दल बदल का दंगल

0
148

प्रेम पुनेठा
उत्तराखंड में कांग्रेस के नेता यशपाल आर्य और उनके बेटे संजीव आर्य ने दिल्ली में भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और दो घंटे के बाद ही उनको पार्टी की ओर से बाजपुर और नैनीताल से प्रत्याशी बनाने की घोषणा कर दी गई तो व्हाट्सअप पर एक मैसेज वायरल होने लगा कि तत्काल टिकट की व्यवस्था भारतीय रेल में ही नहीं भारतीय जनता पार्टी में भी मौजूद है। लेकिन तत्काल टिकट की व्यवस्था बाद में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी देखने को मिली और इसने भी रुड़की से सुरेश जैन, यमकेश्वर से शैलेंद्र सिंह रावत और सुनीता बाजवा को भाजपा छोड़ कांग्रेस पार्टी में आने पर तत्काल टिकट दे दिया। इस तरह कांग्रेस और भाजपा दोनों में ही तत्काल टिकट की व्यवस्था कायम की गई। इस प्रक्रिया ने बता दिया कि विचार और पार्टी निष्ठा जैसी कोई चीज आज की राजनीति में नहीं है अगर कुछ है तो सिर्फ अपनी राजनीति बचाना और उसे अपने परिवार को हस्तांतरित करना।

