‘समर्थकों’ का यथार्थ

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लेखक-कलाकार 

भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार ने लगता है इस वर्ष के शुरू में दिल्ली और अब बिहार की हार के बावजूद अपनी आक्रामकता के दुष्परिणामों से सबक नहीं सीखा है। भाजपा लगातार देश की सांस्कृतिक, अकादमिक और बौद्धिक संस्थाओं की संविधान सम्मत नीतियों को हर हालत में अपनी संकीर्ण हिंदुत्ववादी महत्वाकांक्षाओं के अनुरूप बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। यह छिपा नहीं है कि भाजपा ने अपने डेढ़ वर्ष के शासन में जिस तरह से अपने समर्थकों को बिना उनकी योग्यता को ध्यान में रखे विभिन्न संस्थानों में बैठाया है उसका सबसे भ्रष्ट उदाहरण फिल्म संस्थान पुणे (एफटीआईआई) है जहां उन्होंने अध्यक्ष पद पर ऐसे व्यक्ति को बैठा दिया है जो किसी भी हालत में इस के योग्य नहीं है। कमोबेश यही हाल सेंसर बोर्ड का है जिसके मोदी सरकार नियुक्त अध्यक्ष पहलाज निहलाणी के करतब अपना ही रंग दिखा रहे हैं। उन्होंने इधर मेरा देश है महान, मेरा देश है जवान नाम का जो वीडियो नरेंद्र मोदी की प्रशंसा में बनाया है उसमें मास्को के बिजनेस सेंटर, दुबाई के एक्सप्रेस वे और अमेरिकी स्पेस सेंटर के दृश्य उड़ाकरलगा दिए हैं। जब उनसे पूछा गया उन्होंने ऐसा क्यों किया तो पहलाज जी ने इसे ‘प्रधानमंत्री मोदी का सपनाÓ बतला कर सही ठहराया। इससे सकरार की जो किरकिरी हो रही है सुना है उससे सूचना प्रसारण मंत्रालय तक खफा है। बोर्ड के अन्य सदस्यों ने उनके खिलाफ लगभग विद्रोह कर दिया है। लगता हैइससे पहले कि वह अपने प्रिय नेता की आन में कोई और करतब करें उन्हें बाहर का रास्ता दिखलाने की तैयारी हो रही है।
पर यह सब जो हो रहा है उससे भाजपा के नौकरशाही, शिक्षा और अन्य बौद्धिक संस्थाओं के भगवाकरण करने के निर्णय में कोई कमी नहीं आई है। बड़े पैमाने पर अपने आदमियों को योग्य उम्मीदवारों की कीमत पर सरकारी नौकरियों में जिस तरह से चिपकाया जा रहा है उसका ताजा उदाहरण सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक काकोडकर और स्मृत्ति ईरानी विवाद है। यही नहीं दिल्ली विश्वविद्यालय है जहां इस बीच कई वर्षों से रुकी व्याख्याताओं की भर्ती चल रही है एक भी उम्मीदवार अपनी योग्यता पर नहीं लिया गया है और लगता है अगले साढ़े तीन साल और नहीं लिया जाएगा। इसका जो संदेश आम आदमी तक जा रहा है वह भाजपा की समझ में आता नहीं लग रहा है। पहला यह कि वह किसी भी रूप में कांग्रेसी सरकारों से अलग नहीं है। बल्कि उनसे कई गुना ज्यादा संकीर्ण और दृष्टिहीन है। अपने सांप्रदायिक एजेंडे के सामने देश और समाज की उन्नति उसके लिए मायने नहीं रखती। इसलिए उससे न्याय की उम्मीद नहीं की जा सकती। दूसरा, वह योग्यता का सम्मान नहीं करती। उसे इस बात की चिंता नहीं है कि वह किस तरह से सार्वजनिक संस्थानों और शिक्षा क्षेत्र को औसत से भी नीचे के लोगों से भर कर तबाह कर रही है। तीसरा उसके साथ योग्य व्यक्ति नहीं हैं और चौथा, उसका नेतृत्व निहायत अडिय़ल किस्म का संवेदनाहीन और अलोकतांत्रिक है।
