यह धुआं कहा से उठता है!

संपादकीय

सत्ताधारी वर्ग किस तरह से अपने और सामाजिक संकटों का सामना करता है, या कहना चाहिए बच निकलता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण इधर दिल्ली में देखने को मिल रहा है। संकट है प्रदूषण का, जिससे इस महानगर का कोई भी हिस्सा चाहे, कालोनी कितनी भी पॉश हो या झुग्गी-झोपड़ी वाली , बचा नहीं है, हां उनके प्रभावित होने का स्वरूप और मात्रा भिन्न हो सकती है। जैसे कि दक्षिणी और ल्यूटन्स दिल्ली में संकट वायु प्रदूषण का है तो निम्रवर्गीय कालोनियों में यह वायु के अलावा सामान्य कूड़े और प्लास्टिक व अन्य किस्म के रासायनिक प्रदूषण का भी है। देखा जाए तो इससे सिर्फ दिल्ली ही नहीं कमोबेश देश का हर शहर और कस्बा प्रभावित हो चुका है। देश कुल मिला कर एक बड़े कूड़ा घर में बदलता जा रहा है। जलवायु पर पेरिस में 30 नवंबर से शुरू होनेवाले सम्मेलन से ठीक तीन दिन पहले भारत सरकार द्वारा जारी एक रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के प्रमुख 59 शहरों से प्रति दिन 50 हजार टन कूड़ा निकलता है। यह आंकड़ा भी पांच साल पुराना था। जाहिर है कि यह चिंता का विषय है। विशेषकर शासक वर्ग के लिए क्यों कि इससे सुविधा भोगी वर्ग भी – अपने एसीओं और एयर प्यूरिफायरों के बावजूद, जिनकी, खबर है कि बिक्री, तेजी से बढ़ रही है – बच पाने की स्थिति में नहीं रहा है।
देखने की बात यह है कि प्रदूषण चाहे भूमि की सतह का हो, भूमिगत हो या वायु का, इन सभी का संबंध कुल मिला कर उस नई जीवन शैली से है जो उपभोक्तावाद और अंधाधुंध बाजारवाद की देन है। यानी इसका संबंध वृहत्तर आर्थिक नीतियों से है और इसके लिए कुल मिला कर शासक वर्ग जिम्मेदार है। यह अचानक नहीं है कि प्रदूषण के असली कारणों पर कोई बात नहीं हो रही है। बल्कि कहना चाहिए मूल कारणों से ध्यान भटकाने की जो बातें हो रही हैं वे दिल्ली से लेकर पेरिस तक लगभग एक-सी हैं। पर हमारे देश के संदर्भ में दिल्ली महत्वपूर्ण है। इसे लेकर हम शासक वर्ग की प्रदूषण और जलवायु की चिंता के कारणों की वास्तविकता को समझ सकते हैं।
दिल्ली देश की राजधानी है,यहां केंद्रीय सरकार व उसके मुलाजिमों की फौज के अलावा कारपोरेट और औद्योगिक जगत के कर्णधारों की कतार रहती है, दिल्ली को लेकर चिंता का स्तर समझा जा सकता है। विशेष कर ऐसे में जब कहा जा रहा हो कि अपने प्रदूषण में दिल्ली ने बीजिंग को पीछे छोड़ दिया है। इधर पिछले कुछ सालों से प्रदूषण का हल्ला जाड़े आने से कुछ पहले से ही जोर मारने लगता है। इसकी शुरूआत होती है पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों द्वारा जलाई जानेवाली खरीफ की फसल की कटाई के बाद धान के बचे हुए पुवाल के खेतों में ही जलाए जाने से। इसके कई कारण हैं जैसे कि विशेषकर हरियाणा और पंजाब में तुलनात्मक रूप से बड़ी जोतों के कारण कृषि में पशुओं के इस्तेमाल का घटना, रसायनिक उर्वरकों और मशीनों का बढ़ता इस्तेमाल तथा परंपरागत फसलों की