शब्दों के महल और यथार्थ की धूल-मिट्टी

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यह भारतीय समाज के लिए कठिन समय है, इसमें शंका नहीं है। हमारे संविधान, संस्कृति और उसकी बहुलता के आधारभूत मूल्यों को अपदस्थ करते हुए उन शक्तियों ने केंद्र में ढाई साल पहले ही सत्ता हासिल कर ली थी जिनका विश्वास न तो बहुलतावाद में है और न ही धर्मनिरपेक्षता में। अब उत्तर प्रदेश (उप्र) में हुई उनकी जीत ने देश की इन मूल्यों की संजोई धरोहर के लिए और गहरा संकट पैदा कर दिया है। देश के सबसे बड़े राज्य में एक ऐसे व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनाया जाना जो अपने सांप्रदायिक विध्वंश और विघटन के लिए जाना जाता हो, बल्कि जिसकी राजनीति का आधार ही यह हो, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वर्तमान नेतृत्व की मंशा को साफ कर देता है। बहुसंख्यकवाद हमारे समाज को ऐसे मुहाने की ओर धकेलता लिए जा रहा जिसके बाद सांप्रदायिक टकराव, हिंसा और अस्थिरता की अंधी खाई है। भयावहता यह है कि इसके लिए सरकारी तंत्र का इस्तेमाल होना शुरू हो गया है।

सन 2013 के चुनावों में केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत ने सांप्रदायिक ताकतों को निर्णायक रूप से सत्ता में बैठा दिया और प्रतिगामी ताकतों के हाथ में सत्ता सौंप दी। नरेंद्र मोदी की सांप्रदायिकता को, उनके कथित विकास पुरुष ने, जो आड़ दी हुई थी वह, देश के सबसे बड़े राज्य में, भाजपा की जीत के बाद उघड़ कर सामने आ गई है। उप्र के मुख्यमंत्री के रूप में योगी आदित्यनाथ को सत्ता सौंपना, किसी भी तरह के भ्रम की गुंजाईश नहीं छोड़ता। देखा जाए तो आदित्यनाथ नरेंद्र मोदी का अगला संस्करण हैं। यह कम हैरान करने वाला नहीं है कि मोदी के उत्थान में नब्बे के दशक के जिस हिंसक राममंदिर आंदोलन (फिर शिला पूजन, कारसेवकों की खेपें, गोधरा कांड और गुजरात के दंगे) ने निर्णायक भूमिका निभाई, देश के सबसे बड़े इस राज्य, जिसने मोदी को प्रधानमंत्री पद पर पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई, की बागडोर संभालनेवाले आदित्यनाथ भी काफी हद तक उसी राम मंदिर आंदोलन की उपज हैं। निश्चय ही मोदी की राष्ट्रीय स्वीकार्यता में उनके कॉरपोरेट जगत के साथ सावधानी से निर्मित संबंधों का महत्त्वपूर्ण हाथ है। पर जहां तक आदित्यनाथ का सवाल है उनका राजनीतिक महत्त्व उनके कट्टर अल्पसंख्यक विरोधी होने में है जो इस बार के चुनावों में भाजपा का अधार रहा है। लेकिन भाजपा के उत्थान को समझने के लिए इन्हीं घटकों तक सीमित रहना स्थितियों का सरलीकरण होगा और हमारा विश्लेषण एकांगी।

आजादी के बाद के सात दशकों के हमारे शासकों की ढुलमुलता, सत्ता लोलुपता, अवसरवादिता, दृष्टिहीनता ने समाज से सांप्रदायिकता, रूढि़वादिता और जातिवाद को जड़ से समाप्त करने का प्रयत्न नहीं किया। तात्कालिक लाभ की क्षूद्रता ने इन नेताओं को उल्टा सांप्रदायिकता और जातिवाद को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ाने में मदद की। उनकी इस अवसरवादिता और निर्णय न ले पाने की कमजोरी ने आरएसएस और भाजपा जैसी ताकतों को खत्म करने की जगह बढ़ाने का काम किया। वह देख नहीं पाए कि भाजपा किस तरह से अपने आधार का विस्तार कर रहा है। वोट बैंक की राजनीति के अस्त्र का अब उल्टा उन्हीं उदारवादी दलों का संहार करने में काम आ रहा है, जो दशकों तक पहले इन दलों को सत्ता में बनाए रखने में मदद करता रहा है। तात्कालिक तौर पर देखें तो समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की ऐसी नीतियों के चलते भाजपा उप्र में स्पष्ट रूप से वोटों का ध्रुवीकरण करने में सफल हुई। जहां तक मुस्लिम मतदाताओं का सवाल है उन्होंने सारी धोखाधड़ी के बावजूद इनका साथ नहीं छोड़ा पर जब वे आपस में ही लडऩे में लगी रहीं तो वही होना था,जो हुआ।