अक्टूबर में हुए लेखकों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, इतिहासकारों तथा समाजशास्त्रियों के विरोध ने निश्चय ही भाजपा को हिला दिया है पर उसने इसे आवश्यक विनम्रता और एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार से असहमत रहनेवालों के पक्ष का सम्मान करने और उनके विरोध के कारणों को जानने-समझने की कोशिश करने की जगह उल्टा एक नकारात्मक किस्म का आक्रामक रवैया अपनाया लिया है। वह अपने अहं में विरोधियों की चरित्र-निष्ठा पर ही प्रश्र चिन्ह लगाने में जुटी हुई है और इस तरह उनका मुंह बंद करने की भौंडी कोशिश कर रही है। इसके लिए जिस तरह से भाजपा समर्थकों का लगातार इस्तेमाल किया जा रहा है वह चकित करनेवाला है। इसका पहला उदाहरण अक्टूबर माह में देखने में आया था जब साहित्य अकादेमी के सामने किए गए लेखकों के मौन विरोध के खिलाफ भाजपा ने अपने गिनेचुने लेखकों के नेतृत्व में स्वयंसेवकों और राजनीतिक कार्यकत्र्ताओं की भीड़ को खड़ा किया था। इसने और जो किया हो इस बात को और पुख्ता कर दिया कि उसके साथ बुद्धिजीवी लगभग हैं ही नहीं। क्योंकि उसका बचाव करने जो लेखक खड़े किए गए वे पौराणिक कथाओं के चरबे के मोटे-मोटे ग्रंथों के बावजूद रचनात्मक जगत में कोई प्रतिष्ठा नहीं हासिल कर पाए हैं।
असल में न भाजपा नेतृत्व को और न ही उसके समर्थक यह मानने को तैयार हैं कि लेखक-कलाकार मात्र सरकारी प्रतिष्ठा और पदों से न तो बनते हैं और न ही बनाए जा सकते हैं। किसी भी अच्छी रचना की पहली शर्त उसका यथास्थिति को पोषित करना नहीं बल्कि उसे तोडऩा होती है। साहित्य का, बल्कि ज्ञान के किसी भी अनुशासन का काम समाज को पीछे नहीं आगे ले जाने के लिए तैयार करना होता है। इसलिए लेखकों, कलाकारों और बुद्धिजीवियों का सत्ता, संस्थान और यथास्थिति से टकराव एक अवश्यंभावी स्थिति है। देश में बढ़ती असहिष्णुता को लेकर ऐसे कई लेखक-कलाकार चिंतित हैं जिन्होंने कभी न तो कोई सरकारी पद लिया और न ही सम्मान, फिर भी उनका कद अपनी रचनात्मक उपलब्धि के कारण समाज में कहीं ऊंचा है। सत्ता के पक्षपाती लेखक अक्सर दरबारी कहलाते हैं – चाहे वे कांग्रेस के दौर में हों या भाजपा के। स्वयं कांग्रेस के दौर में जो लेखक सरकार से जुड़ रहे थे वे कुल मिला कर या तो हास्य-व्यंग्य के कवि रहे हैं या फिर दोयम दर्जे के कलम घिस्सू। इसका प्रमाण पिछले कुछ दशकों में सरकार द्वारा सम्मानित हिंदी के लेखकों की सूची को देख कर समझा जा सकता है। मजेदार बात यह है कि इनमें से एक भी उस विरोध में शामिल नहीं था जिसे भाजपा के लोग ‘नियोजित विरोधÓ सिद्ध करने की जी-जान से कोशिश कर रहे हैं। यह कहना बड़बोलापन माना जा सकता है पर हमारे पाठक जानते हैं कि पिछले डेढ़ दशक से ज्यादा से समयांतर लगातार ऐसे लोगों और उन्हें सम्मानित करनेवाली सरकारों, चाहे केंद्रीय हों या प्रदेश की, का विरोध करता रहा है।