जगह ज्यादा लाभकारी फसलों का बोया जाना आदि। इस पुवाल उखाडऩा मंहगा सौदा होता है। वैसे भी किसान धान की फसल के बाद, तत्काल रबी की फसल की तैयारी कर रहा होता है, इसलिए जल्दी में होता है। ऐसे में उसके पास इस बला से निजात पाने का एक ही तरीका रह जाता है और वह होता है इसे जला देने का। दिल्ली के चारों ओर की हजारों एकड़ जमीन पर इन पुवालों के जलाए जाने से स्वाभाविक है कि धुंआ उठता है और उसका असर राजधानी पर पड़ता है। अखबार जितना भी हल्ला मचाएं यह प्रदूषण कुल मिला कर अपने आप में कोई बहुत बड़ी मात्रा में नहीं होता है, हां यह दिल्ली के प्रदूषण को, जिसकी मात्रा पहले ही खतरे की सीमा पर पहुंच चुकी है, में इजाफा जरूर कर देता है। असल में संकट इसलिए बढ़ता है कि मौसम के डंठे होते जाने के कारण, प्रदूषण तेजी से ऊपर नहीं उठ पाता है।
इस पृष्ठभूमि में सिर्फ किसानों को दोष देना कितना वाजिब है, समझा जा सकता है। इस पर भी केंद्र के दबाव में राज्यों ने पुलाव को जलाने के खिलाफ दंडात्मक कानून बना दिए हैं। पर यह भी सच है कि विगत वर्षों की तुलना में पुवाल का जलाया जाना लगातार कम हुआ है।
जहां तक दिल्ली का सवाल है यहां से ही नहीं बल्कि पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से, ऐसे सारे उद्योगों को, जिनसे प्रदूषण होता था या प्रदूषण होना माना जाता था, न्यायालय के आदेश पर लगभग एक दशक पहले ही बाहर किया जा चुका है। इसके बाद आता है वह प्रदूषण जो मानव जनित है। वह ज्यादातर मलमूत्र और ठोस कूड़े के रूप में है। चूंकि यह कचरा जैवकीय है इससे निपटना ज्यादा कठिन नहीं है, यद्यपि इसका भी संबंध विकास की उस शैली से है, जो लगातार केंद्रीय करण को बढ़ावा दे रही है।
तीसरी समस्या है खनिज ईंधन चालित वाहनों के प्रदूषण की। दिल्ली में पेट्रोल और डीजल से चलनेवाले वाहनों की संख्या एक करोड़ के आसपास पहुंचने वाली है। इनमें सबसे बड़ी संख्या निजी गाडिय़ों की है और सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद, जिसके तहत सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बड़ी वृद्धि होनेवाली है, वाहनों की संख्या में और बढ़ोतरी की पूरी संभावना है।
समस्या की असली जड़ यही है। तीन दशक पहले की प्रदूषण रहित दिल्ली अचानक दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर में तब्दील नहीं हुई है। एक रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली के प्रदूषण के पीछे सबसे बड़ा कारक यही गाडिय़ां हैं। यानी इन गाडिय़ों के चलने से पैदा होनेवाला धुंआ है। खनिज ईधन के धुंए में कई तरह के विषाक्त तत्व होते हैं विशेषकर सल्फर डाइआक्साइड और सस्पेंडेड पार्टिकल मैटर जो सिर्फ खांसी, आंखों में जलन और उबकाई आदि ही पैदा नहीं करते बल्कि सांस (रेस्पिरेटरी) और हृदय रोग (कार्डियोवास्कुलर) जैसी गंभीर बीमारियां पैदा करते हैं। इसलिए असली समस्या इन गाडिय़ों की संख्या को नियंत्रित करने की है। सवाल है क्या यह किया जा सकेगा?
