दुनिया की हार के खिलाफ एक फलसफा देखने का

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जॉन बर्जर के महत्त्व पर शिवप्रसाद जोशी
”मैं आपको नहीं बता सकता हूं कि कला क्या करती है और कैसे करती है, लेकिन मैं जानता हूं कि कला ने अक्सर जजों का भी फैसला सुनाया है, बेगुनाहों की वकालत की है और भविष्य को यह दिखाया है कि अतीत पर क्या गुजरी थी, इस तरह कि वो कभी नहीं भुलाया जा सका है। मैं यह भी जानता हूं कि शक्तिशाली लोग कला से डरते है, चाहे वो अपने किसी भी रूप में हो। जब यह ऐसा करती है तो फिर लोगों के बीच ऐसी कला कभी-कभी एक अफवाह की तरह और कभी एक किंवदंती की तरह उतर आती है क्योंकि उसे उस चीज का बोध रहता है जो जीवन की क्रूरताएं नहीं महसूस कर सकती हैं, वो बोध जो हमें एकजुट करता है, क्योंकि आखिरकार यह है तो इंसाफ ही, उसमें निहित। कला जब इस तरह कार्य करती है, तो वो अदृश्य, अपरिवर्तनीय और स्थायी साहस और सम्मान की मिलन-स्थली बन जाती है।‘’ (बर्जर, 1991)
ब्रिटिश कला चिंतक, पेंटर, कवि, निबंधकार और सार्वजनिक बुद्धिजीवी के रूप में ख्यात जॉन बर्जर 90 साल की भरी-पूरी उम्र जीकर इस दुनिया से इस नए साल 2017, के दूसरे दिन विदा हुए। ठीक एक दिन पहले, ब्रिटेन के ही और बर्जर की ही तरह सार्वजनिक बुद्धिजीवी, एक्टिविस्ट लेखक और जाने-माने अर्थशास्त्री और पब्लिक इकोनॉमिक्स के जनक कहे गए एंथनी एटकिन्सन ने आखिरी सांस ली। दोनों दिग्गजों ने जीवन के अलग-अलग क्षेत्रों में खुद को खपाया और 20वीं सदी के मध्य से 21वीं सदी के डेढ़ दशक पूरे हो जाने तक अपने विचारों, अनुभवों, अध्ययनों और किताबों से हमारी इस दुनिया को बेहतर बनाने की अनथक लड़ाई के अग्रिम योद्धा बने रहे।

जीवन, किताब और फिल्म
1926 में लंदन में पैदा हुए बर्जर को यूनिवर्सिटी सिस्टम से डर और परहेज था। सेंट्रल स्कूल ऑफ आर्ट और चेल्सी स्कूल ऑफ आर्ट से कला की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने दूसरे विश्व युद्ध के दौरान और उसके तत्काल बाद का कुछ समय (1944-46) ब्रिटिश सेना में बिताया। आगे जीवनयापन के लिए पेंटिंग की और टीचर बने। इसी दौरान माक्र्स की ओर मुड़े। और फिर जीवन भर माक्र्सवादी रहे, अपनी तरह के। पेंटिग करते थे लेकिन उसे छोड़कर लिखने की ओर झुके और जीवनपर्यंत यही करते रहे। उनके मुताबिक, ”एक चित्रकार, वॉयलिन वादक की तरह होता है। आपको हर रोज बजाना होता है। आप छिटपुट तौर पर ऐसा नहीं करते रह सकते हैं। मेरे लिए चित्रकारी में अपनी जिंदगी गुजार देना मुश्किल था क्योंकि मेरे सामने बहुत सारे राजनीतिक तकाजे थे। सबसे बड़ी ताकीद एटमी हमले की थी- यह जोखिम अमेरिका से था, सोवियत संघ से नहीं।‘’ 1951 से न्यू स्टेट्समैन अखबार के लिए कला समीक्षा शुरू की। 1958 में उनका पहला नॉवल प्रकाशित हुआ, अ पेंटर ऑफ अवर टाइम। 1960 में उनके शुरुआती निबंधों की पहली किताब परमानेंट रेड आई। बर्जर ने न्यू सोसायटी, पंच और संडे टाइम्स के लिए भी आलोचनाएं लिखीं। 1965 में उनकी चर्चित और पिकासो प्रेमियों के बीच विवादास्पद किताब सक्सेस एंड फेल्योर ऑफ पिकासो प्रकाशित हुई। पिकासो के घनवाद की तारीफ करते हुए बर्जर ने प्रस्थापना भी इस किताब में रखी कि पिकासो को महानता का आवरण पहनाने में तत्कालीन बुर्जुआ का भी बड़ा हाथ था और उनकी कृतियां अंतत: बुर्जुआ कमोडिटी बन कर रह गईं।