मध्यमार्गी कांग्रेस में, जो मूलत: आजादी की लड़ाई का मंच था, हर तरह की विचारधारा के लोग थे। हिंदूवादियों की वहां कमी नहीं थी। ये उसके निर्णायक कदम उठाने में हर तरह के रोड़े अटकाते रहे। इस पर भी कांग्रेस को ऐसे कम अवसर नहीं मिले, जब वह इस देश को सही अर्थों में एक उदार, धर्मनिरपेक्ष राज्य बना सकती थी। किन्हीं अर्थों में राम मंदिर आंदोलन की नींव भाजपा ने नहीं, कांग्रेस ने ही डाली। तटस्थ होकर देखें तो समझ आ जाता है कि इस पूरे दौर में दुर्भाग्य से वाम की ओर झुकाव वाली शक्तियों से कहीं ज्यादा अपनी कमियों से दक्षिणपंथी ताकतों ने सीखा है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि आगे का रास्ता नहीं रहा है। एक मायने में यह उन प्रगतिशील और उदारवादी शक्तियों के लिए अच्छा ही हुआ है कि उनके सामने शत्रु स्पष्ट है। यह याद करना पीड़ा जनक है कि उदारवादी, विशेषकर वामपंथी, ताकतों को पचा जाने में कांग्रेस का बड़ा हाथ रहा है। निश्चय ही इसके अंतरराष्ट्रीय कारण रहे, पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके आराम पसंद नेताओं ने जिस तरह से अवसर गंवाए और जिस तरह आजादी के बाद के सबसे बड़े विरोधी दल का बिखराव हुआ वह, किसी दुखांत नाटक से कम नहीं है।

पर अब पश्चाताप का समय नहीं है। वामपंथी और मध्यमार्गी दलों को हिंदूवादी ताकतों से सीखना होगा कि किस तरह से एक-दूसरे की पूरक बना जा सकता है। बहुसंख्यकवादियों ने 1947 से कई चोले बदले और किसी समयकी लगभग एक अस्पृश्य पार्टी से आज वह देश की सत्ता के केंद्र में स्थापित हो चुकी है। इनके युवा नेतृत्व को सोचना होगा कि आगे का रास्ता कैसे तय करना है। एक सफल राजनीतिक दल को अपनी प्रासंगिकता सदा बनाए रखनी होती है। राजनीति समकालीनता का नाम है, बाकी सब उसके उपादान हैं। आप दूसरे की पीठ पर चढ़कर सत्ता नहीं पा सकते। इसलिए वर्तमान की समस्याओं के लिए नेतृत्व का आगे बढ़कर आना समय की मांग होती है, मोदी, नकारात्मक ही सही पर इसका उदाहरण हैं। हताशा के दौर में जनता नेतृत्व की व्यक्तिगत अच्छाई-बुराई नहीं देखती। वह ज्यादा सिद्धांतों को भी नहीं समझती। उसे जिस चीज की तलाश रहती है वह है नेतृत्व और उसके कार्यान्वयन की क्षमता। जो भी शक्ति यह मंशा दिखलाती है वह लोकतंत्र में सत्ता में आती है। दुर्भाग्य से हम मात्र जनता के विवेक पर ज्यादा निर्भर नहीं कर सकते, विशेषकर ऐसी स्थिति में जब हमने उसे वर्तमान और भविष्य की बारीकियों को समझाने का आधारभूत स्तर (ग्रासरूट लेवल) पर कोई काम ही न किया हो।