पिछले तीन दशकों में भारतीय अर्थव्यवस्था में जो बढ़ोतरी दिखलाई देती है उसके पीछे मोटरगाड़ी उद्योग (ऑटो इंडस्ट्री) का बड़ा योगदान है। इस उद्योग ने किस तरह से भारतीय बाजार को पकड़ा यह अपने आप में एक कहानी है।
पर इससे पहले यह बात समझ में आनी चाहिए कि निजी वाहनों से बचने का एकमात्र उपाय यह है कि देश में, विशेषकर बड़े नगरों में सक्षम सार्वजनिक यातायात व्यवस्था हो। पर हमारे यहां उल्टा हुआ है। अगर दिल्ली को ही लें तो यहां की परिवहन व्यवस्था को नियोजित तरीके से ध्वस्त किया गया। उदारीकरण के चलते ऑटो इंडस्ट्री से सब तरह की पाबंदियां हटा ली गईं और उसे अपना विस्तार करने की ही सुविधा नहीं दी गई बल्कि अप्रत्यक्ष तौर पर कई तरह की सब्सिडी दी गईं। इसका सबसे ताजा उदाहरण गुजरात का है, जिसने राज्य में नॉनो मोटर कारखाना लगाने के लिए 30 हजार करोड़ का लगभग व्याज रहित ऋण और प्रतीकात्मक कीमत पर हजारों एकड़ जमीन मुहैया करवाई है। सरकार की ओर से अपने कर्मचारियों को गाडिय़ां खरीदने के लिए आसान शर्तों पर ऋण दिये गए। सरकार ने बैंकों को गाडिय़ां खरीदने के लिए अधिक से अधिक और आसान किस्तों पर ऋण देने के लिए प्रेरित किया।
अगर इस बीच केंद्रीय सरकार ने रेल यातायात का न तो विस्तार किया और न ही उसकी सेवाओं को दुरस्त तो दूसरी ओर बड़ी राज्य सरकारों ने लगातार सार्वजनिक यातायात को घटाना शुरू किया। इसका परिणाम यह हुआ कि कि महानगरों के बाहर कस्बों के बीच भी सार्वजनिक बसों की जगह छोटी गाडिय़ां चलने लगीं। इसका सत्ताधारियों को दोहरा लाभ हुआ। एक तो वह सार्वजनिक यातायात उपलब्ध करवाने की जिम्मेदारी से निवृत्त हो गई और दूसरी ओर आईएमएफ तथा वल्र्ड बैंक के एजेंडे के तहत सरकारी नौकरों को कम करने के दबाव को भी पूरा करने का उसका उद्देश्य पूरा हो गया। इस तरह एक के बाद एक – स्वास्थ्य, शिक्षा और सार्वजनिक यातायात जैसी – सेवाओं को निजी हाथों में सौंप कर वह स्वयं फैलिसिटेटर में बदलती गई। उसका काम रह गया है कि वह देखे कि गाडिय़ों के लिए ईंधन मुहैया होता रहे। यह और बात है कि इसके लिए देश को अपनी दुर्लभ विदेशी मुद्रा का एक बड़ा हिस्सा देना पड़ता है। अनुमान है कि इस दौर में जब कि तेल के दाम अपने निम्रतम स्तर पर हैं हमें सन 2014-2015 के वित्त वर्ष में 6,87,369 करोड़ रुपये (112.748 बिलियन डालर) तेल के आयात पर देने पड़े। इस भारी भरकम खर्च को सार्वजनिक परिवहन के द्वारा आसानी से कम किया जा सकता है।
सच यह है कि जब तक दिल्ली या किसी भी अन्य महानगर में गाडिय़ों की संख्या को कम नहीं किया जाएगा तब तक प्रदूषण पर नियंत्रण असंभव है। अब सवाल है दिल्ली जैसे शहर में यह नियंत्रण कैसे हो? सरकार ने इसके लिए जो तरीके निकाले हैं वे सब असल में आटो इंडस्ट्री को लाभ पहुंचानेवाले हैं। असल में एक सीमा तक इसका कारण यह भी है कि सरकार अपने कथित 7 प्रतिशत विकास की दर को गिरते हुए नहीं देखना चाहती फिर चाहे इसके लिए देश की