राज्यों के चुनाव संकट में साइकिल

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उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर अजय सिंह

क्या 2017 के नतीजे 2012 के नतीजों को दोहराएंगे? उत्तर प्रदेश की राजनीतिक फिजा में कई सवाल गूंज रहे हैं। क्या ‘हाथ’ (कांगे्रस का चुनाव निशान) का साथ लेकर ‘साइकिल’ (राज्य में सरकार चला रही समाजवादी पार्टी का चुनाव निशान) तेज रफ्तार से दौड़ पाएगी और दोनों की मिली-जुली सरकार बनेगी? ‘हाथी’ (राज्य में मुख्य विपक्षी पार्टी बहुजन समाज पार्टी का चुनाव निशान) की चुस्त-दुरुस्त चुनावी तैयारियां और अपने पक्ष में मजबूत सामाजिक समीकरण बना लेने की उसकी तरकीब क्या गुल खिलाएगी? ‘कमलÓ (भारतीय जनता पार्टी का चुनाव निशान) का फूल कितना खिलेगा जबकि उसके तालाब पर में अच्छी-खासी तकरार और बगावत मची हुई है? इस बार क्या किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार हैं? ‘यूपी को ये साथ पसंद है’ (सपा-कांगे्रस का संयुक्त चुनावी नारा) – क्या वाकई यूपी को पसंद आएगा?
अगर घिसे-पिटे जुमले का सहारा लेना हो, तो इन सवालों का जवाब है : आठ मार्च के बाद सारी तस्वीर साफ हो जाएगी। उत्तर प्रदेश विधानसभा की 403 सीटों के लिए 11 फरवरी से आठ मार्च तक सात चरणों में चुनाव होना है। यह चुनाव कई वजहों से दिलस्प और जटिल हो चला है, और सही कयास लगा पाना मुश्किल है। (राज्य विधानसभा में कुल 404 सीटें हैं, जिनमें से एक पर नामांकन (ऐंग्लो-इंडियन समुदाय) हेाता है।)
पहले हम 2012 के विधानसभा चुनाव नतीजे पर एक नजर डालें, तब उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की अध्यक्षता में समाजवादी पार्टी (सपा) को 224 सीटें और 29.13 प्रतिशत वोट मिले थे। जाहिर है, तब सपा को अकेले अपने दम पर स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा सीटें मिली थीं और उसने अपनी सरकार बनाई थी। मुलायम ने खुद मुख्यमंत्री न बनकर अपने बेटेअखिलेश यादव को राज्य का मुख्यमंत्री बनाया था, हलाकि पार्टी कार्यकर्ताओं का अच्छा-खासा दबाव था कि मुलायम ही मुख्यमंत्री बनें। मायावती के नेतृत्व में बहुजन समाज पार्टी को 80 सीटें और 25.91 प्रतिशत वोट मिले थे, और वह राज्य विधानसभा में मुख्य विपक्षी पार्टी बनी। भारतीय जनता पार्टी को 47 सीटें और 15 प्रतिशत वोट मिले, जबकि कांगे्रस को 28 सीटें और 11.65 प्रतिशत वोट मिले। राष्ट्रीय लोकदल (अजीत सिंह) को 9 सीटें मिली थीं, और तब कांगे्रस और राष्ट्रीय लोकदल ने मिलकर राज्य विधानसभा का चुनाव लड़ा था।
अब, 2017 में, राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ है। सपा के अंदर वर्चस्व और कब्जे को लेकर चार महीने तक चली अंदरूनी लड़ाई में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ‘विजेता’ बनकर उभरे हैं। उन्होंने पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से अपने पिता मुलायम को हटा दिया, वह खुद पार्टी राष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए, अपने सगे चाचा शिवपाल सिंह यादव को सरकार व पार्टी के सभी पदों से बर्खास्त कर दिया, और पार्टी व सरकार की पूरी कमान उन्होंने अपने हाथ में ले ली। अब पार्टी व सरकार में अखिलेश सर्वेसर्वा हैं।