मंच ‘… दुश्मन उसका आस्मां क्यों हो!’

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गृहमंत्री राजनाथ सिंह के नाम लेखक शम्सुल इस्लाम खुला पत्र

अपने पिछले दिनों (दिसंबर 12, 2016) कठुआ, जम्मू में भाषण देते हुए पाकिस्तान को चेतावनी दी कि वह इस मुगालते में ना रहे कि ”मजहब के आधार पर फिर से भारत को बांट देगा। …हमारा दिल यह कहता है कि चाहे हिंदू हो, या मुसलमान हो, जो भी भारत माता की कोख से पैदा हुए हैं, वे सभी एक दूसरे के भाई-भाई हैं।‘’
आपके यह विचार जानकर की आप भारत के हिंदुओं और मुसलमानों को एक दूसरे का भाई मानते हैं बहुत आनंद और सुख का अनुभव हुआ। धर्म के नाम पर पैदा किए गए पाकिस्तान को सच-मुच में यह समझ लेना चाहिए कि हमारे देश को धर्म के नाम पर नहीं बांटा जा सकता और इस बात से बहुत तस्सली मिली कि देश के गृहमंत्री के तौर पर आप उन साजिशों के प्रति सचेत हैं जिनके तहत देश के सब से बड़े दो धार्मिक समुदायों को लड़वाने की कोशिश की जा रही है।
जनाब, मुझ जैसे देशवासियों को पूरा भरोसा है हमारे देश के हिंदुओं और मुसलमानों को लड़वाने की साजिशों के बारे में आपने पाकिस्तान को जो चेतावनी दी है वह कोई राजनीतिक जुमलेबाजी नहीं बल्कि पूरी प्रतिबद्धता से आप ने ऐसा कहा है। मैं यह सवाल इसलिए उठा रहा हूं क्योंकि आप हमारे प्रधानमंत्री महामहिम मोदी जी की तरह सार्वजानिक तौर पर लगातार यह घोषणा करते रहे हैं कि आप ‘हिंदू राष्ट्रवादी’ हैं, आरएसएस के कार्यकर्ता हैं और हिंदुत्व विचारधारा में विश्वास करते हैं।
इन हालात में यह शंका होना लाजमी है कि आप भारत के प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष ढांचे के समर्थन में खड़े ने रह कर आरएसएस के बताए रास्ते पर ही चलेंगे। मैं यहां पर आरएसएस के कुछ राष्ट्र विरोधी नजरियों से आप को अवगत करना चाहूंगा जिनसे आप आरएसएस के वरिष्ठ मेंबर के तौर पर भली-भांति परिचित होंगे।
महोदय, यहां आप को यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि जहां तक पाकिस्तान का संबंध है वह भी प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत के बारे में इसी प्रकार की घटिया और दुश्मनाना सोच रखता है। मैं आपका ध्यान आरएसएस के देश के प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष ढांचे के बारे में कुछ शर्मनाक विचारों की ओर दिलाना चाहता हूं ताकी आपको देश के सामने गंभीर आतंरिक चुनौती का अहसास हो सके।
आरएसएस भारत के साझे राष्ट्रवाद से नफरत करता है
स्वतंत्रता की पूर्व संध्या पर (14 अगस्त 1947) इसके अंग्रेजी मुखपत्र, ऑर्गनाइजर में संपादकीय द्वारा भारतीय राष्ट्र की निम्नलिखित परिभाषा दी गई:
राष्ट्रत्व की छद्म धारणाओं से गुमराह होने से हमें बचना चाहिए। बहुत सारे दिमागी भ्रम और वर्तमान एवं भविष्य की परेशानियों को दूर किया जा सकता है अगर हम इस आसान तथ्य को स्वीकारें कि हिंदुस्थान में सिर्फ हिंदू ही राष्ट्र का निर्माण करते हैं और राष्ट्र का ढांचा उसी सुरक्षित और उपयुक्त बुनियाद पर खड़ा किया जाना चाहिए… स्वयं राष्ट्र को हिंदुओं द्वारा हिंदू परंपराओं, संस्कृति, विचारों और आकांक्षाओं के आधार पर ही गठित किया जाना चाहिए।
यह समझना जरा भी मुश्किल नहीं है कि अगर आरएसएस हिंदुओं को एक विशिष्ट राष्ट्र मानता है तो वह यह भी स्वीकार कर रहा है कि अन्य धर्म के लोग भिन्न राष्ट्र हैं। यह बिल्कुल वही सोच है जो मुस्लिम लीग की थी।
आरएसएस धर्म-निरपेक्ष भारत की प्रति वफादार होने के बजाए हिंदू-राष्ट्र बनाने के प्रति संकल्पबद्ध है