1962 में बर्जर ने लंदन छोड़ा और योरोप के अन्य देशों का रुख किया। 1974 में वो फ्रांस के पेरिस के पास क्विनजी नाम के देहाती इलाके में जा बसे। वहीं से लिखते-पढ़ते, सोचते और देखते रहे और निबंध लिखे। वहां के किसानों के साथ काम किया, घुलेमिले। वहां उन्होंने इंटू देअर लेबर्स नाम से एक पुस्तक त्रयी की रचना की: पिग अर्थ, वंस इन योरोपा और लिलियक एंड फ्लैग: एन ओल्ड वाइव्स टेल ऑफ अ सिटी। इस त्रयी में फ्रांसीसी ग्रामीणों की जिंदगियों के ब्यौरे हैं। कि कैसे वे एक देहात और कस्बे से निकलते हुए एक शहर की ओर रुख करते हैं। 1972 में बर्जर ने बीबीसी के लिए ‘वेज ऑफ सीइंग’ के नाम से कला पर एक सीरिज लिखी और पेश की। इस शृंखला ने तो मानो कला आलोचना की दुनिया को पहले स्तब्ध फिर बदल ही डाला। और सिर्फ कला ही नहीं, मनोरंजन उद्योग, टीवी, फोटोग्राफी, विज्ञापन- सांस्कृतिक विमर्श के नए दरवाजे खोलते हुए यह किताब एक समांतर बाइबल की तरह हाथोंहाथ ली गईं। कहा जाता है कि बर्जर अपने नजरिए के लिए वॉल्टर बेंजामिन के निबंध ‘द वर्क ऑफ आर्ट इन द एज ऑफ मकैनिकल रिप्रोडक्शन’ से गहरे प्रभावित थे। 1972 में ही उनका उपन्यास जी (अंग्रेजी वर्णमाला का अक्षर) प्रकाशित हुआ। अपने उत्तर आधुनिक संदर्भों के लिए मशहूर इस उपन्यास के लिए उन्हें बुकर पुरस्कार भी मिला और इनाम की आधी रकम उन्होंने कैरिबियाई आंदोलनकारी समूह ब्लैक पैंथर्स को दान कर दी क्योंकि उनका मानना था कि कैरिबियाई इलाकों में नवउपनिवेशी शोषण में बुकर पुरस्कार देने वाली बुकर्स संस्था के कंपनी हितों का भी हाथ था। 1973 में वेज ऑफ सीइंग को किताब के रूप में ले आ गया। कला समीक्षा का नया रास्ता फूट पड़ा। जॉन बर्जर एक राजनीतिक बुद्धिजीवी के रूप में भी दुनिया में जान लिए गए। 1976 में बर्जर ने जोनाअ हू विल बि ट्वेंटीफाइव इन द इयर 2000 नाम की फिल्म की पटकथा लिखी जिसके लिए उन्हें न्यूयार्क क्रिटिक्स अवार्ड मिला। 1982 में बर्जर ने अनदर वे ऑफ टेलिंग लिखी। 1991 में उनकी किताब कीपिंग ए रेंदेवु आई जिसमें विजुअल कलाओं पर उनके निबंध और कविताएं संकलित हैं। 1993 में वॉक मी होम नाम की फिल्म की पटकथा लिखी और उसमें अभिनय भी किया। 2001 में बर्जर की किताब द शेप ऑफ अ पॉकेट एंड सेलेक्टड एसेस प्रकाशित हुई। 2005-06 में हेअर इज वेअर वी मीट: द स्टोरी ऑफ क्रॉसिंग पाथ्स नाम का उनका कहानी संग्रह आया। अपनी भाषा, संरचना और शिल्प में यह एक वास्तविक पोस्टमॉडर्न उपन्यास सरीखा है जहां बर्जर नाम के किरदार की मुलाकात ऐसे अपने निकटस्थ लोगों से विभिन्न देश काल में हो रही है जो उनके अपने रहे हैं मां से लेकर दोस्त तक।
बर्जर आखिरी दिनों तक फ्रांस के क्विनजी में ही रहे। वहीं पर उन पर एक वृहद वृत्तचित्र बनाया गया, द सीजन्स इन क्विनजी के नाम से जो चार अलग अलग छोटी फिल्मों का एक कोलाज है। टिल्डा स्विंटन और कोलिन मैककेब की बनाई ये चार फिल्में बर्जर की शख्सियत के चार पहलुओं को चार मौसमों चार विचारों के जरिए सामने लाती हैं। सात महीने पहले इसका ट्रेलर जारी हुआ। अद्भुत है। इस फिल्म का हमें इंतजार है। कुछ लोग शायद देख भी चुके हों। इसी में लगभग मंत्र की तरह बर्जर ने कहा था, ”अगर मैं किस्सागो (स्टोरीटेलर) हूं तो इसलिए कि मैं सुनता हूं।‘’ फिल्म देखने के बाद ही पता चल सकता है कि देखने पर जोर देने वाले बर्जर ने सुनने पर जोर आखिर किन संदर्भों में दिया होगा। एक अनुमान यह है कि सुनते हुए को भी देखने की बात वो कर रहे हों, बात अटपटी लग सकती है कि लेकिन आधुनिक क्लासिक्स में शुमार वेज ऑफ सीइंग पढऩे के बाद आपको यह बात शायद उतनी अटपटी न लगे। पिछले ही साल उम्र के नौवें दशक में प्रवेश करने के अवसर पर बर्जर को सलाम करते हुए दो किताबें आईं। द लॉंग व्हाइट थ्रेड ऑफ वर्ड्स जिसमें उनके चाहने वाले विश्व कवियों की रचनाएं शामिल हैं। इस किताब की संपादक त्रयी में अमरजीत चंदन, गैरेथ इवांस और यास्मीन गुणरत्नम हैं। दूसरी किताब है, अ जार ऑफ वाइल्ड फ्लावर्स जिसमें नामचीन लेखकों के निबंध शामिल हैं। इसके संपादक अमरजीत चंदन और यास्मीन गुणरत्नम हैं। 2016 की ये अंग्रेजी किताबें विकट ऑनलाइन बाजार में हैं, हिंदी एक बहुत दूर का बिंदु है।

