ओम पुरी : किरदारों का संगतराश

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प्रताप सिंह

स्टार-सिस्टम की पुश्तैनी-शर्तों की जंजीरों और सजीले नकली नायकवाद के मिथ को तोडऩे वाले ओमपुरी अब हमारे बीच नहीं हैं। उनका खुरदरा चेहरा थिएटर (एनएसडी) और समांतर-सिनेमा की गुलजार-गलियों से अपनी खांटी पहचान बनाता हुआ अंतत: बालीवुड और अंतरराष्ट्रीय सिनेमा की दहलीज तक पहुंचा तो पता चला अभिनय का, मैथड एक्टिंग और मैनरिज्म से मुक्त एक नया मुहावरा गढ़ा जा सकता है।
मराठी नाटक ‘घासीराम कोतवाल’ (बाद में फिल्म) से अपने सिनेमाई-सफर की शुरुआत करने वाले ओमपुरी अपनी (शुरू-शुरू की) फिल्मों में – यथार्थवादी शैली की नई उपज के लिए नसीरुद्दीन शाह की तरह ही संघर्ष करते नजर आए। दोनों की डॉयलाग-डिलिवरी, धमक और परकाया-प्रवेश की विविध कूट-युक्तियां हिंदी सिनेमा के प्रतिनायक को नई सनद और स्वीकृति दिलाने में बहुत काम आईं। कायदे की पहली फिल्म ‘गोधूलि’ से ही ओमपुरी समांतर-सिनेमा की पहली कतार में आ गए। श्याम बैनेगल, गोबिंद निहलाणी ही नहीं, सत्यजित रे तक उनकी कला और अभिनय शैलियों की विविध गुणवत्ता से आम आदमी के किरदार सचमुच हासिल कर पाए। श्याम बाबू की फिल्म ‘आरोहण’ तथा ‘भारत एक खोज’ के सूत्रधार और कई किरदारों ने तो समांतर सिनेमा के आविष्कृत नए नायकों (गिरीश कारनाड, मोहन आगाशे, सत्यदेव दुबे, नसीर, राजेंद्र गुप्ता, सत्येन कप्पू, बिजलानी) के बीच की कड़ी के रूप में उनका लोहा मनवाया। ओमपुरी ने आम आदमी के चुनिंदा। खास किरदारों को कभी गढ़ा नहीं, उन्हें जीकर दिखाया। ‘तमस’ का ‘नत्थू’, ‘सदगति’ का ‘दुखी’ उनके अभिनय की सहजें अभिव्यक्ति और मार्मिक-संवेदनानुभूति के भरोसे ही – भीष्म साहनी और पे्रमचंद के इन पात्रों के सच्चे यानी निखालिस प्रतिबिंब के रूप में परदे पर नजर आते हैं। ‘तमस’ का सूअर-वध का दृश्य जैसे भुलाया नहीं जा सकता। वैसे ही, ‘सदगति’ का ओमपुरी का, दुखी का ‘मोंताज’ भी अविस्मरणीय है। साइत-सगुन निकालने वाले दंभी पंडित की भूमिका उतनी ही सहज निभा रहे मोहन अगाशे और मौन-विलाप से दर्शकों को जड़ कर देने वाली स्मिता पाटिल के सामने ओमपुरी का ‘दुखी’ अपने जड़-यथार्थ के क्रिस्टिल को अपनी अभिनय की पूंजी से जिस तरह तोड़ता है, वह दुखी चमार के अंत का कारुणिक दृश्य उपस्थित करने की विरल घड़ी में बदल जाता है। ‘गांधी’ और ‘आक्रोश’ के गुस्सैल उनके पात्र एकाध संवाद से ही (‘आक्रोश’ में तो बिना संवाद के ही) अपनी अस्मिता, नाराजगी और हूक का परिचय दे देते हैं।
ओमपुरी के किरदार ही वहां भी, ज्यादा ही ब-दिलोजां-बदस्तूर, मक्बूल हुए हैं। ‘सिटी ऑफ जोयÓ से ‘हन्डर्ड फुट जर्नी’ तक की – अपनी अभिनयता की पराकाष्ठा से परे, वहां भी नई ऊंचाइयों को ओमपुरी ने हासिल किया है।