आरएसएस के स्वयंसेवक भारत के प्रजातांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष संविधान में कितनी आस्था रखते हैं उसका अनुमान आरएसएस की शाखाओं में की जाने वाली ‘प्रार्थना’ और ‘प्रतिज्ञा’ से लगाया जा सकता है। ‘प्रार्थना’ में भारत के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप को नकार कर इसे हिंदू भूमि की संज्ञा दी गई है। प्रार्थना के शब्द हैं:
हे वत्सल मातृभूमि! मैं तुम्हें निरंतर प्रणाम करता हूं! हे हिंदूभूमि! तूने ही मुझे सुख में बढ़ाया है। हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे हित मेरी यह काया अर्पित हो। तुम्हें मैं अनंत बार प्रणाम करता हूं। हे सर्वशक्तिमान परमेश्वर! ये हम हिंदूराष्ट्र के अंगभूत घटक, तुम्हें आदरपूर्वक प्रणाम करते हैं। तुम्हारे ही कार्य के लिए हमने अपनी कमर कसी है, उसी की पूर्ति के लिए हमें शुभ आशीर्वाद दो। विश्व के लिए ऐसी अजेय शक्ति, जिसे विश्व में कोई जीत न सके,जिसके समक्ष सारा जगत् विनम्र हो-ऐसा विशुद्ध शील तथा बुद्धिपरक स्वीकृति हमारे कण्टकमय मार्ग को सुगम करें, ऐसा ज्ञान हमें दो।
यह जानकर किसी को भी आश्चर्य हो सकता है कि आरएसएस के स्वयंसेवक भारत के मौजूदा संवैधानिक ढांचे को सुरक्षित रखने के बजाए निम्नलिखित प्रतिज्ञा करते हैं:
सर्वशक्तिमान श्री परमेश्वर तथा अपने पूर्वजों का स्मरण कर मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि अपने पवित्र हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति तथा हिंदू समाज का संरक्षण कर हिंदू राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति करने के लिए मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का घटक बना हूं। संघ का कार्य मैं प्रामाणिकता से, नि:स्वार्थ बुद्धि से तथा तन, मन, धन पूर्वक करूंगा और इस व्रत का मैं आजन्म पालन करूंगा। भारत माता की जय।
भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री और अन्य मंत्री जो अपने आपको बचपन से ही आरएसएस का स्वयंसेवक कहते हैं उनसे इस देश के नागरिक यह जरूर जानना चाहेंगे कि वे एक प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत के प्रति वफादार हैं या इसको नष्ट करके हिंदू राष्ट्र बनाने के काम में जुटे हैं। उन्हें यह जरूर बताना होगा कि वे किसके प्रति वफादार हैं।
आरएसएस साझे राष्ट्रवाद के प्रतिक तिरंगे झंडे की तोहीन करता है
स्वतंत्रता की पूर्वसंध्या पर जब दिल्ली के लाल किले से तिरंगे झंडे को लहराने की तैयारी चल रही थी आरएसएस ने अपने अंग्रेजी मुखपत्र (ऑर्गनाइजर) के 14 अगस्त सन् 1947 वाले अंक में राष्ट्रीय ध्वज के तौर पर तिरंगे के चयन की खुलकर भत्र्सना करते हुए लिखा:
वे लोग जो किस्मत के दांव से सत्ता तक पहुंचे हैं वे भले ही हमारे हाथों में तिरंगे को थमा दें, लेकिन हिंदुओं द्वारा न इसे कभी सम्मानित किया जा सकेगा न अपनाया जा सकेगा। तीन का आंकड़ा अपने आप में अशुभ है और एक ऐसा झंडा जिसमें तीन रंग हों बेहद खराब मनोवैज्ञानिक असर डालेगा और देश के लिए नुकसानदेय होगा।
आरएसएस के प्रमुख सिद्धांतकार गुरु गोलवलकर देश के मुसलमानों और ईसाइयों को खतरा बताते हैं।