देखो मगर ध्यान से
वेज ऑफ सीइंग को कला, संस्कृति और राजनीति के अंतर्संबंधों पर एक दस्तावेजी किताब माना जाता है। बर्जर की दृष्टि के निर्माण में इन तीनों अवधारणाओं का योगदान है। बर्जर ने कला के स्थापित आलोचना कर्म और देखने के पैमानों को भारी चोट पहुंचाई। उन्होंने अपने अकाट्य तर्कों के सहारे साबित किया कि एक पेंटिग क्योंकर एक बुर्जुआ गतिविधि भी होती है और क्योंकर वो अभिजात हितों और स्वार्थों की हिफाजत करती हुई रह जाती है। बर्जर ने देखने के तरीके से इलीटिज्म का चश्मा उतारने को कहा। उन्होंने यह नहीं बताया कि आप इस तरह किसी चित्र को देखो या इस तरह न देखो। उन्होंने बस यह बताया कि आप कैसे देखो, क्या देखो। मिसाल के लिए स्त्री शरीर की नग्न चित्र परंपरा पर बर्जर ने यह कहकर हमला किया कि यह सिर्फ मर्दवादी यौनेच्छा की भूख है। वो दर्शक के सामने पेश की गई स्त्री की देह है।
जॉन बर्जर के कला फलसफे में स्त्री चित्रण पर खास जोर है। तमाम नारीवादी और उत्तर आधुनिक विमर्शों में हमें यह व्याख्या नहीं मिलती। यहां तक कि पारंपरिक-प्रचलित-रूढिग़्रस्त माक्र्सवादी नजरिए भी कुछ दूर जाकर ठिठक जाते हैं। बर्जर इस यथास्थिति या इस कमजोरी को तोड़ते हैं। कला में प्रशंसा से ज्यादा आशय खोजने पर उनका जोर रहा है। इसी शिनाख्त में वो यह भी पता लगाते हैं कि ऑयल पेंटिंग परंपरा किस तरह निजी संपत्ति के रूप में परिवर्तित हो जाती है। वेज ऑफ सीइंग में उन्होंने चित्र दर चित्र पश्चिमी कला जगत में स्त्री की उपस्थिति के निहितार्थ समझाए हैं। न्यूड श्रेणी के चित्रों की पड़ताल करते हुए बर्जर बताते हैं कि अनावृत स्त्री देह, और कुछ नहीं कलाकार और कला दर्शक के लिए एक यौन कामना है। स्त्रियों की नग्नता उनकी अपनी अभिलाषा और उनकी अपनी चाहत से चित्र में प्रकट नहीं होती, वो एक पुरुष के लिए उकेरी गई यौनेच्छा की एक प्रतिकृति बन जाती है। वह विजन का एक ऑब्जेक्ट बन जाती है। नग्न स्त्री की देह को आंका जाता है, बार-बार देखा जाता है जैसे उसका सर्वे किया जा रहा हो और सर्वे करने वाला पुरुष होता है। स्त्री के लिए यहां कुछ नहीं है। यह एक पुरुषवादी दृष्टि के लिए उकेरी गई नग्नता है। बर्जर के मुताबिक इसमें कला नहीं है। और अगर यह कला है तो ये देह को टटोलने की एक कला होगी। अपनी भूख को टटोलने की और उसका विस्तार करने की कला।
वह उस रूप में नग्न नहीं है जैसी कि वह है, वह उस रूप में नग्न है जैसा कि प्रेक्षक या दर्शक उसे देखता है
बर्जर बताते हैं कि गैर योरोपीय कला परंपराओं में खासकर भारतीय कला, पर्शियन आर्ट, अफ्रीकी और प्रि-कोलम्बियन आर्ट में नग्नता इतनी चित्त, उदासीन और हवाले हो चुकी के अंदाज में नहीं है। इन कला निरूपणों में एक सक्रिय और उद्दाम प्रेम का इजहार है, यौन आकर्षण और यौन उद्दीपन की एक वास्तविक सचेत मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति है, वहां स्त्री पुरुष की तरह ही सक्रिय है। दोनों की क्रियाएं एक दूसरे में घुलमिल जाती हैं। वहां सिर्फ यौन वस्तु की तरह देह को देखता पुरुष प्रेक्षक नहीं है। वो उसका कन्ज्यूमर नहीं है। यह बात अलग है कि जिन समाजों के जिन वक्तों की कलाओं के उदाहरण बर्जर ने दिए उन समाजों के आने वाले वक्तों