जनता को कितनी ही कीमत क्यों न चुकानी पड़े। इधर राष्ट्रीय हरित ट्राईब्यून ने फैसला दिया है कि दस वर्ष पुरानी गाडिय़ों को सड़कों पर चलने का अधिकार नहीं होगा। यह किया गया है प्रदूषण के नाम पर। सत्य यह है कि शहरों में गाडिय़ां इतनी नहीं चलतीं कि उन्हें दस वर्ष के बाद ही खत्म कर दिया जाए। चूंकि ये ज्यादातर दफ्तर से घर के बीच इस्तेमाल होती हैं इसलिए औसत 50 किमी प्रतिदिन से ज्यादा नहीं चलतीं। मोटा अंदाजा लगाया जाए तो ये गाडिय़ां साल में दस से पंद्रह हजार किमी से ज्यादा नहीं चलतीं। दूसरे शब्दों में ये गाडिय़ां बहुत हुआ तो दस वर्ष में सिर्फ एक से डेढ़ लाख किमी ही चल पाती हैं जबकि किसी भी आधुनिक कार की बनावट कम से कम दो लाख मील यानी 3,21,868 किलो मीटर चलने की है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस तरह से गाडिय़ों को दस साल में कंडम करने के कारण कितने संसाधनों बर्बाद किया जा रहा है।
दूसरे शब्दों में गाडिय़ों को दस साल बाद बाहर करने के बजाय सरकारों ने दूसरे तरीके अपनाने चाहिए थे। इस तरह का कोई निर्णय लेने से पहले इन सब बातों पर विचार करना एनजीटी की भी जिम्मेदारी थी। सवाल है अगर एनजीटी दिल्ली में वाहनों की संख्या को नियंत्रिक करने जैसा कड़ा आदेश नहीं दे सकती थी तो भी वह ज्यादा आसान रास्ता तो अपना ही सकती थी कि शहर में सम और विषम नंबरों की गाडिय़ां बारी-बारी से चलाने का आदेश देती। उसके इस आदेश का किस को फायदा हुआ है सिवा निर्माताओं के और पैसेवालों को। इससे असानी से प्रदूषण को आधा किया जा सकता था। पूरे साल नहीं तो भी यह नियम कम से कम अक्टूबर से फरवरी तक तो आसानी से लागू हो ही सकता था। सच यह है कि आज यह उद्योग इतना ताकतवर हो चुका है कि इसके खिलाफ कोई नहीं जा सकता। यह अचानक नहीं है कि सारा मीडिया इन सवालों को उठाने को तैयार नहीं है। वह जितने विज्ञापन देता है उनके चलते वह किसी भी अखबार या चैनल को असानी से अपने हितों के अनुकूल चलने के लिए मजबूर कर सकता है और कर रहा है।
अब सरकार जो शहर के किसी एक हिस्से में महीने में एक दिन गाडिय़ां न चलाने, विशेषकर किसी अवकाश के दिन, का नाटक कर रही है उसका क्या असर होनेवाला है? इससे होगा यह कि गाडिय़ां दूसरे रास्तों का इस्तेमाल करने लगेंगी। अगर वाकेई मंशा गंभीर है तो एक पूरे दिन, फिर चाहे वह अवकाश के दिन ही क्यों न हो, पूरे दिन शहर में निजी गाडिय़ों पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए। पर सरकार के लिए यह भी संभव नहीं है।
सच यह है कि दिल्ली की खरबों रूपये से बन रही मैट्रो ट्रेन दस साल में ही अपर्याप्त साबित होने लगी है।
देखना होगा कि सरकार का अगला कदम इस संकट से बचने का क्या होनेवाला है।
इस बीच मोटरगाडिय़ों के मांग में, गत वर्ष जो कमी आती नजर आ रही थी उसके बढऩे के समाचार आने लगे हैं। इससे आगे के पेजों को देखने  लिये क्लिक करें NotNul.com

2 responses to “यह धुआं कहा से उठता है!”

