जमीन की लूट में सरकार की मेहरबानी

उत्तराखंड

उत्तराखंड की सरकारों, चाहे वह भाजपा की हों या फिर कांग्रेस की, में निर्विवाद रूप से जो एक समानता दिखलाई देती है वह है यहां के संसाधनों की लूट के लिए खूली छूट देना। कॉरपोरेट घरानों, धन्नासेठों और कुलीन वर्ग के लिए इस राज्य के प्राकृतिक संसाधन खासकर जमीन बड़े पैमाने पर लाभ कमाने का जरिया है। राज्य सरकार इसमें मददगार की भूमिका में होती है। उत्तराखंड की वर्तमान कांग्रेस सरकार और उसके मुख्यमंत्री हरीश रावत मददकर्ता की भूमिका को कितनी तत्परता से निभा रहे हैं इसका ताजा उदाहरण अल्मोड़ा जिले के नैनीसार गांव का है। कांग्रेस सरकार डीडा (द्वारसों) ग्राम पंचायत के नैनीसार गांव की 353 नाली (7.061 हेक्टेयर) जमीन जिंदल समूह की हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी को एक अंतरराष्ट्रीय आवासीय स्कूल बनाने के लिए देने जा रही है। ग्रामीणों को इसके बारे में तब पता चला जब इस संस्था ने जमीन अपने कब्जे में लेनी शुरू कर दी। हस्तांतरण की प्रक्रिया पूरी तरह मुक्कमल होने से पहले जिंदल समूह की इस सोसायटी ने जिस तरह से जमीन पर कब्जा कर लिया है वह बताता है कि इसमें सरकार और प्रशासन की किस हद तक मिलीभगत है। इस मामले में पंचायती राज कानून का पूरी तरह से उल्लंघन किया गया है। दिलचस्प यह है कि हरीश रावत उस कांग्रेस पार्टी से ही हैं जो अपने नेता राजीव गांधी का देश में पंचायती राज लागू करने के लिए गुणगान करते नहीं अघाती है। नियम यह कहता है कि इस मामले में ग्राम सभा की आम बैठक बुलायी जानी चाहिए थी, जो कि नहीं बुलाई गई और न ही गांव के लोगों से अनापत्ति ली गई। एक अनापत्ति पत्र दिखाया जा रहा है जो ग्राम प्रधान गोकुल सिंह राणा की तरफ से दिया गया है। इसमें नौ लोगों के हस्ताक्षर हैं और इसकी तारीख 23 जुलाई, 2015 है। इसमें कहा गया है कि यह जमीन सार्वजनिक उपयोग और धार्मिक प्रयोजन की नहीं है। जबकि ग्रामीणों ने 15 अक्टूबर को रानीखेत के उप-जिलाधिकारी को एक पत्र सौंपा है जिसमें उन्होंने कहा है कि ग्रामवासियों की खुली बैठक में कोई भी प्रस्ताव पारित नहीं किया गया है और जिन्होंने फर्जी दस्तावेज तैयार किया है उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए। उप-जिलाधिकारी को सौंपे गए इस पत्र में 39 ग्रामीणों के हस्ताक्षर हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि जिंदल समूह की इस सोसायटी के दंबग स्थानीय लोगों को लालच दे रहे हैं और बात नहीं मानने पर जबरन उठवा देने और जान से मारने की धमकी दे रहे हैं।
हरीश रावत सरकार और जिंदल समूह के खिलाफ नैनीसार के ग्रामीण आंदोलन कर रहे हैं। इस रिपोर्ट को लिखने तक ( 26 नवंबर) द्वारसों में ग्रामीणों का क्रमिक अनशन जारी था। इस जमीन पर जिंदल का स्कूल खोलने का बोर्ड लगा है और रोड से लगी जमीन पर सड़क का निर्माण हो चुका है। बांज, काफल, चीड़ के पेड़ जमींदोज किए जा चुके हैं। उस समय तक जिंदल की इस संस्था और पटवारी के पास जमीन का कब्जा लेने का कोई आदेश नहीं था।
यह इस बात को स्पष्ट करता है कि जिंदल समूह को पता है कि जमीन उसके नाम हस्तांतरित हो ही जाएगी, इसलिए प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही उसने जमीन पर कब्जा कर लिया। इस जमीन का मूल्य चार करोड़ सोलह लाख उनसठ हजार नौ सौ रुपए लगाया गया है। वार्षिक किराया मात्र 1996.80 रुपए लिखा गया है। इसी आधार पर उत्तराखंड सरकार ने 22 सितंबर को सचिव डीएस गब्र्याल की ओर से जारी शासनादेश में गर्वमेंट ग्रांट एक्ट के अधीन पहले 30 वर्ष के लिए दो लाख रुपए वार्षिक दर और 1996.80 किराए पर पट्टा निर्गत करने के लिए नियमानुसार अग्रिम कार्यवाही करने के आदेश दिए। इसका सात अक्टूबर को उप-जिलाधिकारी ने पट्टे पर सशुल्क आवंटन करने हेतु अपनी आख्या दी।
