लिए आर्थिक भ्रष्टाचार ही सर्वोपरी है। इसलिए हमारा भी आग्रह न तो सामाजिक बाध्यताओं पर है और न ही संस्कृति और परंपराओं पर।
इसमें शंका नहीं कि देश में पिछले लगभग चार दशकों में भ्रष्टाचार के आकार ने दानवीय रूप ले लिया है। इसका व्यापक प्रभाव सबसे पहले नौवें दशक में सामने आया था और राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। मसला था बोफोर्स तोप की दलाली का। वह दलाली बाद की दलालियों के सामने ऊंटे के मुंह में जीरे का फंका जैसी कही जा सकती है। असल में शासक दलों द्वारा जायज-नाजायज तरीके से पैसे जमा करने के पीछे जो बड़ा कारण है, वह छिपा नहीं है। उसका संबंध हमारी संसदीय चुनाव व्यवस्था से है। आजादी से अब तक हर अगला चुनाव पिछले से महंगा होता गया है परिणामस्वरूप राजनीतिक दलों तथा उम्मीदवारों के लिए पैसे जमा करना एक बड़ी मजबूरी बनता गया है। हथियारों की खरीद की दलाली, कॉरपोरेटों को दी जाने वाली सुविधाएं, प्राकृतिक संसाधनों की लूट, इन सब का संबंध महंगे होते चुनाव ही हैं।
इस महंगाई का संबंध एक और कारण से भी रहा है और वह है उदारीकरण। यह कोई इत्तफाक नहीं है कि उदारीकरण की शुरुआत का भी यही दौर था। इसने संसाधनों की लूट की प्रतिद्वंद्विता को गलाकाट बनाया और तब उद्यमियों को ऐसे शासकों की जरूरत पडऩे लगी जो उनके हितों का ध्यान रख सकें। इस प्रवृत्ति को हम आज बजरी, पत्थर तक के लिए देश के कोने-कोने में होने वाली छीना झपटी में देख सकते हैं। यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि कई बड़े पूंजीपतियों के विधान सभाओं से लेकर संसद तक में प्रतिनिधि हैं। स्थिति यहां तक है कि इनमें से कई इन उद्योगपतियों के पहले मुलाजिम भी रह चुके हैं। अब तो खैर सरकारें बनाने और बिगाडऩे में उन की महत्त्वपूर्ण भूमिका हो चुकी है, ठीक अमेरिकी लोकतंत्र की तरह जहां अभी-अभी एक ऐसे राष्ट्रपति ने शपथ ली है जिसे दुनिया के सबसे ताकतवर आदमी बनाने में उसी पूंजी ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बल्कि माना तो यहां तक जाता है कि वर्तमान सरकार के पीछे भी पुराने नए खरबपतियों, जिनकी संख्या में इस दौर में सबसे ज्यादा इजाफा हुआ है, की भूमिका रही है।
स्पष्ट है कि अगर इस देश को भ्रष्टाचार और काले धन से मुक्त करना है तो सबसे पहला व जरूरी कदम चुनाव से जुड़े भ्रष्टाचार को खत्म करना है। चुनाव और राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे और कालेधन की भूमिका को समझने के लिए गत माह तीसरे सप्ताह में जारी एसोशिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स (लोकतांत्रिक अधिकारों का संगठन-एडीआर) द्वारा जारी रिपोर्ट महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती है।
चंदे का और सत्ता का क्या संबंध है यह इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि इन 11 वर्षों के दौरान कांग्रेस लगभग दस और भाजपा सिर्फ दो वर्ष ही सत्ता में रही। उसे देखते हुए भाजपा को मिलने वाली राशि को कम कर के नहीं आंका जा सकता। पर यह भी ध्यान रखा जाना जरूरी है कि वह इससे पहले लगभग पांच वर्ष सत्ता में रह चुकी थी।
रिर्पोट के अनुसार 2004 से 2015 तक के 11 वर्षों में राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले चंदे की कुल राशि का दो तिहाई अज्ञात स्रोतों से मिला था। इस का अर्थ हुआ कि इस दौरान पार्टियों को मिले चंदे कुल चंदे रु. 11,367.34 करोड़ में से रु. 7832.98 करोड़ अज्ञात स्रोतों से थे। कांग्रेस को मिलने वाले कुल चंदे में से अज्ञात स्रोतों से मिलने वाली राशि का हिस्सा जहां 83 प्रतिशत था, भाजपा के चंदे में इसका प्रतिशत 65 रहा।