  1. yathavat

    Great article! I liked the presence of your article.
    you may also visit,
    Hindi monthly Magazines

  2. shashi sagar verma

    मानवाधिकार, राष्ट्रीए सुरक्षा और
    न्यायिक सक्रियता: कितना राजनीतिक कितना गैर-राजनीतिक
    पिछले 15 अप्रेल 2016 को भोपाल के राष्ट्रीए न्यायिक अकादमी में तीन दिवसीय कार्यक्रम मे पहले दिन उच्चतम न्यायलय के मुख न्यायधीश श्री टी॰ एस ॰ ठाकुर तथा अन्य न्याधीशों को आंतरिक और बाहरी सुरक्षा पर लगभग एक घंटे के सम्बोधन मे राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार श्री अजित डोभाल ने कहा की राष्ट्रीए सुरक्षा एक गैर राजनीतिक और गैर पक्षपातपूर्ण विषय है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए, उन्होने कहा की न्यायिक त्वरित कारवाई के लिए न्यायलयों का अधिक से अधिक सहयोग चाहिए, राष्ट्रीए सुरक्षा के कारकों पर अपनी राष्ट्रीए योजना को विस्तार करते हुए उन्होने इस बात पर बल दिया की तकनीक, अनुसंधान तथा अन्वेषन कैसे आतंकवाद और आंतरिक उग्रवाद के खतरों का सामने करने में सहायक हो सकते है।
    एक सामान्य सिद्धान्त में राष्ट्रीए सुरेक्षा का मतलब होता है लोगों की सुरक्षा न की शासन के सर्वोकृष्ट की सुरक्षा। राष्ट्रीए सुरक्षा के नाम पर आँख बंद कर के हर बार सरकार का भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि कई बार राजनीतिक और दलगत कारको की वजहों से सीमा पर या आंतरिक सुरक्षा का हवाला दिया जाता है। उदाहरण के लिए सयुंक्त राज्य और इस्राइल के साथ कथित इस्लामिक आतंकवाद से भारत की साझा युद्ध सहमति एक तरह से उनके यहाँ जैसी आतंक को आमंत्रित करने की ओर बढ़ता कदम इस लिए प्रतीत होता है की युद्ध और रक्षा के बीच एक पतली पर बहुत ही स्पष्ट लकीर होती है तथा इस मौजूदा सुरक्षा समझोते की वजह रक्षा बाज़ार और हमारी अति संवेदेनशील अन्तराष्ट्रिय सीमाओं का राजनीतिकरण की मजबूरी ही नहीं जरूरत भी है । आतंक तो आतंक है लेकिन हर राष्ट्र में उसकी राजनीति तथा समाधान की नीति अलग होती है। मसलन कश्मीर और उत्तरपूर्व में समाज विरोधी या देश विरोधी गतिविधियों का कारण लगता भले ही सीमा पार प्रायोजित हो पर यह पूरी तरह से हमारी सरकारों की आलोकतांत्रिक नीतियाँ है, जिनकी वजह से मानवाधिकार का हनन होना और आक्रोश या संघर्ष की जमीन का बनना लाज़मी हो जाता है, जो एक राजनीतिक प्रश्न है, जिसका ताज़ा उदाहरण कुपवाड़ा और हंदवाड़ा की घटना है जो पी॰ डी॰ पी॰ और भा॰ ज॰ पा॰ के गठबंधन के कारण इसलिए लगता है की पी॰ डी॰ पी॰ की छवि नर्म अलगाओवादी वाली है जो पकस्तीनी मुद्रा, पूर्ण स्वतन्त्रता, इत्यादि का समर्थन करती हुए उस मध्यवर्ती क्षेत्र पर अपना कब्जा बरकरार रखती थी जो मुख्य धारा की राजनीति और कट्टर अलगाओवादी के बीच की थी, लेकिन गटबंधन के बाद वो जगह खाली उसी तरह हो गयी जिस तरह अस्सी के दसक मे नेशनल कोन्फ्रेंस और कॉंग्रेस के गठबंधन के बाद सत्ता से इत्तर नए मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट का गठन हुआ था और जिसके नेताओं ने हूरियत और हिजबूल मुजाहिदीन जैसी अलगाओवादी संगठनो का आधार रखा। कहने का अर्थ यह हैं की ये सारे समीकरण राजनीति की मौजूदा मांग की वजह से बनते हैं, बनते रहेंगे तथा इसका समाधान सिर्फ कानून व्यवस्था या सेना नहीं है जिनकी तैनाती लगभग पिछले पच्चीस साल से विरोध के बावजूद विशेष अधिकारो के साथ उन प्रदेशों मे है।