इधर लगभग एक माह बाद 17 नवंबर को भाजपा समर्थक ऐसे 47 इतिहासकारों, पुरातत्ववेत्ताओं, समाजविज्ञानियों और राजनीतिशास्त्रियों ने एक वक्तव्य जारी कर उन लोगों की, जिन्होंने वैश्विक स्तर पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा शासन में बढ़ती असहिष्णुता के प्रति अपनी असहमति और विरोध जाहिर किया है, यह कहते हुए आलोचना की है कि यह विरोध नियोजित है। पर इस वक्तव्य में हस्ताक्षर करनेवाले लोगों की तह में जाने पर कुछ और ही सामने आता है। उस बात पर बाद में आएंगे पहले यह देख लिया जाए कि इस वक्तव्य में कहा क्या गया है।
इन लोगों के अनुसार : ” इस तरह एक के बाद एक जो नियोजित तरीके से भारत और विदेश में (विरोध में वक्तव्य)जारी किए जा रहे हैं – इन के अलावा और भी बौद्धिक वर्गों द्वारा जारी किए गए हैं – यह एक नियोजित सामूहिक गायन जैसा अभियान है – जो एक हव्वा खड़ा कर के भेडिय़ा आया-भेडिय़ा आया चिल्ला रहा है। ये (वक्तव्य) अपने सारतत्व में न तो बौद्धिक हैं और न ही अकादमिक, बल्कि विचारधारात्मक हैं और उससे भी ज्यादा राजनीतिक हैं।ÓÓ
वक्तव्य में आगे कहा गया है कि ”इतिहासकार, पुरातत्वविद् और अकादमिक होने के नाते भारतीय सभ्यता के विभिन्न पक्षों पर विशेषज्ञता रखनेवाले हम लोग नैतिकता बघारने के इस पाखंडपूर्ण प्रयत्न पर अपनी प्रतिक्रिया देना चाहते हैं।ÓÓ
वक्तव्य के अनुसार, ”इन हस्ताक्षरकर्ताओं (असहिष्णुता विरोधी) में कई 1970 से उस विचारधारात्मक-राजनीतिक तंत्र का हिस्सा रहे हैं जो आईसीएचआर सहित देश की कई इतिहास की संस्थाओं पर हावी हैं और भारतीय इतिहास लेखन के अपने अंध मत को पूरे अकादमिक अनुशासन पर लादते रहे हैं।ÓÓ
इन सत्ता पक्ष के लोगों का आरोप है कि वामपंथी स्कूल के लोगों ने उनके विचारों से असहमत भारतीय इतिहासकारों का मूल्यांकन अकादमिक तरीके से न कर के उन्हें ‘राष्ट्रवादीÓ या ‘सांप्रदायिकÓ घोषित किया है। कई अकादमिशियनों को राजनीतिक तौर पर थोपी गई उनकी लाइन न अपनाने के कारण भेदभाव तथा लगभग निष्कासन और पेशेगत अवसरों के नुकसान को सहना पड़ा है…।ÓÓ
वैसे इन लोगों ने यह भी कहना है कि ”हम भारत के विगत को गौरवपूर्ण और संपूर्ण स्वर्णयुग करारने को खारिज करते हैं पर हम वामपंथियों द्वारा थोपे जानेवाले कई गुना घातक ‘विधिसंगत इतिहासÓ (लेजिसलेटेड हिस्ट्री) को खारिज करते हैं।ÓÓ
इन विद्वानों का कहना कितना तर्क संगत है यह बतलाना जरूरी नहीं है। इनका यह कहना ही कि ”भारत के विगत को गौरवपूर्ण और संपूर्ण स्वर्णयुग करार ने को (हम) खारिज करते हैंÓÓ उनकी सीमाओं को स्पष्ट कर देता है। यह तथाकथित ‘राष्ट्रवादीÓ इतिहास लेखन वस्तुनिष्ठता और तार्किकता से अपनी दूरी के लिए दुनिया के अकादमिक हलकों में बाकायदा जाना जाता है। इस वक्तव्य को पिछले एक साल में जिस तरह से स्टेम सेल, प्लास्टिक सर्जरी, नक्षत्रों के बीच चलनेवाले गीयर युक्त विमानों का भारतीयों