कौन भाजपाई -कौन कांग्रेसी
छोटे राज्यों में राजनीतिक अस्थिरता एक स्थायी भाव बन चुका है। व्यक्तियों का एक पार्टी से दूसरी पार्टी में राजनीतिक लाभ के लिए जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं रह गई। मार्च में भाजपा ने कांग्रेस का तख्ता पलट करने का असफल प्रयास किया। उसने कांग्रेस के ग्यारह विधायकों से पाला बदल करवा लिया लेकिन आखिर में वह सरकार गिराने में असफल रही और इन विधायकों को अपनी सदस्यता से हाथ धोना पड़ा। इसके अलावा बाद में एक कांग्रेसी विधायक और एक भाजपा के विधायक ने अपनी निष्ठाएं बदल लीं और सदस्यता खो दी। दोनों ही पार्टियां इन खेमा बदल विधायकों पर पूरी तरह से मेहरबान रहीं। भाजपा ने कांग्रेस से बगावत करने वाले बारह विधायकों में से दस को टिकट दे दिया केवल दो को टिकट नहीं दिए गए लेकिन उसके एवज में अमृता रावत के पति सतपाल महाराज को चौबट्टाखाल और विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा को सितारगंज से टिकट थमा दिया गया। कांग्रेस ने भी भाजपा से बगावत करने वाले दान सिंह भंडारी को भीमताल से और भीम लाल आर्य को घनसाली से टिकट दे दिया। इस तरह बागियों के साथ किए गए वादे पूरी तरह से निभाए गए लेकिन इस पूरी कोशिश में पार्टी कार्यकर्ताओं में भारी नाराजगी हो गई। कुमाऊं में धारचूला, डीडीहाट, गंगोलीहाट, अल्मोड़ा, बाजपुर और गढ़वाल में धनोल्टी, धर्मपुर आदि जगहों पर कार्यकर्ताओं ने निर्दलीय चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी। अब जिन लोगों ने भाजपा में टिकट का बंटवारा किया वे बागियों के मैदान में आते ही खामोश हो गए और बागियों को मनाने का काम संघ पर छोड़ दिया। संघ ने अधिकांश जगहों पर बागियों को मना लिया। इस चुनाव में भाजपा के टिकट वितरण भी अजीब सा था और परिवारवाद हावी रहा। केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह के समधी नारायण सिंह राणा को धनोल्टी से सिटिंग विधायक महावीर रांगड को हटाकर टिकट दिया गया, इसी तरह यमकेश्वर से विधायक विजया बड़थ्वाल को हटाकर पूर्व मुख्यमंत्री भुवनचंद्र खंडूड़ी की बेटी ऋतु खंडूड़ी को टिकट दे दिया गया अब बड़थ्वाल निर्दलीय मैदान में हैं। इसी तरह से विजय बहुगुणा के बेटे सौरभ बहुगुणा, अमृता रावत के पति सतपाल महाराज को चौबट्टाखाल, मुन्ना सिह चौहान को विकासनगर और उनकी पत्नी मधु चैहान को चकराता से , नए-नए भाजपाई बने यशपाल आर्य को बाजपुर और उनके बेटे संजीव को नैनीताल से प्रत्याशी बनाया गया।
टिकट बंटवारे के बाद कांग्रेस में भी घमासान कम नहीं हुआ। वहां तो पार्टी आफिस में जमकर तोडफ़ोड़ की गई। सबसे ज्यादा नाराजगी किशोर उपाध्याय के सहसपुर से चुनाव लडऩे को लेकर रही, जहां आर्येंद्र शर्मा समर्थकों और किशोर उपाध्याय समर्थकों में कई बार हाथापाई की स्थिति आ गई। इसी तरह भीमताल से दान सिंह भंडारी के चुनाव लडऩे पर राम सिंह कैड़ा नाराज हो कर निर्दलीय बन बैठे। शिल्पी अरोड़ा को गदरपुर से टिकट नहीं मिला तो वह हरीश रावत के खिलाफ किच्छा से ही चुनाव लडऩे को मैदान में उतर गईं। यमकेश्वर में शैलेंद्र सिंह रावत को टिकट देने के खिलाफ रेणु बिष्ट चुनाव मैदान में निर्दलीय उतर गईं। हरिद्वार में हाजी तस्लीम को टिकट मिलने पर ताहिर ने बगावत कर दी। देवप्रयाग से मंत्री प्रसाद को टिकट देने पर शूरवीर सिंह शजवाण नाराज हैं तो लालकुंआ में हरीश दुर्गापाल को टिकट मिलने से हरेंद्र बोरा नाराज हो गए। लोहाघाट से खुशाल सिंह अधिकारी को टिकट मिलने से लक्ष्मण सिंह लमगडिय़ा ने पार्टी छोड़ दी। इस समय नारायण दत्त तिवारी समर्थक पार्टी से किनारा कर चुके हैं। कांग्रेस का सबसे बड़ा पेच धनौल्टी सीट पर फंस गया, जहां कांग्रेस पीडीएफ कोटे के मंत्री प्रीतम सिंह पंवार को प्रत्याशी बना चुकी थी लेकिन पहले उन्होंने कांग्रेस के चिन्ह पर लडऩे से आनाकानी करने पर मनमोहन मल्ल को प्रत्याशी बनाया। बाद में वह कांग्रेस के टिकट पर लडऩे को तैयार हो गए तो मनमोहन से मैदान से हटने को कहा गया लेकिन वह माने नहीं। टिकट बंटवारें को लेकर किशोर उपाध्याय और हरीश रावत में खूब जोर आजमाइश हुई।