में कलाएं कितनी विचलित, अस्थिर और बाजार के हवाले हुई हैं। वेज ऑफ सीइंग में एक जगह बर्जर कहते हैं, ”औरत के साथ हमेशा कोई न कोई रहता है, सिवाय जब वो बिल्कुल अकेली हो लेकिन तब भी शायद उसकी अपनी बनाई छवि उसके साथ रहती है। वो कमरे से गुजर रही हो या अपने पिता की मौत पर रो रही हो, वो खुद को चलता हुआ और रोता हुआ न देखना नहीं रोक सकती। सबसे शुरुआती बचपन से ही उसे सिखाया जाता है और इसके लिए जोर भी दिया जाता है कि वो खुद का लगातार निरीक्षण करती रहे, खुद का सर्वे। उसे हर उस चीज का सर्वे करना होता है जो वो है और जो वो करती है क्योंकि वो दूसरों को कैसी दिखती है- खासकर मर्दों के सामने कैसी दिखती है- उसकी जिंदगी की कामयाबी के लिए सामान्य तौर पर जैसा सोचा गया है उसके लिए यह निहायत ही महत्त्वपूर्ण है।‘’
उन्होंने कला में ‘नेकड’ और ‘न्यूड’ के फर्क को समझाया। नेकड (अनावृत) का मतलब वस्त्रहीन और न्यूड (नग्नता) को एक कला रूप मान लिया जाता है। लेकिन बर्जर यहीं पर इस धारणा को चुनौती देते हैं कि अगर न्यूड एक कला रूप है तो फिर न्यूड तस्वीर, न्यूड अदा, न्यूड हावभाव क्या है। आगे बढ़कर कह सकते हैं कि फिर पॉर्न क्या है। न्यूड को एक कला परिपाटी में बड़ी चतुराई से ढाला गया है। आखिरकार बर्जर इस नतीजे पर आते हैं कि अनावृत यानी नेकड होना खुद का होना है। न्यूड यानी नग्न होना दूसरों द्वारा नग्न हुआ देखा जाना है जिसमें अपने लिए इसका कोई पहचान सूत्र नहीं होता। नेकड देह को न्यूड देह बनने के लिए एक वस्तु की तरह पेश आना होता है। इस वस्तु को देखना इसे वस्तु के रूप में भोगने की चाहत को उद्दीप्त करता है। नेकडनेस खुद को जाहिर कर देती है। न्यूडिटी प्रदर्शन के लिए होती है। वो एक तरह की पोशाक है। बर्जर बड़े धैर्य और पैनी निगाह से बताते हैं कि न्यूड चित्र एक डिसप्ले है। वो प्रेक्षक के लिए पेश किया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उक्त चित्र उसकी किस स्थिति या पर्यावरण में तैयार किया गया है, उसका मूल सबजेक्ट भी तितर-बितर हो जाता है बस रह जाती है तो प्रेक्षक की निगाह। इस कला कर्म में बर्जर यह खोट बताते हैं कि अगर वो न्यूड देह किसी प्रेम क्षण को अभिव्यक्त करने के लिए किया गया भी होता है तो उसका असली मकसद प्रेक्षक के लिए एक नग्नता को जुटाना ही रहता है। वो प्रेक्षक को ही देख रही होती है या उसकी भंगिमाएं और उसकी मुद्राएं इस तरह से उकेरी जाती हैं कि वो अपने पेंटिंग के यथार्थ में कम, प्रेक्षक के यथार्थ में ज्यादा मुस्तैद नजर आती है जो दरअसल यौन कामना का एक फूहड़ यथार्थ ही है क्योंकि उसका संबंध सिर्फ वासना और उपभोग से है।
बर्जर ने तो न्यूड मॉडल को कई पेंटिंग्स में केश रहित दिखाने की भी मीमांसा की है क्योंकि उनका संबंध स्त्री के पैशन और उसके अपने सौंदर्यबोध से है तो उसे न दिखाकर प्रेक्षक के लिए रास्ता खुला छोड़ दिया जाता है। यानी वो एक ऐसी अवस्था में है जहां वो समर्पित है और उसकी अपनी कोई भावना नहीं है। वह इस्तेमाल किया जाने वाला एक दृश्य-उत्पाद है। वहां स्त्रियता एक पुरुष-प्रेक्षक सर्वे के लिए उपलब्ध है। बर्जर ने आधुनिक कला रूपों में न्यूडिटी के निरूपण में आए बदलावों को भी रेखांकित किया है। भले ही स्त्री छवियों में वैसी प्रेक्षक केंद्रित मानसिकता कम होती गई है लेकिन जिस तरह से मीडिया रूपों का विस्तार हुआ है और आज विज्ञापन, टीवी, सिनेमा या पत्रकारिता में हम स्त्री छवियों को देखते हैं तो लगता है कि देखने का विद्रूप सघन ही हुआ है। वे मूल्य और प्रवृत्तियां नए ढंग से हमलावर हैं। स्त्री चित्रण और स्त्री रूप की प्रस्तुति में आशय नहीं बदले हैं क्योंकि प्रेक्षक सदा से वही रहता आया है। यानी पुरुष। बर्जर तो अपने तर्क को साबित करने के लिए जोखिम उठाते हुए चुनौती भी देते हैं कि एक पारंपरिक न्यूड चित्र को लीजिए और उसमें स्त्री को पुरुष में रूपांतरित करना शुरू कीजिए। अपने मस्तिष्क की आंख के जरिए या चित्र बनाकर। और फिर उस हिंसा को नोट कीजिए जो इस रूपांतरण के दौरान उभरती है। छवि के प्रति नहीं बल्कि संभावित दर्शक की धारणाओं के प्रति।