द्वारा हजारों वर्ष पहले आविष्कार कर दिए जाने और महाभारत जैसे महाकाव्य को भारतीय इतिहास की धुरी बतलाने तथा सरस्वती की अतार्किक और अर्थहीन हो चुकी खोज आगे बढ़ाने आदि, और वह भी भाजपा के सर्वोच्च नेतृत्व की ओर से, महिमा मंडन और स्थापन किया गया है, उसका इस राजनीतिक दल की इतिहास के प्रति समझ और मंशा को स्पष्ट कर देता है। प्रश्र है क्या भाजपा समर्थक इन इतिहासकारों ने एक बार भी अपने नेतृत्व से कहा कि ये बातें आधारहीन हैं। ये इतिहास लेखन को तो भटकाती ही हैं साथ ही भारत जैसे देश की आम जनता को, जहां अंधविश्वास, पाखंड और अशिक्षा आज भी बड़े पैमाने पर है, भ्रमित करने और बरगलाने तथा समाज को हजारों साल पीछे की ओर धकेलने में जो भूमिका निभाती है क्या उसे नजरंदाज किया जा सकता है। पर सच यह है कि हिंदुत्व की विचारधारा मूलत: आम जनता को ऐसे काल्पनिक संसार से जोड़ती है जो अतीत को अतार्किक ढंग से गौरवांवित करउस काल्पनिक ‘स्वर्णयुगÓ को लाने का सपना दिखा सके जो न कभी था और न ही हो सकता है। सच यह भी है कि दुनिया में जहां भी धार्मिक कट्टरता जन्म लेती है वह अनिवार्य रूप से विगत के काल्पनिक स्वर्णयुग की ही बात करती है।
इन दक्षिणपंथी इतिहासकारों से जुड़े तथ्यों को देखना भी कम मजेदार नहीं है। इनमें से 11 तो आईसीएचआर के सदस्य हैं। (दिलीप कुमार चक्रवर्ती, शरदींदु मुखर्जी, नंदिता कृष्णन, एमडी श्रीनिवास,मीनाक्षी जैन, माइकेल डेनीनो, आरसी अग्रवाल, सच्चिदानंदन सहाय, निखिलेश गुहा, पूर्बी रॉय, इसाक सीआई।) इन्हें कुछ ही माह पहले नई सरकार द्वारा नियुक्त किया गया है। दो एक और सरकार वित्त पोषित संस्था आईसीएसएसआर (भारतीय समाज विज्ञान अनुसंधान परिषद्) के सदस्य हैं। चंद्रकला पाडिया तो पिछले दिनों ही इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस स्टडीज शिमला की अध्यक्ष बनी हैं। इसी तरह कपिल कपूर वर्धा के महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं। यह महोदय अंग्रेजी के अध्यापक रहे हैं। यानी दुनिया के एकमात्र हिंदी भाषा विश्वविद्यलय के ऊपर उसी समझ के तहत थोपे गए हैं जिसके तहत चौहान को एफटीआईआई पर थोपा गया है। यह तो कपूर साहब का सौभाग्य या छात्रों की तटस्थता कहिए कि उनकी नियुक्ति का विरोध नहीं हुआ।
हस्ताक्षरकर्ताओं में एक नाम बी.बी. लाल (ब्रज बासी लाल) का है। 94 वर्षीय लाल साहब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के निदेशक रहे हैं। उन्होंने 1975-78 के दौरान ‘रामायण स्थलों का पुरातत्वÓ (आर्कलॉजी आफ रामायण साइट्स) पर काम किया था और इस अध्ययन ने बाबरी मस्जिद के विवाद को बढ़ाने और अंतत: उसके ढहा दिए जाने को बल दिया था। मजे की बात यह है कि बीबी लाल का सारा काम कांग्रेस शासन के दौरान ही हुआ है। यह बात और है कि सन 2000 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से नवाजा।
