क्रांति की विरासत

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महान अक्टूबर क्रांति का यह सौंवा वर्ष चल रहा है। इस क्रांति ने समतावादी-साम्यवादी विचार को न केवल पहली बार मजबूती के साथ जमीन पर उतारा और पूरी दुनिया को बताया कि समाज का शोषित और पीडि़त वर्ग भी न केवल क्रांति कर सकता है बल्कि शासन भी चला सकता है। इस क्रांति का पूरी दुनिया पर गहरा असर पड़ा। रूसी क्रांति के तीन दशक बाद एशिया के एक पिछड़े और गरीब मुल्क चीन में दूसरी साम्यवादी क्रांति हुई। इसने भी दुनिया पर अपनी तरह से असर डाला। लेकिन विशेषकर अक्टूबर क्रांति की अनुगूंज और उसका असर बहुत गहरा था।
इस बार समयांतर के वार्षिकांक का विषय अक्टूबर क्रांति के सौ साल के सफर और दुनिया पर पड़ऩे वाले उसके प्रभाव पर केंद्रित किया गया है। इस क्रांति की सफलताओं और असफलताओं का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत करने का यह छोटा प्रयास है। वामपंथी राजनीति के अध्येता विजय प्रशाद ने अपने लेख में रूसी क्रांति के महत्त्व और उसकी समस्याओं को बहुत ही गहराई और स्पष्टता से रखा है। स्त्री मुक्ति का सवाल अक्टूबर क्रांति के नायकों ने किस तरह से हल किया और इसने पूरी दुनिया में स्त्री मुक्ति आंदोलनों को प्रभावित किया इसकी पड़ताल वामपंथी अध्येता और मशहूर कवि कात्यायनी ने की है। भारत जैसे विषमता से भरे देश में जहां जाति का सवाल वामपंथी कभी भी नहीं सुलझा पाए तथा दलित और वामपंथी एक साथ क्यों नहीं चल पाए, इसकी गहन पड़ताल जाने-माने विचारक आनंद तेलतुम्बड़े ने अपने विचारोत्तेजक लेख में की है। क्रांति और एक समाजवादी व्यवस्था के निर्माण के लिए भारत में हमेशा से ही एक उर्वर भूमि रही है, इसके बावजूद भारतीय वामपंथी यहां क्यों सफल नहीं हुए और आज वह हाशिये पर क्यों पहुंच गए हैं। सुप्रसिद्ध वामपंथी विचारक सुमंत बनर्जी ने भारतीय वामदलों की कमजोरियों और भविष्य की दिशा के बारे में विचार किया है।
चीन का कम्युनिस्ट शासन पूरी दुनिया के लिए हमेशा ही एक पहेली बना रहता है। यह शासन अपनी आर्थिक नीतियों में पूंजीवाद की राह पर है और राजनीतिक रूप से समाजवादी है, इसको समझने की भी कोशिश की गई है। चीन के बारे में प्रोफेसर मनोरंजन मोहंती का साक्षात्कार वर्तमान चीनी समाज के कई पहलुओं पर प्रकाश डालता है। इसके साथ ही नेपाल और पूंजीवादी देशों में समाजवाद के सूत्रों को भी तलाशने की कोशिश है।

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– कृष्ण सिंह

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