अपनी इसी अवधारणा को बर्जर कला से आगे भूमंडलीकृत पूंजीवाद की अन्य विडम्बनाओं और विज्ञापन और उपभोक्तावाद की आततायी संस्कृति तक ले गए और बताया कि स्त्री देह का जो चित्रण कला में था वो विज्ञापन, प्रचार और ग्लैमर और फैशन की दुनिया में उस भूख और चाहत को एक नए विस्तार की ओर ले गया। यह एक भीषण चाक्षुष अनुभव से भीषण उपभोग के अनुभव की ओर जाने की तीव्र फिसलन थी। इस तरह बर्जर ही हमें सबसे पहले यह बताते हैं कि कलाएं पहले अपने प्रदर्शन में फिर अपने निरूपण में और फिर अपने आगामी इस्तेमालों में कितनी मनुष्यविरोधी, अमानवीय और पतन की ओर ले जाने वाली हो सकती हैं। लेकिन बर्जर सिर्फ इस नैतिक विचलन को नोट करने वाले या उस पर चोट करने वाले या उससे सावधान करने वाले चिंतक नहीं थे, उन्होंने कला को एक मानवीय और एक माक्र्सवादी सौंदर्यबोध के रास्ते से समझने के तरीके भी समझाए हैं। उनके पास बदलाव के टूल्स थे। उन्होंने दुनिया को बदलने के लिए सांस्कृतिक प्रतीकों को मनुष्य चेतना से जोडऩे के तरीके भी बताए। उन्होंने बताया कि कला से हम कैसे राजनीति की ओर रुख कर सकते हैं। हम कैसे कला को मानवीय चेष्टा का हथियार बना सकते हैं। भूमंडलीय पूंजीवाद के प्रतीकों की बर्जर की प्रखर छानबीन ही हमें और जागरूक और सचेत बनाती है। बर्जर कहते हैं कि पूंजीवाद जिस बहुसंख्यक आबादी का शोषण करता है उसे मजबूर करता है कि वो अपनी दिलचस्पियों को यथासंभव संकरा बनाकर परिभाषित करे। इसी धारणा पर पूंजीवाद टिका रहता है। एक दौर में व्यापक हरण के जरिए इसे हासिल किया गया था। आज विकसित देशों में, क्या वांछनीय है और क्या नहीं, इसका एक नकली पैमाना थोप कर पूंजीवाद का लक्ष्य हासिल किया जाता है।

शब्द, अस्तित्व और द्वंद्व
2006 की अपनी किताब कन्फैब्यलेशन में विजुअल भाषा से आगे शब्द की दृश्यात्मकता की अहमियत बताते हैं। जॉन बर्जर मानते हैं कि भाषा एक देह है, एक जीवित प्राणी… और इस प्राणी का निवास अव्यक्त भी है और व्यक्त भी। बर्जर के मुताबिक विश्वसनीयता में एक अजीब तरह का द्वंद्व रहता है। किसी अनुभव की संदेहार्थता और अनिश्चितता के प्रति, यहां तक कि वो निश्चितता का अनुभव ही क्यों न हो, उसके प्रति लेखक का खुलापन ही है जो लेखन को स्पष्टता और इसलिए एक किस्म का यकीन मुहैया कराता है। फॉर्म और कंटेट एक दूसरे से गुंथे हुए हैं, इस तरह कि उनसे एक साथ खून रिसता है। लेखन में प्रामाणिकता, अनुभव की संदेहार्थकता के प्रति वफादारी से ही आती है। उनका एक मशहूर कथन है, ”व्यक्ति की मृत्यु उसके बारे में तमाम चीजों को निश्चित बना देती है।