इसलिए सब कुछ के बावजूद सारी दुनिया में भारत के बारे में जो ज्ञान, फिर चाहे वह इतिहास का हो, राजनीतिशास्त्र का हो, पुरातत्व का हो, सम्मानित, स्वीकार्य और मान्य है वह कुल मिला कर उन्हीं लोगों का है जो कथित ‘वामपंथीÓ हैं। असल में विश्व के वे सर्वाधिक सम्मानित इतिहासकार – बाशम से लेकर डॉनिगर तक – जिनका भारतीय वामपंथ से कोई लेना-देना नहीं है उस वस्तुनिष्ठ और तटस्थ समझ और दृष्टि का समर्थन करते हैं उन इतिहासकारों की हैजिन्हें वामपंथी कहा जाता है।
पर ये भाजपा समर्थक इतिहासकार जिस तरह से स्वयं को कांग्रेस के शासन काल में प्रताडि़त सिद्ध करने की कोशिश कर रहे हैं वह भी अपने आप में बहुत विश्वसनीय नहीं है। टाइम्स आफ इंडिया (19 नवंबर) में प्रकाशित अक्षय मुकुल की एक रिपोर्ट के अनुसार इस वक्तव्य में हस्ताक्षर करनेवाले कई इतिहासकार ऐसे रहे हैं जिन्हें ”वामपंथियों द्वारा कब्जायीÓÓ हुई भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद् (आईसीएचआर) के दौरान अनुदान मिला है। इन अनुदान पानेवालों में ओमप्रकाश केजरीवाल सबसे आगे हैं। उन्हें पहले अपनी पीएचडी करने के लिए 1980 के दशक में आईसीएचआर की फैलोशिप मिली थी। यानी तब वह नौकरी पर थे। रिटायर होने के लगभग दस वर्ष बाद 2012 में उन्हें आईसीएचआर की सीनियर फैलोशिप मिली थी। दूसरे हस्ताक्षरकर्ता शरदेंदु मुकर्जी को 1990 में अपनी पीएचडी की थिसिस छपवाने के लिए आईसीएचआर से प्रकाशन अनुदान मिला। उन दिनों आईसीएचआर के अध्यक्ष इरफान हबीब थे। डीएन त्रिपाठी (दया नाथ त्रिपाठी) को 1999 में ‘पुरातत्व और परंपराÓ पर काम करने के लिए सात लाख 31 हजार का अनुदान मिला था। त्रिपाठी स्वयं आईसीएचआर के अध्यक्ष रह चुके हैं। आर नाथ को आईसीएचआर ने 1970 और फिर 1980 के दशकों में दो वेतन के बराबर (पे प्रोटेक्शन) की फैलोशिप दी थी। तथा एसपी गुप्ता को दो बार कुल मिला कर लगभग छह लाख की फैलोशिप मिली।
इस के अलावा इन में से कई लोगों को वि
भिन्न किस्म की पदोन्नति और सम्मान मिले हैं जैसे कि रवींद्र सिंह बिष्ट को 2013 में पद्मश्री और ओम प्रकाश केजरीवाल को यूपीए सरकार द्वारा सीआईसी (मुख्य सूचना आयुक्त) बनाया गया था।
अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं में मोदी की चरम समर्थक व स्मृति ईरानी की कटु आलोचक मधु किश्वर, किसी जमाने में सतीप्रथा के समर्थन में संपादकीय लिखने के लिए चर्चित रहे जनसत्ता के पत्रकार बनवारी, रघुवीर सहाय के संपादनकाल में साप्ताहिक दिनमान तथा अन्य हिंदी पत्रिकाओं में पुरातत्व पर लेखन करनेवाले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के पूर्व निदेशक बृजमोहन पांडे, पुरातत्वविद कीर्ति मनकोडी, जनेवी के संस्कृत विभाग के रजनीश कुमार मिश्र व संतोष कुमार शुक्ल, जनेवी के ही अंग्रेजी के प्रोफेसर और कवि मकरंद परांजपे, संगीतकार व संगीतशास्त्री सुमति कृष्णन तथा लेखक और अनुवादक प्रेमा नंदकुमार आदि शामिल हैं। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

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