पर ‘कलयुग’ में ‘आधुनिक कर्ण’ का जीवंत पात्र बनाने वाले श्याम बैनेगल ने उन्हें ‘आरोहण’ जैसी भूमिका कभी न दी। जिसमें ओमपुरी ने अभिनय की धुर छलांग लगाई और ‘अर्धसत्य’ से भी दो साल पहले 1981 में सर्वोत्तम अभिनेता का पुरस्कार हासिल किया। लेकिन ओमपुरी ‘मिर्च मसाला’ के अब्बू मियां के ‘अकेले गांव में पूरा मर्द’ वाले किरदार की अहमियत के लिए भी याद किए जाते हैं। यहां नेगेटिव रोल में उनके सामने नसीर सूबेदार बने हुए थे।
विश्व मंच पर ओमपुरी, शशिकपूर, विक्टर बनर्जी जैसी साख दूसरों की नहीं बन पाई। ओमपुरी ने रंगमंचीय (एनएसडी के) प्रभावों से उत्प्रेरित ‘नरसिम्हा’ जैसे कई ‘स्टीरियोटाइप’ किरदार बॉलीवुड में आजमाए। जिन्हें उनसे बेहतर अमरीश पुरी करते आए थे। ऐसे किरदारों के बजाय ब्रितानी या हॉलीवुड की फिल्मों के प्रौढ़ या रंगीले जीवंत हिंदुस्तानी-पाकिस्तानी पात्रों की कमाई ही उन्हें चर्चा में बनाए रख सकी। ‘ईस्ट इज ईस्ट’, ‘वेस्ट इज वेस्ट’ और ‘द रेलुक्येंर फंडमिंटलिस्ट’ की उनकी भूमिकाएं इस दृष्टि से मानीखेज हैं। बाहर की फिल्मों में ही नहीं, भारतीय-सिनेमा की जमीन पर भी ओमपुरी अपनी कामेडी से भरपूर मुद्राओं में भी छाए रहे। कामेडी को नई रंगत देने के लिए उन्होंने डेविड निवेन की शैली को अपनाया। बाकी देसीपन का छोंक लगाने के लिए अपनी पंजाबी- पृष्ठभूमि की स्वाभाविक-दरियादिली और नहज-नसीयतों से काम लिया और आजमाया। लेकिन केंद्र में रहे ऐतिहासिक, गंभीर या करुण – दमित पात्रों की बरतर – भूमिकाओं की आजमाइश में चरित्र-अभिनेताओं की पूर्व-परंपरा के नगीनों को उन्होंने खूब ध्यान में रखा।
कमर्शियल और हटकर नजर आती ओमपुरी की कला-फिल्में अपनी प्रतिभा से उन्होंने ऐसे मचान पर लाकर खड़ी कर दी हैं, जहां उनकी कारीगरी की कौंध अलग से महसूस की जा सकती है। गुलशन ग्रोवर ने ओमपुरी की अभिनय शैली की ईजाद को मार्क किया है। उनका यह कहना एकदम सही है कि – ओमपुरी ने नायक की फिल्मी-छवि को डेम्यूलिस्ट कर खुद एक प्रतिनायक खड़ा कर दिया। इसका पुख्ता प्रमाण ओमपुरी की कम से कम दस फिल्में (आक्रोश, अर्धसत्य, द्रोहकाल, माचिस, गिद्ध, मिर्च-मसाला, मकबूल, नरसिम्हा, जाने भी दो यारो, ईस्ट इज ईस्ट) तो हैं ही। अलबत्ता कामेडी का बाजार खड़ा करने वाले कुंदन शाह और प्रियदर्शन ने भी उनकी बहुकोणीय-प्रतिभा को जमकर भुनाया और ‘जाने भी दो यारो’, ‘मालामाल-विकली’ में क्रमश: नसीर, पंकज कपूर, रवि वासवानी, सतीश शाह तथा ‘मालामाल विकली’ के परेश रावल की टक्कर में उन्हें भरपूर विकट-अतिरंजना का खेल दिखाने का अवसर दिया। श्रेष्ठ किरदारों की सीमा रेखा से बाहर भी ‘सिंग इज किंग’ और ‘ये तेरा घर – ये मेरा घर’ के उनके उपजाए हसोड़-क्षण बेशकीमती कामदी-कला के ही उदाहरण हैं। और भी कितनी ही पसंदीदा फिल्में हैं।
