मंटो का इकलौता उपन्यास

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यह पत्र शकील सिद्दीकी के पत्र के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए ‘सही जानकारी के सवाल के नाम परÓ लिखा जा रहा है, वैसे ऐसा कोई हस्तक्षेप मेरी प्रकृति नहीं है।
हिंदी पाठकों को याद नहीं है कि श्रीपत राय ने कहानी की तरह 1956 में उपन्यास नामक एक मासिक भी निकाला था। इसके संपादक श्रीपत राय और भैरव प्रसाद गुप्त थे। मंटो भैरव प्रसाद गुप्त के प्रिय लेखक थे। कहानी के सन् 1955 के ऐतिहासिक महत्त्व के विशेषांक में भैरव प्रसाद गुप्त ने मंटो की कहानी ‘टोबा टेकसिंहÓ प्रकाशित की थी। उपन्यास के दूसरे अंक में 1956 में भैरव प्रसाद गुप्त ने मंटो का ‘इकलौत उपन्यासÓ (यह भैरव के ही शब्द हैं)बगैर उनवान राजो और मिस फरिया नाम से छापा था।
इसके अनुवादक महमूद अहमद ‘हुनरÓ थे। उपन्यास चूंकि आकार की दृष्टि से काफी छोटा था, भैरव प्रसाद गुप्त ने मंटो के नाम से ‘सआदत हसनÓ नामक आत्मकथ्य दिया था, एक लेख ‘मंटो और उसकी कलाÓ अबुल्लैस सिद्दी का दिया था और मंटो की एक-दो कहानियां भी दीं थीं। लेकिन मंटों के संदर्भ न नरेंद्र मोहन, न भैरव प्रसाद गुप्त का जिक्र करते हैं, न ही अन्य लोग। जाहिर है शकील सिद्दीकी को तो इन सब बातों की कोई जानकारी ही नहीं है।

– मधुरेश, बरेली

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