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि यह जमीन उनकी नाप भूमि थी, जिसे बंदोबस्त में गलत दर्ज किया गया, वहां पर वन पंचायत बनी है, चीड़ के पेड़ों पर लीसा लगा है, गांव का एक छोटा मंदिर है लेकिन इन सभी की सरकार के इशारे पर अनदेखी की गई। आंदोलनकारियों की कहना है कि हिमांशु एजुकेशनल सोसायटी ने मुख्यमंत्री को जो प्रस्ताव दिया है उसमें उत्तराखंड के किसानों, मजदूरों के बच्चों की पढ़ाई इस कथित इंटरनेशनल स्कूल में करने की कोई व्यवस्था नहीं है, शासनादेश में भी केवल अधिकारियों-कर्मचारियों के बच्चों को शिक्षा देने का जिक्र है। इस प्रकार गांव की अरबों रुपए की बेशकीमती जमीन पर जिंदल का कब्जा होगा और ग्रामीणों को इसका कोई लाभ नहीं होगा।
इस इंटरनेशनल स्कूल में पढऩे वाले बच्चों की श्रेणियों के बारे में जो बताया जा रहा है वह इस प्रकार है – कॉरपोरेट घरानों के बच्चे, अनिवासी भारतीयों के बच्चे, पूर्वोत्तर के बच्चे, माओवाद से प्रभावित राज्यों के बच्चे, गैर अंग्रेजी भाषी राष्ट्रों के बच्चे और वल्र्ड एनजीओ द्वारा प्रायोजित बच्चे। स्पष्ट है कि सरकार की मेहरबानी से कौडिय़ों के दाम पर मिलने जा रही इस जमीन पर अंतरराष्ट्रीय आवासीय स्कूल बनाकर जिंदल समूह बड़ा मुनाफा कमाएगा। जाहिर है इसमें अमीरों के बच्चे ही पढ़ेंगे। हां, दिखाने के लिए चंद सीटें उन गरीबों के लिए भी हो सकती हैं ताकि यह बताया जा सके कि हम गरीबों को भी शिक्षा दे रहे हैं। जैसा पांच सितारा अस्पतालों के संबंध में हम पूरे भारत में देख रहे हैं।
यहां महत्त्वपूर्ण सवाल यह है कि हरीश रावत की सरकार यहां एक अंतरराष्ट्रीय आवासीय स्कूल क्यों खुलवाना चाहती है जबकि रानीखेत में ही पहले से दो बड़े निजी आवासीय स्कूल हैं और नैनीताल में पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर के कई जाने-माने स्कूल हैं। इनमें से कई स्कूल डेढ़ सौ वर्ष से भी पहले के हैं। इसके अलावा जिंदल के इस अंतरराष्ट्रीय स्कूल से उत्तराखंड की शिक्षा व्यवस्था में भी कोई आमूल-चूल परिवर्तन नहीं होने जा रहा है। यह सभी जानते हैं कि तथाकथित इंटरनेशनल आवासीय स्कूलों की फीस इतनी ज्यादा होती है कि इनमें प्रथम श्रेणी के सरकारी अधिकारी तक अपने बच्चों की फीस वहन करने की स्थिति में नहीं होते। अगर हरीश रावत इस पहाड़ी राज्य में शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने चाहते हैं तो उन्हें सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधारने पर ध्यान देना चाहिए। उनकी सरकार यदि इस जमीन पर स्कूल खोलना ही चाहती है तो वह एक सरकारी आवासीय स्कूल खोल सकती है। यह नवोदय विद्यालयों की तर्ज पर हो सकता है जहां गरीब पहाड़ी लोगों के बच्चों को आसानी से शिक्षा मिल सकेगी। लेकिन सरकार की मंशा कॉरपोरेट घरानों के लिए छप्परफाड़ मुनाफे का रास्ता खोलना है।
पी.सी. तिवारी परिवर्तन पार्टी के अध्यक्ष हैं और ग्रामीणों के साथ आंदोलन चला रहे उत्तराखंड का कहना है कि इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

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