किंचित, ओमपुरी का असल ग्राफ ‘अर्धसत्य’, ‘मिर्च-मसाला’, ‘माचिस’ और ‘जाने भी दो यारो’ की अद्भुत बसीरह की बाउंड्री पर ही उन्हें औरों से अलग खड़ा करता है। एक अदाकार का अनुशासन, अंतर्दृष्टि और तनाव तथा भीतरी बेचैनी को (सम्यक) बाहर लाने का जज्बा ‘अर्धसत्य’ के अनंत वैलणकर में कूट-कूट कर भरा है। ओमपुरी ने वैलणकर के चरित्र की जटिलताओं, नौकरशाही के ट्रेप (चक्रव्यूह) के रचाव को समझते हुए भ्रष्ट-व्यवस्था के प्रतीक (राम शैट्टी-सदाशिव) से टकराने की टंकार महसूस कराई है। इससे पारंपरिक-नायक और महानायकों का मिथ भी टूटा है। यहां ओमपुरी का ‘परफेक्शन’ पिछले सिनेमा के उन्नायक (अमिताभ) की ‘बादशाहत’ से भी मोहभंग कराता है। यह ‘परफेक्शन’ ईमानदारी से पात्र को कथानक की केंद्रीय धुरी बनाए रखने के कारण भी संभव हुआ है और उसे पापुलर-सिनेमा की जंजीरों से मुक्त रखने के कारण भी। अमिताभ के साथ भी की गई ओमपुरी की फिल्मों में – ‘देव’ का जिक्र भर होता है। उनसे ओमपुरी की जोड़ी उस तरह नहीं बन सकती, जैसे नसीर के साथ ‘मकबूल’ जैसी फिल्मों में बनती दिखाई देती है। एक जगह ओमपुरी अपने नए नायक की पक्षधरता का एक बचाव कर चुके हैं – ‘मैं अमिताभ बच्चन नहीं हूं पर अमिताभ से कम भी नहीं हूं।‘ अमिताभ के बड़े होते गए बाजार और मजबूत बैसाखियों (गाने, गीतकार, मौसी की, नायिकाओं गायकों या सलीम-जावेद) के बगैर, भी ओमपुरी हमारे समय के दलित-तबकों के जननायक बनकर उभरे और अंतत: सहनायक वाली अपनी अप्रतिम भूमिकाओं (‘मिर्च-मसाला’ के अब्बू मियां, ‘माचिस’ के सनातन, ‘जाने भी दो यारो’ के बिल्डर आहुजा) के लिए भी उतने ही जाने गए। ये सभी दमदार भूमिकाएं हैं। इनमें ‘जाने भी दो यारो’ में – वैसे तो पंकज कपूर (मि. तनेजा), ओमपुरी (बिल्डर आहुजा), सतीश शाह (कमिशनर डीमेलो), भक्ति बर्वे (संपादिका शोभा सेन) तथा रवि वासवानी, नसीर (दोनों फोटोग्राफर) की विनोद-वृत्तियां हर फ्रेम में खिलती हैं। पर इस फिल्म में – मानो हज्ल (फार्सियल पोएट्री) से पैदा हुई पैरोडी में ओमपुरी ने चार चांद लगाए हैं। ऐसी सेंसीविटी, विट, हाजिर जवाबी, प्रतित्युत्पन्नमति की मिसाल मिलनी मुश्किल है। बिल्डर आहुजा की ओमपुरी की भूमिका का (विट) इनके संवादों के भीतर छिपे प्रहसन की मुद्रा की अनमोल तराश से एक अलहदा ही मंजर गजब का पेश करता है। ओमपुरी ने अपने हिस्से में आई नशीली-अदाकारी से चुटीले-संवादों का अनूठा ही रंग इस फिल्म में बिखेरा-बुरका है। पुलिस कमिश्नर डी’मेलो (सतीश शाह) की लाश का सजीला ताबूत खींचे जाने की कॉमेडी का यह अंश भी ओमपुरी की बेहतरीन अदाकारी से लबालब है। कुछ पल के लिए – उन्होंने सर्वोत्तम अभिनेताओं (गोप, आगा, राधाकृष्ण, देवेन वर्मा, संजीव कुमार