फिलहाल प्रगतिशील ताकतों के सामने जो चुनौती है, उसकी क्षमताओं और सीमाओं को समझना और उनपर तत्काल कार्य करना जरूरी है। हम जिस उपमहाद्वीप का हिस्सा हैं वह अपनी भौगोलिक ही नहीं बल्कि सांस्कृतिक विविधता के लिए भी एक चुनौती है। अचानक नहीं है कि हमारे संविधान निर्माताओं ने इस जटिलता का ध्यान रखा था। स्वयं हिंदू अपने आप में कोई ऐसा ठोस धर्म या समुदाय नहीं है जो किसी एक खास जीवन शैली से जुड़ा हो इसलिए इसकी विविधता को चुनौती देना किस हद तक खतरनाक हो सकता है, इसकी सिर्फ कल्पना की जा सकती है। एक वाक्य में कहें तो यह इस देश के विखंडन का निश्चित नुस्खा है। उत्तर-पश्चिम और पूर्वोत्तर में पहले से ही शांति नहीं है। यह नीति इसे बढ़ाएगी।

उप्र में आते ही जिस तरह से आदित्यनाथ ने अपना एजेंडा शुरू करने की कोशिश की है व स्पष्ट कर देता है कि काम करने का यह तरीका उनकी प्रशासनिक अनुभवहीनता के साथ ही प्रदर्शन-प्रियता भी दर्शाता है। नए मुख्यमंत्री ने सुना है शपथ लेने के हप्ते भर में ही 50 निर्णय लिए। इनमें दफ्तरों में पान,पान मसाला और पोलिथीन पर पाबंदी से लेकर एंटी रोमियो दस्तों का निर्माण और ‘अवैध’ बूचडख़ानों पर प्रतिबंध जैसे आदेश हैं। सरकारी दफ्तर साफ हो जाएं पर सड़कें – गलियां पीक से सनी रहें, यह कौन-सी सफाई है! अगर आप वास्तव में सफाई चाहते हैं तो बंद करिये पान, गुटके और सिगरेट को। वैसे भी ये स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। इसी तरह के सवाल उनके एंटी रोमियो अभियान को लेकर उठाए जा सकते हैं । उत्तर भारत क्यों महिलाओं के प्रति इस तरह आक्रामक है? वही लड़के जो अपने घर की औरतों को बचाने के चक्कर में मारे जाते हैं दूसरे घरों की लड़कियों को उठा ले जाने के फेर में क्यों नजर आते हैं? साफ है कि गड़बड़ कहीं समाज में है। पर योगी जी को कौन समझाए और वह समझें तो क्यों! उन्होंने पूरा प्रदेश ही दुनिया की सबसे भ्रष्ट पुलिस व्यवस्था के हाथों में थमा दिया।

बूचडख़ानों के मामले में तो और भी गंभीर खामी है। बहाना लाइसेंस का है पर उद्देश्य उग्र हिंदू समर्थकों की तुष्टि। प्रदेश में पर्याप्त आधुनिक लाइसेंसधारी बूचडख़ाने ही नहीं हैं। पर सबसे ज्यादा भैंस का गोश्त इसी प्रदेश से विदेशों से पैसा कमाता है। अकेले उप्र में यह 50 हजार करोड़ का कारोबार है और इससे पांच लाख लोगों का रोजगार चलता है। राज्य में लाइसेंस वाले कुल 44 बूचडख़ाने बतलाए जाते हैं और इन में से भी 32 यांत्रिक हैं जो निर्यात के लिए माल तैयार करते हैं। प्रदेश की जनसंख्या विशाल है। हालत यह है कि राज्य की राजधानी में ही कोई लाइसेंसी बूचडख़ाना नहीं है। आखिर क्यों लाइसेंस नहीं दिए गए? कुल मिला कर समस्या पुरानी और प्रशासनिक लापरवाही की देन है जिसे तुगलकी फरमान से एक दिन में नहीं सुधारा जा सकता। हां, इससे वे लोग जरूर आतंकित किए जा सकते हैं जो गरीब वोटों की रोटी सेकने के लिए भाजपा के निशाने पर हैं। आदित्यनाथ की यही संकीर्णता और द्वेष प्रदेश के लिए शुभ लक्षण नहीं है। खतरनाक बात यह है कि ध्रुवीकरण के इस भौंडे हथियार का इस्तेमाल देखा-देखी और भी कई भाजपा शासित राज्यों ने शुरू हो गया है।