    ऐसी परिस्थिति में राष्ट्रीए सुरक्षा सलाहकार का सम्बोधन चौंकाने वाला ही नहीं अन्यायपूर्ण भी है। क्योंकि राष्ट्रीए सुरक्षा अब सिर्फ राजनीतिक या गैर राजनीतिक ना होकर शासन करने वाली राजनीतिक पार्टी के घरेलू या विदेश नीति पर निर्भर करता है। अलग अलग राजनीतिक पार्टियों और सामाजिक समूहों में राष्ट्रीएता को ले कर मतभेद हो सकता है, राष्ट्रीए सुरक्षा और मानवाधिकार का अंतरसंबंध असाधारण रूप से राजनीतिक और सामाजिक-आर्थिक विषय या कहें समस्या है। मानवाधिकार के सिद्धान्त और राष्ट्रीए सुरक्षा की नीति में इस बात को लेकर असहमिति है की सुरक्षा की मांग और मानवाधिकार के दावे के बीच लकीर कैसी हो तो फिर गैर-पक्षपातपूर्ण या गैर राजनीतिक बात कहाँ रह जाती है।
    हमे नहीं लगता की हमारे न्यायधीशों को राष्ट्रीए सुरक्षा सलाहकार की एकपक्षीय या पक्षपातपूर्ण सम्बोधन को सुनना जरूरी है और अगर यह जरूरी है भी तो ऐसे ही सम्बोधन का अवसर सामाजिक और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को भी मिलना चाहिए, जो हर समय संवैधानिक अधिकार के लिए उनका प्रतिनिधितव करते हैं जिनके साथ राष्ट्रिय सुरक्षा के नाम पर भेद-भाव किया जाता है। फिर ऐसा ही सम्बोधन आदिवासी, दलित, डर और असुरक्षा की वजह से सहमे और प्रतिरोध करते अल्पसंख्यक, हर समय बेघर होने का खौफ लिए झुगियों की आबादी, हाशिये पे खुदकशी करते किसान, भूमिहीन मजदूर, उत्पीड़ित महिलाओं, तथा कुपोषित बच्चों, की तरफ से भी होना चाहिए क्योंकि जिस भी नाम से इन्हे हम पहचानते हैं असल मे ये सब अपने अधिकारों और संसाधनो के असमान वितरण से सिर्फ “ वंचित ” हैं, और इन वंचितों को भी न्यायधीशों से राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार की ही तरह “अधिक सहयोग” और “ त्वरित कारवाई “ की अपेक्षा रखने का पूरा हक़ मिलना ही चाहिये।
    एक अवधारणा सी बन गयी है की मानवाधिकार राष्ट्रिय सुरक्षा की राह मे बाधक है, दलील यह की इतनी क्षति का जोखिम तो जमानती तौर पे लेना ही पड़ेगा, हर समय सिर्फ नियमों के तहत सफलता नहीं मिल सकती कभी कभी सीमा रेखा से बाहर जाना पड़ता है। परिणाम की लालसा अक्सर प्रक्रिया को नज़रअंदाज़ करने पर आमादा रहती है नहीं तो क्या सचमुच मानवाधिकार की शर्त इतनी कठिन है की इसी राज्य के नाक के नीचे ऐसी अवधारणा सिर्फ पनपती ही नहीं बल्कि अपने पूर्वाग्रहों से भरे दुराग्रहों के प्रति आग्रही भी हो जाती हैं। राष्ट्रिय सुरक्षा सलाहकार क्या यह नहीं जानते जब नियमों का पालन नहीं होगा तो न्याय नहीं होगा, और जब न्याय ही नहीं होगा तो न्यायधीशों की क्या जरूरत। क्या कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों और व्यक्तियों सुरक्षा किए बिना अपनी रक्षा कर सकता है, सच तो यह है की सिर्फ लोकतान्त्रिक अधिकारो की बहाली ही असल राष्ट्रिय सुरक्षा को सुनिश्चित कर सकती है। लोकतन्त्र पर प्रहार, अल्पसंख्यकों का राजनीतिक दुराव, आर्थिक विषमता तथा सामाजिक असौहार्द सिर्फ राष्ट्र ही नहीं दुनिया के लिए भी खतरा है, और यह बात मानव अधिकार की सार्वभौम घोषणा मे ही नहीं हमारे संविधिन की मूल भावना मे भी निहित है, और अगर ऐसा नहीं होता तो उसी समारोह मे दूसरे दिन के कार्यक्रम में महामहिम राष्ट्रिपती श्री प्रणब मुखर्जी को यह कहने की जरूरत नहीं पड़ती की “न्यायधीशों को आत्म अनुशासन में रहना चाहिये क्योंकि न्यायिक सक्रियता से न्यायपालिका की स्वतन्त्रता को खतरा है तथा प्राधिकार की इस्तेमाल करते समय संतुलन का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिये जो की एक संवैधानिक वयवस्था है” प्राधिकार के इस्तेमाल में संतुलन इसलिए भी जरूरी है की विधायिका और कार्यपालिका न्यायिक समीक्षा के अंतर्गत आते हैं और इनकी पक्षपात रहित समीक्षा के लिए न्यायालय का स्वतंत्र और आत्म अनुशासन में रहना पहली शर्त है। न्यायिक समीक्षा संविधान के बुनियादी सिद्धान्त में निहित है और इसमे किसी तरह का अतिक्रमण नहीं होना चाहिये भले ही कोई कानून या संसोधन इसकी इजाजत ही क्यों ना देते हों।
    कानूनी मामलो की बेहिसाब बढ़ती संख्या और न्यायधीशों की कमी के अत्याधिक तनाव व दबाव में खुद उच्चतम न्यायालय का मानना है की हमारे पास इस बात के साक्ष्य और अनुभव हैं की कई मौकों पर सर्वोच्य नयायालय द्वारा कथित आतंक विरोधी कानून की संवैधानिकता तथा उसके आधार पर दिये गए फैसलों में कुछ नयायधीश राष्ट्रीए सुरक्षा को ले कर अति संवेदिनशील या न्यायिक अतिसक्रियता जैसी स्थिति में फैसला देते हैं, और ऐसा करते समय वे पूरी तरह से समझते हैं की इन क़ानूनों का कितना दुरुपयोग होता है या हो सकता है। सबसे पहले तो इसे स्वीकार करने की जरूरत हैं। इसका उदाहरण विगत के कुछ मृतुदण्ड के फैसलो में देखा जा सकता है जहां शायद अतिसक्रियता के कारण अपने ही मानदंडों को नज़रअंदाज़ कर फैसले लिए गए, राजद्रोह के एक मामले में अन्तरिम जमानत का फैसला लिखते समय एक माननीय नयायाधीश महोदया इतनी अतिसक्रियता के प्रभाव मे थी की नयायशास्त्र के शब्द से इतर उन्हे सिनेमा के गीत और चिकित्सा शास्त्र से शब्द उधार लेने पड़े, और तेईस पन्नो के अंतरिम जमानत के फैसले की आलोचना करते हुए कुछ कानून के जानकारों ने यहाँ तक कहा की यह एक स्मारिकीय फैसला इस संदर्भ मे है की भविष्य के फैसलो में यह ये यह तय करने मे मदद करेगा की फैसलों में क्या “नहीं” लिखा जाना चाहिए। भौतिक शास्त्र से एक शब्द अगर उधार लिया जाय तो हम कह सकते हैं की यह फैसला अतिसक्रियता के ” गृत्वाकर्षण“ से मुक्त नहीं हो पाया।
    -और अंत मे हरिसंकर परसाई रचनावली के खंड दो से एक लघु व्यंग “क्रांति हो गयी” जो आज की राजनीति में भी प्रासंगिक है,
    एक समय किसी देश में चारों ओर क्रांति की पुकार उठने लगी ।
    अन्याय – पीड़ित, शोषित वर्ग के अधिकारों की मांग एकदम उभर पड़ी।
    सर्वत्र एक ही मांग गूंज रही थी – क्रांति ! क्रांति! क्रांति!