‘’ बर्जर अपने लेखन में नए दिक् काल का निर्माण करते हैं। उनकी तलाश उस दिक् काल की है जो नजरों से ओझल है या नजरअंदाज है। वेज ऑफ सीइंग से लेकर अंडरस्टैडिंग द फोटोग्राफ तक आप पाएंगें कि बर्जर एक विलक्षण दार्शनिक निगाह से पेंटिंग, मनुष्य, उपकरण, वस्तु, चित्र, वातावरण और क्रिया सबको एक साथ रखकर छानबीन करते हैं। उनके मुताबिक देखने का मुकम्मल तरीका, मुकम्मल सौंदर्य ही नहीं देखने की एक मुकम्मल राजनीति भी संभव है। इसके लिए टूल्स भी उन्होंने बताए हैं। सबसे बड़ा टूल तो आपकी अपनी मानवीय चेतना ही है। अंत:करण पर बर्जर का खासा जोर है। अंतत: यह देखना अंत:करण की आवाज सुनकर देखना ही है। बर्जर के इस मंत्र से दुविधाओं की बंद लकीरें खुलती हैं और नई दुविधाओं नए द्वंद्वों से हमारा सामना हो पाता है। बर्जर का मंत्र मुक्ति का मंत्र नहीं है, वो देखने की गूढ़ता को हल करने के बाद मोक्षप्राप्ति का मंत्र नहीं है, वो हमें नए चक्कर में फंसा लेने वाला माक्र्सवादी सौंदर्यबोध है। आपको निजात नहीं मिल सकती। देखने का दिक्-काल फैलता जाता है और सहसा नई विमाएं प्रकट होने लगती हैं।
उनके निष्कर्ष इसीलिए सबसे अलग और अनोखे हैं। पेंटिंग को देखने का जो नजरिया बर्जर बताते हैं और जो वो यह बताते हैं कि फलां पेंटिंग के पीछे कलाकार की क्या अवधारणा और क्या मानस काम कर रहा होगा, वो विश्लेषण अद्भुत है। यानी यह छानबीन सिर्फ तर्कों और विश्लेषणों और पूर्व अध्ययनों और अपने संजोए ज्ञान पर केंद्रित नहीं है, इसमें बर्जर जैसे खुर्दबीनी निगाहों से पेंटर या कलाकार के मानस में झांकने का दुस्साहस करते हैं। वो दर्शक के विचार में भी दखल देते हैं और सटीक तौर पर बता पाते हैं कि आखिर एक पेंटिंग क्यों बनाई गई है और क्यों देखी जा रही है। यानी एक कलाकर्म की राजनीतिक-सांस्कृतिक सच्चाई की इतनी सूक्ष्म पड़ताल बर्जर के यहां है कि हैरानी होती है कि यह व्यक्ति इतने नामालूम दिक्-काल में आखिर क्यों और कैसे झांक पा रहा है। ये विलक्षणता थी बर्जर के पास जिसका एक मुजाहिरा हेअर इज वेअर वी मीट: द स्टोरी ऑफ क्रॉसिंग पाथ्स नाम के उनके आत्मकथात्मक उपन्यास में है। नाईजीरियाई मूल के युवा अमेरिकी उपन्यासकार, फोटोग्राफर और आर्ट हिस्टोरियन टेयु कोळ, बर्जर के कला चिंतन और खासकर इस कहानी संग्रह से गहरे प्रभावित रहे हैं। राजनीति, कला, साहित्य और फोटोग्राफी पर अपने निबंधों की किताब, नोन ऐंड स्ट्रेंज थिंग्स में बर्जर की एक किताब की समीक्षा करते हुए कोल कहते हैं कि बर्जर ने यह दिखाया है कि किस तरह यथार्थ की परिरेखाएं, चित्रकारी के कार्य में बाधा पहुंचा कर उसे परेशान करती हैं। बर्जर के मुताबिक, ”अगर चित्रांकन की लाइनें इस उत्पीडऩ की झलक नहीं दिखाती हैं तो वो सिर्फ एक निशान बन कर रह जाती है।‘’ कोल का कहना है कि, ”बर्जर के कहानी संग्रह ने मेरे जीवन को बदल दिया।‘’ कोळ के मुताबिक, ”इसमें साढ़े आठ कहानियां हैं। वास्तविक जीवन पर हैं लेकिन काल्पनिक हैं। बर्जर मृत लोगों से मिलते हैं। जैसे अपनी बहुत पहले मृत मां से एक मुलाकात।‘’ कला, साहित्य और राजनीति की आज की पीढ़ी के लिए बर्जर एक प्रस्थान बिंदु हो सकते हैं। और यह बात योरोप ही नहीं, एशिया, अफ्रीका और एशिया समेत तमाम महाद्वीपों के जन-संघर्षों और बौद्धिक बेचैनियों के लिए उपयुक्त है।
बर्जर ने जिस तरह योरोपीय कला में रिनेसां और उसके बाद के कला आंदोलनों की कृतियों को परखा, वो काम उन्होंने आगे भी जारी रखा और जेनुइन कला मुहावरों का जोरदार समर्थन किया। बर्जर के सिद्धांत हमें बताते हैं कि जब आप एक तयशुदा जेहन के साथ किसी कला को देखने आते हैं तो हो सकता है आपसे बहुत सी चीजें देखते हुए छूट जाएं, हो सकता है कि आप एक बहुत सीमित निगाह से देखते हुए लौट जाएं और उसी के आधार पर आकलन कर बैठें। जैसे कलाकर्म एक उद्दाम धीरज का इम्तहान है, कुछ वैसे ही इम्तहान से देखने वाले को भी गुजरना होता है। ऐसा न हो कि वो देखते हुए गुम ही हो जाए या एक स्थूल किस्म की वाह-वाह में लौट जाए। जेनुइन कला को एक सजग दर्शक की जरूरत है। जैसे एक जेनुइन कविता