जिन लोगों ने आपातकाल का दौर और नसबंदी का तमाशा देखा है, वह निश्चय ही मन ही मन मुस्करा रहे होंगे। अंतत: कांग्रेस के सफाये का वह सबसे बड़ा कारण बना था। दुर्भाग्य से या सौभाग्य से तब की यादें आदित्यनाथ को नहीं होंगी, क्योंकि वह तब सिर्फ तीन साल के होंगे।

दूसरा तथ्य, जिसे भूला नहीं जाना चाहिए वह है सपा और बसपा को मिला कुल वोट का प्रतिशत। यह भाजपा को मिले वोट से चार प्रतिशत ज्यादा है। अगर इन्होंने मिल कर चुनाव लड़ा होता तो निश्चय ही स्थिति बिहार जैसी होती। यही नहीं अगर हमारी चुनाव प्रणाली में वोटों के प्रतिशत के हिसाब से प्रतिनिधित्व तय होने का नियम होता तो भाजपा तथाकथित प्रबल बहुमत की दावेदार नहीं हो पाती। हिंदुत्व आदर्शों की दुहाई भाजपा देती है पर वह इन्हें अपनाती कितना है यह बतलाने की जरूरत नहीं है। गोवा और मणिपुर में सत्ता कब्जाना इसके उदाहरण हैं। वह सत्तामें बने रहने लिए सब कुछ करने को तैयार है। जो भी हो फिलहाल सबक साफ है। लोकसभा चुनावों में सिर्फ दो साल बाकी हैं।

वस्तुगत स्थितियों को भी समझना जरूरी है। अर्थव्यवस्था, जो नरेंद्र मोदी के लिए सबसे बड़ी जवाबदेही है, संकट की ओर बढ़ रही है। उन्होंने अपेक्षाओं को आकाश पर पहुंचाया हुआ है। इधर उभर रहे तथ्य जो संकेत दे रहे हैं उनसे स्पष्ट है कि पिछले तीन वर्षों में केंद्र की भाजपा सरकार आर्थिक मोर्चे पर ज्यादा कुछ नहीं कर पाई है। पिछले दो वर्षों में बैंकों की न वसूल हो सकनेवाली राशि दो गुनी होकर लगभग छह लाख करोड़ पहुंच गई है। गत वर्ष अप्रैल से सितंबर तक के आंकड़े बतलाते हैं कि कृषि के बाहर के आठ क्षेत्रों में इन छह महीनों में सिर्फ आधा प्रतिशत रोजगार ही सृजित हो पाया है। यह अर्थव्यवस्था के ठहरने के अलाव बेरोजगारी के बेकाबू होने का संकेत है।  कृषि का अपना संकट है। किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला तेज ही हुआ है। दक्षिणी भारत  इस सदी के सबसे बड़े  सूखे का शिकार है। सरकार शेयर बाजार के सूचकांकों  को देखकर ही मगन है।

सबसे ज्यादा अवसरवादी और आत्मकेंद्रित मध्यवर्ग किसी टाइम बम की तरह टिकटिक कर रहा है। समाचार है कि ऑटोमेशन और क्लाउड कम्यूटिंग के कारण अब तक का नौकरियों का सबसे आकर्षक क्षेत्र आईटी और आईटीईएस में रोजगार के अवसर तेजी से गिरे हैं। एक समाचार के अनुसार इसी वर्ष इस क्षेत्र द्वारा दी जानेवाली नौकरियों में 40 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। अगले कुछ ही वर्षों में नई नौकरियां देना तो छोड़ पुरानी नौकरियों भी खत्म होने जा रही हैं। रही-सही कसर डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी कर दी है। दूसरे शब्दों में कहें तो उदारीकरण अब ढलान पर है।

मोदी की नाटकबाजी ने, जिसका विमुद्रीकरण एक अंक था, इस संकट को बढ़ाया ही है। भविष्य बतलाएगा कि गैर सांप्रदायिक लोकतांत्रिक शक्तियां किस तरह से संगठित होती हैं। अगर अब भी नहीं होती हैं तो देश का भविष्य क्या करवट लेगा, कहा नहीं जा सकता।

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