    कारखानो के मजदूर छुट्टी के समय जब गंदे कपड़ों मे बंधी सुखी रोटियाँ निकाल उन्हे पानी के सहारे कण्ठ से नीचे उतारते तो एक ही बात कहते –अब क्रांति होनी ही चाहिए।
    शिक्षक पढ़ाते हुए और किसान हल जोतते हुए क्रांति की बात सोंचते।
    होटल में , बाज़ार में, बसों में, रेल में, चौराहों पर चौपालों पर एक ही स्वर उठता था। क्रांति चाहिए ! क्रांति चाहिए !
    कवि अपने गीतों में क्रांति का आह्वान करते।
    लेखक तरुणाई को गर्म खून की सौगंध देकर क्रांति के लिए उभारते।
    एक ही स्वर धरती से उठकर आसमान को छेद रहा था – क्रांति ! क्रांति ! क्रांति !
    राज्यसत्ता क्रांति की इस पुकार से भयभीत हुई । राजा का हृदय दहला। मंत्री घबराए। नौकरसाह सकपकाए। सत्ता, वैभब, एश्वर्य उन्हे हाथ से खिसकते नज़र आए।
    राजा ने मंत्रियों को बुलाया और उनसे सलाह की। उन्होने एक तरकीब निकाली।
    तीन दिनो बाद देश के तमाम अखबारों मे पहिले पृस्ठ पर मोटे-मोटे अक्षरों में उस बड़े व्यापारी का यह वक्तव्य छपा- “क्रांति होनी चाहिए। मनुष्य को मनुष्य का अधिकार मिलना ही चाहिए। जनता की सच्ची सरकार कायम होनी चाहिए।
    उस राज्य में बड़े-बड़े व्यापारियों के चिकने पन्नोवाले, सुंदर कवर के, अनेक खूबसूरत अखबार निकलते थे। सबने उसकी बात को प्रमुखता से छापा। वह बड़ा व्यापारी था। सब लोग उसे जानते थे। उसका नाम सबने सुना था। लोगों ने कहा “कैसा निर्भीक है!”
    बस वह सवेरे व्यापारी था, शाम को नेता हो गया।
    इधर अनेक देशभक्त, क्रांतिवीर, किसानो और मजदूरों में क्रांति की तैयारी कर रहे थे।
    कुछ दिनो बाद उसस व्यापारी ने तमाम व्यापारियों को मिला कर ‘क्रांतिकारी दल’ की स्थापना कर ली।
    और एक दिन देश के तमाम अखबारों में उस व्यापारी की विभिन्न तसवीरों के साथ छापा- ‘क्रांति हो गयी ! राजसत्ता पलट गयी !राजा गद्दी से उतार दिया गया ! क्रांतिकारी दल ने सरकार को खरीद लिया। अब जनता के सच्चे प्रतिनिधि क्रांतिकारी दल का राज्य होगा।‘
    अखबारों में बात छपी तो सर्वत्र फैली और गूंजी- क्रांति हो गयी !, क्रांति हो गयी !
    और लोगों ने सोंचा – ‘अब करने को क्या रह गया? क्रांति तो हो गयी ।‘
    और सर्वत्र मरघट सी मुर्दानि छा गयी। लोग निष्क्र्यि हो गए। सब पहले जैसा ही चलता रहा। राजा वही, मंत्री वही, नौकरशाही वही। वही अन्याय, वही शोषण, लेकिन लोग शान्त। उन्होने मान लिया की क्रांति हो गयी ।
    और इधर क्रांति करने वाले वीर सोंचने लगे – यह क्रांति बिना किए कैसे हो गयी !

Leave a Reply