को सजग पाठक चाहिए। कलाकार के लिए यह एक बड़ी बात होगी अगर लोग उसकी कृति को एक ऑब्जेक्ट की तरह देखने के बजाय उसके समूचे पर्यावरण के साथ, उसके रंग, कोने, लाइनें, शेड्स के रूप में देखें। वो न सिर्फ उसकी तकनीक या उसकी जमीन देखें बल्कि अपनी कृति में उसका मंतव्य क्या है, उस तक पहुंचने की अपने अपने ढंग से कोशिश करें। कला कोई वक्तव्य देती ही हो, यह हरगिज जरूरी नहीं। हर कला बेशक बयान नहीं हो सकती लेकिन मजे की बात देखिए कि ऐसा कहने या ऐसा सोचने में ही एक बयान भी छिपा हुआ है। कुछ नहीं बताने, कुछ नहीं उद्घाटित करने का बयान। “ऐब्सन्स ऑफ अ स्टेटमेंट इज ऑल्सो अ स्टेटमेंट ऑफ ऐब्सन्स”। दर्शक के रूप में हमें कला में किसी उपस्थिति को और किसी अनुपस्थिति को, जो भी वहां है या नहीं है, उसे पकडऩा होता है। अगर हम कलाकार की रचना प्रक्रिया और उसकी कलाकृति को देखने की प्रक्रिया को बहुत गहराई से और अर्थपूर्ण और राजनीतिक तल्लीनता के साथ देखना चाहते हैं तो हमें शायद कुछ और ही टूल्स की जरूरत पड़ेगी। वे टूल्स, जैसा कि बर्जर हमें बता चुके हैं, अंत:करण, अंत:चेतना और अचैतन्य से मिलेंगे। (देखें समकालीन कला का दर्शन और मनोविज्ञान, समयांतर, दिसंबर 2014)
बर्जर की थ्योरी हाशिये की दृश्य-उपस्थिति की थ्योरी है। ब्राजील के शिक्षाशास्त्री और दार्शनिक पाउलो फ्रेरे ने जैसे उत्पीडि़तो का शिक्षाशास्त्र पेश किया कमोबेश उसी तरह बर्जर ने उत्पीडि़तों का कलाशास्त्र बनाया। इसमें जाहिर है कला सृजन से लेकर कला का दर्शन तक सब शामिल है। बर्जर ने पूंजीवादी और उपयोगितावादी और निजतावादी ढांचे की शिनाख्त कला में की और बताया कि देखने की प्रक्रिया को पूंजीवाद कैसे हड़प लेता है और दुष्चक्र की यह संस्कृति कैसे परिदृश्य में पसरी हुई है। अर्जेंटीना के कवि युआन गेलमान (चुनी हुई कविताओं के लेखक के किए अनुवाद, तनाव में प्रकाशित) की एक कविता पंक्ति को जॉन बर्जर ने अपने एक लेख का शीर्षक बनाया था: ‘अंगेस्ट द ग्रेट डिफीट ऑफ द वल्र्ड।‘ गेलमान की कविता से ही उस लेख का समापन किया था:
अपनी तफ्सील खुद जुटाती हुई आ गई है मृत्यु
हम लोग तैयार हैं
संघर्ष के लिए फिर से हम शुरू कर रहे हैं
शुरू कर रहे हैं फिर से हम सभी
दुनिया की महापराजय के खिलाफ
कभी खत्म न होने वाले साधारण सहयोगी
स्मृति में जलते रहते हैं आग की तरह
फिर से दोबारा बार बार।

वक्त को टटोलती निगाह
प्रख्यात लेखिका अरुंधति रॉय कहती हैं, ”जॉन बर्जर हमें सिखाते हैं कि कैसे सोचना है। कैसे महसूस करना है। कैसे चीजों को टकटकी लगाए देखते रहना है जब तक हम यह देख लें कि जो हम सोच रहे थे वो वहां नहीं है। सबसे बढ़कर वो हमें सिखाते हैं कि विपत्ति के हालात में हम कैसे प्रेम करें। वो मास्टर हैं।‘’ अरुंधति रॉय 2009 के दरम्यान जॉन बर्जर से मिलने गई थीं। बर्जर ने बस उनसे कहा कि, ”तुम अभी अपना कम्प्यूटर खोलो और अपना लिखा कुछ फिक्शन मुझे पढ़कर सुनाओ।‘’ अरुंधति के मुताबिक, ”ऐसा पूछ सकने वाला वो दुनिया का शायद अकेला शख्स था, मैंने एक छोटा सा पीस पढ़कर सुनाया जिसे सुनकर बर्जर ने लगभग आदेश देते हुए कहा, तुम फौरन दिल्ली लौटो और यह किताब पूरी करो।‘’ इस धक्के के करीब आठ साल बाद अब 2017 में बहुप्रतीक्षित उपन्यास आ रहा है अरुंधति का जिसका नाम है- द मिनिस्ट्री ऑफ अटमोस्ट हैपीनेस। अगर जॉन बर्जर न होते तो शायद यह उपन्यास न आ पाता या पता नहीं कब तक आ पाता जिसका बेसब्री से इंतजार अरुंधति के पाठक प्रशंसक एक्टिविस्ट करते रहे हैं जो उनके लेखन के ताप, उद्विग्नता और एक्टिविज्म के साथ-साथ बड़े हुए या निखरे हैं।