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में पार्टी के अंदर अखिलेश के विरोधी भी अच्छे-खासे पैदा हो गए हैं। पार्टी में अखिलेश-विरोधी असंतुष्ट व क्षुब्ध गुट सामने आ गए हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं का वह हिस्सा, जो मुलायम-शिवपाल से जुड़ा है – यह हिस्सा अच्छा-खासा है, प्रभावशाली है, और कई इलाकों में इसका असर व पैठ है – अखिलेश को इस चनाव में ‘सबकÓ सिखाने के लिए कमर कसे हुए है। यादव परिवार (इसे परिवार की बजाय कबीला कहना ज्यादा सही होगा) और सपा में अंदरूनी लड़ाई फिलहाल थमी हुई है, लेकिन तलवारें अंदर-ही-अंदर खिंची हुई हैं। पार्टी का शिवपाल गुट चुनाव में अखिलेश गुट को पटखनी देने के लिए तैयार है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता और सपा सरकार में मंत्री रह चुके अंबिका चौधरी सपा छोड़ बसपा में शामिल हो गए हैं – मुलायम के प्रति अखिलेश के व्यवहार से क्षुब्ध होकर। सपा के संस्थापक सदस्य अंबिका चौधरी का बसपा में शामिल होना माने रखता है। चर्चा है कि शिवपाल यादव मायावती व बसपा से संपर्क बनाए हुए हैं।
जमीनी हकीकत को भांपते हुए अखिलेश यादव ने समझ लिया कि इस चुनाव में सपा के लिए अकेले अपने दम पर चुनाव जीतना और दोबारा सरकार बना लेना लगभग असंभव है। इसीलिए उन्होंने कांगे्रस और उसके उपाध्यक्ष राहुल गांधी की तरफ अपना हाथ बढ़ाया और चुनाव-पूर्व सपा-कांगे्रस गठबंधन की पेशकश की। यह गठबंधन कांगे्रस की बजाय अखिलेश के लिए ज्यादा जरूरी था – उनका राजनीतिक अस्तित्व इस चुनाव में दाव पर लगा है। संकट में फंसी उनकी ‘साइकिल’ को ‘हाथ’ का सहारा चाहिए। और इस बहाने, लगभग 30 साल से उत्तर प्रदेश में सत्ता से बाहर, कांगे्रस को सत्ता की थोड़ी-सी मलाई चखने को मिल जाए, तो क्या बुरा। (वैसे भी, उत्तर प्रदेश में कांगे्रस के पास खोने के लिए कुछ है भी नहीं।)
इस गठबंधन के तहत सपा 403 सीटों में से 298 पर और कांगे्रस शेष 106 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। हालांकि कई सीटों पर उम्मीदवारों के चयन को लेकर दिक्कतें और झगड़े व खबरें आ रही हैं। सपा-कांगे्रस गठबंधन को उम्मीद है कि वह मध्यवर्ग को – खासकर युवा तबके को – अपनी और आकर्षित करेगा। समाचार माध्यम में करोड़ों रुपए खर्च कर सायास तरीके से अखिलेश की जो छवि – ‘विकास पुरुष’ – गढ़ी गई है, उसका फायदा इस गठबंधन को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। (राष्ट्रीय लोकदल इस गठबंधन से बाहर है।)
इस विधानसभा चुनाव में किसी एक पार्टी को बहुत मिलने के आसार नहीं दिखाई दे रहे हैं। इस चुनाव में मायावती और बसपा कोई आश्चर्यजनक कारनामा कर दिखाएं, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। बसपा ने बड़े ढंग से, काफी पहले से अपनी चुनावी तैयारियां की हैं। उसने जो सामाजिक समीकरण साधा है (दलित-मुस्लिम गठबंान, और इस गठबंधन के साथ अन्य पिछड़ी जातियों और सवर्ण जातियों को जोडऩा), वह कारगर और गतिशील दिखाई देता है। हाल के दिनों में मायावती ने अपनी पुरानी छवि काफी हद तक बदली है। उनका व्यवहार दोस्ताना और समावेशी हुआ है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को कोई खास गढ़त मिलती नहीं दिखाई दे रही। वह अपने अंदरूनी झगड़े में फंसी हुई है। लेकिन आशंका जताई जा रही है कि मतदान का दिन नजदीक आते-आते वह कुछ ऐसी हरकत कर सकती है कि सांप्रदायिक धु्रवीकरण करन का उसका मकसद पूरा हो सके। यह एक सच्चाई है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक नरेंद्र मोदी (प्रधानमंत्री) की पहुंच गांव-गांव तक हुई है, जहां तक वामपंथी/ कम्युनिस्ट पार्टियों की बात है, वे मिल-जुलकर करीब 150 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। इन पार्टियों के लिए उत्तर प्रदेश में अपनी खोई हुई जमीन हासिल करना एक बड़ी चुनौती है। 

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