और जीवन) के ‘दारू कुट्टा-अंदाज’ की लडिय़ां पिरोकर मानो एक नया हास्य-रसायन का घोल भी आविष्कृत किया है। संवादों से ही – उस मंजर की महक तक पहुंचने की यह तरतीब ओमपुरी की जादूगिरी की भी ऋणी रहेगी। मुलायजा फर्माएं – ताबूत को कार समझते हुए नशे में – ओमपुरी… ”ओए ये कार किसने (सड़क के) बीच में ‘पार्क’ कर रखी है…? कौन-सा मॉडल है…? अच्छा – ‘फोर्ड’ ! लो सिगरेट पिओ यार! (दूसरे केरेक्टर की लाश को संबोधित करते हुए) तू तो… बहुत थका हुआ लग रहा है। मैं अभी तेरा पहिया बदल देता हूं!’’ ओपुरी अपनी जटिल भूमिकाओं (‘अर्धसत्य’, ‘भवनी भवाई’) के बाद जब ऐसी खिलंदड़ी भूमिका में भी बेजोड़ नजर आते हैं तो उन्हें सलाम करने को मन करता रहा है। ‘हेराफेरी-3’, ‘बिल्लू’ से ‘घायल-रिटर्न’ तक के पड़ाव आखिर एक अव्वल दर्जे के अभिनेता को सलमान की नई करोड़ों की फिल्म ‘ट्यूबलाइट’ के सिने-रंगमंच की राह तक पर ले आए थे। जहां अमिताभ नहीं, सलमान के मैनरिज्म के सामने उनके ‘नरसिम्हा’ या ‘अब्बू मियां’ को नहीं रहना था। ओमपुरी हो या नवाजुद्दीन सिद्दीकी (‘किक’ के खलनायक) अब फिर से कमर्शियल सिनेमा की मांद में भी पाए जाने को मजबूर हैं। ओमपुरी ‘ट्यूबलाइट’ में शायद ही – कुछ कदम साथ चले हों। वहां तो इरफान और ‘शंघाई कालिंग’ की चीनी-अभिनेत्री (जू-जू) करोड़ों कमा रहे सलमान के बाजार की उछाल का हिस्सा हैं।
‘ट्यूबलाइट’ को गाहे-बगाहे ओमपुरी की आखिरी फिल्म कह दिया गया है। और मान भी लिया गया है।
वास्तव में ओमपुरी अपने किरदारों की बेहतरीन संगतराशी के लिए ही याद रखे जाएं तो बेहतर! वैसे भी उनकी निजी जिंदगी के तूफान, गुस्सैल तबीयत, इस्लाम कबूल करने की अफवाहें और कथित आत्मकथाएं उन्हें दूसरे मोरचे पर हताश कर चुकी थीं। हार्ट-अटैक के कारण – अचानक ‘अलविदा’ लेने वाला यह खांटी-कलाकार आज से 65 साल पहले जौहरा बाई के शहर अंबाला में जन्मा था। इसी साल (2017) 6 जनवरी को उनकी जिंदगी और सिनेमा-थिएटर से हमेशा के लिए बिछुडऩा वाकयी तकलीफदेह है। गोवा में, मीरा नायर की पाकिस्तान की नई पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म (‘द रेल्युइटेंट फंडामेंटलिस्ट’) में उन्हें पूरी संजींदगी के साथ कुछ लम्हों के लिए परदे पर देखा था। ‘9-11’ के बाद की इस्लामिक-दुनिया में बंटे मॉडर्न पाकिस्तान की नई आतंकी-छवियों वाली यह फिल्म ही मेरे लिए ओमपुरी की आखिरी बड़ी फिल्म साबित हुई। बेशक, उनका रोल छोटा ही था। ब्रितानी और अमेरिकी फिल्मों में अपना सिक्का जमा चुके इस हिंदुस्तानी कलाकार को कार्लोवी वारी फिल्मोत्सव में एक भारतीय एंट्री ‘अर्धसत्य’ के लिए सर्वोत्तम अभिनेता का पुरस्कार मिला था। वही उनकी सिने-कलाओं का शिखर है। 

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