अरुंधति के साथ-साथ पंजाबी कवि और सार्वजनिक बुद्धिजीवी, चिंतक अमरजीत चंदन का जिक्र करना यहां जरूरी है। उनकी कविता पुस्तक आ गई है, सोनाटा फॉर फोर हैंड्स। अमरजीत ब्रिटेन में रहते हैं और योरोप-अमेरिका-एशिया के साहित्यिक-सांस्कृतिक हल्कों में जाने-माने हैं। उनकी कविताओं के पहले फुललेंथ कलेक्शन की एक सबसे खास बात यह है कि इसकी भूमिका जॉन बर्जर ने लिखी है जो अमरजीत की कविता और विचार के मुरीदों में शामिल हैं। यूट्यूब पर बर्जर, लसण- गार्लिक (लहसुन) कविता का पाठ करते हुए एक रिकॉर्डिंग है। यह अमरजीत चंदन की एक प्रतिनिधि कविता है। बर्जर, चंदन की कविता के बारे में कहते हैं कि, ”उनकी कविता अपने श्रोताओं या पाठकों को समयहीनता के विस्तार में ले जाती है। समय वहां एक कामदार पर्दे की तरह है। उनका कविता अभ्यास बताता है कि दिक् काल की चार विमाओं, जिन्हें हम आदतन पहचानते हैं, के अलावा और भी विमाएं हैं।‘’
ये दो जिक्र लाने का मकसद यह दिखाने का है कि जॉन बर्जर का देखने का तरीका कितना अलग और खास था। और अपने युवतर और युवा और नए समकालीनों के प्रति वो कितने सहृदय, सजग और संरक्षक जैसे थे। यह कोई लेखकीय, अप्रतिम या दैवीय विशिष्टता नहीं थी जो बर्जर को हासिल थी, यह एक बहुत ही चेतनासंपन्न, लोकतांत्रिक और जनवादी नजर थी जो दुनिया में सामूहिक प्रयासों की हिमायती थी। नए औपनिवेशिक और फासीवादी गठजोड़ सघन और सक्रिय हो रहे हैं और राजनीति, भूगोल, संस्कृति, कला, समाज से लेकर नींद और स्वप्न तक न सिर्फ उनके हमले तेज हैं बल्कि उनकी रंगते भी अलग हैं। बर्जर और उनके समकालीन सार्वजनिक बुद्धिजीवी अपने अपने ढंग से अपने अपने विषयों के जरिए इन रंगतों की असलियत सामने लाते रहे थे। यही काम एदुआर्दो गालियानो लातिन अमेरिकी जनता के सपनों को धराशायी होने से बचाने के लिए कर रहे थे। अंतरराष्ट्रीय फलक पर नॉम चॉमस्की एक झंडा थामे हुए हैं और उत्सुक और उत्तेजित दो पीढिय़ां उनके पीछे हैं…राष्ट्रीय स्तरों पर अलग अलग भाषाओं में सार्वजनिक बुद्धिजीवी अपनी बेचैनी और सक्रियता में एकाग्र और व्यापक हैं। हिंदी में इधर 2014 के बाद एक नया प्रतिरोध उभर कर आया है। बेशक इसके निशान साठ और सत्तर के दशक के हैं। पीढिय़ां अगर मनमौजी और मगन हैं तो पीढिय़ां चिंतित और तैयार भी हैं। उनके इम्तहान का वक्त कुछ आ ही चुका है कुछ आना ही चाहता है। बेशक इन सबके बीच एक एक कर साया उठ रहा है। नए साये मंडराते हुए अट्टाहस कर रहे हैं।
जॉन बर्जर ने कहा था, ”आधुनिक विश्व में, जहां राजनीति की वजह से हर घंटे हजारों लोग मारे जाते हैं, वहां कोई भी लेखन राजनीतिक जागरूकता और सिद्धांतों के अभाव में प्रामाणिक नहीं हो सकता।‘’ वक्त को टटोलती बर्जर और उन जैसे बुद्धिजीवियों की निगाह के दायरे में हम भी हैं, हमारे भीतर साहस और विश्वसनीयता की पड़ताल चलती रहेगी। 

संदर्भ सामग्री/वेब संदर्भ:
http://raiot.in/watch-ways-of-seeing-in-memory-of-john-berger/वेज ऑफ सीइंग, पेग्विन बुक्स, 1990
https://www.youtube.com/watch?v=~PcJRzMWrzc (जॉन बर्जर और सूजन सोनटाग की एक घंटे की दुर्लभ बातचीत की रिकॉर्डिंग- टू टेल अ स्टोरी- 1983)
https://www.youtube.com/watch?v=wqCaWv_yLBQ (जेंडर रिसर्च इन्स्टीट्यूट एट डॉर्टमोथ (ग्रिड-GRID) की ओर से आयोजित जॉन बर्जर का रिकॉर्डेड व्याख्यान- टाइम्स ऑफ क्राइसिस और नॉम चॉमस्की के साथ बातचीत की बर्जर की उपलब्ध कराई गई रिकॉर्डिंग का प्रसारण- अप्रेल 2014)

नोन एंड स्ट्रेंज थिंग्स, टेयु कोले, फेबर एंड फेबर, 2016

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