जन प्रतिनिधित्व कानून (रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पिपुल एक्ट) के तहत 20 हजार रुपए चंदे तक की राशि का स्रोत बतलाना जरूरी नहीं है। इस नियम का किस तरह से दुरुपयोग होता है उसका उदाहरण बहुजन समाज पार्टी है। पिछले 11 वर्षों में इस पार्टी को 764 करोड़ चंदे में मिले पर इसने एक भी चंदा देने वाले का नाम नहीं बतलाया।
चुनाव आयोग चाहता है कि चंदे की रु. दो हजार से ऊपर की राशि के सभी चंदों को घोषित किया जाए। एडीआर की मांग है कि सारे चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक किए जाएं। उसकी यह भी मांग है कि राजनीतिक पार्टियां सूचना के अधिकार आरटीआई के अंतर्गत लाई जाएं। यह बतलाने की जरूरत नहीं है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने वालों में कौन हैं और क्यों राजनीतिक दल इन लोगों के नामों को छिपाए रखना चाहते हैं। पर वह प्रधानमंत्री जो कालेधन और भ्रष्टाचार को स्वयं को घोषित विरोधी बतलाता है क्या वह इस बीमारी को खत्म करने की दिशा में कदम उठाएगा? क्या बेहतर यह नहीं होता कि वर्तमान सरकार ने अपने ढाई वर्ष के कार्यकाल में यह आवश्यक काम अब तक कर दिया होता।
पर हाथी के दांत खाने और दिखाने के अलग-अलग होते हैं। सच तो यह है कि 2013-14 के वित्तीय वर्ष में यानी चुनावों से ठीक पहले भाजपा को कॉरपोरेट कंपनियों की ओर से 83.19 करोड़ था जो कांग्रेस, एनसीपी, सीपीआई और सीपीएम को मिले कुल चंदा से दो गुनी से जयादा थी। उस वर्ष कांग्रेस को कंपनियों ने सिर्फ 11.72 करोड़ रुपए ही दिए थे। हमें भूलना नहीं चाहिए कि नरेंद्र मोदी विश्वनाथ प्रताप सिंह और मनमोहन सिंह से कुछ ज्यादा ही उदारीकरण के समर्थक हैं। उन्होंने गुजरात में अपने मुख्यमंत्रित्व के कार्यकाल में वाइब्रेंट गुजरात के माध्यम से राज्य के संसाधनों की बोली लगाई थी और बड़े-बड़े कारपोरेट घरानों ने उसे लपका था। इस दौरान राज्य में विकास के नाम पर जो पर्यावरण का विनाश हुआ है उसकी अलग ही कहानी है।
इधर उन्होंने फिर से चुनावी सुधारों के चुनाव आयोग के प्रस्ताव का समर्थन किया है और कहा है कि उनकी ”सरकार हर उस निर्णय का समर्थन करने के लिए प्रतिबद्ध है जो जनता के हित में है।‘’ पर सवाल है आखिर वह क्या है जो प्रधानमंत्री को चुनावी सुधार करने से रोक रहा है। यह वायदा तो उनकी पार्टी ने चुनावों के दौरान भी किया था। इसलिए अगर जनता के हितों को ही देखा जाना था तो पहले चुनावी सुधार किए जाने चाहिए थे जो आज देश में भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी जड़ बन चुके हैं। पर उन्होंने किया क्या? नोटबंदी और पूरे देश को लाइन में लगा दिया, सिवा कॉरपोरेटों और नेताओं के। जैसे जैसे देश में कॉरपोरेशनों का प्रभव बढ़ रहा है, भारतीय समाज पर कई खतरे एक साथ मंडरा रहे हैं। पहला है असमानता का और दूसरा है चुनावों का पूरी तरह कॉरपोरेशनों के कब्जे में आ जाना। यानी अगर चुनावों में पैसे का प्रभाव इसी तरह बेरोक टोक बढ़ता गया तो इस देश की भविष्य की सरकारों का कॉरपोरेशनों द्वारा कॉरपोरेशनों के लिए हो जाना तय है। 

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