सारा ध्यान मैदान पर
इस चुनाव में दोनों पार्टियां अपना सारा जोर मैदान के चार जिलों हरिद्वार, देहरादून, उधमसिंह नगर और नैनीताल में लगाए हुए हैं, जहां 35 सीटें हैं और शेष नौ पहाड़ी जिले सहायक के तौर पर हैं। कांग्रेस में हरीश रावत उधम सिंह नगर के किच्छा और हरिद्वार ग्रामीण दो स्थानों से मैदान में हैं तो कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष किशोर उपाध्याय देहरादून जिले के सहसपुर, इंदिरा हृदयेश हल्द्वानी में हैं। पहाड़ी जिलों में कांग्रेस का कोई भी बड़ा नेता नहीं जा रहा है। कांग्रेस की रणनीति यह है कि अगर इन चार जिलों में उसे पर्याप्त बढ़त मिल गई तो पहाड़ अपने आप पीछे आ जाएगा। वैसे भी पहाड़ में अब कांग्रेस के पास कोई बड़े नाम वाला नेता रह नहीं गया है। दूसरी ओर भाजपा की ओर से इस तरह की कोई रणनीति नहीं बनाई गई है लेकिन जोर उसका भी मैदानी जिलों पर ही है। उसके भी बड़े नेता मैदानी जिलों की ओर ही ध्यान लगाए हुए हैं। हरक सिंह रावत को रुद्रप्रयाग से मैदानी इलाके कोटद्वार की ओर आना पड़ा, पूर्व मंत्री प्रकाश पंत अपने लिए लालकुंआ सीट चाहते थे लेकिन पार्टी ने उन्हें पुरानी जगह पिथौरागढ़ ही भेज दिया। वैसे भी भाजपा अपने स्थानीय नेताओं के बजाय नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व पर ज्यादा निर्भर है। इस चुनाव ने पहाड़ के गिरते राजनीतिक महत्त्व और ताकत को रेखांकित कर दिया है। आने वाला समय पहाड़ से नेताओं के पलायन का हो सकता है।

मुद्दाविहीन चुनाव
उत्तराखंड का पूरा चुनाव आज मुद्दाविहीन हो गया है। कुछ समय पूर्व तक कांग्रेस के दागी आज भाजपा में हैं। जो कांग्रेस को गरियाते थे वे आज कांग्रेस में हैं और जो भाजपा को गरियाते थे वे भाजपाई हैं। विचारधारा, सोच और दृष्टिकोण का कोई अर्थ नहीं रह गया है। ऐसे में जनता हतप्रभ है कि यह क्या हो रहा है और पता ही नहीं चल रहा है कि कौन किस खेमे में है। जब दलों में निष्ठाएं ही नहीं रहीं तो मुद्दा कौन उठाए। दोनों पार्टियों के सामने केवल एक ही लक्ष्य रह गया है कि किसी भी तरह से सत्ता पायी जाए चाहे इसके लिए कितने ही समझौते क्यों न करने पड़ें। इस स्थिति में सबसे खराब हालत पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की है। कल तक जिस नेता को भ्रष्टाचार करने वाला बता रहे थे आज उसी के लिए वोट मांगने जाना पड़ रहा है। हर नेता केवल अपनी जीत सुनिश्चित करना चाह रहा है। वैसे भी भाजपा और कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय राजनीतिक दल अपने केंद्रीय नेताओं के लिए ही जमीन तैयार करने की कोशिश करते हैं और हाईकमान के आदेश पालक बन कर रह जाते हैं। उनके लिए स्थानीय और क्षेत्रीय मुद्दों से ज्यादा केंद्रीय नेताओं की सुविधा महत्त्व हो जाती है।
स्थानीय मुद्दों को स्थापित करने का काम क्षेत्रीय पार्टियां ही कर सकतीं थीं लेकिन उनकी हालत सबसे खराब है। उत्तराखंड क्रांति दल का बिखराब और विलय एक शास्वत प्रक्रिया हो चुकी है। आज वह किसी भी सीट पर प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज कराने की स्थिति में नहीं है। वामदल कुछ ही क्षेत्रों में उपस्थित हैं। अन्य छोटे राजनीतिक दल कहीं नहीं हैं। तब मुद्दे पूरी तरह से गौंड़ हो चुके हैं। कहने के लिए सभी दल रस्म अदायगी के लिए घोषणा पत्र लाएंगे लेकिन वे चर्चा का विषय नहीं होंगे। चर्चा होगी तो पार्टी बदलू नेताओं और उनके समर्थकों के कामों की। उत्तराखंड का यह चुनाव आने वाले समय में और राजनीतिक गिरावट का संकेत है। 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here