गोलवलकर की रचनाओं का संकलन विचार नवनीत आरएसएस के कार्यकर्ताओं के लिए एक पवित्र पुस्तक का स्थान रखता है। इस पुस्तक के 16 वें भाग का शीर्षक है आंतरिक संकट जिसमें गोलवलकर मुसलमानों को खतरा नंबर एक और ईसाईयों को खतरा नंबर दो बताते हैं। मुसलमानों को नंबर एक का खतरनाक तत्व बताते हुए वह कहते हैं : देश के अंदर कितनी ही मुस्लिम बस्तियां हैं, अर्थात कितने ही लघु पाकिस्तान हैं, जहां देश का सामान्य कानून कुछ संशोधनों के साथ लागू होता है औरजहां दुष्टों के मन की लहर ही अंतिम नियम है। इस देश में इस प्रकार की बस्तियां नि:संशय रूप से पाकिस्तान-समर्थकतत्वों के चारों ओर फैले हुए जाल के छोटे-बड़े केंद्र हो गए हैं… निष्कर्ष यह है कि प्राय: हर स्थान में ऐसे मुसलमान हैं जो ट्रांसमीटर के द्वारा पाकिस्तान से सतत संपर्क स्थापित किए हैं।
ईसाइयों को आंतरिक सुरक्षा के लिए दुश्मन नं दो घोषित करते हुए गोलवलकर ने लिखा : उनकी गतिविधियां केवल अधार्मिक ही नहीं, राष्ट्रविरोधी भी हैं… इस प्रकार भूमिका है हमारे देश में निवास करने वाले ईसाई सज्जनों की। वे यहां हमारे जीवन के धर्मिक एवं सामाजिक तंतुओं को ही नष्ट करने के लिए प्रयत्नशील नहीं है वरन विविध क्षेत्रों में और यदि संभव हो तो संपूर्ण देश में राजनीतिक सत्ता भी स्थापित करना चाहते हैं।
आदरणीय राजनाथ सिंह जी आरएसएस के एक बहुत वरिष्ठ और कर्मठ कार्यकर्ता होने के नाते आप अपने संगठन के भारत विरोधी इन विचारों से भली-भांति परिचित होंगे। हिंदू-राष्ट्रवाद के इन्हीं उग्र विचारों से प्रेरित होकर आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों की भीड़ ने दिसंबर (छह) 1992 में अयोध्या नगरी में एक मस्जिद को ढाया था जिसकी वजह से देश के हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक गहरी खाई पैदा हो गई। यह जघन्य अपराध पाकिस्तान ने नहीं बल्कि आरएसएस ने अंजाम दिया था। आरएसएस से जुड़े लोग भारत को केवल हिंदुओं के लिए आरक्षित भूमि बताते हैं और इनमें से कु छ तो इस बात की भी घोषणा कर चुके हैं कि 2021 तक भारत को मुसलमानों और ईसाइयों से खाली कराकर एक खालिस हिंदू राष्ट्र बना दिया जाएगा।
महोदय, मैं भारत के एक नागरिक के तौर पर आपसे यह जानना चाहता हूं कि क्या आप आरएसएस के एक वरिष्ठ नेता के तौर पर इन राष्ट्र-विरोधी विचारों से सहमत हैं ? आपके भाषणों, लेखनी और आचरण से तो यही लगता है कि आपको इस सब पर कोई आपत्ति नहीं है। इसलिए मुझे यह प्रश्न पूछने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। भारत में आरएसएस के राज के चलते क्या प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत के विनाश के लिए किसी पाकिस्तान या दूसरी विदेशी शक्ति की जरूरत है।
मैं अपनी बात समाप्त करने से पहले आपको इस सच्चाई से अवगत करना चाहता हूं कि भारतीय मुस्लमान अपने प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष देश से बेइंतहा मोहब्बत करते हैं और पाकिस्तान हो या कोई और भारत दुश्मन उसके शैतानी मंसूबों से नफरत करते हैं। लेकिन यह आरएसएस और उससे जुड़े संगठन व लोग हैं जो भीतर से प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत को तबाह करने के काम में दिन-रात लगे हैं। इस शैतानी काम की शुरुआत 30 जनवरी, 1948 को गांधी जी की हत्या के साथ हो गई थी। यह काम लगातार जारी है और पाकिस्तान जैसे देश इस बात का इंतजार कर रहे हैं कि कब आरएसएस अपने मंसूबों में सफल ह ो तो वे भी जश्न मना सकें।
मैं आशा करता हूं कि आप एक प्रजातांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष भारत के गृहमंत्री होते हुए राष्ट्र-विरोधी आरएसएस की विचारधारा से मुक्त होकर देशभक्त भारतीयों के साथ खड़े रहेंगे ताकि पाकिस्तान को कभी भी खुश होने का अवसर प्राप्त न हो। 

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